28 अध्याय

कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिव-पूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन,

व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना

और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा

व्यास उवाच

तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।

साधयन्ति नरा नित्यं तमसा व्याकुलीकृताः॥१॥

कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयं तथा।

अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः॥२॥

अधार्मिका अनाचारा महाकोपाल्पचेतसः।

अनृतं वदन्ति ते लुब्धास्तिष्ये जाताः सुदुःप्रजाः॥३॥

दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः।

विप्राणां कर्मदोषैश्च प्रजानां जायते भयम्॥४॥

नाधीयते कलौ वेदान् न यजन्ति द्विजातयः।

यजन्त्यन्यायतो वेदान् पठन्ते चाल्पबुद्धयः॥५॥

व्यासजी ने कहा-कलियुगमें मनुष्य सदा तमोगुण से आवृत रहते हैं, इसीलिये माया, असूया (गुणों में दोषदर्शन) तथा तपस्वियोंके वधमें ही लगे रहते हैं। कलियुग में प्राणहन्ता रोग, निरन्तर भूखका कष्ट, अवर्षण का भयंकर भय तथा देशोंका उलट-फेर होता रहता है। कलियुग में उत्पन्न हुए दुष्ट मनुष्य अधार्मिक, सदाचार से रहित, अत्यन्त क्रोधी, दुर्बल चित्तवाले तथा लोभी होते हैं और झूठ बोलते हैं। ब्राह्मणोंके असत् उद्देश्य, असत् अध्ययन, दुराचार तथा दूषित शास्त्रोंके अभ्यास और बुरे कर्मके दोषसे प्रजामें भय उत्पन्न होता है। द्विजाति लोग कलियुगमें वेदोंका अध्ययन नहीं करते और न यज्ञ ही करते हैं। अल्प बुद्धिवाले (यज्ञ करनेकी योग्यता से रहित) लोग यज्ञ करते हैं और अन्यायपूर्वक वेदों को पढ़ते हैं ॥१-५॥

शूद्राणां मन्त्रयौनैश्च सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह।

भविष्यति कलौ तस्मिञ् शयनासनभोजनैः॥६॥

राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति च।

भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायेते नरेश्वर॥७॥

कलियुगमें शूद्रोंका ब्राह्मणों के साथ मन्त्र, योनि, शयन, आसन और भोजनके द्वारा सम्बन्ध हो जायगा। नरेश्वर! अधिकांश राजा शूद्र होंगे, जो वस्तुतः राजा होनेके लिये अयोग्य होंगे; वे ब्राह्मणोंको पीड़ित करेंगे। भ्रूणहत्या और वीरहत्या प्रचलित हो जायगी॥६-७॥

स्नानं होमं जपं दानं देवतानां तथार्चनम्।

अन्यानि चैव कर्माणि न कुर्वन्ति द्विजातयः ॥ ८ ॥

विनिन्दन्ति महादेवं ब्राह्मणान् पुरुषोत्तमम्।

आम्नायधर्मशास्त्राणि पुराणानि कलौ युगे॥ ९ ॥

कुर्वन्त्यवेददृष्टानि कर्माणि विविधानि तु।

स्वधर्मेऽभिरुचि व ब्राह्मणानां प्रजायते॥१०॥

(कलियुगमें) द्विजाति लोग स्नान, होम, जप, दान, देवताओं का पूजन तथा अन्य (शुभ) कर्मोंको भी नहीं करेंगे। कलियुगमें महादेव शंकर, पुरुषोत्तम विष्णु, ब्राह्मणों, वेदों, धर्मशास्त्रों और पुराणोंकी लोग निन्दा करते हैं। (सभी लोग) वेदमें अविहित अनेक प्रकार के कर्मों को करते हैं तथा ब्राह्मणोंकी अपने धर्ममें रुचि नहीं रहती ॥८-१०॥

