21 अध्याय

श्राद्ध-प्रकरणमें निमन्त्रणके योग्य पंक्तिपावन ब्राह्मणों तथा त्याज्य

पंक्ति-दूषकोंके लक्षण

व्यास उवाच

स्नात्वा यथोक्तं संतर्प्य पितॄश्चन्द्रक्षये द्विजः।

पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यात् सौम्यमनाः शुचिः॥१॥

पूर्वमेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम्।

तीर्थं तद् हव्यकव्यानां प्रदाने चातिथिः स्मृतः॥२॥

व्यासजी बोले-द्विजको चाहिये कि चन्द्रमाके क्षय होनेपर अर्थात् अमावास्याको स्नानकर यथोक्त रीतिसे पितरोंका तर्पण करके शान्तचित्त होकर तथा पवित्रतापूर्वक पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करे। (श्राद्धसे) पूर्व ही वेदमें पारंगत विद्वान् ब्राह्मणका अन्वेषण करना चाहिये, क्योंकि उसे ही (वेदपारग ब्राह्मणको ही) हव्य, कव्य, तीर्थ और दानका अतिथि (अधिकारी) कहा गया है॥१-२॥

ये सोमपा विरजसो धर्मज्ञाः शान्तचेतसः।

व्रतिनो नियमस्थाश्च ऋतुकालाभिगामिनः॥३॥

पञ्चाग्निरप्यधीयानो यजुर्वेदविदेव

बढचश्च त्रिसौपर्णस्त्रिमधुर्वाथ यो भवेत्॥४॥

जो सोमपायी, रजोगुणसे हीन, धर्मको जाननेवाले, शान्तचित्त, व्रतपरायण, नियममें स्थित, ऋतुकालमें गमन करनेवाले हैं (वे ब्राह्मण पंक्तिपावन हैं)। पञ्चाग्निका सेवन करनेवाला, अध्ययनशील, यजुर्वेदका ज्ञाता, बच् (ऋग्वेदी) त्रिसौपर्ण तथा त्रिमधु' अर्थात् ऋग्वेदके अंश-विशेषका अध्येता, ॥३-४॥

त्रिणाचिकेतच्छन्दोगो ज्येष्ठसामग एव च।

अथर्वशिरसोऽध्येता रुद्राध्यायी विशेषतः॥ ५ ॥

त्रिणाचिकेत' (यजुर्वेदके अंशविशेषका अध्येता) छन्दोग२ (सामवेदका ज्ञाता) ज्येष्ठसामग३–ज्येष्ठसाम (सामगान) तथा अथर्ववेदका अध्येता और विशेषरूप से रुद्राध्याय का अध्ययन करनेवाला (ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है)॥५॥

अग्निहोत्रपरो विद्वान् न्यायविच्च षडङ्गवित्।

मन्त्रब्राह्मणविच्चैव यश्च स्याद् धर्मपाठकः॥ ६ ॥

ऋषिव्रती ऋषीकश्च तथा द्वादशवार्षिकः।

ब्रह्मदेयानुसंतानो गर्भशुद्धः सहस्रदः॥ ७ ॥

चान्द्रायणव्रतचरः सत्यवादी पुराणवित्।

गुरुदेवाग्निपूजासु प्रसक्तो ज्ञानतत्परः॥ ८ ॥

विमुक्तः सर्वतो धीरो ब्रह्मभूतो द्विजोत्तमः ।

महादेवार्चनरतो वैष्णवः पंक्तिपावनः॥ ९ ॥

अहिंसानिरतो नित्यमप्रतिग्रहणस्तथा।

सत्रिणो दाननिरता विज्ञेया: पंक्तिपावनाः॥१०॥

अग्निहोत्रपरायण, विद्वान्, न्यायवेत्ता, वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष-इन छ: अङ्गोंको जाननेवाला, वेदके मन्त्रभाग एवं ब्राह्मण- भागको जाननेवाला तथा धर्मशास्त्र को पढ़नेवाला, ऋषियों के व्रतों का पालन करनेवाला, ऋषीक, बारह वर्षों तक चलनेवाले व्रत, यज्ञ (सत्र)-का करनेवाला, ब्राह्म- विवाहद्वारा उत्पन्न संतान, गर्भाधानादि संस्कारसे शुद्ध और सहस्रों (शिष्योंको विद्या) दान करनेवाला (ब्राह्मण) पंक्तिपावन होता है। चान्द्रायणव्रत करनेवाला, सत्यवादी, पुराण जाननेवाला, गुरु, देवता और अग्निकी पूजा में आसक्त, ज्ञानपरायण, आसक्ति आदिसे सर्वथा मुक्त, धीर, ब्रह्मज्ञानी, महादेवको पूजामें निरत रहनेवाला तथा वैष्णव श्रेष्ठ द्विज पंक्तिपावन होता है। नित्य अहिंसा- व्रतपरायण, अप्रतिग्रही, यज्ञ करनेवाले और दान देने- वाले (ब्राह्मणों)-को पंक्तिपावन जानना चाहिये॥६-१०॥

