कूर्म महा पुराण
20 अध्याय
इक्ष्वाकु-वंश-वर्णनके प्रसंगमें श्रीराम-कथाका प्रतिपादन, श्रीरामद्वारा सेतु-
और रामेश्वर-लिंगकी स्थापना, शंकर-पार्वतीका प्रकट होकर रामेश्वर-
लिंगके माहात्म्यको बतलाना, श्रीरामको लव-कुश-पुत्रोंकी प्राप्ति
तथा इक्ष्वाकु-वंशके अन्तिम राजाओंका वंश-वर्णन
सूत उवाच
त्रिधन्वा राजपुत्रस्तु धर्मेणापालयन्महीम्।
तस्य पुत्रोऽभवद् विद्वांस्त्रय्यारुण इति स्मृतः॥ १ ॥
तस्य सत्यव्रतो नाम कुमारोऽभून्महाबलः।
भार्या सत्यधना नाम हरिश्चन्द्रमजीजनत्॥ २॥
हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद् रोहितो नाम वीर्यवान्।
हरितो रोहितस्याथ धुन्धुस्तस्य सुतोऽभवत्॥ ३ ॥
विजयश्च सुदेवश्च धुन्धुपुत्रौ बभूवतुः।
विजयस्याभवत् पुत्रः कारुको नाम वीर्यवान्॥ ४ ॥
कारुकस्य वृकः पुत्रस्तस्माद् बाहुरजायत।
सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद् राजा परमधार्मिकः॥ ५ ॥
द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा।
ताभ्यामाराधितः प्रादादौर्वाग्निर्वरमुत्तमम्॥ ६ ॥
सूतजी बोले-राजपुत्र त्रिधन्वाने पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। उसका एक विद्वान् पुत्र हुआ जो त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसको (त्रय्यारुणको) सत्यव्रत नामका महान् बलवान् पुत्र हुआ। सत्यधना नामक उसकी पत्नीने हरिश्चन्द्रको जन्म दिया। हरिश्चन्द्रको रोहित नामवाला पराक्रमी पुत्र हुआ। रोहितका हरित और उसका पुत्र धुन्धु हुआ। धुन्धुके विजय और सुदेव-ये दो पुत्र हुए। विजयका कारुक नामका वीर पुत्र हुआ। कारुकका पुत्र वृक और उससे बाहु (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ। उस बाहुका पुत्र सगर हुआ जो परम धार्मिक था। सगरकी दो पत्नियाँ थीं प्रभा और भानुमती। और्वाग्निने उन दोनोंसे पूजित होकर उन्हें श्रेष्ठ वर प्रदान किया ॥१-६॥
एकं भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम्।
प्रभा षष्टिसहस्रं तु पुत्राणां जगृहे शुभा॥ ७ ॥
असमञ्जस्य तनयो ांशुमान् नाम पार्थिवः ।
तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात् तु भगीरथः॥ ८॥
येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता।
प्रसादाद् देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ ९॥
(वरके फलस्वरूप) भानुमतीने असमञ्जस नामक पुत्र को ग्रहण किया और कल्याणी प्रभाने साठ हजार पुत्रों को प्राप्त किया। असमञ्जसके पुत्र अंशुमान् नामक राजा थे, उनके पुत्र दिलीप तथा दिलीपसे भगीरथ हुए, जिन्होंने तपस्या करके देवाधिदेव धीमान् महादेवकी कृपासे भागीरथी गङ्गाको (पृथ्वीपर) अवतारित किया॥७-९॥
भगीरथस्य तपसा देवः प्रीतमना हरः।
बभार शिरसा गङ्गां सोमान्ते सोमभूषणः॥१०॥
