कूर्म महा पुराण
17 अध्याय
भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन
व्यास उवाच
नाद्याच्छूद्रस्य विप्रोऽन्नं मोहाद्वा यदि वान्यतः।
स शूद्रयोनि व्रजति यस्तु भुङ्क्ते ह्यनापदि ॥१॥
षण्मासान् यो द्विजो भुङ्क्ते शूद्रस्यान्नं विगर्हितम् ।
जीवन्नेव भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते॥२॥
व्यासजीने कहा-ब्राह्मणको मोहसे अथवा अन्य किसी दूसरे कारणसे शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये। जो अनापत्तिकालमें शूद्रका अन्न भक्षण करता है, वह शूद्रयोनिको प्राप्त होता है। जो द्विज छ: महीनेतक लगातार शूद्रका गर्हित अन्न खाता है, वह जीते हुए शूद्र हो जाता है और मृत्युके बाद श्वान-योनिमें जन्म लेता है॥ १-२॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रस्य च मुनीश्वराः।
यस्यान्नेनोदरस्थेन मृतस्तद्योनिमाप्नुयात्॥३॥
हे मुनीश्वरो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र- इनमेंसे जिसका अन्न मृत्युके समय जिसके उदरमें रहता है, उसे उसीकी योनि प्राप्त होती है (अर्थात् ब्राह्मणका अन्न उदरमें मृत्युके समय है तो ब्राह्मण-योनि प्राप्त होगी आदि-आदि) ॥३॥
राजान्नं नर्तकान्नं च तक्ष्णोऽन्नं चर्मकारिणः।
गणान्नं गणिकान्नं च षण्ढान्नं चैव वर्जयेत्॥४॥
चक्रोपजीविरजकतस्करध्वजिनां तथा।
गान्धर्वलोहकारानं सूतकान्नं च वर्जयेत्॥५॥
राजा, नर्तक, बढ़ई, चर्मकार, गण (सौ ब्राह्मणोंका संघ), गणिका और नपुंसकके अन्नका परित्याग करना चाहिये। चक्रके आधारपर अपनी जीविका चलानेवाला (तैलिक-तेली)२, धोबी, चोर, ध्वजी३ (मद्यविक्रय- जीवी), गायक, लौहकार और सूतकके अन्नका त्याग करना चाहिये ॥४-५॥
कुलालचित्रकर्मान्नं वाधुषेः पतितस्य च।
पौनर्भवच्छत्रिकयोरभिशस्तस्य चैव हि॥ ६ ॥
सुवर्णकारशैलूषव्याधबद्धातुरस्य
चिकित्सकस्य चैवान्नं पुंश्चल्या दण्डिकस्य च॥ ७ ॥
स्तननास्तिकयोरन्नं देवतानिन्दकस्य च।
सोमविक्रयिणश्चान्नं श्वपाकस्य विशेषतः॥ ८ ॥
भार्याजितस्य चैवान्नं यस्य चोपपतिहे।
उत्सृष्टस्य कदर्यस्य तथैवोच्छिष्टभोजिनः॥ ९॥
कुम्भकार, चित्रकार, वाधुषि' (कर्ज देकर सूदसे जीविका चलानेवाले), पतित, विधवाके पुनर्विवाहके अनन्तर अथवा पति-परित्यक्तासे उत्पन्न पुरुष, छत्रिक (नापित), अभिशस्त (चोरी, मैथुन आदि आरोपसे ग्रस्त), स्वर्णकार, नट, व्याध, बन्धनप्राप्त, आतुर (रोगी), चिकित्सक, व्यभिचारिणी स्त्री तथा दण्डधर (दण्ड देनेवाले, नियामक-जल्लाद आदि)-का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। चोर, नास्तिक, देवनिन्दक, सोमलता-विक्रयी तथा विशेषरूपसे चाण्डालका और स्त्रीके वशीभूत तथा जिसके घरमें उस स्त्रीका उपपति हो, (समाजद्वारा) परित्यक्त, कृपण और जूठा भोजन करनेवालेका अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये॥६-९॥
अपाङ्क्त्यान्नं च सङ्घान्नं शस्त्राजीवस्य चैव हि।
क्लीबसंन्यासिनोश्चान्नं मत्तोन्मत्तस्य चैव हि।
भीतस्य रुदितस्यान्नमवक्रुष्टं परिक्षुतम्॥१०॥
ब्रह्मद्विषः पापरुचेः श्राद्धान्नं सूतकस्य च।
वृथापाकस्य चैवान्नं शावान्नं श्वशुरस्य च॥११॥
अप्रजानां तु नारीणां भृतकस्य तथैव च।
