कूर्म महा पुराण
13 अध्याय
ब्रह्मचारीके नित्यकर्मकी विधि, आचमनका विधान, हाथोंमें स्थित तीर्थ, उच्छिष्ट
होनेपर शुद्धिकी प्रक्रिया, मूत्र-पुरीषोत्सर्गके नियम
व्यास उवाच
भुक्त्वा पीत्वा च सुप्त्वा च स्नात्वा रथ्योपसर्पणे।
ओष्ठावलोमको स्पृष्ट्वा वासो विपरिधाय च॥१॥
रेतोमूत्रपुरीषाणामुत्सर्गेऽयुक्तभाषणे
ष्ठीवित्वाध्ययनारम्भे कासश्वासागमे तथा॥२॥
चत्वरं वा श्मशानं वा समाक्रम्य द्विजोत्तमः।
संध्ययोरुभयोस्तद्वदाचान्तोऽप्याचमेत् पुनः॥३॥
चण्डालम्लेच्छसम्भाषे स्त्रीशूद्रोच्छिष्टभाषणे।
उच्छिष्टं पुरुषं स्पृष्ट्वा भोज्यं चापि तथाविधम्।
आचामेदश्रुपाते वा लोहितस्य तथैव च॥४॥
भोजने संध्ययोः स्नात्वा पीत्वा मूत्रपुरीषयोः।
आचान्तोऽप्याचमेत् सुप्त्वा सकृत्सकृदथान्यतः॥५॥
व्यासजी बोले-भोजन करके, जल इत्यादि पीकर, शयनकर उठनेके बाद, स्नान करके तथा मार्गमें गमनके समय, रोमरहित दोनों ओष्ठोंका स्पर्शकर, वस्त्र धारणकर, वीर्य, मल-मूत्रका त्यागकर, अनुपयुक्त भाषण करनेपर, थूकनेके बाद, अध्ययनारम्भमें, खाँसी या श्वास आनेपर,
चौराहे अथवा श्मशानको पार करनेपर, इसी प्रकार दोनों संध्याओंमें श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि वह आचमन किये रहनेपर भी पुन: आचमन करे। चाण्डाल और म्लेच्छसे बात करनेपर, स्त्री, शूद्र और जूठे मुखवालेसे भाषण करनेपर, जूठे मुँहवाले पुरुषका तथा इसी प्रकार उच्छिष्ट भोजनका स्पर्श होनेपर, आँसू तथा रक्तके गिरनेपर, भोजनके समय, दोनों संध्याओंमें स्नानकर और जल आदिके पीनेपर तथा मल-मूत्रके उत्सर्गपर आचमन किये होनेपर भी आचमन करे। सोनेसे जगनेके बाद एक बार और अन्य समयोंमें अनेक बार आचमन करना चाहिये॥१-५॥
अग्नेर्गवामथालम्भे स्पृष्ट्वा प्रयतमेव वा।
स्त्रीणामथात्मनः स्पर्श नीवी वा परिधाय च॥६॥
उपस्पृशेज्जलं वार्द्र तृणं वा भूमिमेव वा।
केशानांचात्मनः स्पर्श वाससोऽक्षालितस्य च॥ ७॥
अग्निका, गौका स्पर्श होनेपर, किसी परिश्रम करनेवालेका, स्त्रीका तथा अपना स्पर्श होनेपर (अपने जिस अङ्गका स्पर्श आवश्यक या अनिवार्य न हो उसका कामत: यदि स्पर्श किया जाय), नीवी (कटि- कमरका वस्त्र) पहिनकर, अपने केशों तथा बिना धोये वस्त्रका स्पर्श करनेपर जल, हरे तृण या भूमिका स्पर्श करना चाहिये॥६-७॥
अनुष्णाभिरफेनाभिरदुष्टाभिश्च
शौचेप्सुः सर्वदाचामेदासीनः प्रागुदङ्मुखः॥ ८ ॥
धर्मतः।
शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।
अकृत्वा पादयोः शौचमाचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥ ९ ॥
सोपानत्को जलस्थो वा नोष्णीषी वाचमेद् बुधः ।
न चैव वर्षधाराभिर्न तिष्ठन् नोद्धृतोदकैः॥१०॥
नैकहस्तार्पितजलैर्विना सूत्रेण वा पुनः।
न पादुकासनस्थो वा बहिर्जानुरथापि वा॥११॥