कुशीलचर्याः पाषण्डैर्वृथारूपैः समावृताः।

बहुयाचनको लोको भविष्यति परस्परम्॥११॥

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।

प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे॥१२॥

शुक्लदन्ता जिनाख्याश्च मुण्डा: काषायवाससः ।

शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥१३॥

शस्यचौरा भविष्यन्ति तथा चैलाभिमर्षिणः।

चौराश्चौरस्य हर्तारो हर्तुहर्ता तथापरः॥१४॥

दुःखप्रचुरताल्पायुर्वेहोत्सादः सरोगता।

अधर्माभिनिवेशित्वात् तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्॥१५॥

लोग कुत्सित आचारवाले एवं व्यर्थके पाखण्डों से युक्त हो जायेंगे और संसार परस्परमें बहुत याचना करनेवाला हो जायगा। कलियुगमें जनपद अन्नविक्रयी, चौराहे वेद के विक्रयस्थल तथा स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिवाली हो जायँगी। युगका अन्त आनेपर सफेद दाँतोंवाले, जिन नामवाले, मुण्डित, काषायवस्त्रधारी शूद्र पर-धर्माचरण करने लगेंगे। (लोग) अनाज और वस्त्रकी चोरी करनेवाले होंगे। चोर लोग चोरोंकी ही चोरी करेंगे और दूसरे चोर उस चोरका चुरायेंगे। दुःखकी अधिकता होगी, अल्प आयु होगी, देहमें आलस्य तथा रोग रहेगा। अधर्म में विशेष प्रवृत्तिके कारण कलियुगमें सभी व्यवहार तामस होंगे॥११-१५॥

काषायिणोऽथ निर्ग्रन्थास्तथा कापालिकाश्च ये।

वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे॥१६॥

आसनस्थान् द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः ।

ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा राजोपजीविनः ।। १७ ।।

उच्चासनस्थाः शूद्रास्तु द्विजमध्ये परंतप।

ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालबलेन तु॥१८॥

पुष्पैश्च हसितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैर्द्विजाः।

शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः ॥१९॥

न प्रेक्षन्तेऽर्चितांश्चापि शूद्रा द्विजवरान् नृप।

सेवावसरमालोक्य द्वारि तिष्ठन्ति च द्विजाः॥२०॥

कुछ लोग काषायवस्त्र धारण करनेवाले, कुछ निर्ग्रन्थ (यज्ञोपवीत, शिखा आदिसे विहीन पंथवाले), कापालिक', वेदविक्रयी तथा कुछ लोग तीर्थविक्रयी हो जायँगे। (कलियुगमें) राजाका संरक्षण प्राप्त कर अल्पबुद्धिवाले शूद्र आसनपर स्थित द्विजोंको देखकर नहीं चलते (द्विजोचित व्यवहार नहीं करते) तथा श्रेष्ठ द्विजोंको प्रताड़ित करते हैं। परंतप! कलियुगमें समय के प्रभावसे द्विजोंके मध्यमें शूद्र उच्च आसनपर बैठते हैं, किंतु राजा जानकर भी उन्हें दण्ड नहीं देता। अल्प ज्ञान, अल्प भाग्य तथा अल्प बलवाले द्विज लोग पुष्पों के मनोविनोदके साधन 'हास' आदिसे तथा अन्य माङ्गलिक पदार्थोंसे शूद्रोंकी पूजा करते हैं। राजन् ! शूद्र लोग पूजित श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखतेतक नहीं और द्विज सेवाके अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उनके दरवाजेपर

