कूर्म महा पुराण
14 अध्याय
हरिद्वारमें दक्षद्वारा यज्ञका आयोजन, यज्ञमें शंकरका भाग न देखकर महर्षि दधीचद्वारा
दक्षकी भर्त्सना तथा यज्ञमें भाग लेनेवाले ब्राह्मणोंको शाप, देवी पार्वतीके कहने-
पर शंकरद्वारा रुद्रों, भद्रकाली तथा वीरभद्रको प्रकट करना, वीरभद्रादिद्वारा
दक्षके यज्ञका विध्वंस, शंकर-पार्वतीका यज्ञस्थलमें प्राकट्य, भयभीत
दक्षद्वारा शंकर तथा पार्वतीकी स्तुति और वर प्राप्त करना,
ब्रह्माद्वारा दक्षको उपदेश और शिव-विष्णुके
एकत्वका प्रतिपादन तथा
दक्षद्वारा
शिवकी शरण ग्रहण करना
नैमिषीया ऊचुः
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।
उत्पत्तिं विस्तरात् सूत ब्रूहि वैवस्वतेऽन्तरे॥१॥
स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।
किमकार्षीन्महाबुद्धे श्रोतुमिच्छाम साम्प्रतम्॥२॥
नैमिषीय ऋषि बोले-सूतजी महाराज! वैवस्वत मन्वन्तर में हुई देवताओं, दानवों, गन्धर्वो, नागों तथा राक्षसों की उत्पत्तिको आप विस्तारसे बतलायें। महा बुद्धिमान् सूतजी ! इस समय हम यह सुनना चाहते हैं कि प्राचीन कालमें प्रचेताके पुत्र राजा दक्षने भगवान् शंकरसे शाप प्राप्तकर क्या किया था॥ १-२॥
सूत उवाच
वक्ष्ये नारायणेनोक्तं पूर्वकल्पानुषङ्गिकम्।
त्रिकालबद्धं पापघ्नं प्रजासर्गस्य विस्तरम्॥३॥
सूतजीने कहा-मैं पूर्वकल्पके प्रसंगमें नारायणद्वारा कहे गये (भूत, भविष्य तथा वर्तमान- इस प्रकार) तीनों कालोंसे सम्बद्ध तथा पाप हरनेवाले प्रजा-सर्ग को विस्तारसे बतलाता हूँ॥३॥
स शप्तः शम्भुना पूर्वं दक्षः प्राचेतसो नृपः।
विनिन्द्य पूर्ववैरेण गङ्गाद्वारेऽयजद् भवम्॥४॥
देवाश्च सर्वे भागार्थमाहूता विष्णुना सह।
सहैव मुनिभिः सर्वैरागता मुनिपुङ्गवाः ॥५॥
दृष्ट्वा देवकुलं कृत्स्नं शंकरेण विनागतम्।
दधीचो नाम विप्रर्षिः प्राचेतसमथाब्रवीत्॥६॥
प्राचीन कालकी बात है, भगवान् शंकर के शाप से ग्रस्त उन प्रचेतापुत्र राजा दक्षने पूर्व वैरके कारण शंकर की निन्दा कर गङ्गाद्वार हरिद्वारमें एक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। श्रेष्ठ मुनियो! विष्णुके साथ सभी देवता उस यज्ञमें भाग ग्रहण करनेके लिये बुलाये गये। सभी मुनियोंके साथ वे वहाँ आये। शंकरको छोड़कर आये हुए समस्त देव-समूहोंको देखकर दधीच नामक विप्रर्षि ने प्राचेतस-दक्षसे (इस प्रकार) कहा- ॥ ४-६॥
दधीच उवाच
ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यस्याज्ञानुविधायिनः ।
स देवः साम्प्रतं रुद्रो विधिना किं न पूज्यते॥७॥
दधीच बोले-ब्रह्मा आदिसे लेकर पिशाचतक जिनकी आज्ञाका शीघ्र ही अनुपालन करते हैं, उन रुद्रदेव की पूजा इस समय क्यों नहीं की जा रही है ? ॥७॥
दक्ष उवाच
सर्वेष्वेव हि यज्ञेषु न भागः परिकल्पितः।
न मन्त्रा भार्यया सार्धं शंकरस्येति नेज्यते॥८॥
विहस्य दक्षं कुपितो वचः प्राह महामुनिः।
शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वज्ञानमयः स्वयम्॥९॥
दक्षने कहा-सभी यज्ञोंमें भार्यासहित शंकर के भाग एवं मन्त्रोंकी परिकल्पना नहीं हुई है, इसलिये उनकी पूजा नहीं की जाती। इसपर साक्षात् सर्वज्ञानमय महामुनि दधीच ने कोपपूर्वक हँसते हुए सभी देवताओं को सुनाते हुए दक्षसे कहा-॥८-९॥
दधीच उवाच
यतः प्रवृत्तिर्विश्वेषां यश्चास्य परमेश्वरः।
सम्पूज्यते सर्वयज्ञैर्विदित्वा किल शंकरः ॥१०॥
दधीच बोले-जिनसे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जो इस (विश्व)-के परमेश्वर हैं, वे शंकर निश्चय ही सभी यज्ञोंद्वारा ज्ञानपूर्वक पूजित होते हैं ॥ १० ॥
दक्ष उवाच
न ह्ययं शंकरो रुद्रः संहर्ता तामसो हरः।
नग्नः कपाली विकृतो विश्वात्मा नोपपद्यते॥११॥
