25 अध्याय

श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका

कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका

दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा

महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा

स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका

दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन

सूत उवाच

प्रविश्य मेरुशिखरं कैलासं कनकप्रभम्।

रराम भगवान् सोमः केशवेन महेश्वरः॥ १ ॥

अपश्यंस्तं महात्मानं कैलासगिरिवासिनः।

पूजयाञ्चक्रिरे कृष्णं देवदेवमथाच्युतम्॥ २ ॥

चतुर्बाहुमुदाराङ्गं कालमेघसमप्रभम्।

किरीटिनं शार्ङ्गपाणिं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥ ३ ॥

दीर्घबाहुं विशालाक्षं पीतवाससमच्युतम्।

दधानमुरसा मालां वैजयन्तीमनुत्तमाम्॥ ४ ॥

भ्राजमानं श्रिया दिव्यं युवानमतिकोमलम्।

पद्माङ्ग्रिनयनं चारु सुस्मितं सुगतिप्रदम्॥ ५ ॥

सूतजी बोले-मेरु शिखरके स्वर्णिम कैलास पर्वतपर पहुँचकर महेश्वर भगवान् शंकर केशव (श्रीकृष्ण)- के साथ विहार करने लगे। कैलास पर्वतपर निवास करनेवालोंने उन देवाधिदेव, अच्युत, महात्मा श्रीकृष्ण को देखकर उनकी पूजा की। उन्होंने चार भुजावाले, उदार अङ्गीवाले, प्रलयकालीन मेघके समान प्रभावाले, मुकुटधारी, हाथ में धनुष धारण किये, श्रीवत्ससे सुशोभित वक्षःस्थलवाले, दीर्घ भुजावाले, विशाल नेत्रोंवाले, पीताम्बर धारण किये, वक्षःस्थलपर उत्तम वैजयन्तीकी माला धारण किये, शोभासे सुशोभित दिव्य अति कोमल, युवावस्थावाले, कमल (वर्ण)-के समान (रक्त) चरण एवं नेत्रवाले, अत्यन्त सुन्दर, मुसकराते हुए अच्छी गति प्रदान करनेवाले अच्युत (श्रीकृष्ण)-की पूजा की॥१-५॥

कदाचित् तत्र लीलार्थं देवकीनन्दवर्धनः।

भ्राजमानः श्रिया कृष्णश्चचार गिरिकन्दरे॥ ६ ॥

गन्धर्वाप्सरसां मुख्या नागकन्याश्च कृत्स्नशः।

सिद्धा यक्षाश्च गन्धर्वास्तत्र तत्र जगन्मयम्॥ ७ ॥

दृष्ट्वाश्चर्यं परं गत्वा हर्षादुत्फुल्ललोचनाः।

मुमुचुः पुष्पवर्षाणि तस्य मूर्षि महात्मनः॥ ८ ॥

गन्धर्वकन्यका दिव्यास्तद्वदप्सरसां वराः।

दृष्ट्वा चकमिरे कृष्णं त्रस्तवस्त्रविभूषणाः॥ ९ ॥

काश्चिद् गायन्ति विविधां गीतिं गीतविशारदाः।

सम्प्रेक्ष्य देवकीसूनुं सुन्दर्यः काममोहिताः॥१०॥

वहाँ किसी समय माता देवकीके आनन्दको बढ़ानेवाले शोभासम्पन्न श्रीकृष्ण लीलाके निमित्त कैलास पर्वत की गुहामें विचरण करने लगे। सभी प्रमुख गन्धर्वो, अप्सराओं, नागकन्याओं, सिद्धों, यक्षों तथा गन्धर्वो ने वहाँ उन जगन्मय (श्रीकृष्ण)-को देखा और परम आश्चर्यचकित होकर वे आनन्दसे प्रफुल्लित नेत्रवाले हो गये तथा उन महात्माके मस्तकपर पुष्पों की वर्षा करने लगे। दिव्य गन्धर्वांकी कन्याएँ तथा उसी प्रकार श्रेष्ठ अप्सराएँ कृष्णको देखकर अव्यवस्थित वस्त्राभूषणवाली होकर उनकी कामना करने लगीं। गायनमें पारंगत कुछ सुन्दरियाँ काममोहित होकर देवकीपुत्रकी ओर देखकर विविध प्रकारके गीत गाने लगीं ॥६-१०॥

काश्चिद्विलासबहुला नृत्यन्ति स्म तदग्रतः।

सम्प्रेक्ष्य संस्थिताः काश्चित् पपुस्तद्वदनामृतम्॥११॥

कुछ अत्यन्त विलासप्रिय (कन्याएँ) उनके आगे नृत्य करने लगी और कुछ वहीं स्थित होकर उनकी ओर देखकर उनके वदनामृतका पान करने लगीं ॥११॥