धर्मकी दृष्टिसे शुद्धिकी अभिलाषावालेको चाहिये कि वह सदा पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके बैठकर शीतल, फेनरहित तथा दोषवर्जित जलसे आचमन करे। सिर या कानको ढकने और शिखा तथा कच्छ (पिछोटा) खुलनेपर, बिना पैर धोये आचमन करनेपर भी अशुद्ध रहता है (अर्थात् इन स्थितियोंमें पहले पाँवोंको धोना चाहिये। अनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करना चाहिये)। बुद्धिमान् व्यक्तिको जूता पहने हुए, जलमें स्थित होनेपर, सिरपर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिये। (इसी प्रकार) न वर्षाके जलसे, न खड़े होकर, न उठाये हुए जलसे, एक हाथसे अर्पित जलसे अर्थात् किसी अन्यके द्वारा अञ्जलिसे नहीं, केवल एक हाथसे दिये गये जलसे, बिना यज्ञोपवीतके, न पादुकासनपर बैठे हुए (पाँवमें
धारण जानेवाली पादुकाको आसन बनाकर उसीपर बैठकर) अथवा न जानुओंके बाहर हाथ निकाले हुए आचमन करना चाहिये॥८-११॥
न जल्पन् न हसन् प्रेक्षन् शयानः प्रह्व एव च।
नावीक्षिताभिः फेनाद्यैरुपेताभिरथापि वा॥१२॥
शूद्राशुचिकरोन्मुक्तैर्न क्षाराभिस्तथैव च।
न चैवागुलिभिः शब्दं न कुर्वन् नान्यमानसः॥१३॥
बोलते हुए, हँसते हुए, देखते हुए (किसी अन्यकी ओर देखते हुए), सोते हुए और झुककर आचमन नहीं करना चाहिये। बिना देखे हुए अथवा फेन आदिवाले जलसे आचमन नहीं करना चाहिये। शूद्र' अथवा अपवित्र व्यक्तिके हाथोंसे दिये हुए एवं खारे जलसे और अंगुलियोंसे शब्द करते हुए तथा अन्यमनस्क होकर आचमन नहीं करना चाहिये ॥१२-१३॥
न वर्णरसदुष्टाभिन चैव प्रदरोदकैः।
न पाणिक्षुभिताभिर्वा न बहिष्कक्ष एव वा॥१४॥
जिस जलका अपना स्वाभाविक वर्ण या रस विकृत हो गया है, उससे आचमन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही प्रदरोदक (अत्यल्प जल)-से आचमन नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त किसी पात्रमें रखे हुए उस जलसे भी आचमन नहीं करना चाहिये जो पूरा हाथ डालकर क्षुभित कर दिया गया हो। यदि कच्छ (पिछोटा) धोतीसे बाहर निकल जाय तो उस स्थितिमें आचमन नहीं करना चाहिये। कच्छको धोतीके भीतर करनेके अनन्तर ही आचमन करनेका विधान है॥ १४॥
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठ्याभिः क्षत्रियः शुचिः।
प्राशिताभिस्तथा वैश्यः स्त्रीशूद्रौ स्पर्शतोऽन्ततः॥१५॥
(आचमनमें) ब्राह्मण हृदयतक पहुँचनेवाले, क्षत्रिय कण्ठतक पहुँचनेवाले जलसे और वैश्य मुखके भीतर प्रविष्ट (कण्ठतक न भी पहुँचे)जलसे शुद्ध होते हैं; स्त्री, शूद्र तो केवल (जिह्वा, ओष्ठके अन्ततक) जलके स्पर्शमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं ॥ १५ ॥
अङ्गुष्ठमूलान्तरतो रेखायां ब्राह्ममुच्यते।
अन्तराङ्गुष्ठदेशिन्यो पितॄणां तीर्थमुत्तमम् ॥१६॥
कनिष्ठामूलतः पश्चात् प्राजापत्यं प्रचक्षते।
अङ्गुल्यग्रे स्मृतं दैवं तदेवाएं प्रकीर्तितम्॥१७॥
मूले वा दैवमाएं स्यादाग्नेयं मध्यतः स्मृतम्।
तदेव सौमिकं तीर्थमेतज्ज्ञात्वा न मुह्यति॥१८॥
ब्राह्मणैव तु तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्।
कायेन वाथ दैवेन न तु पित्र्येण वै द्विजाः॥१९॥
त्रिः प्राश्नीयादपः पूर्वं ब्राह्मणः प्रयतस्ततः।
सम्मृज्याङ्गुष्ठमूलेन मुखं वै समुपस्पृशेत्॥२०॥
अंगूठेके मूलकी रेखामें ब्राह्मतीर्थ, तर्जनी और अंगूठेके मध्यभागमें उत्तम पितृतीर्थ, कनिष्ठाके मूलभाग प्राजापत्यतीर्थ कहलाता है। अंगुलियोंके अग्रभागमें दैवतीर्थ और वही आर्षतीर्थ भी कहा जाता है। अथवा (अँगुलियोंके) मूल भागको दैव या आर्षतीर्थ, मध्यभागको आग्नेयतीर्थ कहा गया है। इसी (आग्नेयतीर्थ)-को सौमिकतीर्थ कहा गया है। इसे जानकर मोह नहीं प्राप्त होता अर्थात् यथाविधि इसके अनुसार अनुष्ठान करनेपर अन्तःकरण शुद्ध होनेसे अज्ञान नष्ट हो जाता है। द्विजो! द्विजको चाहिये कि वह ब्राह्मतीर्थसे ही नित्य आचमन