ईश्वरो हि जगत्स्स्रष्टा प्रभुर्नारायणः स्वराट् ।
सत्त्वात्मकोऽसौ भगवानिज्यते सर्वकर्मसु॥१२॥
दक्षने कहा-संहार करनेवाले, तमोगुणी, नग्न, कपाल धारण करनेवाले तथा विकृत (वेशवाले) रुद्र, हर, शंकर किसी भी प्रकार विश्वात्मा नहीं हो सकते। संसारकी सृष्टि करनेवाले स्वराट्, प्रभु नारायण ही ईश्वर हैं और सभी कर्मोंमें उन सत्त्वात्मक भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है। ११-१२ ॥
दधीच उवाच
किं त्वया भगवानेष सहस्रांशुर्न दृश्यते।
सर्वलोकैकसंहर्ता कालात्मा परमेश्वरः॥१३॥
यं गृणन्तीह विद्वांसो धार्मिका ब्रह्मवादिनः ।
सोऽयं साक्षी तीव्ररोचिः कालात्मा शांकरी तनुः॥१४॥
एष रुद्रो महादेवः कपर्दी च घृणी हरः।
आदित्यो भगवान् सूर्यो नीलग्रीवो विलोहितः ।। १५॥
संस्तूयते सहस्रांशुः सामगाध्वर्युहोतृभिः ।
पश्यैनं विश्वकर्माणं रुद्रमूर्तिं त्रयीमयम्॥१६॥
दधीच बोले- क्या तुम समस्त लोकोंके एकमात्र संहारकर्ता कालस्वरूप, तथा हजारों किरणवाले इन परमेश्वर भगवान् (सूर्य)-को नहीं देख रहे हो। धर्मात्मा, ब्रह्मवादी विद्वान् जिनकी स्तुति करते हैं, वही ये (सूर्य) तीव्र तेजसे सम्पन्न कालात्मक साक्षी यहाँ शंकरके शरीररूपमें ही स्थित हैं। देवी अदिति के पुत्र ये भगवान् सूर्य ही रुद्र, महादेव, कपर्दी, घृणी, हर, नीलग्रीव, विलोहित (नामवाले) हैं। सामवेदका गान करनेवाले तथा अध्वर्यु एवं होताओंके द्वारा हजारों किरणवाले सूर्यकी स्तुति की जाती है। विश्व को बनानेवाले त्रयीमय-ऋक्, यजुः तथा सामवेदस्वरूप रुद्रकी मूर्तिको देखो। १३-१६ ॥
दक्ष उवाच
य एते द्वादशादित्या आगता यज्ञभागिनः ।
सर्वे सूर्या इति ज्ञेया न हन्यो विद्यते रविः॥१७॥
एवमुक्ते तु मुनयः समायाता दिदृक्षवः।
बाढमित्यब्रुवन् वाक्यं तस्य साहाय्यकारिणः॥१८॥
तमसाविष्टमनसो न पश्यन्ति वृषध्वजम्।
सहस्रशोऽथ शतशो भूय एव विनिन्द्यते॥१९॥
निन्दन्तो वैदिकान् मन्त्रान् सर्वभूतपतिं हरम्।
अपूजयन् दक्षवाक्यं मोहिता विष्णुमायया ॥२०॥
देवाश्च सर्वे भागार्थमागता वासवादयः।
नापश्यन् देवमीशानमृते नारायणं हरिम्॥२१॥
हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः।
पश्यतामेव सर्वेषां क्षणादन्तरधीयत॥२२॥
दक्षने कहा-यज्ञमें भाग ग्रहण करनेवाले ये जो बारह (अदिति-पुत्र) आदित्य यहाँ आये हुए हैं, ये सभी सूर्यके नामसे ही जाने जाते हैं। इनसे अतिरिक्त कोई अन्य सूर्य नहीं हैं। ऐसा कहनेपर यज्ञ देखने की इच्छा से आये हुए उनके (दक्षके) सहयोगी मुनियों ने (समर्थन करते हुए) दक्षसे कहा-ठीक है। तमोगुण से आविष्ट मनवाले सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें आये हुए उन लोगोंने भगवान् वृषध्वज शंकरको न देखते हुए पुनः उनकी निन्दा करनी आरम्भ की। विष्णुकी माया से मोहित होकर वे वैदिक मन्त्रोंकी निन्दा करते हुए सभी प्राणियों के एकमात्र स्वामी भगवान् हरकी पूजा न करके दक्षके वचनका अनुमोदन करने लगे। यज्ञमें भाग ग्रहण करने के लिये आये हुए इन्द्रादि सभी देवताओंने भी नारायण हरिके अतिरिक्त देव ईशान (शंकर)-को भी नहीं देखा (अर्थात् शिवके माहात्म्यको वे जान नहीं पाये)। ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा सभीके देखते-देखते क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। १७-२२ ।।
अन्तर्हिते भगवति दक्षो नारायणं हरिम्।
रक्षकं जगतां देवं जगाम शरणं स्वयम्॥ २३॥
प्रवर्तयामास च तं यज्ञं दक्षोऽथ निर्भयः।
रक्षते भगवान् विष्णुः शरणागतरक्षकः॥२४॥
पुनः प्राह च तं दक्षं दधीचो भगवानृषिः ।
सम्प्रेक्ष्यर्षिगणान् देवान् सर्वान् वै ब्रह्मविद्विषः ।। २५॥
अपूज्यपूजने चैव पूज्यानां चाप्यपूजने।
नरः पापमवाप्नोति महद् वै नात्र संशयः॥२६॥