काश्चिद् भूषणवर्याणि स्वाङ्गादादाय सादरम्।

भूषयाञ्चक्रिरे कृष्णं कामिन्यो लोकभूषणम्॥१२॥

काश्चिद् भूषणवर्याणि समादाय तदङ्गतः।

स्वात्मानं भूषयामासुः स्वात्मगैरपि माधवम्॥१३॥

काश्चिदागत्य कृष्णस्य समीपं काममोहिताः।

चुचुम्बुर्वदनाम्भोजं हरेर्मुग्धमृगेक्षणाः॥१४॥

प्रगृह्य काश्चिद् गोविन्दं करेण भवनं स्वकम्।

प्रापयामासुर्लोकादिं मायया तस्य मोहिताः ॥१५॥

कुछ कामिनियाँ (कन्याएँ) अपने अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणों को उतारकर उनसे लोकभूषण कृष्णको आदरपूर्वक आभूषित करने लगीं। कुछ उनके अङ्गोंसे श्रेष्ठ आभूषणों को लेकर अपनेको तथा अपने आभूषणोंसे माधवको सजाने लगीं। कतिपय मुग्ध मृगके समान नयनोंवाली काम-मोहित (कन्याएँ) हरि कृष्णके समीपमें जाकर उनके मुखकमलका स्पर्श करने लगीं। उनकी मायासे मोहित कुछ अप्सराएँ लोकों के आदि कारण गोविन्द का हाथ पकड़कर उन्हें अपने भवनमें ले गयीं ॥ १२-१५॥

तासां स भगवान् कृष्ण: कामान् कमललोचनः ।

बहूनि कृत्वा रूपाणि पूरयामास लीलया॥१६॥

एवं वै सुचिरं कालं देवदेवपुरे हरिः।

रेमे नारायणः श्रीमान् मायया मोहयञ्जगत्॥१७॥

उन कमललोचन भगवान् श्रीकृष्णने बहुतसे रूप धारणकर लीलापूर्वक उनकी अभीष्ट कामनाओंकी पूर्ति की। इस प्रकार श्रीमान् नारायण हरिने संसार को (अपनी) मायासे मोहित करते हुए देवाधिदेव शंकर के नगर में बहुत समयतक रमण किया॥१६-१७॥

गते बहुतिथे काले द्वारवत्यां निवासिनः।

बभूवुर्विह्वला भीता गोविन्दविरहे जनाः॥१८॥

ततः सुपर्णो बलवान् पूर्वमेव विसर्जितः।

कृष्णेन मार्गमाणस्तं हिमवन्तं ययौ गिरिम्॥१९॥

अदृष्ट्वा तत्र गोविन्दं प्रणम्य शिरसा मुनिम्।

आजगामोपमन्यु तं पुरीं द्वारवतीं पुनः ॥२०॥

तदन्तरे महादैत्या राक्षसाश्चातिभीषणाः।

आजग्मुर्दारकां शुभ्रां भीषयन्तः सहस्रशः ॥२१॥

स तान् सुपर्णो बलवान् कृष्णतुल्यपराक्रमः ।

हत्वा युद्धेन महता रक्षति स्म पुरीं शुभाम्॥२२॥

बहुत दिन व्यतीत होनेपर द्वारिकापुरीके रहनेवाले लोग गोविन्दके विरहमें भयभीत एवं विह्वल हो गये। तब पहले कृष्णद्वारा छोड़ दिये गये बलवान् गरुड उनको ढूँढ़ते हुए उस हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ गोविन्द को न देखकर उन उपमन्युको विनयपूर्वक प्रणामकर पुनः द्वारवतीपुरीमें लौट आये। इसी बीच अत्यन्त भयंकर हजारों महादैत्य तथा राक्षस भय उत्पन्न करते हुए सुन्दर द्वारकामे आ पहुँचे। कृष्णके समान पराक्रमवाले बलवान् सुपर्ण (गरुड)-ने महान् युद्धद्वारा उन्हें मारकर उस शुभ पुरीकी रक्षा की॥१८-२२॥

एतस्मिन्नेव काले तु नारदो भगवानृषिः ।

दृष्ट्वा कैलासशिखरे कृष्णं द्वारवतीं गतः॥२३॥

तं दृष्ट्वा नारदमृषिं सर्वे तत्र निवासिनः।

प्रोचुर्नारायणो नाथः कुत्रास्ते भगवान् हरिः॥२४॥

स तानुवाच भगवान् कैलासशिखरे हरिः।

रमतेऽद्य महायोगिन् तं दृष्ट्वाहमिहागतः ॥२५॥

इसी समय भगवान् नारद ऋषि कैलास शिखर पर श्रीकृष्णका दर्शनकर द्वारकापुरीमें गये। उन नारद ऋषि को देखकर वहाँ (द्वारकामें) निवास करनेवाले सभीने पूछा-'नारायण, नाथ, भगवान् हरि कहाँ हैं?' उन्होंने (नारदने) उनसे कहा कि भगवान् हरि कैलास शिखरपर रमण कर रहे हैं, मैं उन महायोगीको देखकर आज यहाँ आया हूँ॥ २३-२५॥

तस्योपश्रुत्य वचनं सुपर्णः पततां वरः।

जगामाकाशगो विप्राः कैलासं गिरिमुत्तमम्॥२६॥

ददर्श देवकीसूनुं भवने रत्नमण्डिते।

वरासनस्थं गोविन्दं देवदेवान्तिके हरिम्॥२७॥

उपास्यमानममरैर्दिव्यस्त्रीभिः

महादेवगणैः सिद्धर्योगिभिः परिवारितम्॥ २८॥

विप्रो! उनका वचन सुनकर आकाश में चलने वाले पक्षियोंमें श्रेष्ठ वे गरुड श्रेष्ठ पर्वत कैलासपर गये। उन्होंने देवकीपुत्र गोविन्द हरिको देवाधिदेव (शंकर)- के समीप रत्नमण्डित भवनमें एक श्रेष्ठ आसन पर विराजमान देखा। (वहाँ) देवता, दिव्य स्त्रियाँ, महादेव के गण, सिद्ध तथा योगीजन चारों ओरसे घेरकर उनकी उपासना कर रहे थे॥२६-२८॥

