कूर्म महा पुराण
4 अध्याय
शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन,
शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण
ईश्वर उवाच
वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः।
माहात्म्यं देवदेवस्य येनेदं सम्प्रवर्तते॥१॥
ईश्वर बोले-हे ब्रह्मवादियो! आपलोग ध्यान लगाकर सुनें। जिससे यह सभी प्रवर्तित होता है, उस देवाधिदेवके माहात्म्यको मैं बताता हूँ॥ १॥
नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन न चेज्यया।
शक्यो हि पुरुषैर्ऋतुमृते भक्तिमनुत्तमाम्॥२॥
अहं हि सर्वभावानामन्तस्तिष्ठामि सर्वगः।
मां सर्वसाक्षिणं लोको न जानाति मुनीश्वराः ॥३॥
यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।
सोऽहं धाता विधाता च कालोऽग्निर्विश्वतोमुखः॥४॥
न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।
ब्रह्मा च मनवः शक्रो ये चान्ये प्रथितौजसः॥५॥
मैं न तो विविध प्रकारके तपसे, न दानसे और न यज्ञोंसे ही जानने योग्य हूँ। बिना उत्तम भक्तिके मनुष्य मुझे जान नहीं सकता। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला मैं सभी भावोंके अन्त में प्रविष्ट रहता हूँ। परंतु मुनीश्वरो! मुझ सर्वसाक्षीको संसार जान नहीं पाता। जिसके भीतर यह सब प्रतिष्ठित है और जो परम तत्त्व सभीके अन्त में स्थित है, मैं वही धाता, विधाता, काल, अग्नि तथा सभी ओर मुखवाला हूँ। सभी मुनि, देवता, ब्रह्मा, मनु, इन्द्र और जो अत्यन्त तेजस्वी हैं, वे भी मुझे नहीं देख पाते ॥२-५॥
गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।
यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥६॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मा लोकपितामहः।
ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥७॥
अहं हि सर्वहविषां भोक्ता चैव फलप्रदः।
सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्थितः॥८॥
वेद मुझ अद्वितीय परमेश्वरकी निरन्तर स्तुति किया करते हैं। ब्राह्मण अनेक प्रकारके वैदिक यज्ञोंके द्वारा अग्निस्वरूप मेरा यजन करते हैं। सभी लोक तथा लोकपितामह ब्रह्मा मुझे नमस्कार करते हैं। योगी जन सभी प्राणियोंके अधिपति (मुझ) ईश्वर देवका ध्यान करते हैं। सबकी आत्मा और सर्वव्यापी मैं ही सभी देवोंके शरीरोंको धारण कर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता एवं सभी फलोंका प्रदाता हूँ॥६-८॥
मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।
तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्त्या मामुपासते॥ ९ ।।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते।
तेषां ददामि तत् स्थानमानन्दं परमं पदम्॥१०॥
धार्मिक वेदनिष्ठ विद्वान् मेरा दर्शन करते हैं। जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, मैं नित्य उनके समीपमें रहता हूँ। धार्मिक ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य मेरी उपासना करते हैं। मैं उन्हें आनन्दस्वरूप परमपद नामक स्थान प्रदान करता हूँ॥९-१०॥
अन्येऽपिये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीचजातयः।
भक्तिमन्तः प्रमुच्यन्ते कालेन मयि संगताः॥११॥
नमद्भक्ता विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः।
आदावेतत् प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति॥१२॥
यो वै निन्दति तं मूढो देवदेवं स निन्दति।
यो हितं पूजयेद् भक्त्या स पूजयति मां सदा॥१३॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकारणात्।
यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः ॥१४॥