असतां प्रग्रहो यत्र सतां चैव विमानना।
दण्डो देवकृतस्तत्र सद्यः पतति दारुणः॥२७॥
एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिः शशापेश्वरविद्विषः।
समागतान् ब्राह्मणांस्तान् दक्षसाहाय्यकारिणः ।। २८॥
भगवान् ब्रह्माके अन्तर्धान हो जानेपर स्वयं दक्ष संसारकी रक्षा करनेवाले देव नारायण हरिकी शरण में गये। तदनन्तर भयसे मुक्त होकर दक्षने वह यज्ञ आरम्भ किया। शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान् विष्णु (उस यज्ञकी) रक्षा करने लगे। भगवान् दधीच ऋषि ने ब्रह्म (शंकर)-से द्वेष माननेवाले उन सभी ऋषिगणों तथा देवताओंकी ओर देखकर उन दक्षसे पुनः कहा-जो अपूज्य है, उसका पूजन करनेसे और जो पूज्य है, उसका पूजन न करनेसे मनुष्य निश्चित ही महान् पापको प्राप्त करता है, इसमें किंचित् भी संदेह नहीं है। जहाँ दुर्जनोंका आदर होता है और सत्पुरुषोंका अनादर होता है, वहाँ अति शीघ्र ही दारुण दैवी दण्ड उपस्थित होता है। ऐसा कहकर विप्रर्षि दधीचने दक्षकी सहायता करनेके लिये आये हुए उन ईश्वर (शंकर)-से विद्वेष रखनेवाले ब्राह्मणोंको शाप देते हुए कहा- ॥ २३-२८॥
यस्माद् बहिष्कृता वेदा भवद्भिः परमेश्वरः।
विनिन्दितो महादेवः शंकरो लोकवन्दितः॥२९॥
भविष्यध्वं त्रयीबाह्याः सर्वेऽपीश्वरविद्विषः ।
निन्दन्तो खैश्वरं मागं कुशास्त्रासक्तमानसाः ॥३०॥
मिथ्याधीतसमाचारा मिथ्याज्ञानप्रलापिनः ।
प्राप्य घोरं कलियुगं कलिजैः किल पीडिताः॥३१॥
त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं गच्छध्वं नरकान् पुनः।
भविष्यति हृषीकेशः स्वाश्रितोऽपि पराङ्मुखः ॥ ३२॥
चूँकि तुम लोगोंने वेदोंकी अवमानना की है और समस्त संसारके द्वारा वन्दित परमेश्वर महादेव शंकर की निन्दा की है, अतः ईश्वर (शंकर)-से द्वेष रखनेवाले तुम सभी वेदत्रयीसे रहित हो जाओगे और असत्- शास्त्रोंमें मन लगाते हुए ईश्वर-मार्ग (शिव-मार्ग)की निन्दा करोगे तथा घोर कलियुग आने पर मिथ्या अध्ययन और मिथ्या आचारयुक्त होकर मिथ्या ज्ञानका प्रलाप करनेवाले होओगे, साथ ही कलिके द्वारा उत्पन्न कष्ट एवं दु:खों आदिसे पीड़ित रहोगे। पुन: तुम सभी अपने सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके नरक प्रारा करोगे। तुम लोगोंके द्वारा हृषीकेश विष्णुके भलीभाँति आश्रय ग्रहण करनेपर भी वे तुम लोगोंसे विमुख ही रहेंगे॥ २९-३२॥
एवमुक्त्वा तु विप्रर्षिर्विरराम तपोनिधिः।
जगाम मनसा रुद्रमशेषाघविनाशनम्॥३३॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी महादेवं महेश्वरम्।
पतिं पशुपतिं देवं ज्ञात्वैतत् प्राह सर्वदृक्॥३४॥
ऐसा कहकर तपस्याकी निधि वे विप्रर्षि (दधीच) चुप हो गये और मानसिक रूपसे सम्पूर्ण पापों का विनाश करनेवाले रुद्रकी शरणमें गये। इसी बीच यह सारी घटना जानकर सर्वदर्शी (सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाली) देवी (पार्वती)-ने (अपने) पतिदेव पशुपति महादेव महेश्वरसे कहा- ॥ ३३-३४॥
देव्युवाच
दक्षो यज्ञेन यजते पिता मे पूर्वजन्मनि।
विनिन्द्य भवतो भावमात्मानं चापि शंकर॥३५॥
देवाः सहर्षिभिश्चासंस्तत्र साहाय्यकारिणः।
विनाशयाशु तं यज्ञं वरमेकं वृणोम्यहम्॥ ३६॥
देवी बोलीं-शंकर! पूर्वजन्मके मेरे (सतीके) पिता दक्ष यज्ञ कर रहे हैं और आपके भाव तथा स्वरूपको निन्दा कर रहे हैं। ऋषियोंके साथ देवता वहाँ उनकी सहायता करते हुए उपस्थित हैं। मैं आपसे एक वर माँगती हूँ कि 4 'आप शीघ्र ही उस यज्ञको नष्ट करें'॥३५-३६॥
एवं विज्ञापितो देव्या देवो देववरः प्रभुः।
ससर्ज सहसा रुद्रं दक्षयज्ञजिघांसया॥३७॥
सहस्रशीर्षपादं च सहस्राक्षं महाभुजम्।
सहस्रपाणिं दुर्धर्षं युगान्तानलसंनिभम्॥३८॥