प्रणम्य दण्डवद् भूमौ सुपर्णः शंकरं शिवम्।

निवेदयामास हरेः प्रवृत्तिं द्वारके पुरे॥२९॥

ततः प्रणम्य शिरसा शंकरं नीललोहितम्।

आजगाम पुरीं कृष्णः सोऽनुज्ञातो हरेण तु॥३०॥

आरुह्य कश्यपसुतं स्त्रीगणैरभिपूजितः।

वचोभिरमृतास्वादैर्मानितो

मधुसूदनः॥३१॥

वीक्ष्य यान्तममित्रघ्नं गन्धर्वाप्सरसां वराः।

अन्वगच्छन् महायोगिन् शङ्खचक्रगदाधरम्॥३२॥

विसर्जयित्वा विश्वात्मा सर्वा एवाङ्गना हरिः।

ययौ स तूर्णं गोविन्दो दिव्यां द्वारवतीं पुरीम्॥३३॥

गरुड ने कल्याणकारी शंकरको भूमिपर दण्डवत् प्रणाम किया और द्वारकापुरीका समाचार हरिसे निवेदन किया। तदनन्तर नीललोहित शंकरको विनयपूर्वक प्रणामकर और उन हरकी आज्ञा प्राप्तकर स्त्रीसमूहों द्वारा पूजित और अमृतके समान मधुर स्वादुयुक्त वचनों से सत्कृत वे मधुसूदन श्रीकृष्ण कश्यपपुत्र गरुड पर आरूढ़ होकर अपनी पुरीको चले। शंख, चक्र तथा गदाधारी शत्रुहन्ता महायोगीको जाते हुए देखकर गन्धर्व तथा श्रेष्ठ अप्सराओंने उनका अनुगमन किया। विश्वात्मा गोविन्द हरि उन सभी अङ्गनाओंको विदाकर शीघ्र ही उस दिव्य पुरी द्वारवतीको गये ॥२९-३३॥

गते मुररिपौ नैव कामिन्यो मुनिपुङ्गवाः।

निशेव चन्द्ररहिता विना तेन चकाशिरे॥३४॥

श्रुत्वा पौरजनास्तूर्णं कृष्णागमनमुत्तमम्।

मण्डयाञ्चक्रिरे दिव्यां पुरीं द्वारवतीं शुभाम्॥३५॥

पताकाभिर्विशालाभिर्ध्वजै रत्नपरिष्कृतैः।

लाजादिभिः पुरीं रम्यां भूषयाञ्चक्रिरे तदा ॥ ३६॥

अवादयन्त विविधान् वादित्रान् मधुरस्वनान्।

शङ्खान् सहस्रशो दध्मुर्वीणावादान् वितेनिरे॥३७॥

प्रविष्टमात्रे गोविन्द पुरीं द्वारवती शुभाम्।

अगायन् मधुरं गानं स्त्रियो यौवनशालिनः॥३८॥

दृष्ट्वा ननृतुरीशानं स्थिताः प्रासादमूर्धसु।

मुमुचुः पुष्पवर्षाणि वसुदेवसुतोपरि॥३९॥

मुनिश्रेष्ठो! उन मुरारिके चले जानेपर वे कामिनियाँ चन्द्रमारहित रात्रिके समान शोभाहीन हो गयीं। पुरवासियों ने श्रीकृष्ण के आगमन के शुभ समाचारको सुनकर शीघ्र दिव्य एवं मङ्गलमयी द्वारवती पुरीको सुसज्जित किया। श्रीकृष्णके आमगनसे अति प्रसन्न द्वारका वासियों ने विशाल पताकाओं और रत्नोंसे जटित ध्वजों तथा लाजा आदि माङ्गलिक वस्तुओंसे सुन्दर पुरीको सजा दिया। मधुर स्वरवाले विविध वाद्यों, हजारों शंखों तथा वीणाओं को वे लोग बजाने लगे। गोविन्दके शुभपुरी द्वारवतीमें प्रवेश करते ही युवती स्त्रियाँ मधुर स्वरमें गान करने लगी। उन ईशान (कृष्ण)-को देखकर वे नृत्य करने लगी और महलोंके ऊपर स्थित स्त्रियाँ वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण के ऊपर फूल बरसाने लगीं ॥३४-३९॥

प्रविश्य भवनं कृष्ण आशीर्वादाभिवर्धितः।

वरासने महायोगी भाति देवीभिरन्वितः॥४०॥

सुरम्ये मण्डपे शुभ्रे शङ्खाद्यैः परिवारितः।

आत्मजैरभितो मुख्यैः स्त्रीसहस्त्रैश्च संवृतः॥४१॥

भवनमें प्रवेशकर महायोगी कृष्ण आशीर्वादों से अभिनन्दित होते हुए अत्यन्त रमणीय शुक्लवर्ण के मण्डपमें स्थित एक श्रेष्ठ आसनपर अपनी पत्नियों के साथ सुशोभित हुए। वे चारों ओरसे शङ्ख आदि प्रमुख पुत्रों तथा हजारों स्त्रियोंसे घिरे हुए थे॥ ४०-४१॥