भगीरथकी तपस्यासे प्रसन्न हुए मनवाले चन्द्रभूषण देव हरने अपने सिरपर स्थित चन्द्रमाके अग्रभाग में गङ्गाको धारण किया ॥१०॥
भगीरथसुतश्चापि श्रुतो नाम बभूव ह।
नाभागस्तस्य दायादः सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत्॥११॥
अयुतायुः सुतस्तस्य ऋतुपर्णस्तु तत्सुतः।
ऋतुपर्णस्य पुत्रोऽभूत् सुदासो नाम धार्मिकः।
सौदासस्तस्य तनयः ख्यातः कल्माषपादकः॥१२॥
भगीरथ का भी श्रुत नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र हुआ नाभाग। उससे सिन्धुद्वीप हुआ। उस सिन्धुद्वीप का पुत्र अयुतायु और उसका पुत्र ऋतुपर्ण हुआ। ऋतुपर्ण का सुदास नामका धार्मिक पुत्र हुआ। उसका पुत्र सौदास हुआ जो कल्माषपाद नामसे विख्यात हुआ ॥११-१२॥
वसिष्ठस्तु महातेजाः क्षेत्रे कल्माषपादके।
अश्मकं जनयामास तमिक्ष्वाकुकुलध्वजम्॥१३॥
अश्मकस्योत्कलायांतुनकुलो नाम पार्थिवः।
स हि रामभयाद् राजा वनं प्राप सुदुःखितः॥१४॥
विभ्रत् स नारीकवचं तस्माच्छतरथोऽभवत्।
तस्माद् बिलिबिलिः श्रीमान् वृद्धशर्मा च तत्सुतः॥१५॥
तस्माद् विश्वसहस्तस्मात् खट्वाङ्ग इति विश्रुतः।
दीर्घबाहुः सुतस्तस्य रघुस्तस्मादजायत॥१६॥
कल्माषपादके क्षेत्रमें महातेजस्वी वसिष्ठने इक्ष्वाकु-वंशके पताकारूप अश्मक नामक पुत्रको उत्पन्न कराया। अश्मककी उत्कला नामक पत्नीसे नकुल नामक राजा उत्पन्न हुआ। वह राजा परशुरामके भयसे अत्यन्त दुःखित होकर वन चला गया। उसने 'नारी-कवच'' धारण कर रखा था। उस (नकुल)-से शतरथ हुआ और उससे श्रीमान् बिलिबिलि उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र वृद्धशर्मा था। उस वृद्धशर्मासे विश्वसह और उसका पुत्र खट्वाङ्ग नामसे विख्यात हुआ। उसका पुत्र दीर्घबाहु और उससे रघु उत्पन्न हुआ॥१३-१६॥
रघोरजः समुत्पन्नो राजा दशरथस्ततः।
रामो दाशरथिवीरो धर्मज्ञो लोकविश्रुतः॥१७॥
भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्च महाबलः।
सर्वे शक्रसमा युद्धे विष्णुशक्तिसमन्विताः।
जज्ञे रावणनाशार्थं विष्णुरंशेन विश्वकृत्॥१८॥
रघुका अज उत्पन्न हुआ और उससे राजा दशरथ हुए। दशरथके पुत्र राम वीर, धर्मज्ञ और लोकमें प्रसिद्ध हुए। दशरथके ही पुत्र भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न भी थे। ये सभी महान् बलशाली, युद्धमें इन्द्रके समान और विष्णुकी शक्तिसे सम्पन्न रावण का विनाश करनेके
लिये विश्वकर्ता विष्णु ही इन लोगोंके रूपमें अंश रूप से प्रकट हुए थे॥१७-१८॥
रामस्य सुभगा भार्या जनकस्यात्मजा शुभा।
सीता त्रिलोकविख्याता शीलौदार्यगुणान्विता॥१९॥
तपसा तोषिता देवी जनकेन गिरीन्द्रजा।
प्रायच्छज्जानकी सीतां राममेवाश्रिता पतिम्॥२०॥
रामकी सौभाग्यशालिनी कल्याणी पत्नी जनक की पुत्री सीता थीं। वे शील एवं उदारता आदि गुणों से सम्पन्न और तीनों लोकोंमें विख्यात थीं। जनकके द्वारा तपस्यासे संतुष्ट की गयी गिरिराजपुत्री पार्वतीने उन्हें जानकी सीताको प्रदान किया। सीताने रामको ही पति बनाया॥१९-२०॥