दंष्ट्राकरालं दुष्प्रेक्ष्यं शङ्खचक्रगदाधरम्।
दण्डहस्तं महानादं शाङ्गिणं भूतिभूषणम्॥ ३९॥
वीरभद्र इति ख्यातं देवदेवसमन्वितम्।
स जातमात्रो देवेशमुपतस्थे कृताञ्जलिः॥ ४०॥
देवी के द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवताओंमें श्रेष्ठ प्रभु भगवान् (शंकर)-ने दक्षके यज्ञका विध्वंस करने के लिये शीघ्र ही हजारों सिर एवं पैरवाले, हजारों आँखवाले, विशाल भुजायुक्त, हजारों हाथवाले, दुर्जेय प्रलयकालीन अग्निके समान, भयंकर दाढयुक्त, देखने में भयंकर, शंख, चक्र तथा गदा धारण किये, हाथ में दण्ड धारण करनेवाले, घोर नाद करनेवाले, सींगसे बने धनुषको धारण किये, विभूतिसे सुशोभित तथा अनेक देवताओंसे घिरे हुए वीरभद्र नामवाले रुद्रको उत्पन्न किया। उत्पन्न होते ही वह हाथ जोड़कर देवताओंके स्वामी भगवान् शंकरके सम्मुख उपस्थित हुआ॥ ३७-४०॥
तमाह दक्षस्य मखं विनाशय शिवोऽस्त्विति।
विनिन्द्य मां स यजते गङ्गाद्वारे गणेश्वर । ४१॥
ततो बन्धुप्रयुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया।
वीरभद्रेण दक्षस्य विनाशमगमत् क्रतुः॥४२॥
मन्युना चोमया सृष्टा भद्रकाली महेश्वरी।
तया च सार्धं वृषभं समारुह्य ययौ गणः॥४३॥
अन्ये सहस्रशो रुद्रा निसृष्टास्तेन धीमता।
रोमजा इति विख्यातास्तस्य साहाय्यकारिणः॥४४॥
शूलशक्तिगदाहस्ताष्टकोपलकरास्तथा
कालाग्निरुद्रसंकाशा नादयन्तो दिशो दश॥४५॥
सर्वे वृषासनारूढाः सभार्याश्चातिभीषणाः।
समावृत्य गणश्रेष्ठं ययुर्दक्षमखं प्रति॥ ४६॥
(शंकरने उससे कहा-) गणेश्वर! दक्षके यज्ञ का विध्वंस करो, वह गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में मेरी निन्दा करते हुए यज्ञ कर रहा है। तुम्हारा कल्याण हो। तदनन्तर बन्धु (शिव)-के द्वारा निर्दिष्ट वीरभद्रने सिंहके समान लीला करते हुए अकेले ही दक्षके यज्ञका विध्वंस कर दिया। उमाने भी क्रोध करते हुए महेश्वरी भद्रकालीको उत्पन्न किया, उसके साथ वृषभपर आरूढ़ होकर वह गण (वीरभद्र) वहाँ (गङ्गाद्वार यज्ञमें) गया। बुद्धिमान् उन शंकरने उनकी सहायता करनेवाले हजारों दूसरे रुद्रोंको भी उत्पन्न किया। (शंकरके) रोमोंसे उत्पन्न होनेके कारण वे रुद्र 'रोमज' कहलाये। हाथोंमें त्रिशूल, शक्ति, गदा, टङ्क (पत्थर तोड़नेके हथियार-घन, हथौड़ा, छेनी आदि) तथा पत्थर लिये हुए और कालाग्नि रुद्रके समान अत्यन्त भीषण सभी अपनी-अपनी भार्याओंके साथ वृषभरूप आसन पर आरूढ होकर दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए गणों में सर्वश्रेष्ठ वीरभद्रको अपने समूहके बीच रखते हुए जहाँ दक्षयज्ञ हो रहा था, उस ओर चल पड़े॥ ४१-४६॥
सर्वे सम्प्राप्य तं देशं गङ्गाद्वारमिति श्रुतम्।
ददृशुर्यज्ञदेशं तं दक्षस्यामिततेजसः॥४७॥
देवाङ्गनासहस्राढ्यमप्सरोगीतनादितम् ।
वीणावेणुनिनादाढ्यं वेदवादाभिनादितम्॥४८॥
दृष्ट्वा सहर्षिभिर्देवैः समासीनं प्रजापतिम्।
उवाच भद्रया रुद्रैवीरभद्रः स्मयन्निव॥४९॥
गङ्गाद्वार (हरिद्वार) नामसे प्रसिद्ध उस देश में पहुँचकर उन सभीने अमित तेजस्वी दक्षके उस यज्ञस्थलको देखा, जो हजारों देवाङ्गनाओंसे सुशोभित था, अप्सराओंके गीतोंसे मुखरित था, वीणा तथा वेणु के निनाद से प्रतिध्वनित और वेद-मन्त्रोंसे गुञ्जित था। देवताओं तथा ऋषियोंके साथ बैठे हुए प्रजापति दक्षको देखकर भद्रकाली तथा रुद्रोंसहित वीरभद्रने हँसते हुए कहा-॥४७-४९॥
वयं ह्यनुचराः सर्वे शर्वस्यामिततेजसः।
भागाभिलिप्सया प्राप्ता भागान् यच्छथ्वमीप्सितान्।।५०॥
अथ चेत् कस्यचिदियमाज्ञा मुनिसुरोत्तमाः।
भागो भवद्भयो देयस्तु नास्मभ्यमिति कथ्यताम्।
तं ब्रूताज्ञापयति यो वेत्स्यामो हि वयं ततः॥५१॥
एवमुक्ता गणेशेन प्रजापतिपुरःसराः।