तत्रासनवरे रम्ये जाम्बवत्या सहाच्युतः।

भाजते मालया देवो यथा देव्या समन्वितः॥४२॥

आजग्मुर्देवगन्धर्वा द्रष्टुं लोकादिमव्ययम्।

महर्षयः पूर्वजाता मार्कण्डेयादयो द्विजाः॥४३॥

ततः स भगवान् कृष्णो मार्कण्डेयं समागतम्।

ननामोत्थाय शिरसा स्वासनं च ददौ हरिः॥४४॥

वैजयन्ती मालासे विभूषित उस रमणीय श्रेष्ठ आसन पर अच्युत श्रीकृष्ण जाम्बवतीके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए जैसे देवी उमाके साथ महादेव। ब्राह्मणो! उन अव्यय तथा लोकोंके आदि कारण (श्रीकृष्ण)-का दर्शन करनेके लिये देवता, गन्धर्व और पूर्वज मार्कण्डेय आदि महर्षि वहाँ आये। तब उन भगवान् श्रीकृष्ण हरि ने मार्कण्डेयजी को आया देखकर आसनसे उठकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और उन्हें आसन दिया॥४२-४४॥

सम्पूज्य तानृषिगणान् प्रणामेन महाभुजः।

विसर्जयामास हरिदत्त्वा तदभिवाञ्छितान्॥४५॥

लम्बी भुजाओंवाले हरि ने प्रणामके द्वारा उन ऋषिगणों की पूजा करके और उनके मनोरथोंको प्रदान करके उन्हें विदा किया॥४५॥

तदा मध्याह्नसमये देवदेवः स्वयं हरिः।

स्नात्वा शुक्लाम्बरो भानुमुपातिष्ठत् कृताञ्जलिः॥४६॥

जजापजाप्यं विधिवत् प्रेक्षमाणो दिवाकरम्।

तर्पयामास देवेशो देवान् मुनिगणान् पितॄन्॥४७॥

तदनन्तर मध्याह्नकालमें स्वयं देवाधिदेव हरिने स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण किये और हाथ जोड़कर सूर्य को आराधना की। दिवाकर सूर्यकी ओर देखते हुए उन्होंने विधिपूर्वक मन्त्रोंका जप किया। उन देवेश्वरने देवताओं, मुनिगणों और पितरोंका तर्पण किया॥४६-४७॥

प्रविश्य देवभवनं मार्कण्डेयेन चैव हि।

पूजयामास लिङ्गस्थं भूतेशं भूतिभूषणम्॥४८॥

समाप्य नियमं सर्वं नियन्तासौ नृणां स्वयम्।

भोजयित्वा मुनिवरं ब्राह्मणानभिपूज्य च॥४९॥

कृत्वात्मयोगं विप्रेन्द्रा मार्कण्डेयेन चाच्युतः।

कथाः पौराणिकी: पुण्याश्चक्रे पुत्रादिभिर्वृतः॥५०॥

अथैतत् सर्वमखिलं दृष्ट्वा कर्म महामुनिः।

मार्कण्डेयो हसन् कृष्णं बभाषे मधुरं वचः॥५१॥

(मुनि) मार्कण्डेयके साथ देवमन्दिरमें प्रवेशकर उन्होंने लिङ्गमें प्रतिष्ठित भस्मविभूषित भूतेश्वर (श्रीशंकर) की पूजा की। मनुष्योंके नियामक उन्होंने स्वयं सभी नियमोंको पूर्णकर ब्राह्मणोंकी पूजा की और मुनीश्वर (मार्कण्डेय)-को भोजन कराया। विप्रेन्द्रो! तदुपरान्त पुत्रों आदिसे घिरे हुए अच्युतने आत्मनिष्ठ होकर मार्कण्डेयजीसे पुराणोंकी पुण्यदायिनी कथाको सुना। इन सारे कर्मोंको देखकर महामुनि मार्कण्डेयने श्रीकृष्ण से हँसते हुए मधुर वचन कहा- ॥ ४८-५१॥

मार्कण्डेय उवाच

कः समाराध्यते देवो भवता कर्मभिः शुभैः।

ब्रूहि त्वं कर्मभिः पूज्यो योगिनां ध्येय एव च॥५२॥

त्वं हि तत् परमं ब्रह्म निर्वाणममलं पदम्।

भारावतरणार्थाय जातो वृष्णिकुले प्रभुः॥५३॥

तमब्रवीन्महाबाहुः कृष्णो ब्रह्मविदां वरः।

शृण्वतामेव पुत्राणां सर्वेषां प्रहसन्निव॥५४॥

मार्कण्डेयजी बोले-(देव!) कर्मोद्वारा आपकी ही पूजा की जाती है और योगियोंके ध्येय भी आप ही हैं, फिर आप शुभ कर्मोंके द्वारा किस देवता की आराधना कर रहे हैं, यह मुझे बतलायें। आप ही वे परम ब्रह्म हैं, निर्वाणरूप हैं और निर्मल पद हैं। (पृथ्वीका) भार उतारनेके लिये आप प्रभु ही वृष्णि-कुल में अवतरित हुए हैं। सभी पुत्रोंके सुनते हुए ही ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ महाबाहु कृष्णने उनसे (मार्कण्डेयजी से) हँसते हुए कहा-॥५२-५४॥