खड़े रहते हैं॥१६-२०॥

वाहनस्थान् समावृत्य शूद्राञ् शूद्रोपजीविनः।

सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ॥२१॥

अध्यापयन्ति वैवेदाञ्शूद्राशूद्रोपजीविनः ।

पठन्ति वैदिकान् मन्त्रान् नास्तिक्यं घोरमाश्रिताः॥२२॥

तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः।

यतयश्च भविष्यन्ति शतशोऽथ सहस्त्रशः॥ २३॥

नाशयन्ति ह्यधीतानि नाधिगच्छन्ति चानघ ।

गायन्ति लौकिकैर्गानैर्दैवतानि नराधिप । २४ ।।

कलियुगमें शूद्रसे जीविका पानेवाले ब्राह्मण वाहन में स्थित शूद्रोंको घेरकर स्तुतियोंद्वारा उनकी प्रशंसा करते हैं और सेवा करते हैं। शूद्रोंसे जीविका प्राप्त करनेवाले (ब्राह्मण) शूद्रोंको वेद पढ़ाते हैं। घोर नास्तिकतावादी (शूद्र) वैदिक मन्त्रोंको पढ़ते हैं। जिनकी श्रेष्ठ द्विज के रूपमें समाजमें मान्यता होती है, वे लोग (अपने) तप एवं यज्ञके फलोंका विक्रय करनेवाले होते हैं। (आलस्य या प्रतिष्ठाके लिये) सैकड़ों एवं हजारों की संख्यामें लोग संन्यासी हो जायँगे। हे निष्पाप राजन्! (कलियुगमें लोग) पढ़े हुएको भूल जाते हैं, अध्ययन के फल ज्ञानके लिये उत्सुक नहीं रहते। (वे) लौकिक गीतोंसे देवताओंकी स्तुति करते हैं ॥ २१-२४॥

वामपाशुपताचारास्तथा वै पाञ्चरात्रिकाः।

भविष्यन्ति कलौ तस्मिन् ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा ॥ २५॥

ज्ञानकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।

कीटमूषकसश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान् ॥ २६॥

कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां कुलेषु वै।

दधीचशापनिर्दग्धाः पुरा दक्षाध्वरे द्विजाः ॥२७॥

निन्दन्ति च महादेवं तमसाविष्टचेतसः।

वृथा धर्मं चरिष्यन्ति कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥२८॥

ये चान्ये शापनिर्दग्धा गौतमस्य महात्मनः ।

सर्वे तेच भविष्यन्ति ब्राह्मणाद्याः स्वजातिषु॥२९॥

कलियुगमें ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वाममार्गी, पाशुपताचारी तथा पाञ्चरात्रिक हो जायँगे। ज्ञान तथा कर्मका लोप हो जाने और लोगोंके निष्क्रिय हो जानेपर कीड़े, चूहे तथा सर्प लोगोंको कष्ट पहुँचायेंगे। प्राचीन कालमें दक्ष प्रजापतिके यज्ञमें दधीचके शापसे दग्ध हुए द्विज ब्राह्मणोंके कुलमें उत्पन्न होंगे। कलियुगके अन्त समय में तमोगुण से व्याप्त मनवाले लोग महादेव की निन्दा करेंगे और व्यर्थ के धर्मों (धर्माभासों)-का आचरण करेंगे तथा जो दूसरे महात्मा गौतमके शापसे दग्ध हुए लोग थे, वे सभी ब्राह्मण आदि अपनी-अपनी जातियों में उत्पन्न होंगे॥ २५-२९ ॥

विनिन्दन्ति हृषीकेशं ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ।

वेदबाह्यव्रताचारा दुराचारा वृथाश्रमाः॥३०॥

वेदोंमें निषिद्ध व्रत और आचारका पालन करनेवाले, दुराचारी तथा व्यर्थका श्रम (धर्म-मोक्षविरोधी अर्थमात्र साधक काम अथवा दुर्जनतावश लोगोंको पीड़ा देनेवाले काम) करनेवाले लोग हृषीकेश (श्रीविष्णु) तथा ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंकी निन्दा करेंगे॥३०॥

मोहयन्ति जनान् सर्वान् दर्शयित्वा फलानि च।

तमसाविष्टमनसो वैडालवृत्तिकाधमाः॥ ३१॥

कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वरः परः।

न देवता भवेन्नृणां देवतानां च दैवतम् ॥३२॥

करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहितः ।

श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया॥३३॥

उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंज्ञितम्।

सर्ववेदान्तसारं हि धर्मान् वेदनिदर्शितान्॥ ३४॥

ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनोपचारतः।

विजित्य कलिजान्दोषान् यान्ति ते परमं पदम्॥ ३५॥

तमोगुणसे आविष्ट मनवाले तथा दिखावटी धर्माचरण करनेवाले अधम लोग अनेक प्रलोभनोंको दिखाकर सब लोगोंको मोहित करेंगे। कलियुगमें लोकोंके ईश्वर, देवताओंके भी देव श्रेष्ठ महादेव रुद्र मनुष्योंकी दृष्टि में देव (आराध्य) नहीं रहेंगे, पर भक्तोंके कल्याणकी कामना से तथा श्रौत एवं स्मार्त धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये नीललोहित शंकर अनेक अवतार धारण करेंगे। वे समस्त वेदान्त के साररूप उस ब्रह्मसंज्ञक ज्ञानको और वेदमें बताये गये धर्मोंको शिष्योंको प्रदान करेंगे। जो ब्राह्मण जिस-किसी भी उपायसे उन (शंकर)-की सेवा करेंगे, वे कलि के दोषोंको जीतकर परमपदको प्राप्त करेंगे। ३१-३५॥