देवा ऊचुर्यज्ञभागे न च मन्त्रा इति प्रभुम्॥५२॥
हम सभी अमित तेजस्वी शंकरके अनुचर हैं, यज्ञ में भाग प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आये हैं, आप हमें अभीप्सित यज्ञभाग प्रदान करें। अथवा श्रेष्ठ मुनियो और देवताओ! आप हमें यह बतलायें कि किसने आपको ऐसी आज्ञा दी है कि मुझे यज्ञभाग न दें और आप लोगोंका ही सब भाग है। जो ऐसी आज्ञा देनेवाला है, उसे बतलायें, फिर हम उसे देख लेंगे। गणोंके स्वामी वीरभद्रके ऐसा कहे जानेपर प्रजापति दक्षसहित देवताओं ने प्रभु (वीरभद्र)-से कहा-'आपको यज्ञभाग देने-सम्बन्धी मन्त्र नहीं हैं'॥५०-५२।।
मन्त्रा ऊचुः सुरान् यूयं तमोपहतचेतसः।
ये नाध्वरस्य राजानं पूजयध्वं महेश्वरम्॥५३॥
ईश्वरः सर्वभूतानां सर्वभूततनुर्हरः।
पूज्यते सर्वयज्ञेषु सर्वाभ्युदयसिद्धिदः॥५४॥
एवमुक्ता अपीशानं मायया नष्टचेतसः।
न मेनिरे ययुर्मन्त्रा देवान् मुक्त्वा स्वमालयम्॥५५॥
ततः स रुद्रो भगवान् सभार्यः सगणेश्वरः।
स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्मर्षि दधीचं प्राह देवताः॥५६॥
(यह सुनकर वेद-) मन्त्रोंने (मूर्तिमान् स्वरूप धारणकर) देवताओंसे कहा-आपका मन तमोगुण से आक्रान्त हो गया है, इसीलिये आप यज्ञके स्वामी महेश्वरकी पूजा नहीं कर रहे हैं। सभी प्राणियों के एकमात्र स्वामी और सभी प्राणियोंके शरीर-रूप तथा समस्त अभ्युदय एवं सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले हर (शंकर) सभी यज्ञोंमें पूजित होते हैं। ईशान अर्थात् शंकरके बारे में ऐसा कहे जानेपर भी मायाके कारण नष्ट चेतनावाले देवोंने (जब उनकी बातको) नहीं माना, तब मन्त्र उन्हें छोड़कर अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर भार्या और गणेश्वरोंसहित उन (वीरभद्रस्वरूप) रुद्रने ब्रह्मर्षि दधीचको हाथोंसे स्पर्श करते हुए देवताओं से कहा-॥५३-५६॥
मन्त्राः प्रमाणं न कृता युष्माभिर्बलगर्वितैः।
यस्मात् प्रसह्य तस्माद् वो नाशयाम्यद्य गर्वितम्॥५७॥
इत्युक्त्वा यज्ञशाला तां ददाह गणपुङ्गवः।
गणेश्वराश्च संक्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः॥५८॥
प्रस्तोत्रा सह होत्रा च अश्वं चैव गणेश्वराः।
गृहीत्वा भीषणा: सर्वे गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः॥५९॥
वीरभद्रोऽपि दीप्तात्मा शक्रस्योद्यच्छतः करम्।
व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्॥६०॥
भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया।
निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णश्चैवमपातयत्॥६१॥
तुम लोगोंने अपने बलसे गर्वित होकर मन्त्रों को प्रमाण नहीं माना, इसलिये इसे सहन न कर मैं आज बलपूर्वक सभीके गर्वको नष्ट करूँगा। ऐसा कहकर गणोंमें श्रेष्ठ वीरभद्रने उस यज्ञशाला को जला डाला और गणेश्वरों ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर (यज्ञशालाके) यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। भयानक सभी गणेश्वरोंने आहुति देनेवालोंसहित पाठ करनेवालों एवं घोड़ेको भी पकड़कर गङ्गाके प्रवाहमें फेंक दिया। प्रदीप्त आत्मावाले तथा दीनतारहित वीरभद्रने भी इन्द्र के उठे हुए सौ हाथों तथा अन्य देवताओंके उठे हुए हाथोंको स्तम्भित कर दिया। उन्होंने नाखूनों के अग्रभाग से खेल-खेलमें ही भग (देवता)-के नेत्रोंको उखाड़ डाला, मुक्केसे मारकर पूषा (देवता)-के दाँतोंको तोड़ डाला॥ ५७-६१॥
तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया।
धर्षयामास बलवान् स्मयमानो गणेश्वरः।। ६२॥
वर्तेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।
जघान मूर्ध्नि पादेन मुनीनपि मुनीश्वराः ॥६३॥