श्रीभगवानुवाच

भवता कथितं सर्वं तथ्यमेव न संशयः।

तथापि देवमीशानं पूजयामि सनातनम्॥५५॥

न मे विप्रास्ति कर्तव्यं नानवाप्तं कथञ्चन।

पूजयामि तथापीशं जानन्नेतत् परं शिवम्॥५६॥

न वै पश्यन्ति तं देवं मायया मोहिता जनाः।

ततोऽहं स्वात्मनो मूलं ज्ञापयन् पूजयामि तम्॥५७॥

नच लिङ्गार्चनात् पुण्यं लोकेऽस्मिन् भीतिनाशनम्।

तथा लिङ्गे हितायैषां लोकानां पूजयेच्छिवम्॥५८॥

श्रीभगवान्ने कहा-आपने जो कुछ भी कहा, सब सत्य ही कहा है, इसमें संशय नहीं है तथापि मैं सनातनदेव ईशान (शंकर)-की पूजा करता हूँ। विप्र! मुझे न तो कुछ करना है और न मुझे कुछ अप्राप्त है, फिर भी यह जानते हुए भी मैं परम शिव ईशकी पूजा करता हूँ। माया से मोहित लोग उन देव (शंकर)-का साक्षात्कार नहीं कर पाते। परंतु मैं अपने मूलका परिचय देते हुए उनकी पूजा करता हूँ। इस संसारमें लिङ्गार्चनसे अधिक कोई पुण्य और भयका नाश करनेवाला (कर्म) नहीं है। अत: इन लोकों (प्राणिमात्र)-के कल्याणके लिये लिङ्गमें शिव की पूजा करनी चाहिये॥५५-५८॥

योऽहं तल्लिङ्गमित्याहुर्वेदवादविदो जनाः।

ततोऽहमात्ममीशानं पूजयाम्यात्मनैव तु॥५९॥

तस्यैव परमा मूर्तिस्तन्मयोऽहं न संशयः ।

नावयोर्विद्यते भेदो वेदेष्वेवं विनिश्चयः ।। ६०॥

एष देवो महादेवः सदा संसारभीरुभिः।

ध्येयः पूज्यश्च वन्द्यश्च ज्ञेयो लिङ्गे महेश्वरः ॥६१॥

वैदिक सिद्धान्तोंको जाननेवाले लोग इस लिङ्ग को मेरा ही स्वरूप कहते हैं। इसीलिये मैं स्वयमेव आत्मस्वरूप ईशानका पूजन करता हूँ। मैं उन्हीं (शंकर)-की परम मूर्ति हूँ, मैं शिवस्वरूप ही हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं। वेदोंमें ऐसा ही निश्चय किया गया है कि हम दोनोंमें कोई भेद विद्यमान नहीं है। संसार से भयभीत लोगोंको इन देव महादेवका सदा ध्यान, पूजन और वन्दन करना चाहिये तथा लिङ्गमें महेश्वरको सदा प्रतिष्ठित समझना चाहिये ॥५९-६१॥

मार्कण्डेय उवाच

किं तल्लिङ्गं सुरश्रेष्ठ लिङ्गे सम्पूज्यते च कः।

ब्रूहि कृष्ण विशालाक्ष गहनं ह्येतदुत्तमम्।। ६२ ।।

श्रीमार्कण्डेयजीने पूछा-विशाल नेत्रोंवाले देवश्रेष्ठ कृष्ण! आप इस गूढ़ एवं श्रेष्ठ विषयको बतलायें कि लिङ्ग क्या है और लिङ्गमें किसकी पूजा होती है? ॥ ६२ ॥

श्रीभगवानुवाच

अव्यक्तं लिङ्गमित्याहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम् ।

वेदा महेश्वरं देवमाहुर्लिङ्गिनमव्ययम्॥६३॥

पुरा चैकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।

प्रबोधार्थं ब्रह्मणो मे प्रादुर्भूतः स्वयं शिवः ॥६४॥

तस्मात् कालात् समारभ्य ब्रह्मा चाहं सदैव हि।

पूजयावो महादेवं लोकानां हितकाम्यया॥६५॥

श्रीभगवान्ने कहा-ज्योतिःस्वरूप, अक्षर, अव्यक्त आनन्द को लिङ्ग कहा गया है और वेद महेश्वरदेव को अव्यय तथा लिङ्ग धारण करनेवाला कहते हैं। प्राचीन कालमें जब सर्वत्र जल-ही-जल एकार्णव हो गया और स्थावर-जङ्गम सब नष्ट हो गया, तब ब्रह्मा तथा मुझे प्रबोधित करनेके लिये उसी एकार्णवमें शिव का प्रादुर्भाव हुआ। उसी समयसे लोकोंके कल्याण की कामनासे ब्रह्मा तथा मैं दोनों ही सदा महादेव की पूजा करते हैं ॥ ६३-६५॥

मार्कण्डेय उवाच

कथं लिङ्गमभूत् पूर्वमैश्वरं परमं पदम्।

प्रबोधार्थं स्वयं कृष्ण वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥६६॥

श्रीमार्कण्डेयजी बोले-श्रीकृष्ण ! अब आप यह बतलायें कि पूर्वकालमें आप लोगोंको ज्ञान देनेके लिये वह ईश्वरका परम पदरूप लिङ्ग किस प्रकार स्वयं

प्रकट हुआ॥६६॥

श्रीभगवानुवाच

आसीदेकार्णवं घोरमविभागं तमोमयम्।

मध्ये चैकार्णवे तस्मिन् शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ६७॥

