40 अध्याय

तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा,

मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति

मार्कण्डेय उवाच

ततो गच्छेत राजेन्द्र भृगुतीर्थमनुत्तमम्।

तत्र देवो भृगुः पूर्वं रुद्रमाराधयत् पुरा॥१॥

दर्शनात् तस्य देवस्य सद्यः पापात् प्रमुच्यते।

एतत् क्षेत्रं सुविपुलं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २॥

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः ।

उपानहोस्तथा युग्मं देयमन्नं सकाञ्चनम्।

भोजनं च यथाशक्ति तदस्याक्षयमुच्यते॥३॥

क्षरन्ति सर्वदानानि यज्ञदानं तपः क्रिया।

अक्षयं तत् तपस्तप्तं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर॥४॥

तस्यैव तपसोग्रेण तुष्टेन त्रिपुरारिणा।

सांनिध्यं तत्र कथितं भृगुतीर्थे युधिष्ठिर॥५॥

मार्कण्डेयजीने कहा-राजेन्द्र! तदन्तर श्रेष्ठ भृगुतीर्थ में जाना चाहिये। प्राचीन कालमें यहाँ महर्षि भृगुदेवने भगवान् रुद्रकी आराधना की थी। उन देवके दर्शन करने से तत्काल पापसे मुक्ति हो जाती है। यह क्षेत्र बहुत बड़ा तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। यहाँ स्नान कर व्यक्ति स्वर्ग जाते हैं और यहाँ मृत्युको प्राप्त होनेवालों का पुनर्जन्म नहीं होता। यहाँ जूतेका जोड़ा तथा सोनेके साथ अन्नका दान करना चाहिये। यथाशक्ति भोजन भी कराना चाहिये। यह सब अक्षय (फलवाला) कहा गया है। युधिष्ठिर! सभी दान, यज्ञ, तप तथा कर्म नष्ट हो जाते हैं (किंतु) भृगुतीर्थमें किया हुआ तप अक्षय होता है। युधिष्ठिर! उन्हीं (महर्षि भृगु)-की उग्र तपस्यासे प्रसन्न होकर त्रिपुरारि भगवान् शंकर भृगुतीर्थमें सदैव संनिहित रहते हैं, यह शास्त्रोंमें कहा गया है॥१-५॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र गौतमेश्वरमुत्तमम्।

यत्राराध्य त्रिशूलाङ्कं गौतमः सिद्धिमाप्नुयात्॥६॥

तत्र स्नात्वा नरो राजन् उपवासपरायणः।

काञ्चनेन विमानेन ब्रह्मलोके महीयते॥७॥

वृषोत्सर्ग ततो गच्छेच्छाश्वतं पदमाप्नुयात्।

न जानन्ति नरा मूढा विष्णोर्मायाविमोहिताः॥८॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम गौतमेश्वर (तीर्थ)-में जाना चाहिये। जहाँ त्रिशूलका चिह्न धारण करनेवाले त्रिशूली (भगवान् शंकर)-की आराधनाकर (महर्षि) गौतम ने सिद्धि प्राप्त की थी। राजन् ! वहाँ (गौतमेश्वर-तीर्थमें) स्नानकर उपवासरत व्यक्ति सोनेके विमानद्वारा ब्रह्मलोक जाता है तथा वहाँ आदर प्राप्त करता है। तदुपरान्त वृषोत्सर्ग-तीर्थकी यात्रा कर शाश्वत पद प्राप्त करना चाहिये। विष्णुको मायासे मोहित मूढ व्यक्ति इस तीर्थको नहीं जानते ॥६-८॥

धौतपापं ततो गच्छेद् धौतं यत्र वृषेण तु।

नर्मदायां स्थितं राजन् सर्वपातकनाशनम्।

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ ९ ॥

तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः।

चतुर्भुजस्त्रिनेत्रश्च हरतुल्यबलो भवेत्॥१०॥

वसेत् कल्पायुतं साग्रं शिवतुल्यपराक्रमः।

कालेन महता जातः पृथिव्यामेकराड् भवेत्॥११॥

इसके पश्चात् धौतपाप नामक तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ स्वयं वृष (अर्थात् भगवान् धर्म)-ने अपना (पाप) धोया था। राजन् ! सभी पातकोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ नर्मदामें स्थित है। उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह चार भुजावाला, तीन नेत्रोंवाला और शंकरके समान बलवाला होता है। शिवके समान पराक्रमी होकर वह दस हजार कल्पों से भी अधिक समयतक शिवलोकमें निवास करता है और बहुत समयके बाद वह पृथ्वीपर एकच्छत्र सम्राट बनकर उत्पन्न होता है॥९-११ ।।

