7 अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस

तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन

ईश्वर उवाच

शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रभावं परमेष्ठिनः ।

यं ज्ञात्वा पुरुषो मुक्तो न संसारे पतेत् पुनः॥ १ ॥

ईश्वर बोले-ऋषियो! आप सभी परमेष्ठीके प्रभावको सुनें, जिसे जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और फिर संसारमें नहीं गिरता ॥१॥

परात् परतरं ब्रह्म शाश्वतं निष्कलं ध्रुवम्।

नित्यानन्दं निर्विकल्पं तद्धाम परमं मम॥ २॥

अहं ब्रह्मविदां ब्रह्मा स्वयम्भूर्विश्वतोमुखः ।

मायाविनामहं देवः पुराणो हरिरव्ययः॥ ३ ॥

योगिनामस्म्यहं शम्भुः स्त्रीणां देवी गिरीन्द्रजा।

आदित्यानामहं विष्णुर्वसूनामस्मि पावकः॥ ४ ॥

रुद्राणां शंकरश्चाहं गरुडः पततामहम्।

ऐरावतो गजेन्द्राणां रामः शस्त्रभृतामहम्॥ ५ ॥

जो परसे परतर, शाश्वत, निष्कल, ध्रुव, नित्यानन्द, निर्विकल्प ब्रह्म है, वह मेरा परम धाम है। मैं ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वतोमुख स्वयम्भू ब्रह्मा हूँ। मायावियोंमें मैं अव्यय पुराण देव हरि हूँ। योगियोंमें मैं शम्भु और स्त्रियोंमें गिरिराज पुत्री पार्वती हूँ। मैं (द्वादश) आदित्योंमें विष्णु तथा (अष्ट) वसुओंमें पावक हूँ। मैं रुद्रोंमें शंकर, उड़नेवाले पक्षियोंमें गरुड, गजेन्द्रोंमें ऐरावत तथा शस्त्रधारियोंमें परशुराम हूँ॥२-५॥

ऋषीणां च वसिष्ठोऽहं देवानां च शतक्रतुः।

शिल्पिनां विश्वकर्माहं प्रह्लादोऽस्म्यमरद्विषाम्॥ ६ ॥

मुनीनामप्यहं व्यासो गणानां च विनायकः।

वीराणां वीरभद्रोऽहं सिद्धानां कपिलो मुनिः॥ ७॥

पर्वतानामहं मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः।

वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमस्यहम्॥ ८॥

अनन्तो भोगिनां देवः सेनानीनां च पावकिः।

आश्रमाणां च गार्हस्थमीश्वराणां महेश्वरः॥ ९ ॥

महाकल्पश्च कल्पानां युगानां कृतमस्म्यहम्।

कुबेरः सर्वयक्षाणां गणेशानां च वीरकः ॥ १०॥

ऋषियोंमें मैं वसिष्ठ, देवताओंमें इन्द्र, शिल्पियों में विश्वकर्मा और सुरद्वेषी राक्षसोंमें प्रह्लाद हूँ। मैं मुनियों में व्यास, गणोंमें विनायक, वीरों में वीरभद्र और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ। मैं पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, प्रहार करनेवाले शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य व्रत हूँ। मैं सोमें अनन्तदेव, सेनानियोंमें कार्तिकेय, आश्रमों में गृहस्थाश्रम और ईश्वरोंमें महेश्वर हूँ। मैं कल्पों में महाकल्प, युगोंमें सत्ययुग, सभी यक्षोंमें कुबेर और गणेश्वरोंमें वीरक हूँ॥६-१०॥

प्रजापतीनां दक्षोऽहं निऋतिः सर्वरक्षसाम्।

वायुर्बलवतामस्मि द्वीपानां पुष्करोऽस्म्यहम्॥११॥

मैं प्रजापतियोंमें दक्ष, सभी राक्षसोंमें निर्ऋति, बलवानोंमें वायु और द्वीपोंमें पुष्कर द्वीप हूँ॥११॥

मृगेन्द्राणां च सिंहोऽहं यन्त्राणां धनुरेव च।

वेदानां सामवेदोऽहं यजुषां शतरुद्रियम्॥१२॥

सावित्री सर्वजप्यानां गुह्यानां प्रणवोऽस्म्यहम्।

सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु॥१३॥

सर्ववेदार्थविदुषां मनुः स्वायम्भुवोऽस्म्यहम्।

ब्रह्मावर्तस्तु देशानां क्षेत्राणामविमुक्तकम्॥१४॥

विद्यानामात्मविद्याहं ज्ञानानामैश्वरं परम्।

भूतानामस्म्यहं व्योम सत्त्वानां मृत्युरेव च ॥१५॥

मैं मृगेन्द्रोंमें सिंह, यन्त्रोंमें धनुष, वेदोंमें सामवेद और यजुर्मन्त्रोंमें शतरुद्रिय हूँ, मैं जपनीय सभी मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र, गोपनीयोंमें प्रणव, (वैदिक) सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, साममन्त्रोंमें ज्येष्ठसाम हूँ। मैं सभी वेदके अर्थको जाननेवाले विद्वानोंमें स्वायम्भुव मनु, देशोंमें ब्रह्मावर्त और क्षेत्रोंमें अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्र हूँ। मैं विद्याओंमें आत्मविद्या, ज्ञानोंमें परम ईश्वरीय ज्ञान, (पञ्च) भूतोंमें आकाश और सत्त्वोंमें मृत्यु' हूँ॥ १२-१५॥