सहस्रशीर्षा भूत्वाहं सहस्राक्षः सहस्रपात्।

सहस्रबाहुर्युक्तात्मा शयितोऽहं सनातनः॥ ६८॥

एतस्मिन्नन्तरे दूरात् पश्यामि ह्यमितप्रभम्।

कोटिसूर्यप्रतीकाशं भ्राजमानं श्रियावृतम् ॥ ६९॥

चतुर्वक्त्रं महायोगिन् पुरुषं काञ्चनप्रभम्।

कृष्णाजिनधरं देवमृग्यजुःसामभिः स्तुतम्॥७०॥

निमेषमात्रेण स मां प्राप्तो योगविदां वरः।

व्याजहार स्वयं ब्रह्मा स्मयमानो महाद्युतिः ।।७१॥

श्रीभगवान्ने कहा-(प्रलयकालमें) विभाग रहित, तमोमय भयंकर एकमात्र समुद्र (एकार्णव) ही था। उस एकार्णवके मध्यभागमें शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाला युक्तात्मा सनातन मैं हजारों सिर, हजारों आँख, हजारों चरण, हजारों बाहुवाला होकर शयन कर रहा था। इसी बीच मैंने दूर स्थित अमित प्रभावाले, करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान, शोभासम्पन्न, कृष्णमृगका चर्म धारण किये हुए, ऋक्, यजुः तथा सामवेद द्वारा स्तुत हो रहे काञ्चनके समान आभावाले महायोगी चतुर्मुख देव पुरुषको देखा। क्षणभरमें ही वे योगज्ञानियों में श्रेष्ठ, महाद्युति ब्रह्मा मुसकराते हुए स्वयं मेरे पास आये और कहने लगे-॥६७-७१॥

कस्त्वं कुतो वा किं चेह तिष्ठसे वद मे प्रभो।

अहं कर्ता हि लोकानां स्वयम्भूः प्रपितामहः॥७२॥

एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मणाहमुवाच ह।

अहं कर्तास्मि लोकानां संहर्ता च पुनः पुनः॥७३॥

एवं विवादे वितते मायया परमेष्ठिनः ।

प्रबोधार्थं परं लिङ्गं प्रादुर्भूतं शिवात्मकम्॥७४॥

कालानलसमप्रख्यं ज्वालामालासमाकुलम्।

क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥७५॥

प्रभो! मुझे बतलायें कि आप कौन हैं, कहाँ से आये हैं और किस कारणसे यहाँ स्थित हैं। मैं लोकों का निर्माण करनेवाला स्वयम्भू प्रपितामह (ब्रह्मा) हूँ। उन ब्रह्मा के द्वारा ऐसा कहे जाने पर मैंने उनसे (ब्रह्मा से) कहा-मैं पुनः-पुनः लोकोंकी सृष्टि करनेवाला हूँ और मैं ही संहार करनेवाला हूँ। परमेष्ठीको माया के कारण इस प्रकारका विवाद बढ़नेपर (हम लोगों को) यथार्थ स्थितिका ज्ञान करानेके लिये (उस समय) शिवरूप परम लिङ्ग प्रादुर्भूत हुआ। वह लिङ्ग प्रलय-कालीन अग्निके समान अनेक ज्वालामालाओं से व्याप्त, क्षय एवं वृद्धिसे मुक्त और आदि, मध्य तथा अन्त से रहित था ॥७२-७५॥

ततो मामाह भगवानधो गच्छ त्वमाशु वै।

अन्तमस्य विजानीम ऊर्ध्वं गच्छेऽहमित्यजः ।। ७६ ।।

तदाशु समयं कृत्वा गतावूर्ध्वमधश्च द्वौ।

पितामहोऽप्यहं नान्तं ज्ञातवन्तौ समाः शतम्।। ७७॥

ततो विस्मयमापन्नौ भीतौ देवस्य शूलिनः ।

मायया मोहितौ तस्य ध्यायन्तौ विश्वमीश्वरम्॥७८॥

प्रोच्चरन्तौ महानादमोङ्कारं परमं पदम्।

प्रह्वाञ्जलिपुटोपेतौ शम्भुं तुष्टुवतुः परम्॥७९॥

तब भगवान् शंकरने मुझसे कहा-तुम शीघ्र ही (इस लिङ्गके) नीचेकी ओर जाओ और इसके अन्त का पता लगाओ और ये अजन्मा ब्रह्मा (इसके) ऊपर की ओर जायँ। तदनन्तर शीघ्र ही प्रतिज्ञा करके हम दोनों ऊपर तथा नीचेकी ओर गये, किंतु पितामह तथा मैं सैकड़ों वर्षों में भी उसका अन्त नहीं जान सके। तदनन्तर त्रिशूलधारी देवकी मायासे मोहित, भयभीत एवं आश्चर्यचकित हम दोनों उन विश्वरूप ईश्वरका ध्यान करने लगे और परमपद महानाद ओंकारका उच्चारण करते हुए नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर श्रेष्ठ शम्भु की स्तुति करने लगे-॥७६-७९॥

ब्रह्मविष्णू ऊचतुः

अनादिमलसंसाररोगवैद्याय शम्भवे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८०॥

प्रलयार्णवसंस्थाय प्रलयोद्भुतिहेतवे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८१॥

चालामालावृताङ्गाय ज्वलनस्तम्भरूपिणे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८२॥

आदिमध्यान्तहीनाय स्वभावामलदीप्तये।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८३॥

ब्रह्मा तथा विष्णुने कहा-विविध अनादि विकारों से मुक्त संसाररूपी रोगके अनादि वैद्यस्वरूप शम्भु, शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। प्रलयकालीन समुद्रमें स्थित रहनेवाले, सृष्टि और प्रलयके कारणरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिधारी ब्रह्मको नमस्कार है। ज्वालामालाओंसे घिरे हुए शरीरवाले, प्रज्वलित स्तम्भरूप शिव, शान्त, लिङ्गमूर्तिवाले ब्रह्मको नमस्कार है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित स्वभावतः निर्मल तेजो रूप शिव, शान्त तथा लिङ्गरूपी मूर्तिको धारण करनेवाले ब्रह्मको नमस्कार है॥८०-८३॥

