10 अध्याय

विष्णुद्वारा मधु तथा कैटभका वध, नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा सनकादिकी

सृष्टि, ब्रह्मासे रुद्रकी उत्पत्ति, रुद्रकी अष्टमूर्तियों, आठ नामों तथा आठ पत्नियोंका

वर्णन, रुद्रके द्वारा अनेक रुद्रोंकी उत्पत्ति तथा पुनः वैराग्य ग्रहण करना,

ब्रह्माद्वारा रुद्रकी स्तुति तथा माहात्म्य-वर्णन, रुद्रद्वारा ब्रह्माको ज्ञानकी प्राप्ति,

महादेवका त्रिमूर्तित्व और ब्रह्माद्वारा अनेक प्रकारकी सृष्टि

श्रीकूर्म उवाच

गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः।

तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्॥१॥

श्रीकूर्मने कहा-महेश्वर देवके अपने निवास-स्थान पर चले जानेके बाद पितामह (ब्रह्मा), (भगवान् विष्णुकी) नाभिसे उत्पन्न उसी विशाल सुन्दर कमलपर रहने लगे॥१॥

अथ दीर्घेण कालेन तत्राप्रतिमपौरुषौ।

महासुरौ समायातौ भ्रातरौ मधुकैटभौ॥२॥

क्रोधेन महताविष्टौ महापर्वतविग्रहौ।

कर्णान्तरसमुद्भूतौ देवदेवस्य शाङ्गिणः ॥३॥

तावागतौ समीक्ष्याह नारायणमजो विभुः।

त्रैलोक्यकण्टकावेतावसुरौ हन्तुमर्हसि ॥४॥

एक लम्बा समय व्यतीत हो जानेपर वहाँ अतुलित शक्तिवाले मधु तथा कैटभ नामक दो असुर आये, जो परस्पर भाई थे। देवोंके भी देव शार्ङ्गधारी भगवान् विष्णुके कानसे उत्पन्न तथा विशाल पर्वतके समान शरीरवाले और महान् क्रोधसे आविष्ट उन दोनों (मधु-कैटभ) को आया हुआ देखकर अजन्मा, विभु (ब्रह्मा) ने नारायणसे कहा-ये दोनों असुर तीनों लोकोंके लिये कण्टक हैं, आप इन्हें मारें ॥२-४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरिर्नारायणः प्रभुः।

आज्ञापयामास तयोर्वधार्थं पुरुषावुभौ ॥५॥

उनके इस वचनको सुनकर प्रभु नारायण हरिने उन दोनों का वध करनेके लिये (जिष्णु तथा विष्णु नामक) दो पुरुषों को आज्ञा दी॥५॥

तदाज्ञया महाद्धं तयोस्ताभ्यामभूद् द्विजाः।

व्यनयत् कैटभं विष्णुर्जिष्णुश्च व्यनयन्मधुम्॥६॥

तत: पद्मासनासीनं जगन्नाथं पितामहम्।

बभाषे मधुरं वाक्यं स्नेहाविष्टमना हरिः॥७॥

हे ब्राह्मणो! उनकी आज्ञासे उन (विष्णु तथा जिष्णु)-से उन दोनों (मधु-कैटभ) असुरोंका महान् युद्ध हुआ। विष्णुने कैटभको जीता और जिष्णुने मधु को जीता। तदनन्तर स्नेह से आविष्ट मनवाले हरि ने कमल के आसनपर आसीन तथा जगन्नाथ पितामहसे मधुर वचन कहा-॥६-७॥

अस्मान्मयोच्यमानस्त्वं पद्मादवतर प्रभो।

नाहं भवन्तं शक्नोमि वोढुं तेजोमयं गुरुम्॥८॥

प्रभो! मेरे कहनेसे आप अब इस कमलसे नीचे उतरें। तेजोमय, बहुत भारी आपको ढोनेमें मैं असमर्थ हूँ॥८॥

ततोऽवतीर्य विश्वात्मा देहमाविश्य चक्रिणः।

अवाप वैष्णवी निद्रामेकीभूयाथ विष्णुना॥ ९ ॥

तब विश्वात्मा (ब्रह्मा) नीचे उतरे और चक्र धारणकरनेवाले विष्णुकी देहमें प्रविष्ट होकर वैष्णवी निद्राकोप्राप्त हो गये। इस प्रकार विष्णुसे उनकी एकात्मता होगयी॥९॥