युवानः श्रोत्रियाः स्वस्था महायज्ञपरायणाः।

सावित्रीजापनिरता ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥११॥

कुलीनाः श्रुतवन्तश्च शीलवन्तस्तपस्विनः।

अग्निचित्स्नातका विप्रा विज्ञेया: पंक्तिपावनाः ॥१२॥

श्रोत्रिय, स्वस्थ, महायज्ञ-परायण, गायत्री-जप करनेमें निरत ब्राह्मण युवक (सामर्थ्यसम्पन्न) पंक्तिपावन होते हैं। कुलीन, ज्ञानवान्, शीलवान्, तपस्वी एवं अग्निका चयन करनेवाले स्नातक ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन जानना चाहिये ॥११-१२॥

मातापित्रोर्हिते युक्तः प्रातःस्नायी तथा द्विजः ।

अध्यात्मविन्मुनिर्दान्तो विज्ञेयः पंक्तिपावनः ॥१३॥

ज्ञाननिष्ठो महायोगी वेदान्तार्थविचिन्तकः।

श्रद्धालुः श्राद्धनिरतो ब्राह्मण: पंक्तिपावनः॥१४॥

वेदविद्यारतः स्नातो ब्रह्मचर्यपरः सदा।

अथर्वणो मुमुक्षुश्च ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥१५॥

असमानप्रवरको सगोत्रस्तथैव च।

असम्बन्धी च विज्ञेयो ब्राह्मण: पंक्तिपावनः॥१६॥

माता-पिताके हितमें लगे हुए, प्रातःस्नान करनेवाले, अध्यात्मवेत्ता, मुनि एवं दान्त ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन समझना चाहिये। ज्ञाननिष्ठ, महायोगी, वेदान्तके अर्थका विशेष चिन्तन करनेवाले, श्रद्धासम्पन्न तथा श्राद्धनिरत ब्राह्मण पंक्ति-पावन होते हैं। वेदविद्यामें निरत, सदा ब्रह्मचर्य-परायण, अथर्ववेदका अध्ययन करनेवाला, मुमुक्षु, स्नातक ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है। असमान प्रवर, असमान गोत्र (-में सम्बन्ध करनेवाला) और असम्बन्धी (निषिद्ध सम्बन्धरहित) ब्राह्मणको पंक्तिपावन समझना चाहिये ॥ १३-१६॥

भोजयेद् योगिनं पूर्वं तत्त्वज्ञानरतं यतिम्।

अलाभे नैष्ठिकं दान्तमुपकुर्वाणकं तथा॥१७॥

तदलाभे गृहस्थं तु मुमुक्षु सङ्गवर्जितम् ।

सर्वालाभे साधकं वा गृहस्थमपि भोजयेत्॥१८॥

सर्वप्रथम तत्त्वज्ञानमें निरत संयतचित्त योगीको भोजन कराना चाहिये। अभाव होनेपर (अर्थात् ऐसा ब्राह्मण न मिलनेपर) इन्द्रियजयी नैष्ठिक ब्रह्मचारी (जो ब्रह्मचर्य- -व्रत स्वीकारकर यावज्जीवन गुरुकुलमें ही निवास करता है)-को और ऐसे ब्राह्मणके अभावमें उपकुर्वाणक (जो ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला है ऐसे ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। उसका भी अभाव होनेपर आसक्तिरहित मुमुक्षु गृहस्थ ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इन सभीके अभाव होनेपर साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको

भोजन कराना चाहिये ॥ १७-१८॥

प्रकृतेर्गुणतत्त्वज्ञो यस्याश्नाति यतिर्हविः।

फलं वेदविदां तस्य सहस्रादतिरिच्यते॥१९॥

तस्माद् यत्नेन योगीन्द्रमीश्वरज्ञानतत्परम्।

भोजयेद् हव्यकव्येषु अलाभादितरान् द्विजान्॥२०॥

प्रकृतिके गुण और तत्त्वको जाननेवाला (तत्त्ववेत्ता) यति (संयतचित्त ब्राह्मण) जिस (व्यक्ति)-का भोजन करता है, उसे (सहस्रों) वेदज्ञको भोजन करानेकी अपेक्षा भी सहस्रगुना अधिक फल मिलता है। इसलिये ईश्वरज्ञानमें तत्पर श्रेष्ठ योगीको देवकार्य एवं पितृकार्यमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इनकी प्राप्ति न होनेपर दूसरे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥ १९-२० ॥