करे अथवा कायतीर्थ (प्राजापत्यतीर्थ) या दैवतीर्थसे करे, पितृतीर्थसे कभी भी आचमन न करे। ब्राह्मण संयत होकर पहले तीन बार जलका आचमन करे, अनन्तर मुड़े हुए अंगूठेके मूलसे मुखका स्पर्श करे यही सम्मान है॥१६-२०॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु स्पृशेन्नेत्रद्वयं ततः।
तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम्॥२१॥
कनिष्ठाङ्गुष्ठयोगेन श्रवणे समुपस्पृशेत्।
सर्वासामथ योगेन हृदयं तु तलेन वा।
संस्पृशेद् वा शिरस्तद्वदगुष्ठेनाथवा द्वयम्॥२२॥
तदनन्तर अँगूठे और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे और तर्जनी तथा अँगूठेके योगसे दोनों नासापुटों (नाक)-का स्पर्श करे। कनिष्ठा और अंगूठेके योगसे दोनों कानोंका स्पर्श करे। तदनन्तर मिली हुई सभी अँगुलियोंसे अथवा हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। तदुपरान्त सिरका भी वैसे ही स्पर्श करे अथवा दोनों अंगूठोंसे स्पर्श करे ॥ २१-२२ ॥
त्रिः प्राश्नीयाद् यदम्भस्तु सुप्रीतास्तेन देवताः।
ब्रह्मा विष्णुमहेशश्च भवन्तीत्यनुशुश्रुम॥ २३॥
गङ्गा च यमुना चैव प्रीयेते परिमार्जनात्।
संस्पृष्टयोर्लोचनयोः प्रीयेते शशिभास्करौ॥ २४॥
आचमनमें तीन बार जो जल पिया जाता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश-ये तीन देवता प्रसन्न होते हैं-ऐसा हमने सुना है। मार्जन करनेसे गङ्गा और यमुना नदियाँ प्रसन्न होती हैं। नेत्रोंके स्पर्शसे सूर्य तथा चन्द्रमा प्रसन्न होते हैं ॥ २३-२४ ॥
नासत्यदस्त्रौ प्रीयेते स्पृष्टे नासापुटद्वये।
कर्णयोः स्पृष्टयोस्तद्वत् प्रीयेते चानिलानलौ ॥ २५ ॥
संस्पृष्टे हृदये चास्य प्रीयन्ते सर्वदेवताः।
मूर्ध्नि संस्पर्शनादेकः प्रीतः स पुरुषो भवेत्॥२६॥
दोनों नासापुटोंका स्पर्श करनेसे नासत्य और दस्र (दोनों अश्विनीकुमार) प्रसन्न होते हैं, इसी प्रकार दोनों कानोंका स्पर्श करनेसे अग्नि तथा वायुदेवता प्रसन्न होते हैं। हृदयके स्पर्श होनेपर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। सिरका स्पर्श करनेसे वे अद्वितीय पुरुष विष्णु प्रसन्न होते हैं । २५-२६॥
नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विग्रुषोऽङ्गं नयन्ति याः।
दन्तवद् दन्तलग्नेषु जिह्वास्पर्शेऽशुचिर्भवेत्॥२७॥
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान्।
भूमिगैस्ते समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत्॥ २८॥
मधुपर्के च सोमे च ताम्बूलस्य च भक्षणे।
फलमूले चेक्षुदण्डे न दोषं प्राह वै मनुः॥२९॥
प्रचरंश्चान्नपानेषु द्रव्यहस्तो भवेन्नरः।
भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत्॥३०॥