सहस्त्रशीर्षनयनः

शङ्खचक्रगदाधरः।

ब्रह्मा नारायणाख्योऽसौ सुष्वाप सलिले तदा॥१०॥

सोऽनुभूय चिरं कालमानन्दं परमात्मनः।

अनाद्यनन्तमद्वैतं स्वात्मानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥११॥

ततः प्रभाते योगात्मा भूत्वा देवश्चतुर्मुखः।

ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां वैष्णवं भावमाश्रितः॥१२॥

तब हजारों सिर तथा हजारों नेत्रवाले और शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले वे नारायण नामवाले ब्रह्मा जलमें सो गये। उन्होंने बहुत समयतक परमात्मा के अनादि, अनन्त, आत्मस्वरूप, ब्रह्मसंज्ञक अद्वैत आनन्द का अनुभव किया। तदनन्तर प्रभातकाल होनेपर योगात्मा देव चतुर्मुख होकर और वैष्णव भावका आश्रय ग्रहणकर उसी प्रकारकी (वैष्णवी) सृष्टि करने लगे। १०-१२॥

पुरस्तादसृजद् देवः सनन्दं सनकं तथा।

ऋभुं सनत्कुमारं च पूर्वजं तं सनातनम्॥१३॥

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः परं वैराग्यमास्थिताः ।

विदित्वा परमं भावं न सृष्टौ दधिरे मतिम्॥१४॥

तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टौ पितामहः ।

बभूव नष्टचेता वै मायया परमेष्ठिनः ॥१५॥

ततः पुराणपुरुषो जगन्मूर्तिर्जनार्दनः।

व्याजहारात्मनः पुत्रं मोहनाशाय पद्मजम्॥१६॥

उन देवने सर्वप्रथम पूर्वजोंके भी पूर्वज सनन्दन, सनक, ऋभु, सनत्कुमार तथा सनातनको उत्पन्न किया। (सुख-दुःख आदि) द्वन्द्व एवं मोह (आसक्ति)-से सर्वथा शून्य एवं परम वैराग्यभाव में स्थित इन सनक आदि ऋषियों ने परम तत्त्व को जानकर सृष्टि कार्य में अपनी बुद्धि नहीं लगायी। उन (सनकादि)-के इस प्रकार के लोक-सृष्टिसे सर्वथा निरपेक्ष भाव को देखकर पितामह (ब्रह्मा) परमेष्ठी (परमात्मा-जनार्दन)की माया से मोहित हो गये। तब जगन्मूर्ति, पुराणपुरुष, जनार्दनने (नाभि) कमलसे उत्पन्न अपने पुत्र (ब्रह्मा) का मोह नष्ट करनेके लिये उनसे कहा- ॥ १३-१६॥

विष्णुरुवाच

कच्चिन्न विस्मृतो देवः शूलपाणिः सनातनः।

यदुक्तवानात्मनोऽसौ पुत्रत्वे तव शंकरः॥१७॥

विष्णु बोले-कहीं आप शूलपाणि सनातन देव को भूल तो नहीं गये? उन शंकरने अपनेको आपके पुत्र-रूपमें होनेकी बात कही थी॥१७॥

अवाप्य संज्ञां गोविन्दात् पद्मयोनिः पितामहः।

प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तपः परमदुश्चरम्॥१८॥

तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित् समवर्तत।

ततो दीर्घेण कालेन दुःखात् क्रोधोऽभ्यजायत॥१९॥

गोविन्दसे चेतना प्राप्तकर पद्मयोनि पितामह प्रजा की सृष्टि करनेकी इच्छासे परम दुश्चर तप करने लगे। उनके इस प्रकार (दीर्घकालतक) तप करनेपर (भी) किसी भी प्रकारकी सृष्टि नहीं हुई। बहुत समय बीत जानेपर उन्हें दुःखसे क्रोध उत्पन्न हुआ॥१८-१९॥

क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतनश्रुबिन्दवः ।

ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तथाभवन्॥२०॥

सर्वांस्तानश्रुजान् दृष्ट्वा ब्रह्मात्मानमनिन्दत।

जही प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः॥२१॥

क्रोधाविष्ट उनके (ब्रह्मा के) नेत्रों से आँसू की बूंदें गिरी। तब उन आँसुओंकी बूंदोंसे भूत-प्रेत उत्पन्न हुए। आँसुओंसे उत्पन्न उन सब (भूत-प्रेतों)-को देखकर क्रोधाविष्ट प्रजापति भगवान् ब्रह्माने अपनी ही निन्दा की और अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया॥ २०-२१॥