एष वै प्रथमः कल्पः प्रदाने हव्यकव्ययोः।

अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः॥२१॥

मातामहं मातुलं च स्वसीयं श्वशुरं गुरुम्।

दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्॥२२॥

हव्य और कव्य प्रदान करनेमें यह प्रथम कल्प है। (इसके अभावमें) सज्जनों (वेदशास्त्रनिष्ठों)-द्वारा सदा अनुष्ठित इस अनुकल्पको जानना चाहिये-मातामह (नाना), मातुल (मामा), भांजा, ससुर, गुरु, दुहितापुत्र (नाती), विट्पति (जामाता), बन्धु (मौसी, बूआ एवं मामी आदिके पुत्र), ऋत्विक् तथा यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणको भोजन कराया जाय ॥ २१-२२ ॥

न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः।

पैशाची दक्षिणा सा हि नैवामुत्र फलप्रदा॥ २३ ॥

कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम्।

द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम्॥ २४॥

श्राद्धमें मित्रको भोजन नहीं कराना चाहिये। इनका संरक्षण (संग्रह) धनके आदान-प्रदानद्वारा करना चाहिये। (यदि श्राद्धमें मित्रको भोजन कराकर दक्षिणा दी जाय तो) ऐसी दक्षिणा पैशाची होती है। यह परलोकमें कोई फल नहीं देती। (किसी विशेष स्थिति या उपर्युक्त कल्प-अनुकल्पके अभावमें) श्राद्धमें भले ही मित्रका (यथोचित) सत्कार करे, किंतु अभिरूप (विद्वान्, मनोज्ञ) पात्र होनेपर भी शत्रुका सत्कार नहीं करना चाहिये, (क्योंकि) द्वेष रखनेवालेके द्वारा भुक्त हवि परलोकमें निष्फल होती है ॥ २३-२४ ॥

ब्राह्मणो हनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति।

तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ॥ २५॥

यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम्।

तथानृचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम्॥२६॥

यावतो ग्रसते पिण्डान् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित्।

तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तान् स्थूलांस्त्वयोगुडान्॥ २७॥

(वेदादिका) अध्ययन न करनेवाला ब्राह्मण तृणमें लगी अग्निके समान शान्त (निस्तेज) हो जाता है। उसे हव्य (यथासम्भव देव-पित्र्य-कार्यमें भोजनके लिये निमन्त्रण) नहीं देना चाहिये, क्योंकि भस्ममें हवन नहीं किया जाता है। जिस प्रकार ऊसर भूमिमें बीज बोनेवाला कुछ फल नहीं प्राप्त करता, उसी प्रकार वेद न जाननेवालेको हवि देनेसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। मन्त्रको न जाननेवाला वह ब्राह्मण देव और पितृकार्यमें जितने पिण्डों (ग्रासों)-को ग्रहण करता है, मृत्युके अनन्तर वह उतने ही स्थूल और प्रज्वलित लोहेके पिण्डों (ग्रासों)-का भक्षण करता है ।। २५-२७॥

अपि विद्याकुलैर्युक्ता हीनवृत्ता नराधमाः।

यत्रैते भुञ्जते हव्यं तद् भवेदासुरं द्विजाः ॥२८॥

यस्य वेदश्च वेदी च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।

स वै दुर्ब्राह्मणो नार्हः श्राद्धादिषु कदाचन ।। २९॥

शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः।

वधबन्धोपजीवी च षडेते ब्रह्मबन्धवः॥३०॥

हे द्विजो! विद्या-सम्पन्न तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी आचारहीन नीच मनुष्य दैव और पित्र्यकार्य में जो हव्य आदि ग्रहण करते हैं, वह (हव्यादि) आसुरी हो जाता है। जिसकी तीन पीढ़ीतक वेद और यज्ञ आदि का उच्छेद हो जाता है, वह दुर्ब्राह्मण होता है, वह श्राद्ध आदिमें कभी भी पूजाके योग्य नहीं होता। शूद्रका नौकर, राजासे वेतन लेनेवाला, पतित (अधार्मिक), गाँवके पुरोहित, वध और बन्धनद्वारा जीविका चलानेवाले–ये छ: ब्रह्मबन्धु होते हैं ।। २८-३०॥