प्रीतश्च भगवानीशस्त्रिशूली नीललोहितः।
प्रददौ शत्रुनाशार्थं जनकायाद्भुतं धनुः॥२१॥
स राजा जनको विद्वान् दातुकामः सुतामिमाम्।
अघोषयदमित्रनो लोकेऽस्मिन् द्विजपुंगवाः ॥ २२॥
इदं धनुः समादातुं यः शक्नोति जगत्त्रये।
देवो वा दानवो वापि स सीतां लब्धुमर्हति ॥२३॥
त्रिशूल धारण करनेवाले, नीललोहित भगवान् ईश (शंकर)-ने प्रसन्न होकर शत्रुओंके विनाशके लिये जनकको अद्भुत धनुष प्रदान किया था। श्रेष्ठ द्विजो! उस विद्वान् शत्रुनाशक राजा जनकने इस कन्याका दान करनेकी इच्छासे संसारमें यह घोषणा करवायी कि देवता
या दानव जो कोई भी इस धनुषको उठानेमें समर्थ होगा, वह सीताको प्राप्त कर सकता है॥२१-२३॥
विज्ञाय रामो बलवान् जनकस्य गृहं प्रभुः।
भञ्जयामास चादाय गत्वासौ लीलयैव हि ॥२४॥
उद्ववाह च तां कन्यां पार्वतीमिव शंकरः।
रामः परमधर्मात्मा सेनामिव च षण्मुखः॥२५॥
ऐसा जानकर बलवान् प्रभु रामने जनकके घर जाकर उस धनुषको उठाकर खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर परम धर्मात्मा रामने उस कन्याका उसी प्रकार पाणिग्रहण किया, जैसे शंकरने पार्वतीका और कार्तिकेय ने सेना (देवसेना)- -का पाणिग्रहण किया ॥ २४-२५॥
ततो बहुतिथे काले राजा दशरथः स्वयम्।
रामं ज्येष्ठं सुतं वीरं राजानं कर्तुमारभत्॥२६॥
तस्याथ पत्नी सुभगा कैकेयी चारुभाषिणी।
निवारयामास पतिं प्राह सम्भ्रान्तमानसा ॥२७॥
मत्सुतं भरतं वीरं राजानं कर्तुमर्हसि।
पूर्वमेव वरो यस्माद् दत्तो मे भवता यतः॥२८॥
तदनन्तर बहुत दिन बीत जानेपर राजा दशरथ ने स्वयं अपने बड़े पुत्र वीर रामको युवराज बनानेका कार्य आरम्भ किया। तब उनकी सौभाग्यशालिनी मधुरभाषिणी कैकेयी नामक पत्नीने भ्रान्तमन होकर पतिको (राम के राज्याभिषेक से) रोका और कहा कि मेरे वीर पुत्र
भरतको राजा बनायें, क्योंकि आपने पहले मुझे वर दे रखा है॥२६-२८॥
स तस्या वचनं श्रुत्वा राजा दुःखितमानसः ।
बाढमित्यब्रवीद्वाक्यं तथा रामोऽपि धर्मवित्॥२९॥
प्रणम्याथ पितुः पादौ लक्ष्मणेन सहाच्युतः।
ययौ वनं सपत्नीकः कृत्वा समयमात्मवान्॥३०॥
संवत्सराणां चत्वारि दश चैव महाबलः।
उवास तत्र मतिमान् लक्ष्मणेन सह प्रभुः॥३१॥
कदाचिद् वसतोऽरण्ये रावणो नाम राक्षसः।
परिव्राजकवेषेण सीतां हृत्वा ययौ पुरीम्॥३२॥
उसका वचन सुनकर उस राजाने अत्यन्त दुःखित मनसे कहा-'अच्छा, ऐसा ही हो'। तब धर्मको जाननेवाले आत्मवान् अच्युत राम भी पिताके चरणोंमें प्रणामकर (वनवासकी) प्रतिज्ञा कर लक्ष्मणके साथ सपत्नीक वनको चले गये। बुद्धिमान् तथा महाबलवान् प्रभु (श्रीराम) भी चौदह वर्षतक लक्ष्मणके साथ वहाँ (वनमें) रहे। वनमें निवास करते समय कभी रावण नामका राक्षस संन्यासीका वेष धारणकर सीताका हरण कर लिया और उन्हें अपनी पुरी (लंका)-में ले गया॥ २९-३२॥