अनायासेन सुमहत् पुण्यमाप्नोति मानवः।

अनेकदोषदुष्टस्य कलेरेष महान् गुणः ॥३६॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्राप्य माहेश्वरं युगम्।

विशेषाद् ब्राह्मणो रुद्रमीशानं शरणं व्रजेत्॥३७॥

ये नमन्ति विरूपाक्षमीशानं कृत्तिवाससम्।

प्रसन्नचेतसो रुद्रं ते यान्ति परमं पदम्॥३८॥

यथा रुद्रनमस्कारः सर्वकर्मफलो ध्रुवम्।

अन्यदेवनमस्कारान्न तत्फलमवाप्नुयात्॥३९॥

एवंविधे कलियुगे दोषाणामेकशोधनम्।

महादेवनमस्कारो ध्यानं दानमिति श्रुतिः॥४०॥

अनेक दोषोंसे दूषित कलिका यह महान् गुण है कि इसके युगमें मनुष्य अनायास महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये महेश्वर-सम्बन्धी युग प्राप्तकर विशेष रूप से ब्राह्मणों को सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे ईशान रुद्रकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। जो प्रसन्न-मनसे विरूपाक्ष, कृत्तिवासा, ईशान रुद्रको नमस्कार करते हैं, वे परमपदको प्राप्त करते हैं। जिस प्रकार रुद्रको किया गया नमस्कार निश्चितरूपसे सभी कामनाओंको पूर्ण करता है, उस प्रकार अन्य देवोंको नमस्कार करनेसे वैसा फल नहीं होता। इस प्रकारके कलियुगमें दोषोंको दूर करनेका एकमात्र उपाय है महादेवको नमस्कार, उनका ध्यान और शास्त्रानुसार दान-ऐसा वेदका मत है ॥ ३६-४०॥

तस्मादनीश्वरानन्यान् त्यक्त्वा देवं महेश्वरम्।

समाश्रयेद् विरूपाक्षं यदीच्छेत् परमं पदम्॥४१॥

नार्चयन्तीह ये रुद्रं शिवं त्रिदशवन्दितम्।

तेषां दानं तपो यज्ञो वृथा जीवितमेव च॥४२॥

इसलिये यदि परमपद प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो अन्य अनीश्वरों (महेश्वरकी कृपासे ही शक्ति प्राप्त करनेवाले अन्य देवों)-को छोड़कर एकमात्र देव विरूपाक्ष महेश्वरका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। जो देवताओंके द्वारा वन्दित रुद्र शिवकी अर्चना नहीं करते हैं, उनका किया हुआ दान, तप, यज्ञ और जीवन व्यर्थ ही होता है। ४१-४२।।

नमो रुद्राय महते देवदेवाय शूलिने।

त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय योगिनां गुरवे नमः॥४३॥

त्रिशूल धारण करनेवाले देवाधिदेव महान् रुद्र को नमस्कार है। त्र्यम्बक, त्रिलोचन, योगियोंके गुरुके लिये नमस्कार है॥ ४३ ॥

नमोऽस्तु वामदेवाय महादेवाय वेधसे।

शम्भवे स्थाणवे नित्यं शिवाय परमेष्ठिने।

नमः सोमाय रुद्राय महाग्रासाय हेतवे॥४४॥

महादेव, वेधा, वामदेव, शम्भु, स्थाणु, परमेष्ठी शिवको नित्य नमस्कार है। सोम, रुद्र, महाग्रास (महाप्रलयमें समस्त प्रपञ्चको अपनेमें लीन कर लेनेवाले)