अन्य भी जो विपरीत कर्म करनेके कारण शूद्र आदि निम्न जातियोंमें हैं, भक्तिपरायण होनेपर वे भी मुक्त हो जाते हैं और यथासमय मुझमें लीन हो जाते हैं। मेरे भक्त विनाशको प्राप्त नहीं होते, मेरे भक्त पापों से रहित हो जाते हैं। मैंने प्रारम्भमें ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि मेरे भक्तका विनाश नहीं होता। जो उस (भक्त)-की निन्दा करता है, वह मूढ देवाधिदेव (शंकर) की ही निन्दा करता है और जो उस (भक्त) की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, (समझो कि) वह सदा मेरी ही पूजा करता है। मेरी आराधनाके लिये जो नियमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल तथा जल मुझे प्रदान करता है, वह मेरा प्रिय भक्त है, ऐसा समझना चाहिये ॥११-१४॥
अहं हि जगतामादौ ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
विधाय दत्तवान् वेदानशेषानात्मनिःसृतान्॥१५॥
अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः।
धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम्॥ १६॥
मैंने ही संसारकी सृष्टिके प्रारम्भमें परमेष्ठी ब्रह्मा की सृष्टिकर अपनेसे प्रादुर्भूत सम्पूर्ण वेदोंको उन्हें प्रदान किया। मैं ही सभी योगियोंका अव्यय गुरु, धार्मिक जनों का रक्षक तथा वेदसे द्वेष रखनेवालोंको विनष्ट करनेवाला हूँ॥ १५-१६॥
अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह ।
संसारहेतुरेवाह सर्वसंसारवर्जितः॥१७॥
अहमेव हि संहर्ता स्त्रष्टाहं परिपालकः।
मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी॥१८॥
मैं ही योगियोंको समस्त संसारसे मुक्त करनेवाला हूँ। मैं ही संसारका कारण और सम्पूर्ण संसारसे विवर्जित (असंसृष्ट) हूँ। मैं ही संहार करनेवाला और मैं ही सृष्टि तथा पालन करनेवाला मायावी हूँ। मेरी शक्ति माया है, वह संसारको मोहित करनेवाली है॥ १७-१८॥
ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते।
नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः ॥१९॥
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः।
आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च॥२०॥
एका सर्वान्तरा शक्तिः करोति विविधं जगत्।
आस्थाय ब्रह्मणो रूपं मन्मयी मदधिष्ठिता॥२१॥
अन्या च शक्तिर्विपुला संस्थापयति मे जगत्।
भूत्वा नारायणोऽनन्तो जगन्नाथो जगन्मयः ॥ २२॥
मेरी ही जो पराशक्ति है, वह 'विद्या' इस नाम से कही जाती है। योगियोंके हृदयमें रहते हुए मैं उस मायाको नष्ट कर देता हूँ। सभी शक्तियोंका प्रवर्तन करनेवाला तथा निवर्तन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं सभी का आधार और अमृतका आश्रय-स्थान हूँ। मुझमें अधिष्ठित
और मेरी स्वरूपभूता जो सबके अन्तरमें स्थित अद्वितीय शक्ति है, वह ब्रह्माका रूप धारणकर विविध प्रकारके संसारकी सृष्टि करती है और जो मेरी दूसरी विपुल शक्ति है, वह अनन्त, जगन्नाथ, जगन्मय और नारायणका रूप धारणकर संसारकी स्थापना (पालन आदि कार्य) करती है। १९-२२॥
तृतीया महती शक्तिर्निहन्ति सकलं जगत्।
तामसी मे समाख्याता कालाख्या रुद्ररूपिणी॥२३॥
ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे।
अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे॥२४॥
सर्वेषामेव भक्तानामिष्टः प्रियतरो मम।
यो हि ज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा॥२५॥
अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकाक्षिणः।
तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः॥२६॥
मया ततमिदं कृत्स्नं प्रधानपुरुषात्मकम्।