(आचमन आदिके समय) अङ्गपर गिरे हुए जलकणोंसे शरीर उच्छिष्ट नहीं होता। दाँतोंके भीतर स्थित पदार्थ दाँतोंके समान ही होता है, परंतु जिह्वाके स्पर्श होनेपर व्यक्ति अपवित्र हो जाता है। आचमन करनेके समय या दूसरोंको आचमन कराते समय पैरोंपर गिरे हुए जलको भूमिपर गिरे हुएके समान समझना चाहिये। उससे मनुष्य अपवित्र नहीं होता। मनुने मधुपर्क (यथाविधि मिश्रित दधि, मधु, घी), सोम, ताम्बूल-भक्षण, फल, मूल तथा ईखका दण्ड ग्रहण करनेमें कोई दोष नहीं कहा है, इन्हें कोई भी दे, ग्रहण किया जा सकता है। हम चल रहे हैं तथा हमारे हाथमें ऐसी वस्तु है जो उच्छिष्टस दूषित हो सकती है तो हमें अन्न, जल ग्रहण करते समय उस वस्तुको भूमिपर यथास्थान रख देना चाहिये तथा अन्न, जल ग्रहण करनेके अनन्तर आचमन करनेके बाद भूमिपर रखी हुई वस्तुका प्रोक्षण करना चाहिये, अनन्तर उस वस्तुको लेकर चलना चाहिये॥ २७-३०॥
तैजसं वै समादाय यधुच्छिष्टो भवेद् द्विजः।
भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत्॥३१॥
यद्यमत्रं समादाय भवेदुच्छेषणान्वितः।
अनिधायैव तद् द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात्।
वस्त्रादिषु विकल्पः स्यात् तत्संस्पृष्ट्वाचमेदिह॥३२॥
तैजस* पदार्थ (घी) लिये हुए यदि ब्राह्मण (द्विज) (खाने-पीनेके कारण) उच्छिष्ट हो जाय तो उस तैजस द्रव्य (घी)-को भूमिपर रखकर आचमन करे, पुनः उस द्रव्य (घी)-का प्रोक्षण करे। यदि कोई (द्रव्य- सहित) अमत्र (पात्र) लिये हुए मनुष्य उच्छिष्ट हो जाय तो उस द्रव्य (पात्र)-को (भूमिपर) रखे बिना आचमन कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है (पात्र अपवित्र नहीं होता)।
परंतु वस्त्र आदिके सम्बन्धमें विकल्प है।। ३१-३२ ।।
अरण्येऽनुदके रात्री चौरव्याघ्राकुले पथि।
कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा द्रव्यहस्तो न दुष्यति॥३३॥
जल, उसका स्पर्श होनेपर आचमन करना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें वस्त्रका स्पर्श होनेपर आचमन एवं वस्त्रका प्रोक्षण करना चाहिये। जंगलमें, जलहीन स्थानमें, रात्रिमें और चोर तथा व्याघ्र आदिसे आक्रान्त मार्गमें मल-मूत्र करनेपर भी व्यक्ति आचमन, प्रोक्षण आदि शुद्धिके अभावमें भी दूषित नहीं होता, साथ ही उसके हाथमें रखा हुआ द्रव्य भी अशुचि नहीं होता (पर शुद्धिका अवसर मिल जानेपर यथाशास्त्र शुद्धि आवश्यक है।) ॥ ३३ ॥
निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः।
अह्नि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः॥ ३४॥
अन्तर्धाय महीं काष्ठैः पत्रैर्लोष्ठतृणेन वा।
प्रावृत्य च शिरः कुर्याद् विण्मूत्रस्य विसर्जनम्॥३५॥
दाहिने कानपर यज्ञोपवीत चढ़ाकर दिनमें उत्तरकी ओर मुख करके तथा रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। पृथ्वीको लकड़ी, पत्तों, ढेलों अथवा घाससे ढककर तथा शिरको वस्त्रसे आवृतकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये ॥ ३४-३५॥
छायाकूपनदीगोष्ठचैत्याम्भ:पथि भस्मसु।
अग्नौ चैव श्मशाने च विण्मूत्रे न समाचरेत् ।। ३६॥
न गोमये न कृष्ट वा महावृक्षे न शाड्वले।
न तिष्ठन् न निर्वासा न च पर्वतमस्तके ॥३७॥
न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन।
न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन् वा समाचरेत्॥ ३८॥