ततो गच्छेत राजेन्द्र हंसतीर्थमनुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते॥१२॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र सिद्धो यत्र जनार्दनः।

वराहतीर्थमाख्यातं विष्णुलोकगतिप्रदम्॥१३॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र चन्द्रतीर्थमनुत्तमम्।

पौर्णमास्यां विशेषेण स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र चन्द्रलोके महीयते॥१४॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र कन्यातीर्थमनुत्तमम्।

शुक्लपक्षे तृतीयायां स्नानं तत्र समाचरेत्।

स्नातमात्रो नरस्तत्र पृथिव्यामेकराड् भवेत्॥१५॥

देवतीर्थ ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्।

तत्र स्नात्वा च राजेन्द्र दैवतैः सह मोदते॥१६॥

राजेन्द्र! उसके बाद श्रेष्ठ हंस-तीर्थमें जाना चाहिये। राजन् ! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र! वहाँसे विष्णुलोककी गति प्रदान करनेवाले वराहतीर्थ नामसे प्रसिद्ध तीर्थमें जाना चाहिये, जहाँ जनार्दनने सिद्धि प्राप्त की थी। राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ चन्द्रतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ विशेषरूपसे पौर्णमासी को स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला व्यक्ति चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। राजेन्द्र ! इसके पश्चात् अत्युत्तम कन्यातीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ शुक्लपक्ष की तृतीया तिथिको स्नान करना चाहिये। वहाँ स्नानमात्र करने से व्यक्ति पृथ्वीमें एकमात्र सम्राट होता है। तदनन्तर सभी देवताओंसे वन्दित देवतीर्थमें जाना चाहिये। राजेन्द्र! वहाँ स्नान करनेसे देवताओंके साथ आनन्द (के अनुभवका अवसर) प्राप्त होता है॥ १२-१६॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र शिखितीर्थमनुत्तमम्।

यत् तत्र दीयते दानं सर्वं कोटिगुणं भवेत्॥१७॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थ पैतामहं शुभम्।

यत् तत्र क्रियते श्राद्धं सर्वं तदक्षयं भवेत्॥१८॥

सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।

विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते॥१९॥

मनोहरं तु तत्रैव तीर्थ परमशोभनम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् दैवतैः सह मोदते॥२०॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।

स्नात्वा तत्र नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥२१॥

राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ शिखितीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब करोड़ गुना फलवाला हो जाता है। राजेन्द्र! शुभ पैतामह तीर्थमें भी जाना चाहिये। वहाँ जो श्राद्ध किया जाता है, वह अक्षय (फलवाला) हो जाता है। सावित्रीतीर्थ में पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें महिमा प्राप्त करता है। वहीं मनोहर नामक परम सुन्दर तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम मानस तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ १७-२१॥

स्वर्गबिन्दुं ततो गच्छेत् तीर्थं देवनमस्कृतम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् दुर्गतिं नैव गच्छति॥२२॥

अप्सरेशं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।

क्रीडते नाकलोकस्थो ह्यप्सरोभिः स मोदते॥२३॥

तदुपरान्त देवताओंसे नमस्कृत स्वर्गबिन्दु नामक तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करने से मनुष्यकी दुर्गति नहीं होती। इसके बाद अप्सरेश-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करना चाहिये। इससे वह स्वर्गलोकमें निवास करते हुए क्रीड़ा करता है और अप्सराओं के साथ आनन्दित होता है ॥ २२-२३ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र भारभूतिमनुत्तमम्।

उपोषितोऽर्चयेदीशं रुद्रलोके महीयते।

अस्मिंस्तीर्थे मृतो राजन् गाणपत्यमवाप्नुयात्॥२४॥

कार्तिके मासि देवेशमर्चयेत् पार्वतीपतिम्।

अश्वमेधात् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः॥२५॥

वृषभं यः प्रयच्छेत तत्र कुन्देन्दुसप्रभम्।

वृषयुक्तेन यानेन रुद्रलोकं स गच्छति॥२६॥

एतत् तीर्थं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।

सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥२७॥

जलप्रवेशं यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।

हंसयुक्तेन यानेन स्वर्गलोकं स गच्छति ॥२८॥

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम भारभूति नामक तीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ उपवास करते हुए ईश्वर की आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। राजन् ! इस तीर्थमें मरनेवाला (शिवलोकमें) गाणपत्य-पद प्राप्त करता है। (यहाँ) कार्तिक मासमें पार्वतीपति देवताओंके ईश शंकरकी पूजा करनी चाहिये। इसका

