4 अध्याय

सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्माण्डकी सृष्टिका क्रम, पञ्चीकरण-

प्रक्रिया तथा परमेश्वरके विविध नामोंका निरूपण

सूत उवाच

श्रुत्वाश्रमविधिं कृत्स्नमृषयो हष्टमानसाः।

नमस्कृत्य हृषीकेशं पुनर्वचनमब्रुवन्॥१॥

सूतजीने कहा-आश्रमोंके सम्बन्धमें पूरे विधि-विधान को सुनकर प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने भगवान् हृषीकेश को नमस्कार करके पुनः इस प्रकारका वचन कहा-॥१॥

मुनय ऊचुः

भाषितं भवता सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।

इदानीं श्रोतुमिच्छामो यथा सम्भवते जगत्॥२॥

कुतः सर्वमिदं जातं कस्मिश्च लयमेष्यति।

नियन्ता कश्च सर्वेषां वदस्व पुरुषोत्तम॥३॥

श्रुत्वा नारायणो वाक्यमृषीणां कूर्मरूपधृक् ।

प्राह गम्भीरया वाचा भूतानां प्रभवाप्ययौ॥४॥

मुनिजन बोले-(भगवन् !) आपने श्रेष्ठ चारों आश्रमों के विषयमें सब कुछ बतलाया, अब इस समय हमें यह सुननेकी इच्छा है कि इस जगत्की सृष्टि कैसे होती है। हे पुरुषोत्तम! यह सब (संसार) कहाँ से उत्पन्न हुआ, किसमें विलीन होगा और इन सबका नियामक कौन है? यह सब आप बतलायें। ऋषियोंका वचन सुनकर कूर्मरूप धारण करनेवाले तथा सभी भूत-प्राणियों के उत्पत्ति और विनाशके स्थान भगवान् नारायण गम्भीर वाणी में बोले-॥२-४॥

श्रीकूर्म उवाच

महेश्वरः परोऽव्यक्तश्चतुव्यूहः सनातनः।

अनन्तश्चाप्रमेयश्च नियन्ता विश्वतोमुखः॥५॥

अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।

प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥६॥

श्रीकूर्मने कहा-सर्वत्र (चारों ओर) मुखवाले महेश्वर (प्रकृतिसे) पर, अव्यक्त, चतुर्दूह, सनातन, अनन्त, अप्रमेय तथा (समस्त जगत्के) नियन्ता हैं । तत्त्वचिन्तक जिसे प्रधान और प्रकृति कहते हैं और जो सत्-असत्-रूप हैं, वही अव्यक्त नित्य कारण है॥५-६॥

गन्धवर्णरसैहीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।

अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥७॥

गन्ध, वर्ण और रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, ध्रुव, अक्षय्य (कभी नाश न होनेवाला), नित्य ॥७॥

जगद्योनिमहाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।

विग्रहः सर्वभूतानामात्मनाधिष्ठितं महत्॥ ८ ॥

अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवाप्ययम्।

असाम्प्रतमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे समवर्तत॥ ९ ॥

अपनी आत्मा में स्थित संसार का बीजरूप, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंकी मूर्तिरूप, आत्मा से अधिष्ठित, महत्तत्त्व, अनादि, अनन्त, अजन्मा, सूक्ष्म, त्रिगुण, उत्पत्ति और प्रलय का स्थान, शाश्वत तथा अविज्ञेय ब्रह्म ही आदिमें विद्यमान था।।८-९॥

गुणसाम्ये तदा तस्मिन् पुरुषे चात्मनि स्थिते।

प्राकृतः प्रलयो ज्ञेयो यावद् विश्वसमुद्भवः॥१०॥

ब्राह्मी रात्रिरियं प्रोक्ता अहः सृष्टिरुदाहृता।

अहर्न विद्यते तस्य न रात्रि पचारतः॥११॥

उस समय गुणोंकी साम्यावस्था रूप उस पुरुष के आत्मस्वरूप में स्थित होने पर जब तक विश्व की सृष्टि नहीं हो जाती, प्राकृत प्रलय (-का समय) जानना चाहिये। यह ब्रह्माकी रात्रि कही गयी है और सृष्टिको ब्रह्मा का दिन कहा गया है, (वास्तव में) उसका न दिन होता है और न रात होती है॥१०-११॥

