कूर्म महा पुराण
2 अध्याय
आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद,
आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन
ईश्वर उवाच
अवाच्यमेतद् विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम्।
यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः॥१॥
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः।
न संसारं प्रपद्यन्ते पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः॥२॥
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः।
वक्ष्ये भक्तिमतामद्य युष्माकं ब्रह्मवादिनाम्॥३॥
ईश्वरने कहा-द्विजो! देवता लोग प्रयत्न करनेपर भी जिसे नहीं जान पाते हैं, मेरा यह विज्ञान अत्यन्त गुह्य है, सनातन है एवं बतलाने योग्य (भी) नहीं है। इस ज्ञानका आश्रय ग्रहणकर श्रेष्ठ द्विजगणोंने ब्रह्मभाव को प्राप्त किया है। (इस ज्ञानके कारण) पूर्वकालमें भी ब्रह्मवादियोंको पुनः संसारमें आना नहीं पड़ा (अर्थात् इस ज्ञानसे ब्रह्मभाव अवश्य प्राप्त होता है और ब्रह्मभाव प्राप्त करनेके अनन्तर पुनः संसारमें आगमन नहीं होता)। यह ज्ञान गुह्यसे भी गुह्यतम है, इस साक्षात् ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये। आप भक्तिसम्पन्न ब्रह्मवादियोंको आज मैं यह ज्ञान बतलाऊँगा ॥ १-३॥
आत्मा यः केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः ।
अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः॥४॥
सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ।
स कालोऽग्निस्तदव्यक्तं स एवेदमिति श्रुतिः॥५॥
जो आत्मा अद्वितीय, स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन, सभीका अन्तरतम साक्षात् चिन्मात्र और तमोगुणसे परे है, वही (आत्मा) अन्तर्यामी है, पुरुष है, वही प्राण है, वही महेश्वर है, वही काल तथा अग्नि है और वही अव्यक्त है-ऐसा श्रुतिका कथन है॥ ४-५ ॥
अस्माद् विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते।
स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः॥६॥
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत् प्रभुः।
नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः॥७॥
इसीसे संसार उत्पन्न होता है और इसीमें विलीन हो जाता है। वह मायाका नियामक मायासे आबद्ध होकर अपनी इच्छासे मायाको अङ्गीकार कर विविध शरीरोंको उत्पन्न करता है। यह प्रभु आत्मा न तो गतिशील है और न गतिप्रेरक है। न यह पृथ्वी है, न जल है, न तेज है, न वायु है और न आकाश ही है॥६-७॥
न प्राणो न मनोऽव्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च।
न रूपरसगन्धाश्च नाहं कर्ता न वागपि॥ ८॥
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं द्विजोत्तमाः।
न कर्ता न च भोक्ता वा न च प्रकृतिपूरुषो।
न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ९ ॥
यह न प्राण है, न मन है, न अव्यक्त है, न शब्द है, न स्पर्श है, न रूप, न रस और न गन्ध ही है। न अभिमानी* है, न वाणी ही है। द्विजोत्तमो! यह न हाथ, न पैर, न पायु (शौचेन्द्रिय) और न उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), न कर्ता, न भोक्ता तथा प्रकृति-पुरुष भी नहीं है। माया भी नहीं है, प्राण भी नहीं है, अपितु परमार्थतः चैतन्यमात्र है॥८-९॥
यथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धो नोपपद्यते।
तद्वदैक्यं न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥१०॥
छायातपौ यथा लोके परस्परविलक्षणौ।
तद्वत् प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥११॥
यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात् स्वभावतः।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि ॥१२॥
पश्यन्ति मुनयो युक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।
विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥१३॥
जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार (सांसारिक) प्रपञ्च और परमात्माका भी कोई ऐक्य (अभेद्य आदि) सम्बन्ध नहीं हो सकता ॥ १०॥
जिस प्रकार संसारमें धूप और छाया एक-दूसरेसे विलक्षण हैं, वैसे ही पुरुष तथा प्रपञ्च भी तत्त्वतः एक-दूसरेसे भिन्न हैं। यदि आत्मा स्वभावसे मलिन, अस्वस्थ तथा विकारयुक्त होता तो उसकी मुक्ति सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं होती। योगयुक्त मुनिजन परमार्थतः अपने विकाररहित, दुःखशून्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय आत्माका दर्शन करते हैं। ११-१३ ॥
अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।
सा चाहंकारकर्तृत्वादात्मन्यारोप्यते जनैः॥१४॥
वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।
भोक्तारमक्षरं शुद्धं सर्वत्र समवस्थितम्॥१५॥
तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञानं तच्च प्रकृतिसङ्गतम्॥१६॥
मैं कर्ता हूँ, सुखी, दु:खी, कृश एवं स्थूल हूँ इस प्रकारकी जो बुद्धि है, वह मनुष्यों के द्वारा अहंकार के कारण ही अपनी आत्मामें आरोपित है। वेदके विद्वान् लोग (आत्माको) साक्षी, प्रकृतिसे परे, भोक्ता, अक्षर, शुद्ध तथा सर्वत्र सम रूपसे व्याप्त बतलाते हैं। अतएव यह संसार सभी प्राणियोंके अज्ञानके कारण ही है। अज्ञानसे अन्यथा (विपरीत) ज्ञान होता है अर्थात् अज्ञानका नाश ज्ञानसे ही होता है और यह प्रकृतिसंगत (प्राणियोंके मूल स्वभावके सर्वथा अनुकूल शाश्वत शान्तिरूप) होता है ॥ १४–१६॥
नित्योदितः स्वयं ज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहंकाराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥१७॥
पश्यन्ति ऋषयोऽव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः॥१८॥
तेनायं संगतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः ।
स्वात्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्येत तत्त्वतः॥१९॥
अहंकारसे उत्पन्न अविवेकके कारण स्वयं ज्योतिरूप, नित्य प्रकाशयुक्त सर्वव्यापी परम पुरुष अपनेको 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। ब्रह्मवादी ऋषिगण प्रधान, प्रकृति और कारणको समझकर सत् एवं असत्-स्वरूप, अव्यक्त नित्यतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं। कूटस्थ एवं निरञ्जन होते हुए भी यह आत्मा उस (प्रधान, प्रकृति आदि)-से संगत होकर स्वात्मस्वरूप अक्षर ब्रह्मका यथार्थरूपसे ज्ञान नहीं कर पाता ।। १७–१९॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद् दुःखं तथेतरम्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वे भ्रान्तिनिबन्धनाः॥२०॥
कर्मण्यस्य भवेद् दोषः पुण्यापुण्यमिति स्थितिः ।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः ॥२१॥
नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥२२॥
अनात्मतत्त्वमें आत्मविषयक विज्ञानसे ही दुःख होता है तथा इसी प्रकारकी भ्रान्तिके कारण ही राग, द्वेष आदि सभी दोष उत्पन्न होते हैं। इसके (भ्रान्त पुरुषके) कर्ममें ही दोष होता है, इसी कारण पाप-पुण्यकी स्थिति बनती है और उन कर्मोके अनुसार ही सभी प्रकारके देहकी उत्पत्ति होती है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ और दोषोंसे रहित है। यह अद्वितीय आत्मा मायारूप शक्तिके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, स्वभावत: इसमें भेद नहीं है ।। २०-२२॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदो व्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥२३॥
यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते ॥ २४॥
यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोऽमलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते॥२५॥
ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद् विचक्षणाः।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः ॥२६॥
इसी कारण मुनिजन आत्माको परमार्थतः अद्वैत ही कहते हैं। व्यक्त (महत्तत्त्व, अहंतत्त्व आदि)-के स्वभावसे जो भेद दिखलायी पड़ता है और यह भेद मूलतः माया (प्रकृति)-के कारण ही है तथा यह आत्मा (पुरुष)-के आश्रित होकर ही सब कुछ करती है। जैसे धुएँके सम्पर्क से आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरणसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता। जैसे अद्वितीय शुद्ध स्फटिक अपनी आभासे प्रकाशित होता है, वैसे ही
उपाधियोंसे रहित निर्मल आत्मा (अपने ही प्रकाशसे) प्रकाशित होता है। विद्वान् लोग इस संसारको ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, परंतु दूसरे कुत्सित दृष्टि रखनेवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थस्वरूप (विषयस्वरूप) मानते हैं ॥ २३-२६॥
कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्धान्तदृष्टिभिः॥२७॥
यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः।
रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः॥२८॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः।
उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः॥२९॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा।
योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयम्॥३०॥
भ्रान्त दृष्टिवाले पुरुषोंके द्वारा स्वभाव कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और चैतन्य आत्मा अर्थरूपसे ही देखा जाता है। जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक गुञ्जा आदि उपाधि के कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-
रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियों को अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है॥ २७-३०॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ३१॥
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति।
एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः॥३२॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हदि स्थिताः।
तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः॥३३॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३४॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः।
मायामानं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः॥ ३५॥
(योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपने को स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपने से भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदय में स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है।(योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है॥ ३१-३५॥
यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम् ।
केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः॥३६॥
यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः।
तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत्॥३७॥
जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियों के एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है॥ ३६-३७॥
तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः।
अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति॥३८॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्म निर्विकल्पं यदव्ययम्।
अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ।। ३९॥
एतद् वः परमं सांख्य भाषितं ज्ञानमुत्तमम्।
सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता॥४०॥
इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म,
निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है-ऐसा मेरा है। यह आप लोगों को सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्त का सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है॥ ३८-४० ॥
योगात् सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।
योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित्॥४१॥
यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते।
एकं सांख्यं च योगंच यः पश्यति स तत्त्ववित्॥ ४२ ॥
योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२॥
अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः।
मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः॥४३॥
यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत्।
ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात्॥४४॥
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः।
कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः॥४५॥
विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता-ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुख के रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ॥ ४३-४५॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः।
सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः॥४६॥
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः ।
अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम्॥४७॥
वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन।
प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः॥४८॥
पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः।
निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम्॥ ४९ ।।
यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया।
वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः॥५०॥
मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें-॥ ४६-५०॥
नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः।
प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः॥५१॥
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।
प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम्॥५२॥
तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी।
लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह॥५३॥
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।
प्रसादान्मम योगीन्द्रा एतद् वेदानुशासनम्॥५४॥
मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)। मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी
सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं। मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं। मेरी कृपासे सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता। योगीन्द्रो! यह वेदोंका अनुशासन है॥५१-५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं ब्रह्मवादिभिः ।
मदुक्तमेतद् विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥५५॥
ब्रह्मवादियोंको चाहिये कि वे मेरे द्वारा कहे गये इस सांख्य-योग-समन्वित विज्ञानको (अपने) पुत्र*, शिष्य एवं योगियोंके अतिरिक्त और किसी दूसरेको प्रदान न करें॥ ५५॥
Summary of chapter 51 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta celebrates the supreme glory of Purushottama Nārāyaṇa across all cosmic epochs. In every Manvantara, Bhagavān Vishṇu manifests as divine Avatāras to protect virtuous devotees, uphold Vedic Dharma, and annihilate demoniac forces, demonstrating His unceasing cosmic protection.