दत्तानुयोगान् वृत्त्यर्थं पतितान् मनुरब्रवीत्।

वेदविक्रयिणो ह्येते श्राद्धादिषु विगर्हिताः॥३१॥

श्रुतिविक्रयिणो ये तु परपूर्वासमुद्भवाः।

असमानान् याजयन्ति पतितास्ते प्रकीर्तिताः ॥३२॥

मनुने जीविकाके लिये नौकरी करनेवालेको पतित बतलाया है। ये सभी एवं वेदका विक्रय करनेवाले (ब्राह्मण) श्राद्ध आदि कार्योंमें निन्दित हैं। जो वेद का

विक्रय करनेवाले, हीन अथवा उच्चवर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न तथा असमान वर्णोंका पौरोहित्य करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं। ३१-३२।।

असंस्कृताध्यापका ये भृत्या वाध्यापयन्ति ये।

अधीयते तथा वेदान् पतितास्ते प्रकीर्तिताः॥३३॥

वृद्धश्रावकनिर्ग्रन्थाः पञ्चरात्रविदो जनाः।

कापालिकाः पाशुपताः पाषण्डा ये च तद्विधाः॥३४॥

यस्याश्नन्ति हवींष्येते दुरात्मानस्तु तामसाः।

न तस्य तद् भवेच्छाद्धं प्रेत्य चेह फलप्रदम्॥ ३५॥

जो असंस्कृतों (संस्काररहितों)-के अध्यापक हैं, वेतनके लिये अध्यापन तथा वेदाध्ययन करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं। वृद्ध श्रावक अर्थात् बौद्ध, निर्ग्रन्थ अर्थात् जैन, पाञ्चरात्रके ज्ञाता, कापालिक, पाशुपत (सम्प्रदायविशेषके) और उसी प्रकारके पाखंडी, तमोगुणी, दुरात्मा व्यक्ति-ये जिसके हविष्यानका भक्षण करते हैं, उसका किया श्राद्ध न तो इस लोकमें फल देनेवाला होता है और न परलोकमें ॥ ३३-३५ ॥

अनाश्रमी यो द्विजः स्यादाश्रमी वा निरर्थकः।

मिथ्याश्रमी च ते विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिदूषकाः ॥३६॥

जो द्विज (ब्राह्मण) यथाविधि आश्रमको स्वीकार करनेवाले नहीं हैं अथवा नाममात्रके लिये किसी आश्रमका आश्रय लिये हैं, वे मिथ्याश्रमी कहे गये हैं, उन्हें पंक्तिदूषक समझना चाहिये॥ ३६॥

दुश्चर्मा कुनखी कुष्ठी श्वित्री च श्यावदन्तकः।

विद्धप्रजननश्चैव स्तेन: क्लीबोऽथ नास्तिकः॥३७॥

मद्यपो वृषलीसक्तो वीरहा दिधिषूपतिः।

आगारदाही कुण्डाशी सोमविक्रयिणो द्विजाः॥३८॥

विकारयुक्त चर्म एवं नखवालों, कुष्ठरोगी, श्वेत कुष्ठरोगी, स्वभावतः काले दाँतवाला, विद्ध लिङ्गवाला, चोर, नपुंसक, नास्तिक, मद्य पीनेवाला, शूद्रा स्त्रीमें

आसक्त, वीरहा (वह अग्निहोत्री जिसका अग्निहोत्र नष्ट हो गया है), विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवाला, घर को जलानेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते अन्य पुरुष से उत्पन्न संतान)- -का भोजन करनेवाला तथा सोमलता का विक्रय करनेवाला-इस प्रकारके ब्राह्मण (श्राद्धादि में त्याज्य हैं)॥ ३७-३८॥

परिवेत्ता तथा हिंस्रः परिवित्तिनिराकृतिः।

पौनर्भवः कुसीदी च तथा नक्षत्रदर्शकः॥३९॥

परिवेत्ता अर्थात् बड़े भाईके अविवाहित अथवा अनग्निक रहते हुए विवाह तथा अग्नि स्वीकार करनेवाला छोटा भाई, हिंसा करनेवाला, परिवित्ति-(छोटे भाईके विवाहित होनेसे पहले अविवाहित रहनेवाला बड़ा भाई), निराकृति अर्थात् पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान न करनेवाला, पौनर्भव* (दूसरे पतिसे उत्पन्न पुत्र), ब्याज लेनेवाला तथा नक्षत्रदर्शक (ज्योतिष से जीविका चलानेवाले)- -का श्राद्धादिमें परित्याग करना चाहिये ॥३९॥