निशान्ते प्रतिबुद्धोऽसौ जगदादिरनादिमान्।

सर्वभूतमयोऽव्यक्तो ह्यन्तर्यामीश्वरः परः॥१२॥

प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्याशु महेश्वरः।

क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः॥१३॥

आदिसे रहित वह जगत्का आदि कारण, सर्वभूतमय, अव्यक्त, अन्तर्यामी परात्पर ईश्वर रात्रि व्यतीत होने पर जाग्रत् हुआ। परमेश्वर महेश्वरने प्रकृति एवं पुरुष में शीघ ही प्रविष्ट होकर परम योगके द्वारा (उनमें) क्षोभ (गति) उत्पन्न किया ॥१२-१३॥

यथा मदो नरस्त्रीणां यथा वा माधवोऽनिलः।

अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान्॥१४॥

स एव क्षोभको विप्राः क्षोभ्यश्च परमेश्वरः।

स संकोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः ॥१५॥

प्रधानात्क्षोभ्यमाणाच्च तथा पुंसः पुरातनात्।

प्रादुरासीन्महद् बीजं प्रधानपुरुषात्मकम्॥ १६ ॥

जैसे वसन्त ऋतुकी वायु अथवा मद पुरुष एवं स्त्रियोंको (क्षुब्ध करता है) वैसे ही वह योग विग्रह (योगबल से विविध शरीर-धारण में समर्थ ईश्वर) प्रकृति एवं पुरुषमें अनुप्रविष्ट होकर क्षोभका कारण बनता है। हे ब्राह्मणो! वही परमेश्वर क्षोभ उत्पन्न करनेवाला है एवं स्वयं क्षुब्ध होनेवाला है, वह प्रलय एवं सृष्टि करने के कारण प्रधान भी कहलाता है। प्रधान पुरातनपुरुष के क्षुब्ध होनेसे प्रधान (प्रकृति) पुरुषात्मक महद् बीज का आविर्भाव हुआ ॥१४-१६॥

महानात्मा मतिर्ब्रह्मा प्रबुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।

प्रज्ञा धृतिः स्मृतिः संविदेतस्मादिति तत् स्मृतम्॥१७॥

इसी कारण से (वह महद्वीज) महान् आत्मा, मति, प्रबुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, धृति, स्मृति तथा संवित् कहलाता है ॥१७॥

वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः।

त्रिविधोऽयमहंकारो महतः सम्बभूव ह॥१८॥

महत्तत्त्व से समस्त प्राणियों की सृष्टि का आदि कारण-वैकारिक, तैजस तथा तामस-यह तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ॥ १८॥

अहंकारोऽभिमानश्च कर्ता मन्ता च स स्मृतः ।

आत्मा च पुद्गलो जीवो यतः सर्वाः प्रवृत्तयः॥१९॥

पञ्चभूतान्यहंकारात् तन्मात्राणि च जज्ञिरे।

इन्द्रियाणि तथा देवाः सर्वं तस्यात्मजं जगत्॥२०॥

वह अहंकार अभिमान, कर्ता, मन्ता, आत्मा, पुद्गल तथा जीव (नामों)-से कहा गया है। उसी अहंकार से सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं। अहंकार से पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश), पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), सभी इन्द्रियाँ तथा उन इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता उत्पन्न हुए। यह सम्पूर्ण जगत् उससे ही उत्पन्न हुआ है ॥ १९-२०॥

मनस्त्वव्यक्तजं प्रोक्तं विकारः प्रथमः स्मृतः।

येनासौ जायते कर्ता भूतादींश्चानुपश्यति ॥२१॥

वैकारिकादहंकारात् सर्गो वैकारिकोऽभवत्।

तैजसानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश ॥२२॥

इस 'रस' अव्यक्तसे उत्पन्न मनको प्रथम विकार माना गया है। इस कारण यह कर्ता एवं भूतादिकों को देखनेवाला है। वैकारिक अहंकारसे वैकारिक सृष्टि उत्पन्न हुई। इन्द्रियाँ तैजस हैं और (उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) दस देवता वैकारिक हैं ॥ २१-२२ ।।

एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम्।

भूततन्मात्रसर्गोऽयं भूतादेरभवन् प्रजाः ॥२३॥

भूतादिस्तु विकुर्वाण: शब्दमानं ससर्ज ह।

आकाशं शुषिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम्॥२४॥

आकाशस्तु विकुर्वाण: स्पर्शमात्रं ससर्ज ह।

वायुरुत्पद्यते तस्मात् तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥ २५॥

उनमें (ग्यारहवाँ) इन्द्रिय मन अपने गुणके कारण उभयात्मक है। यह भूततन्मात्राओंकी सृष्टि है। भूतादिकों से ही प्रजा उत्पन्न हुई। विकारप्राप्त भूतोंने शब्दतन्मात्रा को उत्पन्न किया। उस (शब्द तन्मात्रा)-से शब्द लक्षण-वाले तथा अवकाशस्वरूप आकाशकी उत्पत्ति हुई। वैकारिक आकाशने स्पर्श तन्मात्राको उत्पन्न किया। उससे वायु उत्पन्न हुआ और वायुका गुण स्पर्श कहा गया है॥२३-२५॥

वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह।

ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ २६॥

ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमानं ससर्ज ह।

सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु॥२७॥

आपश्चापि विकुर्वन्त्यो गन्धमात्रं ससर्जिरे।

संघातो जायते तस्मात् तस्य गन्धो गुणो मतः ॥२८॥

विकारप्राप्त वायुने रूप तन्मात्राको उत्पन्न किया, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ और इसका 'रूप' गुण कहा जाता है। विकारको प्राप्त हुए तेजने भी रस तन्मात्रा की सृष्टि की और उससे फिर जलकी उत्पत्ति हुई, वह जल गुणका आधार है। विकारको प्राप्त हो रहे जलने गन्ध तन्मात्राको उत्पन्न किया, उससे संघात (पृथ्वीतत्त्व) उत्पन्न हुआ और उसका गुण 'गन्ध' माना गया है॥ २६-२८॥

आकाशंशब्दमात्रं यत् स्पर्शमानं समावृणोत्।

द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत्॥२९॥

रूपं तथैवाविशतः शब्दस्पर्शी गुणावुभौ।

त्रिगुणः स्यात् ततो वह्निः स शब्दस्पर्शरूपवान्॥३०॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसमानं समाविशन्।

तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः॥३१॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपंच रसो गन्धं समाविशन्।

तस्मात् पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शब्दयते॥३२॥

आकाशकी शब्द नामक तन्मात्रा है, उसने स्पर्श नामक तन्मात्राको आवृत किया है, इसलिये वायु शब्द तथा स्पर्श-इन दो गुणोंवाला है। उसी प्रकार रूप (नामक) गुण, शब्द एवं स्पर्श दो गुणोंसे आविष्ट है, अतः तेज या अग्नि-शब्द, स्पर्श तथा रूप-इन तीन गुणोंवाला है। शब्द, स्पर्श तथा रूप एवं रस तन्मात्रा में प्रविष्ट हुए, इसलिये रसात्मक जल-तत्त्वको चार गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस)-से युक्त समझना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस-ये चार गुण गन्ध तन्मात्रा में प्रविष्ट हुए, इसलिये पञ्च स्थूल महाभूतसे युक्त पृथ्वी तत्त्व पाँच गुणोंवाला कहा गया है॥ २९-३२॥

शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः।

परस्परानुप्रवेशाद् धारयन्ति परस्परम् ॥ ३३॥

इसी कारण ये शान्त, घोर, मूढ तथा विशेष कहलाते हैं। ये परस्पर एक-दूसरे में प्रविष्ट होनेके कारण आपस में एक दूसरेको धारण किये रहते हैं॥ ३३॥

एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्।

नाशक्नुवन् प्रजाः स्त्रष्टमसमागम्य कृत्स्नशः॥३४॥

ये सातों महात्मा (महत्, अहंकार आदि तत्त्व) एक-दूसरे के आश्रित होनेके कारण बिना सम्पूर्ण रूप से मिले सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सके॥ ३४॥

पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।

महदादयो विशेषान्ता यण्डमुत्पादयन्ति ते॥ ३५॥

पुरुष से अधिष्ठित और अव्यक्तसे अनुगृहीत होनेके कारण महत्तत्त्वसे लेकर विशेष (पञ्चभूत)-पर्यन्त वे सभी (तत्त्व) अण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ३४-३५॥

एककालसमुत्पन्नं जलबुबुदवच्च तत्।

विशेषेभ्योऽण्डमभवद् बृहत् तदुदकेशयम्॥ ३६॥

तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः ।

प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञितः॥३७॥

स वै शरीरी प्रथमः स वै

आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत ॥ ३८॥

यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्।

हिरण्यगर्भ कपिलं छन्दोमूर्ति सनातनम्॥ ३९॥

विशेषों (महाभूतों)-से एक बार में ही जलके बुल-बुले के समान तथा जलमें स्थित वह बृहत् अण्ड उत्पन्न हुआ। उसी (बृहत् अण्ड)-में परमेष्ठीके (सृष्टिस्वरूप) कार्यका करण सिद्ध (निष्पन्न) हुआ। प्राकृत अण्ड में क्षेत्रज्ञ आविर्भूत हुआ जो ब्रह्मा नामसे कहलाया। वे प्रथम शरीर धारण करनेवाले हैं। वे पुरुष कहलाते हैं और समस्त प्राणियोंके आदिकर्ता वे ब्रह्मा सर्वप्रथम उत्पन्न हुए। प्रधान से परमें स्थित उस पुरुष को हंस, हिरण्यगर्भ, कपिल, छन्दोमूर्ति तथा सनातन कहा जाता है॥ ३६-३९॥

मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः ।

गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन् परमात्मनः॥४०॥

पुरुष उच्यते।

तस्मिन्नण्डेऽभवद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्।

चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥४१॥

उस परमात्माका गर्भवेष्टन था मेरु, पर्वत थे गर्भ के आवरणरूप चर्म-जरायु तथा गर्भोदक थे सभी समुद्र। उस अण्डमें देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ तथा ग्रहों, नक्षत्रोंसहित वायु, सूर्य एवं चन्द्रमा भी उत्पन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥

अद्भिर्दशगुणाभिश्च बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।

आपो दशगुणेनैव तेजसा बाह्यतो वृताः॥४२॥

तेजो दशगुणेनैव बाह्यतो वायुनावृतम्।

आकाशेनावृतो वायुः खंतु भूतादिनावृतम्॥४३॥

भूतादिमहता तद्वदव्यक्तेनावृतो महान्।

एते लोका महात्मानः सर्वतत्त्वाभिमानिनः॥४४॥

अण्ड (ब्रह्माण्ड) बाहरकी ओर अपनेसे दस गुने अधिक जलसे घिरा हुआ है और जल बाहर से अपनेसे दस गुने अधिक तेजसे आवृत है। तेज बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक वायुसे आवृत है। इसी प्रकार वायु आकाशसे आवृत है और आकाश भूतादि अर्थात् अहंकारसे घिरा हुआ है। जैसे अहंकार महत्तत्त्वसे आवृत है, वैसे ही महत्तत्त्व अव्यक्त से आवृत है। ये लोक सर्वतत्त्वाभिमानी महान् स्वरूपवाले हैं। ४२-४४॥

वसन्ति तत्र पुरुषास्तदात्मानो व्यवस्थिताः।

ईश्वरा योगधर्माणो ये चान्ये तत्त्वचिन्तकाः॥४५॥

सर्वज्ञाः शान्तरजसो नित्यं मुदितमानसाः।

एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम्॥४६॥

उन (लोकों)-में उन्हींके आत्मरूप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा योगधर्मा (योगधर्मसे युक्त) पुरुष निवास करते हैं और अन्य भी जो तत्त्वचिन्तक हैं, वे भी निवास करते हैं। (वे सभी पुरुष) सर्वज्ञ, शान्त रजोगुणवाले अर्थात् सत्त्वसम्पन्न तथा नित्य ही अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हैं। ब्रह्माण्ड इन्हीं प्राकृत सात आवरणोंसे आवृत है॥ ४५-४६॥