तथा विष्णुं सगरुडं समायान्तं महाबलः।
विव्याध निशितैर्बाणैः स्तम्भयित्वा सुदर्शनम्॥६४॥
इसी प्रकार लीला करते हुए बलशाली गणेश्वर वीरभद्रने हँसकर पैरके अँगूठेसे चन्द्रमाको धर्षित कर (रौंद) दिया। अग्नि (देवता)-के दोनों हाथोंको काटकर
लीलासे ही उनकी जीभ उखाड़ दी। मुनीश्वरो! उन्होंने पैरसे मुनियोंके मस्तकपर भी प्रहार किया। साथ ही (उस) महाबली (वीरभद्र)-ने सुदर्शनचक्रको स्तम्भित कर गरुडपर बैठकर आते हुए विष्णुको भी तीक्ष्ण बाणोंसे विद्ध (चोटिल) कर दिया ॥ ६२-६४ ।।
समालोक्य महाबाहुरागत्य गरुडो गणम्।
जघान पक्षैः सहसा ननादाम्बुनिधिर्यथा ॥६५॥
ततः सहस्त्रशो भद्रः ससर्ज गरुडान् स्वयम्।
वैनतेयादभ्यधिकान् गरुडं ते प्रदुद्रुवुः॥६६॥
तान् दृष्ट्वा गरुडो धीमान् पलायत महाजवः।
विसृज्य माधवं वेगात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७॥
अन्तर्हिते वैनतेये भगवान् पद्मसम्भवः।
आगत्य वारयामास वीरभद्रं च केशवम्॥६८॥
महाबाहु गरुडने वहाँ आकर गण (वीरभद्र)-को देखकर अचानक उन्हें अपने पंखोंसे मारा और समुद्र के समान गर्जन किया। तदनन्तर उन वीरभद्रने भी स्वयं हजारों गरुडोंको उत्पन्न कर डाला, जो विनतापुत्र गरुडसे भी अधिक बलशाली थे, वे सभी गरुडके ऊपर टूट पड़े। उन (वीरभद्रद्वारा उत्पन्न) गरुडोंको देखकर बुद्धिमान् वे गरुड विष्णुको छोड़कर बड़े ही वेगसे भाग उठे, यह एक आश्चर्यकी बात थी। विनताके पुत्र गरुडके अन्तर्धान हो जानेपर कमलसे उत्पन्न भगवान् ब्रह्माने वहाँ उपस्थित होकर वीरभद्र तथा केशव को (युद्ध करनेसे) रोका॥६५-६८॥
प्रसादयामास च तं गौरवात् परमेष्ठिनः ।
संस्तूय भगवानीशः साम्बस्तत्रागमत् स्वयम्॥६९॥
वीक्ष्य देवाधिदेवं तं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।
तुष्टाव भगवान् ब्रह्मा दक्षः सर्वे दिवौकसः॥७०॥
विशेषात् पार्वती देवीमीश्वरार्धशरीरिणीम्।
स्तोत्रैर्नानाविधैर्दक्षः प्रणम्य च कृताञ्जलिः॥७१॥
ततो भगवती देवी प्रहसन्ती महेश्वरम्।
प्रसन्नमानसा रुद्रं वचः प्राह घृणानिधिः॥७२॥
परमेष्ठी ब्रह्माकी महत्ताको समझकर (वीरभद्र ने उनकी) स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। (उस समय) पार्वतीसहित साक्षात् भगवान् शंकर भी वहाँ आये। सभी गणोंसे घिरे हुए पार्वतीसहित उन देवाधिदेव शंकर को देखकर भगवान् ब्रह्मा, दक्ष तथा धुलोकमें रहनेवाले सभी देवता उनकी (भगवान् शंकरकी) स्तुति करने लगे। दक्षने विशेषरूपसे शंकरकी अर्धाङ्गिनी देवी पार्वतीको हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए नाना प्रकार के स्तोत्रोंसे प्रसन्न किया। तदनन्तर दयाकी निधि देवी भगवतीने हँसते हुए प्रसन्न-मनसे महेश्वर रुद्रसे यह वचन कहा-॥६९-७२॥
त्वमेव जगतः स्त्रष्टा शासिता चैव रक्षकः।
अनुग्राह्यो भगवता दक्षश्चापि दिवौकसः॥७३॥
ततः प्रहस्य भगवान् कपर्दी नीललोहितः।
उवाच प्रणतान् देवान् प्राचेतसमथो हरः॥७४॥
आप ही संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा आप ही शासन करनेवाले एवं रक्षक हैं। आप भगवान्को दक्ष तथा देवताओंपर कृपा करनी चाहिये। तदनन्तर जटा धारण करनेवाले नीललोहित भगवान् हरने हँसकर देवताओं तथा प्रचेतापुत्र दक्षसे कहा- ॥७३-७४॥
गच्छध्वं देवताः सर्वाः प्रसन्नो भवतामहम्।
सम्पूज्यः सर्वयज्ञेषु न निन्द्योऽहं विशेषतः॥७५॥
देवताओ! आप सभी लोग जायँ। मैं आपपर प्रसन्न हूँ। सभी यज्ञोंमें विशेषरूपसे मेरी पूजा करनी चाहिये और मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ७५॥
त्वं चापि शृणु मे दक्ष वचनं सर्वरक्षणम्।
त्यक्त्वा लोकैषणामेतांमद्भक्तो भव यत्नतः॥७६॥
भविष्यसि गणेशानः कल्पान्तेऽनुग्रहान्मम।