कारुकानं विशेषेण शस्त्रविक्रयिणस्तथा॥१२॥
पंक्तिसे बहिष्कृत, समूहके आश्रित, शस्त्रसे आजीविका चलानेवाला, क्लीब (नपुंसक), संन्यासी, मत्त, उन्मत्त, भयभीत, रोते हुए व्यक्तिके तथा अभिशप्त एवं छींक से अशुद्ध अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये। ब्राह्मण से द्वेष करनेवालों, पापबुद्धि, श्राद्ध तथा अशौचसम्बन्धी
अन्न, निष्प्रयोजन बने हुए भोजन (ईश्वर-समर्पणबुद्धि से न बना हुआ), शव-सम्बन्धी तथा ससुरका अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिये। बिना संतानवाली स्त्री, भृत्य, शिल्पी (कारीगर') तथा शस्त्रविक्रयीका अन्न विशेष रूप से त्याग करना चाहिये॥१०-१२॥
शौण्डान्नं घाटिकानं च भिषजामन्नमेव च।
विद्धप्रजननस्यान्नं परिवित्त्यन्नमेव च॥१३॥
पुनर्भुवो विशेषेण तथैव दिधिषूपतेः।
अवज्ञातं चावधूतं सरोषं विस्मयान्वितम्।
गुरोरपि न भोक्तव्यमन्नं संस्कारवर्जितम्॥१४॥
शौण्ड (मद्य बनानेवाले जातिविशेषके लोग), स्तुति करनेवाले 'भाट'-जातिके लोगों, भिषक् (जिससे रोग भयभीत हो), विद्धलिंगी और ज्येष्ठ भाईके अविवाहित रहनेपर विवाह कर लेनेवाले छोटे भाईका अन्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। दो बार विवाह करनेवाली स्त्री तथा ऐसी स्त्रीके पतिका अन्न विशेषरूपसे त्याज्य है। अनादरपूर्वक दिया गया, तिरस्कारपूर्वक दिया गया, रोष एवं अभिमानपूर्वक दिया हुआ अन्न, इसी प्रकार गुरुके संस्कारहीन अन्नको ग्रहण नहीं करना चाहिये॥१३-१४॥
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दुष्कृतं हि मनुष्यस्य सर्वमन्ने व्यवस्थितम्।
यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्बिषम्॥१५॥
मनुष्यका किया हुआ सारा पाप अन्नमें स्थित रहता है। इसलिये जो जिसका अन्न ग्रहण करता है, वह उसके पापका ही भक्षण करता है ॥१५॥
आद्धिकः कुलमित्रश्च स्वगोपालश्च नापितः।
एते शूद्रेषु भोज्याना यश्चात्मानं निवेदयेत्॥१६॥
कुशीलवः कुम्भकारः क्षेत्रकर्मक एव च।
एते शूद्रेषु भोज्याना दत्त्वा स्वल्पं पणं बुधैः ॥ १७॥
पायसं स्नेहपक्वं यद् गोरसं चैव सक्तवः।
पिण्याकं चैव तैलं च शूद्राद् ग्राह्यं द्विजातिभिः॥१८॥
आद्धिक (जो शूद्र द्विजातिके घर हल जोतकर उसके पारिश्रमिक-रूपमें अन्न प्राप्त करता है), कुलमित्र (पिता-पितामहकी परम्परासे जो द्विजातिके घर रहता आया है तथा अभिन्न सहयोगी है), जो अपने गौओं का पालन करनेवाला है, नापित तथा जिस शूद्रने मन, वाणी और कर्मसे सर्वथा स्वयंको 'मैं आपका ही हूँ'- इस रूपमें समर्पित कर दिया है-ऐसे शूद्रका अन्न ग्रहण किया जा सकता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको शूद्रों में नाटक आदिसे जीविका चलानेवालों (चारण, कत्थक), कुम्हार और खेतमें काम करनेवालोंका अन्न थोड़ा मूल्य देकर ग्रहण करना चाहिये। द्विजातियोंद्वारा दूधका' विकार-मक्खन-खोआ आदि, घृतमें पके पदार्थ, गोरस (दूध), सत्तू, पिण्याक (खली, शिलाजीत, केसर, हींग इत्यादि) तथा तेल-ये पदार्थ शूद्रोंसे ग्रहण किये जा सकते हैं॥१६-१८॥
वृन्ताकं नालिकाशाकं कुसुम्भाश्मन्तकं तथा।