एतावच्छक्यते वक्तुं मायैषा गहना द्विजाः।

एतत् प्राधानिकं कार्यं यन्मया बीजमीरितम्।

प्रजापतेः परा मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुतिः ॥४७॥

ब्राह्मणो! (इस विषयमें) केवल इतना ही कहा जा सकता है कि 'यह माया बहुत ही गहन है'। बीजरूपसे मैंने जिसका वर्णन किया वह सब प्रधान अर्थात् प्रकृतिका कार्य (व्यापार) है। यह (प्रकृति या माया अन्य और कोई नहीं) प्रजापतिकी (ही) परा मूर्ति है-ऐसा वेदोंका अभिमत है॥ ४७ ॥

ब्रह्माण्डमेतत् सकलं सप्तलोकतलान्वितम्।

द्वितीयं तस्य देवस्य शरीरं परमेष्ठिनः॥४८॥

हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा वै कनकाण्डजः।

तृतीयं भगवद्रूपं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः॥४९॥

सात लोकोंके तलसे युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन परमेष्ठी देवका दूसरा शरीर है। वेदोंके अर्थ को ठीक-ठीक जाननेवाले बतलाते हैं कि सोनेके समान वर्णवाले पीत अण्डसे प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा भगवान्के तीसरे रूप (शरीर) हैं ॥ ४८-४९॥

रजोगुणमयं चान्यद् रूपं तस्यैव धीमतः।

चतुर्मुखः स भगवान् जगत्सृष्टौ प्रवर्तते॥५०॥

सृष्टं च पाति सकलं विश्वात्मा विश्वतोमुखः।

सत्त्वं गुणमुपाश्रित्य विष्णुर्विश्वेश्वरः स्वयम्॥५१॥

अन्तकाले स्वयं देवः सर्वात्मा परमेश्वरः ।

तमोगुणं समाश्रित्य रुद्रः संहरते जगत्॥५२॥

उन्हीं धीमान्का जो रजोगुणयुक्त अन्य रूप है, वे ही चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हैं तथा संसारकी सृष्टि करते हैं। स्वयं विश्वेश्वर विश्वतोमुख विश्वात्मा भगवान् विष्णु सत्त्वगुणका आश्रय ग्रहणकर उत्पन्न हुए सम्पूर्ण (संसार)-का पालन-पोषण करते हैं। अन्तकालमें स्वयं परमेश्वर सर्वात्मा रुद्रदेव तमोगुणका समाश्रयणकर संसार का संहार करते हैं। ५०-५२॥

एकोऽपि सन्महादेवस्त्रिधासौ समवस्थितः ।

सर्गरक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः ।

एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः॥५३॥

योगेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च।

नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया॥५४॥

एक होनेपर भी वे निर्गुण-निरञ्जन महादेव सृष्टि, पालन और संहाररूपी तीन गुणोंके कारण तीन रूपों में स्थित हैं। वे कभी एक, कभी दो, कभी तीन तथा कभी अनन्त रूप धारण कर लेते हैं। वे योगेश्वर (परमात्मा) अपनी लीलासे अनेक आकार, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंका निर्माण करते हैं और फिर संहार कर डालते हैं ॥५३-५४॥

हिताय चैव भक्तानां स एव ग्रसते पुनः ।

त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्ये सम्प्रवर्तते।

सृजते ग्रसते चैव वीक्षते च विशेषतः॥५५॥

भक्तोंके कल्याणके लिये ही वे पुनः संहार करते हैं। अपनेको तीन रूपोंमें विभक्तकर तीनों कालोंमें प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार (वे) विशेष रूपसे सृष्टि, संहार और पालनका कार्य करते हैं ॥ ५५ ॥