महादेवाय महते ज्योतिषेऽनन्ततेजसे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८४॥

प्रधानपुरुषेशाय व्योमरूपाय वेधसे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८५॥

निर्विकाराय सत्याय नित्यायामलतेजसे।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८६॥

वेदान्तसाररूपाय कालरूपाय धीमते।

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिङ्गमूर्तये॥८७॥

महादेव, महान्, ज्योतिःस्वरूप, अनन्त तेजस्वी लिङ्गविग्रह शिव, शान्त, ब्रह्मको नमस्कार है। प्रधान पुरुषके भी ईश, व्योमस्वरूप, वेधा (ब्रह्म) और लिङ्गविग्रह शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है। निर्विकार, सत्य, नित्य विमल तेजरूप लिङ्गविग्रह शान्त, शिव ब्रह्मको नमस्कार है। वेदान्तसार-स्वरूप, कालरूप, धीमान् लिङ्गमूर्ति शिव, शान्त ब्रह्मको नमस्कार है।। ८४-८७॥

एवं संस्तूयमानस्तु व्यक्तो भूत्वा महेश्वरः ।

भाति देवो महायोगी सूर्यकोटिसमप्रभः॥८८॥

वक्त्रकोटिसहस्रेण ग्रसमान इवाम्बरम्।

सहस्त्रहस्तचरणः सूर्यसोमाग्निलोचनः॥८९॥

पिनाकपाणिर्भगवान् कृत्तिवासास्त्रिशूलभृत्।

व्यालयज्ञोपवीतश्च मेघदुन्दुभिनिःस्वनः॥९०॥

अथोवाच महादेवः प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ।

पश्येतं मां महादेवं भयं सर्वं प्रमुच्यताम्॥९१॥

युवां प्रसूतौ गात्रेभ्यो मम पूर्वं सनातनौ।

अयं मे दक्षिणे पार्वे ब्रह्मा लोकपितामहः।

वामपार्वे च मे विष्णुः पालको हृदये हरः॥९२॥

प्रीतोऽहं युवयोः सम्यक् वरं दद्मि यथेप्सितम्।

एवमुक्त्वाथ मां देवो महादेवः स्वयं शिवः।

आलिङ्गय देवं ब्रह्माणं प्रसादाभिमुखोऽभवत्॥१३॥

इस प्रकार स्तुति करते रहनेपर महायोगी महेश्वर देव प्रकट हो गये और हजारों करोड़ मुखसे आकाश को मानो ग्रास बनाते हुए करोड़ों सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। हजारों हाथ और पैरवाले, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निरूप (तीन) नयनवाले, पिनाकधनुषको हाथ में धारण करनेवाले, चर्माम्बरधारी, त्रिशूलधारी, सर्पका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और मेघ तथा दुन्दुभि के सदृश स्वरवाले भगवान् महादेवने कहा- श्रेष्ठ देवो! मैं प्रसन्न हूँ। मुझ महादेवकी ओर देखो और समस्त भयका परित्याग करो। पूर्वकालमें तुम दोनों सनातन (देव) मेरे शरीरसे उत्पन्न हुए थे। मेरे दक्षिण पार्श्वमें ये लोक पितामह ब्रह्मा, वाम पार्श्वमें पालनकर्ता विष्णु और हृदयमें हर स्थित हैं। मैं तुम दोनोंपर भलीभाँति प्रसन्न हूँ, इसलिये यथेष्ट वर प्रदान करूँगा। ऐसा कहकर महादेव शिव स्वयं मुझे तथा देव ब्रह्माका आलिङ्गन कर अनुग्रह प्रदान करनेके लिये उद्यत हुए॥८८-९३॥

ततः प्रहृष्टमनसौ प्रणिपत्य महेश्वरम्।

ऊचतुः प्रेक्ष्य तद्वक्त्रं नारायणपितामहौ॥ ९४॥

यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ।

भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि देव महेश्वरे॥९५॥

ततः स भगवानीशः प्रहसन् परमेश्वरः।

उवाच मां महादेवः प्रीतः प्रीतेन चेतसा॥९६॥

तदनन्तर प्रसन्न मनवाले नारायण तथा पितामह ने महेश्वरको प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए कहा-देव! यदि प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हम दोनोंको वर देना चाहते हैं तो (यह वर दें कि) हम दोनोंकी आप महेश्वरमें नित्य भक्ति बनी रहे। तब उन प्रसन्न हुए परम ईश्वर भगवान् ईश महादेवने प्रसन्न मनसे हँसते हुए मुझसे कहा- ॥९४-९६॥

देव उवाच

प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ता त्वं धरणीपते।

वत्स वत्स हरे विश्वं पालयतच्चराचरम्॥९७॥

त्रिधा भिन्नोऽस्म्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया।

सर्गरक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः॥९८॥

सम्मोहं त्यज भो विष्णो पालयैनं पितामहम्।

भविष्यत्येष भगवांस्तव पुत्रः सनातनः॥९९॥

देव बोले-धरणीपते! वत्स हरि! तुम सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्ता हो। इस चराचर विश्व का पालन करो। हे विष्णो! मैं निर्गुण तथा निरञ्जन होते हुए भी सृष्टि, रक्षा तथा प्रलयके लिये अपेक्षित गुणोंके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा हर नामसे तीन रूपोंमें विभक्त हूँ। विष्णो! मोहका परित्याग करो, इन पितामहका पालन करो। ये सनातन भगवान् आपके पुत्र होंगे॥ ९७-९९॥