तदा प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत् प्रभोर्मुखात्।

सहस्रादित्यसंकाशो युगान्तदहनोपमः ॥२२॥

तदनन्तर प्रभुके मुखसे हजारों सूर्यके समान देदीप्य-मान तथा प्रलयकालीन अग्निके सदृश प्राणमय रुद्र प्रकट हुए॥ २२॥

                 रुरोद सुस्वरं घोरं देवदेवः स्वयं शिवः।

रोदमानं ततो ब्रह्मा मा रोदीरित्यभाषत।

रोदनाद्द्र इत्येवं लोके ख्यातिं गमिष्यसि॥२३॥

देवोंके भी देव स्वयं शिव उच्च स्वरमें घोर रुदन करने लगे। तब रुदन करते हुए उनसे ब्रह्माने 'मत रोओ'- '-इस प्रकारसे कहा। तुम रुदन करनेके कारण 'रुद्र' इस नामसे संसारमें प्रसिद्धि प्राप्त करोगे॥ २३ ॥

अन्यानि सप्त नामानि पत्नीः पुत्रांश्च शाश्वतान्।

स्थानानि चैषामष्टानां ददौ लोकपितामहः॥२४॥

लोकपितामहने (उन्हें रुद्रके अतिरिक्त) अन्य सात नाम, (आठ) पत्नियाँ, शाश्वत (दीर्घायु) पुत्र और आठ स्थानों* (मूर्तियों)-को प्रदान किया॥ २४॥

भवः शर्वस्तथेशानः पशूनां पतिरेव च।

भीमश्चोग्रो महादेवस्तानि नामानि सप्त वै॥२५॥

सूर्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च।

दीक्षितो ब्राह्मणश्चन्द्र इत्येता अष्टमूर्तयः॥२६॥

भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम, उग्र तथा महादेव- ये सात नाम हैं। सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्र-ये (रुद्रकी) आठ मूर्तियाँ हैं ॥ २५-२६॥

स्थानेष्वेतेषु ये रुद्रं ध्यायन्ति प्रणमन्ति च।

तेषामष्टतनुर्देवो ददाति परमं पदम्॥२७॥

जो इन आठ स्थानों (मूर्तिरूपों)-में रुद्रका ध्यान करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं, उन्हें अष्टमूर्ति रूप देव (भगवान् शिव अपना) परम पद देते हैं ॥ २७ ॥

सुवर्चला तथैवोमा विकेशी च तथा शिवा।

स्वाहा दिशश्च दीक्षा च रोहिणी चेति पत्नयः॥२८॥

शनैश्चरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः ।

स्कन्दः सर्गोऽथ संतानो बुधश्चैषां सुताः स्मृताः॥२९॥

सुवर्चला, उमा, विकेशी, शिवा, स्वाहा, दिशाएँ, दीक्षा तथा रोहिणी-ये ही (रुद्रकी आठ) पलियाँ हैं। शनैश्चर, शुक्र, लोहिताङ्ग (मंगल), मनोजव (कामदेव), स्कन्द, सर्ग, संतान तथा बुध-ये (आठ उनके) पुत्र कहे गये हैं ॥ २८-२९॥

एवम्प्रकारो भगवान् देवदेवो महेश्वरः।

प्रजाधर्मं च कामंच त्यक्त्वा वैराग्यमाश्रितः॥३०॥

आत्मन्याधाय चात्मानमैश्वरं भावमास्थितः।

पीत्वा तदक्षरं ब्रह्म शाश्वतं परमामृतम्॥३१॥

इस प्रकारके देवाधिदेव भगवान् महेश्वरने प्रजाधर्म (सृष्टिकार्य) एवं काम (वासना)-का परित्यागकर वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। उस शाश्वत, परम अमृतरूपी अक्षर ब्रह्मका आस्वादनकर और आत्मामें आत्मतत्त्व का आधानकर वे ईश्वरभावमें स्थित हो गये॥३०-३१॥

प्रजाः सृजेति चादिष्टो ब्रह्मणा नीललोहितः।

स्वात्मना सदृशान्द्रान्ससर्ज मनसा शिवः॥३२॥

ब्रह्मा के द्वारा 'प्रजा की सृष्टि करो' इस प्रकार का आदेश प्राप्त कर नीललोहित शिवने मनसे अपने ही समान रुद्रों की सृष्टि की॥३२॥