अदृष्ट्वा लक्ष्मणो रामः सीतामाकुलितेन्द्रियौ।
दुःखशोकाभिसंतप्तौ बभूवतुररिंदमौ ॥ ३३॥
शत्रुनाशक राम और लक्ष्मण सीताको न देखकर दुःख एवं शोकसे अत्यन्त संतप्त हो गये और उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं ॥ ३३ ॥
ततः कदाचित् कपिना सुग्रीवेण द्विजोत्तमाः।
वानराणामभूत् सख्यं रामस्याक्लिष्टकर्मणः॥३४॥
सुग्रीवस्यानुगो वीरो हनुमान् नाम वानरः।
वायुपुत्रो महातेजा रामस्यासीत् प्रियः सदा॥३५॥
स कृत्वा परमं धैर्यं रामाय कृतनिश्चयः।
आनयिष्यामि तां सीतामित्युक्त्वा विचचारह॥३६॥
महीं सागरपर्यन्तां सीतादर्शनतत्परः।
जगाम रावणपुरीं लङ्कां सागरसंस्थिताम्॥३७॥
तत्राथ निर्जने देशे वृक्षमूले शुचिस्मिताम्।
अपश्यदमलां सीतां राक्षसीभिः समावृताम्॥३८॥
अश्रुपूर्णेक्षणां हृद्यां संस्मरन्तीमनिन्दिताम्।
राममिन्दीवरश्याम लक्ष्मणं चात्मसंस्थितम्॥३९॥
द्विजोत्तमो! यथासमय अक्लिष्टकर्मा रामकी कपि सुग्रीव तथा वानरोंसे मित्रता हो गयी। वायुपुत्र महातेजस्वी वीर हनुमान् नामक वानर सुग्रीवके अनुगामी और सदा रामके प्रिय थे। वे परम धैर्य धारणकर 'उन सीता को लाऊँगा' इस प्रकार रामसे प्रतिज्ञापूर्वक कहकर सीता को देखने के लिये तत्पर हो गये तथा सागरपर्यन्त सारी पृथ्वीपर विचरण करने लगे। (इस प्रकार सीता को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते) सागर में बसी हुई रावण की पुरी लंका में गये। वहाँ उन्होंने राक्षसियोंसे घिरी हुई पवित्र, अश्रुपूर्ण आँखोंवाली, अनिन्दित, रमणीय तथा पवित्र सीता को निर्जन देश में एक वृक्ष के नीचे स्थित देखा। वहाँ भगवती सीता नीलकमलके समान श्यामवर्णवाले राम तथा आत्मसंयमी लक्ष्मणका स्मरण कर रही थीं॥ ३४-३९॥
निवेदयित्वा चात्मानं सीतायै रहसि स्वयम्।
असंशयाय प्रददावस्यै रामागुलीयकम्॥४०॥
एकान्तमें सीताको स्वयं अपना परिचय देकर उनका संदेह मिटानेके लिये उन्होंने (श्रीहनुमान्ने) रामकी अंगूठी उन्हें प्रदान की॥ ४० ॥
दृष्ट्वाङ्गुलीयकं सीता पत्युः परमशोभनम्।
मेने समागतं रामं प्रीतिविस्फारितेक्षणा॥४१॥
समाश्वास्य तदा सीतां दृष्ट्वा रामस्य चान्तिकम्।
नयिष्ये त्वां महाबाहुरुक्त्वा रामं ययौ पुनः॥४२॥
निवेदयित्वा रामाय सीतादर्शनमात्मवान्।
तस्थौ रामेण पुरतो लक्ष्मणेन च पूजितः॥४३॥
पतिकी परम सुन्दर अँगूठीको देखकर प्रीति के कारण विस्फारित नेत्रोंवाली सीताने रामको (ही) आया हुआ माना। तब सीताको देखकर उन्होंने आश्वासन दिया और कहा–'मैं आपको रामके पास ले चलूँगा।' ऐसा कहकर महाबाहु (हनुमान्) पुनः रामके पास चले आये। आत्मवान् (हनुमान्) रामसे सीता-दर्शनकी बात बताकर सामने खड़े हो गये। राम-लक्ष्मणने उनको साधुवादसे सत्कृत किया॥ ४१-४३॥
ततः स रामो बलवान् सार्धं हनुमता स्वयम्।