मय्येव संस्थितं विश्वं मया सम्प्रेर्यते जगत्॥२७॥
मेरी तीसरी जो रुद्ररूपिणी काल नामक महती तामसी शक्ति है, वह समस्त जगत्का संहार करती है कुछ लोग ध्यानद्वारा, कुछ दूसरे लोग ज्ञानद्वारा, कुछ भक्तियोगके द्वारा और कुछ कर्मयोगके द्वारा मेरा दर्शन करते हैं। जो किसी अन्य प्रकारसे नहीं, अपितु केवल ज्ञानद्वारा नित्य मेरी आराधना करता है, वह सभी भक्तोंमें मुझे प्रिय है, प्रियतर है अर्थात् अत्यन्त प्रिय है। अन्य भी जो मेरी आराधना करनेके अभिलाषी तीन (प्रकारके) भक्त हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। मेरे द्वारा ही यह सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषरूप संसार व्याप्त है। यह विश्व मुझमें ही स्थित है और मेरे द्वारा ही संसार प्रेरित किया जाता है॥ २३-२७॥
नाहं प्रेरयिता विप्राः परमं योगमाश्रितः ।
प्रेरयामि जगत्कृत्स्नमेतद्यो वेद सोऽमृतः ॥ २८॥
पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभावतः।
करोति कालो भगवान् महायोगेश्वरः स्वयम्॥२९॥
योगः सम्प्रोच्यते योगी माया शास्त्रेषु सूरिभिः ।
योगेश्वरोऽसौ भगवान् महादेवो महान् प्रभुः॥३०॥
हे विप्रो! परम योगमें ही सदा निरत रहनेवाला मैं प्रेरक नहीं हूँ, तथापि सम्पूर्ण जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, इस (रहस्य)-को जो जानता है, वह अमर हो जाता है। अपने स्वभाववश प्रवर्तमान समस्त जगत्का मैं साक्षीमात्र हूँ। महायोगेश्वर भगवान् काल स्वयं ही (जगत्की सृष्टि) करते हैं। विद्वानोंने शास्त्रों में जिसे योग, योगी और माया कहा है, वह सब प्रभु महादेव भगवान् महायोगेश्वर ही हैं अर्थात् योगेश्वर महादेवमें ही यह सब कल्पित है ॥ २८-३०॥
महत्त्वं सर्वतत्त्वानां परत्वात् परमेष्ठिनः ।
प्रोच्यते भगवान् ब्रह्मा महान् ब्रह्ममयोऽमलः॥३१॥
यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम्।
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥३२॥
सोऽहं प्रेरयिता देवः परमानन्दमाश्रितः।
नृत्यामि योगी सततं यस्तद् वेद स वेदवित्॥३३॥
इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निष्ठितम्।
प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिकायाहिताग्नये॥३४॥
परमेष्ठी सभी तत्त्वोंसे परे हैं अतः सभी तत्त्वोंका महत्त्व ही भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रसिद्ध है और ये भगवान् ब्रह्मा ब्रह्ममय एवं अमल हैं। जो मुझे ही महायोगेश्वरोंका भी ईश्वर समझता है, वह निर्विकल्प (समाधि)-योगसे युक्त होता है, इसमें संदेह नहीं। परमानन्दका आश्रयण करनेवाला वही मैं प्रेरित करनेवाला देवता हूँ। मैं योगी निरन्तर नृत्य करता (प्राणिमात्रके हृदयमें सदा विद्यमान) रहता हूँ, जो ऐसा जानता है वह वेदज्ञ है यह अत्यन्त गुह्य ज्ञान सभी वेदोंमें प्रतिष्ठित है। इसे प्रसन्नचित्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्रीको प्रदान करना चाहिये। ३१-३४॥
Summary of chapter 53 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta concludes the Pūrvārdha of Kūrma Purāṇa by describing the twenty-eight divine Avatāras of Bhagavān Mahādeva Śiva that manifest in every Kaliyuga alongside Vedavyāsa. Appearing as great ascetic masters such as Śveta, Sutāra, Damana, Suhotra, Kaṅka, Logākshi, Jaigīshavya, Dadhīchi, Upamanyu, and Lakulīsha, Mahādeva establishes the sacred Pāshupata Yoga, instructs seekers in holy ash-smearing, and bestows supreme liberation upon sincere spiritual aspirants.