कपर्दिनो निरातङ्कान् नीलकण्ठान् पिनाकिनः।

त्रिशूलहस्तानृष्टिघ्नान् महानन्दांस्त्रिलोचनान्॥३३॥

जरामरणनिर्मुक्तान् महावृषभवाहनान्।

वीतरागांश्च सर्वज्ञान् कोटिकोटिशतान् प्रभुः॥३४॥

प्रभुने सैकड़ों करोड़ जटाजूट धारण करनेवाले, भयरहित, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि, हाथमें त्रिशूल धारण किये, ऋष्टिघ्न, महान् आनन्दस्वरूप, तीन नेत्रयुक्त, जरा-मरणसे रहित, विशाल वृषभोंको वाहनरूप में स्वीकार करनेवाले सर्वज्ञ तथा वीतराग (रुद्रों)को उत्पन्न किया।३३-३४॥

तान् दृष्ट्वा विविधान् रुद्रान् निर्मलान् नीललोहितान्।

जरामरणनिर्मुक्तान् व्याजहार हरं गुरुः॥३५॥

गुरु (ब्रह्मा)-ने जरा-मरणसे रहित, नीललोहित एवं निर्मल उन अनेक रुद्रोंको देखकर हर (शिव)से कहा॥३५॥

मा स्नाक्षीरीदृशीर्देव प्रजा मृत्युविवर्जिताः।

अन्याः सृजस्व भूतेश जन्ममृत्युसमन्विताः॥३६॥

हे देव! मृत्युसे रहित इस प्रकारकी सृष्टि मत करो। भूतेश! जन्म एवं मृत्युवाली दूसरी प्रकार को सृष्टि करो॥ ३६॥

ततस्तमाह भगवान् कपर्दी कामशासनः ।

नास्ति मे तादृशः सर्गः सृज त्वमशुभाः प्रजाः॥३७॥

ततः प्रभृति देवोऽसौ न प्रसूतेऽशुभाः प्रजाः।

स्वात्मजैरेव ते रुद्रैर्निवृत्तात्मा ह्यतिष्ठत।

स्थाणुत्वं तेन तस्यासीद् देवदेवस्य शूलिनः॥३८॥

तदनन्तर कामपर शासन करनेवाले जटाजूटधारी भगवान् (शिव)-ने उनसे कहा-मेरे पास उस प्रकार की (जन्म-मृत्युसे युक्त) सृष्टि नहीं है। (ऐसी) अशुभ प्रजाओं को आप ही उत्पन्न करें। तबसे उन देवने अशुभ प्रजाओंकी सृष्टि नहीं की। (और) अपने आत्मज उन रुद्रों के साथ वे निवृत्तात्मा (क्रियारहित)-के रूप में स्थित हो गये। इसी कारण देवोंमें देव उन शूलधारी (शंकर)-का स्थाणुत्व हुआ (अर्थात् वे 'स्थाणु" इस नाम से प्रसिद्ध हो गये) ॥ ३७-३८॥

ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं तपः सत्यं क्षमा धृतिः।

स्स्रष्टत्वमात्मसम्बोधो ह्यधिष्ठातृत्वमेव च ॥ ३९॥

अव्ययानि दशैतानि नित्यं तिष्ठन्ति शंकरे।

स एव शंकरः साक्षात् पिनाकी परमेश्वरः॥ ४०॥

भगवान् शंकरमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, तप, सत्य, क्षमा, धृति, स्रष्टत्व, आत्मज्ञान तथा अधिष्ठातृत्व-ये दस अव्यय (शाश्वत) गुण सदा प्रतिष्ठित रहते हैं। ये पिनाक धारण करनेवाले शंकर ही साक्षात् परमेश्वर हैं ॥ ३९-४०॥

ततः स भगवान् ब्रह्मा वीक्ष्य देवं त्रिलोचनम्।

सहैव मानसैः पुत्रैः प्रीतिविस्फारिलोचनः॥४१॥

ज्ञात्वा परतरं भावमैश्वरं ज्ञानचक्षुषा।

तुष्टाव जगतामेकं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥४२॥

तदनन्तर प्रीतिसे विकसित नेत्रवाले भगवान् ब्रह्मा ने तीन नेत्रोंवाले देव (शंकर)-को मानस पुत्रोंके साथ देखा। ब्रह्माने अपनी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वर-सम्बन्धी परात्पर भावको जानकर जगत्के एकमात्र स्वामी (भगवान् शंकर)-की अपने मस्तकपर हाथोंकी अंजलि बाँधकर स्तुति की। ४१-४२॥