तावत् तिष्ठ ममादेशात् स्वाधिकारेषु निर्वृतः ॥७७॥
हे दक्ष! तुम भी सभीकी रक्षा करनेमें समर्थ मेरे वचनको सुनो-तुम 'मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ' इस लोकैषणा (यशकी इच्छा)-का परित्यागकर प्रयत्नपूर्वक मेरे भक्त बनो। इस कल्पके बीत जानेपर मेरी कृपासे तुम गणों के अधिपति बनोगे। मेरे आदेशसे उस समयतक तुम अपने अधिकारपर शान्तिसे बने रहो॥७६-७७ ॥
एवमुक्त्वा स भगवान् सपत्नीकः सहानुगः।
अदर्शनमनुप्राप्तो दक्षस्यामिततेजसः॥७८॥
अन्तर्हिते महादेवे शंकरे पद्मसम्भवः।
व्याजहार स्वयं दक्षमशेषजगतो हितम्॥७९॥
ऐसा कहकर वे भगवान् शंकर पत्नी पार्वती तथा अपने अनुचरोंसहित अमित तेजस्वी दक्षके लिये अन्तर्धान (अदृश्य) हो गये। महादेव शंकरके अन्तर्धान हो जानेपर साक्षात् पद्मोद्भव ब्रह्माने समस्त संसार के लिये कल्याणकारी वचन कहे-॥७८-७९ ॥
ब्रह्मोवाच
किं तवापगतो मोहः प्रसन्ने वृषभध्वजे।
यदाचष्ट स्वयं देवः पालयैतदतन्द्रितः ।।८०॥
सर्वेषामेव भूतानां हृद्येष वसतीश्वरः।
पश्यन्त्येनं ब्रह्मभूता विद्वांसो वेदवादिनः॥८१॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बीजं परमा गतिः।
स्तूयते वैदिकैर्मन्त्रैर्देवदेवो महेश्वरः॥८२॥
तमर्चयति यो रुद्रं स्वात्मन्येकं सनातनम्।
चेतसा भावयुक्तेन स याति परमं पदम्॥८३॥
तस्मादनादिमध्यान्तं विज्ञाय परमेश्वरम्।
कर्मणा मनसा वाचा समाराधय यत्नतः॥८४॥
ब्रह्माजीने कहा-(दक्ष!) वृषभध्वज शंकर के प्रसन्न हो जानेपर क्या तुम्हारा मोह दूर हुआ? साक्षात् भगवान्ने जो तुमसे कहा है, आलस्यरहित होकर उसका पालन करो। ये परमेश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। वेदवादी ब्रह्मस्वरूप विद्वान् लोग इनका दर्शन करते हैं। वे सभी प्राणियोंके आत्मा, वे ही बीजरूप तथा परम गति हैं। वैदिक मन्त्रोंके द्वारा देवदेव महेश्वरकी स्तुति की जाती है। जो उस अद्वितीय सनातन रुद्रकी अपनी आत्मामें श्रद्धायुक्त मनसे आराधना करता है, वह परमपद अर्थात् मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित परमेश्वरको जानकर मन, वाणी तथा कर्मसे प्रयत्नपूर्वक उनकी आराधना करो ॥ ८०-८४॥
यत्नात् परिहरेशस्य निन्दामात्मविनाशिनीम्।
भवन्ति सर्वदोषाय निन्दकस्य क्रिया यतः॥८५॥
यस्तवैष महायोगी रक्षको विष्णुरव्ययः।
स देवदेवो भगवान् महादेवो न संशयः॥ ८६ ।।
मन्यन्ते ये जगद्योनि विभिन्नं विष्णुमीश्वरात्।
मोहादवेदनिष्ठत्वात् ते यान्ति नरकं नराः ।। ८७॥
वेदानुवर्तिनो रुद्रं देवं नारायणं तथा।
एकीभावेन पश्यन्ति मुक्तिभाजो भवन्ति ते॥८८॥
अपना ही विनाश कर डालनेवाली शंकरकी निन्दा करना प्रयत्नपूर्वक छोड़ दो, क्योंकि (भगवान् शंकर की) निन्दा करनेवालेकी सारी क्रियाएँ दोषयुक्त ही होती हैं। जो आपके ये अव्यय तथा महायोगी विष्णु रक्षक हैं, वे भी देवताओंके देव भगवान् महादेव ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो अज्ञानसे तथा वेदमें निष्ठा न रखनेके कारण संसारके मूल कारण भगवान् विष्णु को शंकरसे पृथक् मानते हैं, वे मनुष्य नरकमें जाते हैं। वेदमार्गका अनुवर्तन करनेवाले लोग रुद्रदेव तथा नारायणको एकीभावसे देखते हैं, अत: वे मुक्तिपद के भागी होते हैं। ८५-८८॥
यो विष्णुः स स्वयं रुद्रो यो रुद्रः स जनार्दनः।
इति मत्वा यजेद् देवं स याति परमां गतिम्॥८९॥
जो विष्णु हैं वे ही साक्षात् रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही जनार्दन विष्णु हैं-इस प्रकार समझकर जो देवका पूजन करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है ।। ८९॥
सृजत्येतज्जगत् सर्वं विष्णुस्तत् पश्यतीश्वरः।
इत्थं जगत् सर्वमिदं रुद्रनारायणोद्भवम्॥९०॥