गीतवादित्रनिरतो व्याधितः काण एव च।

हीनाङ्गश्चातिरिक्ताङ्गो ह्यवकीर्णिस्तथैव च॥ ४०॥

कन्यादूषी कुण्डगोलौ अभिशस्तोऽथ देवलः।

मित्रभुक् पिशुनश्चैव नित्यं भार्यानुवर्तकः॥४१॥

गाने-बजानेमें निरत, रोगी, काना, हीन अङ्गोंवाला, अधिक अङ्गोंवाला, अवकीर्णी (स्त्रीसे सम्पर्क कर ब्रह्मचर्यव्रत नष्ट करनेवाला), कन्याको दूषित करनेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते पर पुरुष से उत्पन्न संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद उपपतिसे उत्पन्न संतान), अभिशस्त (मिथ्यापवादग्रस्त), (देवल)-मन्दिर आदिसे आजीविका प्राप्त करनेवाले (पुजारी आदि), मित्रद्रोही, चुगली करनेवाला और नित्य भार्याके वशीभूत रहनेवाला-ये श्राद्धादिमें त्याज्य हैं ॥ ४०-४१॥

मातापित्रोणुरोस्त्यागी दारत्यागी तथैव च।

गोत्रभिद् भ्रष्टशौचश्च काण्डस्पृष्टस्तथैव च॥४२॥

अनपत्यः कूटसाक्षी याचको रङ्गजीवकः ।

समुद्रयायी कृतहा तथा समयभेदकः॥४३॥

देवनिन्दापरश्चैव वेदनिन्दारतस्तथा।

द्विजनिन्दारतश्चैते वाः श्राद्धादिकर्मसु॥४४ ।।

कृतघ्नः पिशुनः क्रूरो नास्तिको वेदनिन्दकः।

मित्रधुक् कुहकश्चैव विशेषात् पंक्तिदूषकाः ।। ४५ ॥

माता, पिता, गुरु तथा पत्नीका त्याग करनेवाला, सगोत्र (भाई-बन्धु)-में भेदबुद्धि पैदा करनेवाला, शौचभ्रष्ट (शौचाचारहीन), शस्त्रजीवी, संतानहीन, झूठी

गवाही देनेवाला, याचक, रंगद्वारा जीविकोपार्जन करनेवाला (चित्रकार, नाट्यकार), समुद्रकी यात्रा करनेवाला, कृतघ्न और प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेवाला, देवनिन्दापरायण, वेदनिन्दामें निरत तथा द्विजको निन्दा करनेवाला-ये सभी श्राद्धादि कर्मोंमें त्याज्य हैं। कृतघ्न, चुगली करनेवाला, क्रूर, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, मित्रद्रोही तथा ऐन्द्रजालिक (मायावी, दाम्भिक)-ये विशेषरूप से पंक्तिदूषक हैं ॥ ४२-४५॥

सर्वे पुनरभोज्यानास्त्वदानाश्चि कर्मसु।

ब्रह्मभावनिरस्ताश्च वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥४६॥

(उपर्युक्त) सभी प्रकारके व्यक्ति श्राद्ध में भोजन न कराने योग्य और सभी कर्मोंमें दानके अयोग्य होते हैं। ब्रह्मभावसे शून्य अर्थात् ब्राह्मणत्वसे च्युत व्यक्तियों का विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये ॥ ४६॥

शूद्रान्नरसपुष्टाङ्ग: संध्योपासनवर्जितः

महायज्ञविहीनश्च ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥४७॥

अधीतनाशनश्चैव स्नानहोमविवर्जितः।

तामसो राजसश्चैव ब्राह्मण: पंक्तिदूषकः ।। ४८॥

शूद्रके अन्न एवं रससे पुष्ट हुए अङ्गोंवाला, संध्योपासनासे रहित, पञ्चमहायज्ञोंसे शून्य ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है। पढ़े गये वेदादिका विस्मरण करनेवाला, स्नान एवं होमसे रहित, तमोगुणी तथा रजोगुणी ब्राह्मण

पंक्तिदूषक होता है॥ ४७-४८॥

बहुनात्र किमुक्तेन विहितान् ये न कुर्वते।

निन्दितानाचरन्त्येते वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥४९॥

अधिक क्या कहा जाय। जो शास्त्रविहित स्वकर्मों को नहीं करते और शास्त्रनिषिद्ध (निन्दित) कर्मोंका आचरण करते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक त्याग करने योग्य हैं॥४९॥