ब्रह्मोवाच

नमस्तेऽस्तु महादेव नमस्ते परमेश्वर।

नमः शिवाय देवाय नमस्ते ब्रह्मरूपिणे॥४३॥

नमोऽस्तु ते महेशाय नमः शान्ताय हेतवे।

प्रधानपुरुषेशाय योगाधिपतये नमः॥४४॥

नमः कालाय रुद्राय महाग्रासाय शूलिने।

नमः पिनाकहस्ताय त्रिनेत्राय नमो नमः॥४५॥

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं ब्रह्मणो जनकाय ते।

ब्रह्मविद्याधिपतये ब्रह्मविद्याप्रदायिने॥४६॥

ब्रह्माने कहा-महादेव! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आपको नमस्कार है। शिवको नमस्कार है। ब्रह्मरूपी देवको नमस्कार है। महेश! आपको नमस्कार है। शान्तिके मूलहेतु! आपको नमस्कार है। प्रधान पुरुषेश! आपको नमस्कार है तथा योगाधिपति आपको नमस्कार है। काल, रुद्र, महाग्रास तथा शूलीको नमस्कार है। हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। तीन नेत्रवालेको बार-बार नमस्कार है। त्रिमूर्तिस्वरूप आपको नमस्कार है। ब्रह्मा के उत्पत्तिकर्ता आपके लिये नमस्कार है। ब्रह्मविद्या के अधिपति और ब्रह्मविद्या प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है॥४३-४६॥

नमो वेदरहस्याय कालकालाय ते नमः।

वेदान्तसारसाराय नमो वेदात्ममूर्तये ।। ४७।।

नमो बुद्धाय शुद्धाय योगिनां गुरवे नमः ।

प्रहीणशोकैर्विविधैर्भूतैः परिवृताय ते॥४८॥

नमो ब्रह्मण्यदेवाय ब्रह्माधिपतये नमः ।

त्रियम्बकाय देवाय नमस्ते परमेष्ठिने॥४९॥

वेदों के रहस्य रूप को नमस्कार है। काल के भी काल आपको नमस्कार है। वेदान्तसारके भी सारको नमस्कार है। वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। शुद्ध-बुद्ध स्वरूप को नमस्कार है। योगियों के गुरुको नमस्कार है। शोकों से रहित विविध भूतों से घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्य देव को नमस्कार है। ब्रह्माधिपति के लिये नमस्कार है। त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७-४९ ॥

नमो दिग्वाससे तुभ्यं नमो मुण्डाय दण्डिने।

अनादिमलहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः॥५०॥

नमस्ताराय तीर्थाय नमो योगद्धिहेतवे।

नमो धर्माधिगम्याय योगगम्याय ते नमः ॥५१॥

नमस्ते निष्प्रपञ्चाय निराभासाय ते नमः।

ब्रह्मणे विश्वरूपाय नमस्ते परमात्मने॥५२॥

दिगम्बर! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार है। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल कारणको नमस्कार है। धर्म (धर्माचरण)-के द्वारा प्राप्य, योगगम्य आपको नमस्कार है। निष्प्रपञ्चको नमस्कार है। निराभास! आपको नमस्कार है। विश्वरूप ब्रह्म परमात्माको नमस्कार है॥५०-५२॥

त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव सकलं स्थितम्।

त्वया संह्रियते विश्वं प्रधानाद्यं जगन्मय॥५३॥

त्वमीश्वरो महादेवः परं ब्रह्म महेश्वरः ।

परमेष्ठी शिवः शान्तः पुरुषो निष्कलो हरः॥५४॥

त्वमक्षरं परं ज्योतिस्त्वं कालः परमेश्वरः ।

त्वमेव पुरुषोऽनन्तः प्रधानं प्रकृतिस्तथा ॥५५॥

जगन्मय! आपके द्वारा ही यह सम्पूर्ण (जगत्) रचा गया है, आपमें ही यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है और आप ही प्रधानादि समस्त विश्वका संहार करते हैं। आप ईश्वर, महादेव, परब्रह्म, महेश्वर, परमेष्ठी, शिव, शान्त, पुरुष, निष्कल तथा हर हैं। आप अक्षर, परम ज्योति हैं, आप काल तथा परमेश्वर हैं और आप ही प्रधान पुरुष, प्रकृति तथा अनन्त हैं ।। ५३-५५ ।।