विष्णु इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं और शंकर उसकी देख-रेख करते हैं। इस प्रकार यह सारा संसार रुद्र और नारायणद्वारा ही उत्पन्न होता है॥९०॥
तस्मात् त्यक्त्वा हरेनिन्दां विष्णावपि समाहितः।
समाश्रयेन्महादेवं शरण्यं ब्रह्मवादिनाम्।। ९१॥
उपश्रुत्याथ वचनं विरिञ्चस्य प्रजापतिः।
जगाम शरणं देवं गोपतिं कृत्तिवाससम्॥९२॥
येऽन्ये शापाग्निनिर्दग्धा दधीचस्य महर्षयः।
द्विषन्तो मोहिता देवं सम्बभूवुः कलिष्वथ॥९३॥
त्यक्त्वा तपोबलं कृत्स्नं विप्राणां कुलसम्भवाः ।
पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मणो वचनादिह॥९४॥
इसलिये भगवान् शंकरकी निन्दाका परित्याग कर और विष्णुमें भी ध्यान लगाकर ब्रह्मवादियों के एकमात्र शरण्य महादेवका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ब्रह्माके वचन सुनकर प्रजापति दक्ष चर्माम्बर धारण करनेवाले देव पशुपतिकी शरणमें गये। और जो दूसरे महर्षि दधीचके शापरूपी अग्निसे दग्ध हो गये थे तथा मोहवश शंकरसे द्वेष करनेवाले थे, वे पूर्वजन्मके संस्कारोंके माहात्म्य तथा ब्रह्माके वचन से सम्पूर्ण तपोबलका त्याग करके कलियुगमें ब्राह्मणों के कुलमें उत्पन्न होंगे॥ ९१-९४॥
मुक्तशापास्ततः सर्वे कल्पान्ते रौरवादिषु।
निपात्यमानाः कालेन सम्प्राप्यादित्यवर्चसम्।
ब्रह्माणं जगतामीशमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा॥ ९५॥
समाराध्य तपोयोगादीशानं त्रिदशाधिपम्।
भविष्यन्ति यथा पूर्वं शंकरस्य प्रसादतः॥९६॥
रौरव आदि नरकोंमें डाले गये वे सभी (शंकर से विद्वेष करनेवाले) कल्पान्तमें यथासमय स्वयम्भू की आज्ञासे आदित्यके समान तेजोमय जगत्के स्वामी ब्रह्मको प्राप्तकर शापसे मुक्त हो जायेंगे और तपोयोग द्वारा देवताओं के स्वामी शंकरकी आराधना कर और उनकी कृपासे पुनः जैसे पहले थे वैसे ही (विप्रर्षि) हो जायँगे ॥ ९५-९६॥
एतद् वः कथितं सर्वं दक्षयज्ञनिषूदनम्।
शृणुध्वं दक्षपुत्रीणां सर्वासां चैव संततिम्॥९७॥
प्रसंगवश (मैंने) यह सब दक्ष-यज्ञके विध्वंस की कथा आप लोगोंसे कही। अब आप लोग प्रजापति दक्ष की सभी कन्याओं की संतान-परम्परा का वर्णन सुनें ॥ ९७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्दशोऽध्यायः ।। १४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १४ ॥
Summary of chapter 14 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta narrates the progeny of Svāyambhuva Manu through his sons Priyavrata and Uttānapāda. Uttānapāda's son Dhruva attained an eternal heavenly station through unwavering devotion to Nārāyaṇa. In his lineage appeared Chākshusha Manu and King Vena, whose son Pṛthu was an expansion of Vishṇu who milked the Earth for humanity's sustenance, during whose sacrifice Sūta himself manifested as a divine chronicler. Pṛthu's descendant King Susheela, a pious ruler devoted to Nārāyaṇa, renounced his kingdom to pursue severe asceticism in the Himalayas. At Mandākinī river, Susheela met the great sage Śvetāshvatara, embraced the sacred Pāshupata Vrata, smeared his body with holy ash, and attained highest spiritual wisdom. In the same lineage appeared the ten Prachetas, who married Mārishā and re-begot Daksha Prajāpati. When Daksha insulted Mahādeva and mistreated Satī, Satī immolated Her body in yogic fire, prompting the destruction of Daksha's sacrifice by Vīrabhadra, illustrating the supreme necessity of honoring Mahādeva.