लक्ष्मणेन च युद्धाय बुद्धिं चक्रे हि रक्षसाम्॥४४॥
कृत्वाथ वानरशतैर्लङ्कामार्ग महोदधेः।
सेतुं परमधर्मात्मा रावणं हतवान् प्रभुः॥४५॥
सपत्नीकं च ससुतं सभ्रातृकमरिंदमः।
आनयामास तां सीतां वायुपुत्रसहायवान्॥४६॥
तदनन्तर बलवान् रामने हनुमान् तथा लक्ष्मण के साथ राक्षसोंसे स्वयं युद्ध करनेका निश्चय किया। और सैकड़ों वानरोंद्वारा महासमुद्रमें लंका जानेके लिये मार्गके रूपमें पुलका निर्माण किया गया तथा उसी पुलके सहारे महासमुद्रको पारकर शत्रुहन्ता परम धर्मात्मा प्रभु (श्रीराम)-ने वायुपुत्र हनुमान्की सहायतासे पत्नियों, पुत्रों तथा भाइयोंसहित रावणको मार डाला और भगवती सीताको वापस ले आये॥ ४४-४६॥
सेतुमध्ये महादेवमीशानं कृत्तिवाससम्।
स्थापयामास लिङ्गस्थं पूजयामास राघवः॥४७॥
तस्य देवो महादेवः पार्वत्या सह शंकरः।
प्रत्यक्षमेव भगवान् दत्तवान् वरमुत्तमम्॥४८॥
यत्त्वया स्थापितं लिङ्गंद्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।
महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु॥४९॥
अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ।
दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः॥५०॥
यावत् स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी।
यावत् सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः॥५१॥
स्नानं दानं जपः श्राद्धं भविष्यत्यक्षयं कृतम्।
स्मरणादेव लिङ्गस्य दिनपापं प्रणश्यति॥५२॥
राघवने सेतुके मध्यमें चर्माम्बर धारण करनेवाले महादेव ईशानकी लिङ्गरूपमें प्रतिष्ठाकर उनकी पूजा की। (इस रामेश्वर-प्रतिष्ठाके समय) पार्वतीसहित महादेव भगवान् शंकरदेवने प्रत्यक्ष रूपमें श्रेष्ठ वर प्रदान करते हुए श्रीरामसे कहा-'जो द्विजाति तुम्हारे द्वारा स्थापित इस (रामेश्वर) लिंगका दर्शन करेंगे उनके बड़े-से-बड़े पाप नष्ट हो जायेंगे। महासमुद्रमें स्नान करनेवाले के अन्य जो भी पाप (अर्थात् उपपातक आदि) हैं वे इस लिंगके दर्शनमात्रसे ही नष्ट हो जायेंगे, इसमें संदेह नहीं है। जबतक पर्वत स्थित रहेंगे, जबतक यह पृथ्वी रहेगी और जबतक यह सेतु रहेगा, तबतक मैं गुप्तरूपसे यहाँ प्रतिष्ठित रहूँगा। यहाँ किया गया स्नान, दान, जप तथा श्राद्ध अक्षय होगा। इस (रामेश्वर) लिंगके स्मरण करने मात्रसे ही दिनभरका पाप नष्ट हो जायगा ॥ ४७-५२॥
इत्युक्त्वा भगवाञ्छम्भुः परिष्वज्य तु राघवम्।
सनन्दी सगणो रुद्रस्तत्रैवान्तरधीयत॥५३॥
रामोऽपि पालयामास राज्यं धर्मपरायणः।
अभिषिक्तो महातेजा भरतेन महाबलः॥५४॥
ऐसा कहकर भगवान् शम्भुने रघुवंशी रामका आलिंगन किया और नन्दी तथा अपने गणोंके साथ वे रुद्र (शम्भु) वहीं अन्तर्धान हो गये। भरतके द्वारा अभिषिक्त होकर महाबली, महातेजस्वी तथा धर्मपरायण रामने राज्यका पालन किया॥५३-५४॥