भूमिरापोऽनलो वायुयॊमाहंकार एव च।

यस्य रूपं नमस्यामि भवन्तं ब्रह्मसंज्ञितम्॥५६॥

यस्य द्यौरभवन्मूर्धा पादौ पृथ्वी दिशो भुजाः ।

आकाशमुदरं तस्मै विराजे प्रणमाम्यहम्॥५७॥

संतापयति यो विश्वं स्वभाभिर्भासयन् दिशः।

ब्रह्मतेजोमयं नित्यं तस्मै सूर्यात्मने नमः ॥५८॥

हव्यं वहति यो नित्यं रौद्री तेजोमयी तनुः ।

कव्यं पितृगणानां च तस्मै वढ्यात्मने नमः॥५९॥

आप्यायति यो नित्यं स्वधाम्ना सकलं जगत्।

पीयते देवतासंघैस्तस्मै सोमात्मने नमः॥६०॥

भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश एवं अहंकार- ये जिसके रूप हैं, उन ब्रह्मसंज्ञक आपको नमस्कार करता हूँ। धुलोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी पैर है, दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं और आकाश जिनका उदर है, उन विराट् पुरुषको मेरा प्रणाम है। जो अपने प्रकाशसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करते हुए विश्व को अपेक्षित उष्णता प्रदान करते हैं, उन नित्य ब्रह्म तेजोमय सूर्य रूप को नमस्कार है। जो अपने रौद्र तेजोमय शरीर से (देवताओंको) हव्य तथा पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं, उन अग्निस्वरूप (देव)-को नमस्कार है। जो अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को नित्य संतृप्त करते हैं और देवतासमूहके द्वारा जिनका पान किया जाता है, उन सोमरूप चन्द्रदेव को नमस्कार है॥५६-६०॥

बिभर्त्यशेषभूतानि योऽन्तश्चरति सर्वदा।

शक्तिर्माहेश्वरी तुभ्यं तस्मै वाय्वात्मने नमः॥६१॥

जो सम्पूर्ण प्राणियों का भरण-पोषण करती है और जो (सभी प्राणियोंके) भीतर सदा विचरण करती है, ऐसी वायुरूपात्मक माहेश्वरीशक्ति आपको नमस्कार है॥६१॥

सृजत्यशेषमेवेदं यः स्वकर्मानुरूपतः।

स्वात्मन्यवस्थितस्तस्मै चतुर्वक्त्रात्मने नमः॥६२॥

यः शेषशयने शेते विश्वमावृत्य मायया।

स्वात्मानुभूतियोगेन तस्मै विश्वात्मने नमः॥६३॥

बिभर्ति शिरसा नित्यं द्विसप्तभुवनात्मकम्।

ब्रह्माण्डं योऽखिलाधारस्तस्मै शेषात्मने नमः॥६४॥

जो प्राणियोंके अपने-अपने कर्मोंके अनुसार इस सम्पूर्ण (जगत्)-की सृष्टि करते हैं, उन अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित चतुर्मुखात्मक (ब्रह्मा)-को नमस्कार है। जो अपने आत्मामें प्रतिष्ठित अनुभूतिरूप योगसे (प्रेरित) मायाद्वारा सम्पूर्ण विश्व को आवृतकर शेष (शेषनाग)की शय्यापर शयन करते हैं, उन विश्वात्मा को नमस्कार है। जो चौदह भुवनोंवाले ब्रह्माण्ड को नित्य अपने सिर पर धारण किये रहते हैं और जो सभी के आश्रय हैं, उन शेषात्माको नमस्कार है॥६२-६४॥