अहं च भवतो वक्त्रात् कल्पादौ घोररूपधृक् ।

शूलपाणिर्भविष्यामि क्रोधजस्तव पुत्रकः॥१००।

कल्पके आदिमें मैं भी आपके मुखसे प्रकट होकर घोर रूप धारणकर हाथमें शूल धारण किये आपका क्रोधज पुत्र बनूँगा॥१००॥

एवमुक्त्वा महादेवो ब्रह्माणं मुनिसत्तम।

अनुगृह्य च मां देवस्तत्रैवान्तरधीयत॥१०१॥

ततः प्रभृति लोकेषु लिङ्गार्चा सुप्रतिष्ठिता।

लिङ्गं तल्लयनाद् ब्रह्मन् ब्रह्मणः परमं वपुः॥१०२॥

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव मुझपर तथा ब्रह्मापर कृपा करके वहींपर अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मन्! तबसे लोकमें लिङ्गका पूजन प्रतिष्ठित हो गया। लीन होनेसे वह लिङ्ग कहा जाता है। लिङ्ग ब्रह्मका श्रेष्ठ शरीर है॥१०१-१०२।।

एतल्लिङ्गस्य माहात्म्यं भाषितं ते मयानघ।

एतद् बुध्यन्ति योगज्ञा न देवा न च दानवाः॥१०३॥

एतद्धि परमं ज्ञानमव्यक्तं शिवसज्ञितम्।

येन सूक्ष्ममचिन्त्यं तत् पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१०४॥

तस्मै भगवते नित्यं नमस्कारं प्रकुर्महे।

महादेवाय रुद्राय देवदेवाय लिङ्गिने॥१०५॥

अनघ! मैंने इस लिङ्गका माहात्म्य तुम्हें बताया। इसे न देवता जानते हैं न दानव, केवल योगज्ञ लोग ही जानते हैं। यह शिव नामवाला अव्यक्त परम ज्ञान है। ज्ञानदृष्टिवाले इसीके द्वारा उस सूक्ष्म अचिन्त्य (तत्त्व)-का दर्शन करते हैं। इस लिङ्गस्वरूप देवाधि-देव महादेव भगवान् रुद्रको हम नित्य नमस्कार करते हैं॥१०३-१०५॥

नमो वेदरहस्याय नीलकण्ठाय वै नमः।

विभीषणाय शान्ताय स्थाणवे हेतवे नमः॥१०६॥

ब्रह्मणे वामदेवाय त्रिनेत्राय महीयसे।

शंकराय महेशाय गिरीशाय शिवाय च॥१०७॥

नमः कुरुष्व सततं ध्यायस्व मनसा हरम्।

संसारसागरादस्मादचिरादुत्तरिष्यसि ॥१०८॥

वेद के रहस्य रूप आपको नमस्कार है, नीलकण्ठ को नमस्कार है। विशेष भय* उत्पन्न करनेवाले, शान्त, स्थाणु तथा कारणरूपको नमस्कार है। वामदेव, त्रिलोचन, महिमावान्, ब्रह्म, शंकर, महेश, गिरीश तथा शिव को नमस्कार है। सदा इन्हें नमस्कार करो, मनसे शंकर का ध्यान करो। इससे शीघ्र ही संसारसागरसे पार हो जाओगे ॥१०६-१०८॥

एवं स वासुदेवेन व्याहृतो मुनिपुङ्गवः।

जगाम मनसा देवमीशानं विश्वतोमुखम्॥१०९॥

प्रणम्य शिरसा कृष्णमनुज्ञातो महामुनिः।

जगाम चेप्सितं देशं देवदेवस्य शूलिनः॥११०॥

इस प्रकार वासुदेवके द्वारा कहे जानेपर उन मुनिश्रेष्ठ (मार्कण्डेय) ने विश्वतोमुख देव ईशान (शंकर)-का ध्यान किया। श्रीकृष्णको विनयपूर्वक प्रणामकर उनकी आज्ञा प्राप्तकर महामुनि (मार्कण्डेय) त्रिशूल धारण करनेवाले

देवाधिदेवके अभीष्ट स्थानको चले गये॥१०९-११०॥

य इमं श्रावयेन्नित्यं लिङ्गाध्यायमनुत्तमम्।

शृणुयाद्वा पठेद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥१११॥

श्रुत्वा सकृदपि ह्येतत् तपश्चरणमुत्तमम्।

वासुदेवस्य विप्रेन्द्राः पापं मुञ्चति मानवः ॥११२॥

जपेद् वाहरहर्नित्यं ब्रह्मलोके महीयते।

एवमाह महायोगी कृष्णद्वैपायनः प्रभुः॥११३॥

जो इस श्रेष्ठ लिङ्गाध्यायको सुनेगा, सुनायेगा अथवा पढ़ेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा। विप्रेन्द्रो! वासुदेव के इस श्रेष्ठ तपश्चरणको एक बार भी सुननेवाला मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है अथवा प्रतिदिन इसका निरन्तर जप करनेसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ऐसा महायोगी प्रभु कृष्णद्वैपायनने कहा है॥१११-११३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहनयां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २५ ॥