पलाण्डं लशुनं शुक्तं निर्यासं चैव वर्जयेत्॥१९॥
छत्राकं विड्वराहं च शेलुं पेयूषमेव च।
विलयं सुमुखं चैव कवकानि च वर्जयेत्॥२०॥
गृञ्जनं किंशुकं चैव ककुभाण्डं तथैव च।
उदुम्बरमलाबुं च जग्ध्वा पतति वै द्विजः॥२१॥
बैगन, नालिकासागर, कुसुम्भ (पुष्पविशेष), अश्मन्तक, प्याज, लहसुन, शुक्त और वृक्ष के गोंदका परित्याग करना चाहिये। छत्राक, विड्वराह (ग्राम्य-सूकर), शेलु (वनमेथी), पेयूष, विलय, सुमुख, कवक, (कुकुरमुत्ता), किंशुक (पलाश),
ककुभाण्ड, उदुम्बर (गूलर) तथा अलाबु (वर्तुलाकार-गोल लौकी)-का भक्षण करनेसे द्विज पतित हो जाता है॥१९-२१॥
वृथा कृशरसंयावं पायसापूपमेव च।
अनुपाकृतमांसं च देवान्नानि हवींषि च॥२२॥
यवागूं मातुलिङ्गं च मत्स्यानप्यनुपाकृतान्।
नीपं कपित्थं प्लक्षं च प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥२३॥
पिण्याकं चोद्धृतस्नेहं देवधान्यं तथैव च।
रात्रौ च तिलसम्बद्धं प्रयत्नेन दधि त्यजेत् ।। २४॥
नाश्नीयात् पयसा तक्रं न बीजान्युपजीवयेत्।
क्रियादुष्टं भावदुष्टमसत्संगं च वर्जयेत्॥ २५ ।।
देवताके उद्देश्यसे नहीं केवल अपने लिये पकाये गये कृशरान (तिल-चावलके बने पदार्थ), संयाव (लपसी), खीर एवं पुआका तथा देवान (देवताके लिये समर्पित अन्न), हवनके योग्य द्रव्य (पुरोडाश आदि), यवागू (जौकी काँजी), मातुलिंग (बिजौरा नीबू), देव-पित्र्यकर्ममें कदम्ब, कपित्थ (कैथ) और प्लक्ष (पर्कटी-पाकड़)-का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। तेल निकाली हुई खली, देवताका धान्य और रात्रिमें तिल-सम्बन्धी पदार्थ तथा दहीका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। दूधके साथ मढेका सेवन नहीं करना चाहिये। बीजोंके द्वारा जीविकाका निर्वाह नहीं करना चाहिये। कर्मसे दूषित और भावसे दूषित तथा दुर्जनोंसे सम्बन्धका परित्याग करना चाहिये॥ २२–२५ ॥
केशकीटावपन्नं च सहल्लेखं च नित्यशः।
श्वाघ्रातं च पुनः सिद्धं चण्डालावेक्षितं तथा॥२६॥
उदक्यया च पतितैर्गवा चाघ्रातमेव च।
अनर्चितं पर्युषितं पर्यायान्नं च नित्यशः ॥२७॥
काककुक्कुटसंस्पृष्टं कृमिभिश्चैव संयुतम्।
मनुष्यैरप्यवघ्रातं कुष्ठिना स्पृष्टमेव च॥२८॥
न रजस्वलया दत्तं न पुंश्चल्या सरोषया।
मलवद्वाससा वापि परवासोऽथ वर्जयेत्॥२९॥
विवत्सायाश्च गोः क्षीरमौष्ट्रं वानिर्दशं तथा।
आविकं सन्धिनीक्षीरमपेयं मनुरब्रवीत्॥३०॥
केश (बाल) और कीड़ोंसे युक्त, जिस अन्नको लेकर मनमें विचिकित्सा हो, कुत्तेद्वारा सूंघा हुआ, दुबारा पकाया गया, चाण्डाल, रजस्वला तथा पतित के द्वारा देखा गया और गाय-बैल आदि गोजातिद्वारा सूंघा हुआ, अनादरपूर्वक प्राप्त, बासी तथा पर्यायानका' नित्य परित्याग करना चाहिये। कौआ एवं मुर्गासे स्पृष्ट, कृमि-युक्त, मनुष्योंद्वारा सूंघे गये तथा कुष्ठ रोगीसे स्पर्श किये गये अन्नका परित्याग करना चाहिये। रजस्वलासे प्राप्त, क्रोधयुक्त व्यभिचारिणी स्त्रीद्वारा दिया गया और मलिन वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्ति के द्वारा (दिये अन्नका) और दूसरेके वस्त्रका परित्याग करना चाहिये। मनुने बताया है कि बछड़े-रहित गौ, ऊँटनी और दस दिनोंके भीतर ब्यायी हुई (गौ