यः परान्ते परानन्दं पीत्वा दिव्यैकसाक्षिकम्।

नृत्यत्यनन्तमहिमा तस्मै रुद्रात्मने नमः॥६५॥

योऽन्तरा सर्वभूतानां नियन्ता तिष्ठतीश्वरः।

तं सर्वसाक्षिणं देवं नमस्ये भवतस्तनुम्॥६६॥

यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः समदर्शिनः ।

ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः॥६७॥

यया संतरते मायां योगी संक्षीणकल्मषः।

अपारतरपर्यन्तां तस्मै विद्यात्मने नमः॥६८॥

यस्य भासा विभातीदमद्वयं तमसः परम्।

प्रपद्ये तत् परं तत्त्वं तद्रूपं परमेश्वरम्॥६९॥

नित्यानन्दं निराधारं निष्कलं परमं शिवम्।

प्रपद्ये परमात्मानं भवन्तं परमेश्वरम्॥७०॥

जो महाप्रलयकाल में दिव्य एवं एकमात्र साक्षी रूप परमानन्द का आस्वादन करते हुए नृत्य करते हैं, उन अनन्त महिमावाले रुद्रात्मा को नमस्कार है। जो ईश्वर सभी प्राणियों के भीतर नियन्ताके रूप में प्रतिष्ठित रहते हैं, उन सर्वसाक्षी देव और उनके शरीररूप (देव)को मैं नमस्कार करता हूँ। निद्रारहित, श्वासको जीतनेवाले, संतुष्ट तथा समदर्शी (योगीजन समाधिमें) जिस ज्योति या प्रकाशका दर्शन करते हैं, उन योगात्माको नमस्कार है। जिस (विद्या)-के द्वारा पुण्यात्मा योगीजन अत्यन्त कठिनता से पार की जा सकनेवाली मायाको सरलता से पार कर लेते हैं, उस विद्यास्वरूप (देव)-को नमस्कार है। जिसके प्रकाशसे यह (विश्व) प्रकाशित होता है, मैं (उस) अन्धकारसे सर्वथा रहित अर्थात् प्रकाश स्वरूप और अद्वितीय परम तत्त्व-स्वरूप (तद्रूप परम-तत्त्व मात्र ही जिनका स्वरूप है, उन) परमेश्वरकी शरण ग्रहण करता हूँ। मैं नित्यानन्दस्वरूप, निराधार, निष्कल परमात्मा, परमेश्वर आप परम शिवकी शरण ग्रहण करता हूँ॥६५-७०॥

एवं स्तुत्वा महादेवं ब्रह्मा तद्भावभावितः।

प्राञ्जलिः प्रणतस्तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम्॥७१॥

इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर ब्रह्मा उनकी भावनासे भावित होकर सनातन ब्रह्मको सम्बोधित करते हुए विनयपूर्वक हाथ जोड़े हुए खड़े हो गये ॥७१॥

ततस्तस्मै महादेवो दिव्यं योगमनुत्तमम्।

ऐश्वर्य ब्रह्मसद्भावं वैराग्यं च ददौ हरः॥७२॥

कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतार्तिहा।

व्याजहार स्वयं देवः सोऽनुगृह्य पितामहम्॥७३॥

तदनन्तर महादेव हरने उन्हें सर्वश्रेष्ठ दिव्य योग (ज्ञान), ऐश्वर्य, ब्रह्मकी सद्भावना (ब्रह्मविषयक उत्तम भाव) तथा वैराग्य प्रदान किया। शरणागतों का कष्ट हरनेवाले उन (शंकर) देवने स्वयं अपने मनोरम एवं कल्याणकारी हाथोंके द्वारा उनका (ब्रह्माका) स्पर्श किया और उनपर अनुग्रह करके वे बोले-॥७२-७३॥

यत्त्वयाभ्यर्थितं ब्रह्मन् पुत्रत्वे भवतो मम।

कृतं मया तत् सकलं सृजस्व विविधं जगत्॥७४॥

त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं ब्रह्मन् ब्रह्मविष्णुहराख्यया।

सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलः परमेश्वरः ।। ७५॥

स त्वं ममाग्रजः पुत्रः सृष्टिहेतोर्विनिर्मितः ।

ममैव दक्षिणादङ्गाद् वामाङ्गात् पुरुषोत्तमः॥७६ ॥

तस्य देवादिदेवस्य शम्भोर्हदयदेशतः ।

सम्बभूवाथ रुद्रोऽसावहं तस्यापरा तनुः॥७७॥

ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन् सर्गस्थित्यन्तहेतवः।

विभज्यात्मानमेकोऽपि स्वेच्छया शंकरः स्थितः ।।७८॥

ब्रह्मन् ! जो आपने 'मेरा पुत्र बनें' इस प्रकार से मुझसे प्रार्थना की थी, मैंने उसे (रुद्ररूपमें उत्पन्न होकर) पूर्ण कर दिया। (अब आप) विविध प्रकार के जगत्की सृष्टि करें। ब्रह्मन् ! मैं ही निष्कल परमेश्वर सृष्टि, रक्षा एवं प्रलय-इन तीन गुणोंसे भावित होकर ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव-इन नामोंसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। आप मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं और सृष्टिकी रचनाके लिये मेरे ही दाहिने अङ्गसे आप बनाये गये हैं। मेरे ही बायें अङ्गसे पुरुषोत्तम विष्णु उत्पन्न हैं। उन्हीं देवोंमें आदिदेव शम्भुके हृदयप्रदेशसे मैं ही रुद्ररूपमें प्रादुर्भूत हूँ और उन्हींकी अपर मूर्ति हूँ। हे ब्रह्मन्! ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव (क्रमशः) सृष्टि, स्थिति तथा संहारके हेतु हैं। एक होते हुए भी वे शंकर अपनी इच्छासे अपने को (तीन रूपोंमें) विभक्तकर स्थित रहते हैं।७४-७८॥

तथान्यानि च रूपाणि मम मायाकृतानि तु।

निरूपः केवलः स्वच्छो महादेवः स्वभावतः॥७९॥

इसी प्रकार अन्य भी जो रूप हैं, वे सब मेरी मायाद्वारा ही निर्मित हैं। स्वरूपतः महादेव स्वच्छ, रूपरहित एवं अद्वितीय हैं ॥ ७९ ॥

एभ्यः परतरो देवस्त्रिमूर्तिः परमा तनुः।

माहेश्वरी त्रिनयना योगिनां शान्तिदा सदा।।८०॥

वे देव इन त्रिमूर्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश)-से उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ शरीरवाले हैं। तीन नेत्रोंवाली वह माहेश्वरी मूर्ति योगियोंको सदा शान्ति प्रदान करनेवाली है। ८० ॥

तस्या एव परां मूर्तिं मामवेहि पितामह।

शाश्वतैश्वर्यविज्ञानतेजोयोगसमन्विताम् ॥८१॥

सोऽहं ग्रसामि सकलमधिष्ठाय तमोगुणम्।

कालो भूत्वा न तमसा मामन्योऽभिभविष्यति॥८२॥

यदा यदा हि मां नित्यं विचिन्तयसि पद्मज।

तदा तदा मे सांनिध्यं भविष्यति तवानघ॥८३॥

पितामह! मुझे सनातन ऐश्वर्य, विज्ञान, तेज एवं योगसे समन्वित उनकी वही परा मूर्ति समझो। वही मैं कालरूप होकर तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त विश्वको ग्रस्त कर लेता हूँ, कोई दूसरा तमद्वारा मुझे अभिभूत नहीं कर सकता। निष्पाप कमलोद्भव! जब-जब मुझ सनातनका तुम ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरी समीपता प्राप्त करोगे ॥ ८१-८३ ॥

एतावदुक्त्वा ब्रह्माणं सोऽभिवन्द्य गुरुं हरः।

सहैव मानसैः पुत्रैः क्षणादन्तरधीयत॥८४॥

इतना कहकर गुरु (पिता) ब्रह्माकी वन्दना करके वे हर (महेश्वर) मानस पुत्रोंके साथ क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। ८४॥

सोऽपि योगं समास्थाय ससर्ज विविधं जगत्।

नारायणाख्यो भगवान् यथापूर्वं प्रजापतिः॥८५॥

मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।

दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन योगविद्यया॥८६॥

नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः।

सर्वे ते ब्रह्मणा तुल्याः साधका ब्रह्मवादिनः॥८७॥

नारायण नामवाले उन भगवान्ने योगका अवलम्बन कर प्रजापतिने जैसी सृष्टि पूर्वमें की थी, वैसी ही विविध प्रकारके जगत्की सृष्टि की। योगविद्यासे उन्होंने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठको उत्पन्न किया। पुराणोंके अनुसार यह निश्चित है कि ये नौ ब्रह्माण कहलाते हैं। ये सभी ब्रह्मा के समान हैं, साधक हैं और ब्रह्मवादी हैं ॥ ८५-८७॥

संकल्पं चैव धर्मं च युगधर्मांश्च शाश्वतान्।

स्थानाभिमानिनः सर्वान् यथा ते कथितं पुरा॥८८॥

जैसा पहले बताया गया था तदनुसार संकल्प, धर्म, सनातन युगधर्म तथा सभी स्थानाभिमानी (देवताओं)का वर्णन तुम्हें सुनाया गया॥ ८८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे दशमोऽध्यायः॥१०॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १० ॥