यस्मात् सृष्ट्वानुगृह्णाति ग्रसते च पुनः प्रजाः।

गुणात्मकत्वात् त्रैकाल्ये तस्मादेकः स उच्यते॥५६॥

अग्ने हिरण्यगर्भः स प्रादुर्भूतः सनातनः।

आदित्वादादिदेवोऽसौ अजातत्वादजः स्मृतः॥५७॥

चूँकि वे (स्वयं ही) प्रजाकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन करते हैं और (स्वयं उसका) पुनः संहार करते हैं, इसलिये तीनों कालोंमें (सत्त्व, रज तथा तमरूप) त्रिगुणात्मक होनेसे वे (परमात्मा) एक (अद्वैत) कहलाते हैं। प्रारम्भमें वे सनातन हिरण्यगर्भ प्रादुर्भूत हुए। आदि में उत्पन्न होनेसे वे आदिदेव तथा अजन्मा होने से अज कहलाते हैं ।।५६-५७॥

पाति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।

देवेषु च महादेवो महादेव इति स्मृतः॥५८॥

वे समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' इस नामसे कहे जाते हैं और देवताओंमें सबसे बड़े देव हैं, इसलिये 'महादेव' कहलाते हैं। ५८ ॥

बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा परत्वात् परमेश्वरः।

वशित्वादप्यवश्यत्वादीश्वरः परिभाषितः॥५९॥

ऋषिः सर्वत्रगत्वेन हरिः सर्वहरो यतः।

अनुत्पादाच्च पूर्वत्वात् स्वयम्भूरिति स स्मृतः॥६०॥

नराणामयनो यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः।

हरः संसारहरणाद् विभुत्वाद् विष्णुरुच्यते॥६१॥

बृहत् होनेसे वे ब्रह्मा तथा परम (श्रेष्ठ) होनेके कारण परमेश्वर कहे जाते हैं। सबको अपने वशमें रखनेवाले, परंतु स्वयं किसीके वशमें न रहने के कारण वे ईश्वर (नामसे) परिभाषित किये जाते हैं। उनकी सर्वत्र गति होनेके कारण वे ऋषि और (प्रलयकालमें) सब कुछ हरण करनेके कारण हरि कहलाते हैं। किसीके द्वारा उत्पन्न न होने तथा सर्वप्रथम होनेके कारण 'स्वयम्भू' इस नाम से कहे जाते हैं। सभी मनुष्यों के वे अयन (आश्रय-स्थान) हैं, इसलिये नारायण कहे जाते हैं, संसारका संहार करनेसे हर तथा सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु कहलाते हैं ॥५९-६१॥

भगवान् सर्वविज्ञानादवनादोमिति स्मृतः।

सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात् सर्वः सर्वमयो यतः॥६२॥

शिवः स निर्मलो यस्माद् विभुः सर्वगतो यतः।

तारणात् सर्वदुःखानां तारकः परिगीयते॥६३॥

(वे) सब कुछ जाननेके कारण भगवान् तथा रक्षा-कार्य करनेसे ॐ कहलाते हैं। सभी का विशिष्ट ज्ञान होनेसे सर्वज्ञ तथा सभीके आत्मस्वरूप होनेके कारण वे सर्व कहे जाते हैं। वे मलशून्य हैं, इसलिये शिव और सर्वत्र व्याप्त होनेसे विभु तथा सभी प्रकारके कष्टोंका निवारण करनेसे 'तारक' कहलाते हैं। ६२-६३॥

बहुनात्र किमुक्तेन सर्वं ब्रह्ममयं जगत्।

अनेकभेदभिन्नस्तु क्रीडते परमेश्वरः॥६४॥

और अधिक कहनेसे क्या लाभ! यह सारा जगत् ब्रह्ममय ही है और वे परमेश्वर अनेक रूपोंमें विभक्त होकर अनेक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) करते रहते हैं ॥ ६४॥

इत्येष प्राकृतः सर्गः संक्षेपात् कथितो मया।

अबुद्धिपूर्वको विप्रा ब्राह्मीं सृष्टिं निबोधत॥६५॥

हे ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें इस अबुद्धिपूर्वक हुए प्राकृत सर्ग (प्राकृत सृष्टि)-का वर्णन किया है। अब आप लोग ब्रह्माकी सृष्टिके सम्बन्धमें सुनें ॥६५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥४॥