इत्यादि)-का दूध तथा भेड़ी एवं गर्भिणी गौका दूध पीने योग्य नहीं है॥२६-३०॥
बलाकं हंसदात्यूहं कलवित शुकं तथा।
कुररं च चकोरं च जालपादं च कोकिलम्॥३१॥
वायसं खञ्जरीटं च श्येनं गृधं तथैव च।
उलूकं चक्रवाकं च भासं पारावतानपि।
कपोतं टिट्टिभं चैव ग्रामकुक्कुटमेव च॥३२॥
सिंहव्याघ्रं च मार्जारं श्वानं शूकरमेव च।
शृगालं मर्कटं चैव गर्दभं च न भक्षयेत्॥३३॥
न भक्षयेत् सर्वमृगान् पक्षिणोऽन्यान्वनेचरान्।
जलेचरान् स्थलचरान् प्राणिनश्चेति धारणा ॥३४॥
गोधा कूर्मः शशः श्वाविच्छल्यकश्चेति सत्तमाः।
भक्ष्याः पञ्चनखा नित्यं मनुराह प्रजापतिः॥३५॥
मत्स्यान् सशल्कान् भुञ्जीयान्मांसं रौरवमेव च।
निवेद्य देवताभ्यस्तु ब्राह्मणेभ्यस्तु नान्यथा ॥३६॥
मयूरं तित्तिरं चैव कपोतं च कपिञ्जलम्।
वाधीणसं वकं भक्ष्यं मीनहंसपराजिताः॥३७॥
शफरं सिंहतुण्डं च तथा पाठीनरोहितौ।
मत्स्याश्चैते समुद्दिष्टा भक्षणाय द्विजोत्तमाः॥३८॥
प्रोक्षितं भक्षयेदेषां मांसं च द्विजकाम्यया।
यथाविधि नियुक्तं च प्राणानामपि चात्यये॥३९॥
भक्षयेन्नैव मांसानि शेषभोजी न लिप्यते।
औषधार्थमशक्तौ वा नियोगाद् यज्ञकारणात्॥ ४०॥
आमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे दैवे वा मांसमुत्सृजेत्।
यावन्ति पशुरोमाणि तावतो नरकान् व्रजेत्।। ४१॥
अदेयं चाप्यपेयं च तथैवास्पृश्यमेव च।
द्विजातीनामनालोक्यं नित्यं मद्यमिति स्थितिः॥४२॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्यं नित्यं विवर्जयेत्।
पीत्वा पतति कर्मभ्यस्त्वसम्भाष्यो भवेद् द्विजः॥४३॥
भक्षयित्वा ह्यभक्ष्याणि पीत्वाऽपेयान्यपि द्विजः।
नाधिकारी भवेत् तावद्द्यावद् तन्न जहात्यधः॥४४॥
तस्मात् परिहरेन्नित्यमभक्ष्याणि प्रयत्नतः।
अपेयानि च विप्रो वै तथा चेद् याति रौरवम्॥४५॥
द्विजोंके लिये मद्य न दान देने योग्य है, न पीने योग्य है, न स्पर्श करने योग्य है और न ही देखने योग्य है-ऐसी हमेशाके लिये मर्यादा बनी है। इसलिये सब प्रकारसे मद्यका नित्य ही परित्याग करना चाहिये। मद्य पीनेसे द्विज कर्मोंसे पतित और बातचीत करनेके अयोग्य हो जाता है। अभक्ष्यका भक्षण करने और अपेय पदार्थोंका पान करनेसे द्विज तबतक अपने कर्मका अधिकारी नहीं होता, जबतक उसका पाप दूर नहीं हो जाता। इसलिये प्रयत्नपूर्वक नित्य ही विप्र (द्विज)-को अभक्ष्य एवं अपेय पदार्थों का परित्याग करना चाहिये। यदि द्विज ऐसा करता है अर्थात् इन्हें ग्रहण करता है तो उसे रौरव नरकमें जाना पड़ता है॥ ४२-४५ ॥
Summary of chapter 66 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vedavyāsa presents the precise rules of bodily and spiritual purification (Shaucha) and the ritual of Āchamana. He outlines the appropriate situations requiring Āchamana, such as after taking food, sleeping, sneezing, or touching unholy objects, specifying the use of clean, foam-free water through the Brāhma-tīrtha. Vyāsa emphasizes that inner purity of mind combined with outer physical cleanliness forms the essential foundation for all Vedic rites and spiritual practices.