फल मनीषी लोग अश्वमेधके फलसे भी दस गुना अधिक बताते हैं। जो वहाँ कुन्दपुष्प तथा इन्दु (चन्द्रमा)-के समान (श्वेत) वर्णवाले वृषभका दान करता है, वह वृषयुक्त विमानसे रुद्रलोकमें जाता है। इस तीर्थमें पहुँचकर जो प्राणोंका परित्याग करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मावाला होकर रुद्रलोकमें जाता है। नराधिप! इस तीर्थमें जो जलमें प्रवेश (-कर प्राणत्याग) करता है, वह हंसयुक्त विमानसे स्वर्गलोक जाता है॥ २४-२८॥

एरण्ड्या नर्मदायास्तु संगमं लोकविश्रुतम्।

तत्र तीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥२९॥

उपवासपरो भूत्वा नित्यं व्रतपरायणः।

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र मुच्यते ब्रह्महत्यया॥३०॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र नर्मदोदधिसंगमम्।

जमदग्निरिति ख्यातः सिद्धो यत्र जनार्दनः॥३१॥

तत्र स्नात्वा नरो राजन् नर्मदोदधिसंगमे।

त्रिगुणं चाश्वमेधस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥३२॥

एरण्डी तथा नर्मदाका संगम विख्यात है। वहाँ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। राजेन्द्र! वहाँ स्नानकर उपवास करनेवाला तथा नित्य व्रतपरायण रहनेवाला व्यक्ति ब्रह्महत्या (के पाप)-से मुक्त हो जाता है। राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदा और सागरके संगम-स्थलमें जाना चाहिये। जहाँ जमदग्नि नामसे विख्यात जनार्दनको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! वहाँ नर्मदा तथा सागरके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधके फलका तिगुना फल प्राप्त करता है॥ २९-३२॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र पिङ्गलेश्वरमुत्तमम्।

तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥३३॥

तत्रोपवासं यः कृत्वा पश्येत विमलेश्वरम्।

सप्तजन्मकृतं पापं हित्वा याति शिवालयम्॥ ३४॥

राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम पिङ्गलेश्वर तीर्थमें जाना चाहिये। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य रुद्रलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ उपवास करके जो विमलेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें जाता है॥ ३३-३४॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र आलिकातीर्थमुत्तमम्।

उपोष्य रजनीमेकां नियतो नियताशनः।

अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मुच्यते ब्रह्महत्यया॥३५॥

राजेन्द्र! वहाँसे उत्तम आलिका-तीर्थमें जाना चाहिये। इस तीर्थका माहात्म्य यह है कि यहाँ एक रात्रि उपवास करके संयत रहते हुए नियमपूर्वक सात्त्विक आहार करने से ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति मिल जाती है ॥ ३५ ॥

एतानि तव संक्षेपात् प्राधान्यात् कथितानि तु।

नशक्या विस्तराद्वक्तुं संख्या तीर्थेषु पाण्डव॥३६॥

पाण्डव! संक्षेपमें मैंने प्रधान-प्रधान तीर्थों को बतलाया। विस्तारपूर्वक तीर्थोंकी संख्याका वर्णन नहीं किया जा सकता।।३६ ।।

एषा पवित्रा विमला नदी त्रैलोक्यविश्रुता।

नर्मदा सरितां श्रेष्ठा महादेवस्य वल्लभा॥३७॥

मनसा संस्मरेद्यस्तु नर्मदां वै युधिष्ठिर।

चान्द्रायणशतं साग्रं लभते नात्र संशयः॥३८॥

अश्रद्दधानाः पुरुषा नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः।

पतन्ति नरके घोरे इत्याह परमेश्वरः॥३९॥

नर्मदा सेवते नित्यं स्वयं देवो महेश्वरः।

तेन पुण्या नदी ज्ञेया ब्रह्महत्यापहारिणी॥४०॥

यह पवित्र तथा स्वच्छ जलवाली नर्मदा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात है। नर्मदा सभी नदियोंमें श्रेष्ठ है और महादेवको अत्यन्त प्रिय है। युधिष्ठिर! जो मनसे भी नर्मदाका स्मरण करता है, वह सौ चान्द्रायण व्रतोंसे भी अधिक फल प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। परमेश्वर का यह कहना है कि श्रद्धासे रहित तथा घोर नास्तिकता का आश्रय लेनेवाले पुरुष भीषण नरकमें गिरते हैं (इसलिये ऐसे पुरुषोंको नरकसे बचनेके लिये नर्मदाका दर्शन-सेवन करना चाहिये)। इसी कारण स्वयं देव महेश्वर हम लोगोंको प्रेरणा देनेके लिये नित्य नर्मदाका सेवन करते हैं, अत: इस पवित्र नदीको ब्रह्महत्या-जैसे पापोंको दूर करनेवाली समझना चाहिये (तथा पूर्ण निष्ठाके साथ इसका दर्शन, सेवन अवश्य करना चाहिये)॥३७-४०॥