तुषाङ्गारकपालेषु राजमार्गे तथैव च।
न क्षेत्रे न विले वापि न तीर्थे न चतुष्पथे॥३९॥
नोद्यानोदसमीपे वा नोषरे न पराशुचौ।
न सोपानत्पादुको वा छत्री वा नान्तरिक्षके॥४०॥
नचैवाभिमुखे स्त्रीणां गुरुब्राह्मणयोर्गवाम्।
देवदेवालययोरपामपि कदाचन ॥४१॥
छायामें, कूपमें या उसके अति समीप, नदीमें, गौशाला, चैत्य (गाँवके सीमाका वृक्षसमूह, ग्राम्य देवताका स्थान-टीला, डीह आदिपर), मार्ग, भस्म, अग्नि तथा श्मशानमें मल-मूत्र नहीं करना चाहिये। गोबरमें, जुती हुई भूमिमें, महान् वृक्षके नीचे, हरी घाससे युक्त मैदानमें और पर्वतकी चोटीपर तथा खड़े होकर एवं नग्न होकर मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। न जीर्ण देवमन्दिरमें, न दीमककी बाँबीमें, न जीवोंसे युक्त गड्ढे में और न चलते हुए मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। धान इत्यादिकी भूसी, जलते हुए अंगार, कपाल*, राजमार्ग, खेत, गड्ढे, तीर्थ, चौराहे, उद्यान, जलके समीप, ऊसर भूमि और अत्यधिक अपवित्र स्थानमें मल-मूत्रका त्याग न करे। जूता या खड़ाऊँ पहने, छाता लिये, अन्तरिक्षमें (भूमि-आकाशके मध्यमें), स्त्री, गुरु, ब्राह्मण, गौके सामने, देवविग्रह तथा देवमन्दिर और जलके समीपमें तो कभी भी मल-
मूत्रका विसर्जन न करे ॥ ३६-४१॥
न नज्योतींषि निरीक्षन् वा न संध्याभिमुखोऽपि वा।
प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रतिसोमं तथैव च॥४२॥
नक्षत्रोंको देखते हुए, संध्याकालका समय आनेपर, सूर्य, अग्नि तथा चन्द्रमाकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ४२ ॥
आहृत्य मृत्तिका कूलाल्लेपगन्धापकर्षणम्।
कुर्यादतन्द्रितः शौचं विशुद्धैरुद्धृतोदकैः॥४३॥
आलस्य छोड़कर (नदी या तालाबके) किनारेसे मिट्टी लेकर उसके द्वारा तथा शुद्ध कूप आदिसे निकाले हुए जलके द्वारा (मल-मूत्र) लेप और गन्ध जबतक दूर न हो, तबतक शुद्धि करनी चाहिये॥४३॥
नाहरेन्मृत्तिकां विप्रः पांशुलान्न च कर्दमात्।
न मार्गानोषराद् देशाच्छौचशिष्टा परस्य च ॥४४॥
न देवायतनात् कूपाद् ग्रामान्न च जलात् तथा।
उपस्पृशेत् ततो नित्यं पूर्वोक्तेन विधानतः॥४५॥
विप्र (द्विज)-को चाहिये कि वह शौचके लिये धूलकी ढेर एवं कीचड़युक्त स्थान, रास्ते, ऊसर भूमि, दूसरेके शौच करनेसे बची हुई, मन्दिर, कुएँ, ग्राम और जलके अंदरसे मिट्टी ग्रहण न करे। शौचके अनन्तर पहले बताये गये विधानके अनुसार नित्य आचमन करे॥ ४४-४५ ॥
Summary of chapter 62 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Śiva clarifies the mystery of how He remains absolute, changeless, and non-dual while appearing as the manifold universe through the lens of Māyā. He describes the supreme abode of Purushottama Vishṇu as a realm of pure self-effulgent light beyond the reach of darkness, where the entire universe is woven like threads in a tapestry. Those who realize this unmanifest, blissful Parabrahma through steady contemplation transcend all fears, dissolve their individual egoism, and achieve eternal union with the Supreme.