विशेषाद् ब्राह्मणान् सर्वान् पूजयामास चेश्वरम्।
यज्ञेन यज्ञहन्तारमश्वमेधेन शंकरम्॥५५॥
विशेष रूपसे उन्होंने सभी ब्राह्मणोंकी पूजा की और अश्वमेध यज्ञके द्वारा यज्ञहन्ता* ईश्वर शंकर की अर्चना की॥५५॥
रामस्य तनयो जज्ञे कुश इत्यभिविश्रुतः।
लवश्च सुमहाभागः सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः॥५६॥
अतिथिस्तु कुशाजज्ञे निषधस्तत्सुतोऽभवत्।
नलस्तु निषधस्याभून्नभस्तस्मादजायत॥५७॥
नभसः पुण्डरीकाख्यः क्षेमधन्वा च तत्सुतः।
तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान्॥५८॥
अहीनगुस्तस्य सुतो सहस्वांस्तत्सुतोऽभवत्।
तस्माच्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्तु तत्सुतः॥५९॥
तारापीडाच्चन्द्रगिरि नुवित्तस्ततोऽभवत् ।
श्रुतायुरभवत् तस्मादेते इक्ष्वाकुवंशजाः।
सर्वे प्राधान्यतः प्रोक्ताः समासेन द्विजोत्तमाः॥६०॥
रामके 'कुश' नामसे विख्यात तथा सुन्दर महान् भाग्यशाली, सभी तत्त्वार्थोंको जाननेवाले बुद्धिमान् 'लव' नामसे विख्यात दो पुत्र हुए। कुशसे अतिथि उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र निषध हुआ। निषधका पुत्र नल और उसका पुत्र नभस हुआ। नभससे पुण्डरीक नामवाला
पुत्र हुआ और क्षेमधन्वा उसका पुत्र था। उस क्षेमधन्वा का देवानीक नामक वीर एवं प्रतापी पुत्र हुआ। उस (देवानीक)-का पुत्र अहीनगु और उसका पुत्र सहस्वान् हुआ। उससे चन्द्रावलोक तथा उसका पुत्र तारापीड हुआ। तारापीड से चन्द्रगिरि तथा चन्द्रगिरिका भानुवित्त हुआ। उस (भानुवित्त)-से श्रुतायु नामक पुत्र हुआ। ये सभी इक्ष्वाकुके वंशज हैं। द्विजोत्तमो! संक्षेपमें इनमें प्रधान-प्रधान (राजाओं)-को बताया गया है॥५६-६०॥
य इमं शृणुयान्नित्यमिक्ष्वाकोवंशमुत्तमम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो स्वर्गलोके महीयते॥६१॥
जो इस श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशके वर्णनको सुनेगा, वह सभी पापों से निर्मुक्त होकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होगा॥६१ ॥
Summary of chapter 20 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta turns to the royal solar lineage, beginning with Vaivasvata Manu, the son of Vivasvān and Saṁjñā. Vaivasvata Manu performed a sacrifice to obtain offspring, resulting in the birth of his daughter Ilā and nine sons: Ikshvāku, Nabhaga, Dhṛshṭa, Saryāti, Narishyanta, Nābhāga, Disshṭa, Karūsha, and Prshadhra. Ilā, transformed into a man named Sudyumna due to a divine curse in Śiva's forest, ruled wisely and fathered Purūravas through Budha. The chapter outlines the initial expansion of solar rulers across various earthly kingdoms established by Manu's valiant sons.