पाशानामस्म्यहं माया कालः कलयतामहम्।

गतीनां मुक्तिरेवाहं परेषां परमेश्वरः॥१६॥

यच्चान्यदपि लोकेऽस्मिन् सत्त्वं तेजोबलाधिकम्।

तत्सर्वं प्रतिजानीध्वं मम तेजोविजृम्भितम्॥१७॥

आत्मानः पशव: प्रोक्ताः सर्वे संसारवर्तिनः ।

तेषां पतिरहं देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः॥१८॥

मायापाशेन बध्नामि पशूनेतान् स्वलीलया।

मामेव मोचकं प्राहुः पशूनां वेदवादिनः॥१९॥

मायापाशेन बद्धानां मोचकोऽन्यो न विद्यते।

मामृते परमात्मानं भूताधिपतिमव्ययम्॥२०॥

मैं (बन्धनकारक) पाशोंमें माया, संहार करनेवालों में काल, गतियोंमें मुक्ति और उत्कृष्टोंमें परमेश्वर हूँ। इस संसारमें अन्य जो कुछ भी अधिक तेज और बलसे सम्पन्न सत्त्व पदार्थ हैं, उन सबको मेरे ही तेजसे सम्पन्न जानना चाहिये। संसारमें रहनेवाले सभी जीवोंको पशु कहा गया है, मैं देव उनका पति (स्वामी) हूँ, इसलिये विद्वानोंद्वारा 'पशुपति' कहा जाता हूँ। मैं मायारूपी पाशके द्वारा अपनी लीला से इन पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालता हूँ। वेदज्ञ

लोग मुझे ही पशुओंको मुक्त करनेवाला मोचक कहते हैं। मायाके पाशसे आबद्ध जीवोंको मुक्त करनेवाला मुझ भूतोंके अधिपति अव्यय परमात्माको छोड़कर अन्य कोई नहीं है॥१६-२०॥

चतुर्विंशतितत्त्वानि माया कर्म गुणा इति।

एते पाशा: पशुपतेः क्लेशाश्च पशुबन्धनाः॥२१॥

मनो बुद्धिरहंकारः खानिलाग्निजलानि भूः।

एता प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराश्च तथापरे॥ २२॥

श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम्।

पायूपस्थं करौ पादौ वाक् चैव दशमी मता ॥२३॥

शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।

त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्राकृतानि तु॥२४॥

(प्रकृति-महत्-अहंकार आदि) चौबीस तत्त्व, माया, कर्म तथा गुण-ये पशुपतिके पाश और पशुओं (जीवों) को बन्धनमें डालनेवाले क्लेश हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश- श-ये आठ प्रकृति हैं और दूसरे सभी पदार्थ विकार या विकृति हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा पाँचवीं नासिका, गुदा, जननेन्द्रिय, हाथ, पैर तथा दसवीं इन्द्रिय वाणी और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध-ये तेईस तत्त्व प्राकृत अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हैं ॥ २१-२४॥

चतुर्विंशकमव्यक्तं प्रधानं गुणलक्षणम्।

अनादिमध्यनिधनं कारणं जगतः परम्॥२५॥

सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयमुदाहृतम्।

साम्यावस्थितिमेतेषामव्यक्तं प्रकृतिं विदुः ॥२६॥

चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त किंवा प्रधान है, वह गुणोंसे लक्षित होनेवाला आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित और जगत्का परम कारण है। सत्त्व, रज और तम- ये तीन गुण कहे गये हैं। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको अव्यक्त प्रकृति जानना चाहिये॥ २५-२६ ॥

सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रजो मिश्रमुदाहृतम्।

गुणानां बुद्धिवैषम्याद् वैषम्यं कवयो विदुः॥२७॥

सत्त्वगुणको ज्ञानस्वरूप, तमोगुणको अज्ञान स्वरूप और रजोगुणको मिश्ररूप अर्थात् ज्ञान और अज्ञान दोनोंका मिश्रित रूप कहा गया है। बुद्धिकी विषमता से गुणोंका भी वैषम्य होता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥ २७ ॥

धर्माधर्माविति प्रोक्तौ पाशौ द्वौ बन्धसंज्ञितौ।

मय्यर्पितानि कर्माणि निबन्धाय विमुक्तये॥ २८॥

अविद्यामस्मितां राग द्वेषं चाभिनिवेशकम्।

क्लेशाख्यानचलान् प्राहुः पाशानात्मनिबन्धनान् ॥ २९॥

एतेषामेव पाशानां माया कारणमुच्यते।

मूलप्रकृतिरव्यक्ता सा शक्तिर्मयि तिष्ठति॥३० ।।

बन्ध नामवाले दो पाशोंको धर्म और अधर्म कहा गया है। मुझे अर्पित किये गये कर्म बन्धनसे मुक्ति के लिये होते हैं। आत्माका बन्धन करनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश-इन क्लेश नामवाले पाँच अचल (दीर्घकालतक स्थायी-सा रहनेवाले) तत्त्वोंको पाश कहा गया है। मायाको इन (गाँचों) पाशोंका कारण कहा जाता है। अव्यक्त मूल प्रकृति रूप शक्ति मुझमें प्रतिष्ठित रहती है॥ २८-३०॥

स एव मूलप्रकृतिः प्रधानं पुरुषोऽपि च।

विकारा महदादीनि देवदेवः सनातनः॥३१॥

स एव बन्धः स च बन्धकर्ता

स एव पाशः पशवः स एव।

स वेद सर्वं न च तस्य वेत्ता

तमाहुरग्रयं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥

यह मूल प्रकृति, प्रधान, पुरुष, महत्, अहंकार आदि विकारयुक्त तत्त्व-ये सब देवाधिदेव सनातनके ही रूप हैं। यही (सनातन पुरुष) बन्धन है, यही बन्धनमें डालनेवाला । यही पाश और यही पशु है। यही सब कुछ जानता है, परंतु इसे जाननेवाला कोई नहीं है। इसे ही आदि पुराणपुरुष कहा जाता है* ॥ ३१-३२॥