तथा कारणरूपको नमस्कार है।। ४४ ॥

प्रपद्येऽहं विरूपाक्षं शरण्यं ब्रह्मचारिणम्।

महादेवं महायोगमीशानं चाम्बिकापतिम्॥४५॥

योगिनां योगदातारं योगमायासमावृतम्।

योगिनां गुरुमाचार्यं योगिगम्यं पिनाकिनम्॥४६॥

संसारतारणं रुद्रं ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽधिपम्।

शाश्वतं सर्वगं शान्तं ब्रह्मण्यं ब्राह्मणप्रियम्॥४७॥

कपर्दिनं कालमूर्तिममूर्ति परमेश्वरम्।

एकमूर्तिं महामूर्ति वेदवेद्यं दिवस्पतिम्॥४८॥

नीलकण्ठं विश्वमूर्ति व्यापिनं विश्वरेतसम्।

कालाग्निं कालदहनं कामदं कामनाशनम्॥४९॥

नमस्ये गिरिशं देवं चन्द्रावयवभूषणम्।

विलोहितं लेलिहानमादित्यं परमेष्ठिनम्।

उग्रं पशुपतिं भीमं भास्करं तमसः परम्॥५०॥

मैं विरूपाक्ष, शरण ग्रहण करने योग्य, ब्रह्मचारी, महायोगस्वरूप, ईशान तथा अम्बिकापति महादेव की शरण ग्रहण करता हूँ। योगियोंको योग प्रदान करनेवाले, योगमायासे आवृत, योगियोंके गुरु, आचार्य, योगिगम्य पिनाकी, संसारसे उद्धार करनेवाले, रुद्र, ब्रह्मा, ब्रह्माधिपति, शाश्वत, सर्वव्यापी, शान्त, ब्राह्मणोंके रक्षक तथा ब्राह्मणप्रिय, जटाधारी, कालमूर्ति, अमूर्ति, एकमूर्ति, महामूर्ति, वेदवेद्य और धुलोकके स्वामी परमेश्वर तथा नीलकण्ठ, विश्वमूर्ति, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले, विश्वरेता (जिनके वीर्यसे ही समस्त विश्वकी उत्पत्ति हुई है), कालाग्निरूप, काल का दहन करनेवाले, कामनाओंको प्रदान करनेवाले एवं कामदेवका नाश करनेवाले, चन्द्रमाके अवयवको अर्थात् द्वितीयाके चन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले देव गिरिश, विशेषरूपसे रक्तवर्णवाले, ग्रास बना लेनेवाले (महाप्रलयमें सबको अपने उदरमें डाल लेनेवाले), आदित्य, उग्र, पशुपति, भीम, भास्कर तथा अन्धकार से परे रहनेवाले परमेष्ठीको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ४५-५०॥

इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः।

अतीतानागतानां वै यावन्मन्वन्तरक्षयः॥५१॥

मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि वै।

व्याख्यातानिन संदेहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥५२॥

मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु वै।

तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत॥५३॥

मन्वन्तरकी समाप्तिपर्यन्त बीते हुए तथा भविष्य में आनेवाले युगों (कलियुगों) -का संक्षेपमें यह लक्षण बताया गया है, निःसंदेह एक मन्वन्तर (-के कथन)-से सभी मन्वन्तरों तथा एक कल्प (-के कथन)-से अन्य कल्पों का भी कथन हो गया। बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरों में समान नाम एवं रूपवाले सभी अधिष्ठाता (देवता, सतर्षि तथा इन्द्र आदि) होते हैं ॥५१-५३॥

एवमुक्तो भगवता किरीटी श्वेतवाहनः।

बभार परमां भक्तिमीशानेऽव्यभिचारिणीम्॥५४॥

नमश्चकार तमृषि कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।

सर्वज्ञं सर्वकर्तारं साक्षाद् विष्णुं व्यवस्थितम्॥५५॥

भगवान् (व्यास)-के ऐसा कहनेपर श्वेतवाहन किरीटधारी (अर्जुन)-ने ईशान (भगवान् शंकर)-में निश्चल परम भक्ति धारण की। उन्होंने उन सर्वज्ञ, सब

कुछ करनेवाले, साक्षात् विष्णुके रूपमें अवस्थित प्रभु कृष्णद्वैपायन ऋषिको नमस्कार किया॥५४-५५॥

तमुवाच पुनर्व्यासः पार्थं परपुरञ्जयम्।

कराभ्यां सुशुभाभ्यां च संस्पृश्य प्रणतं मुनिः ॥५६॥

शत्रुके नगरको जीतनेवाले तथा विनीत उन पार्थ (अर्जुन)-को व्यासमुनिने अपने दोनों सुन्दर, शुभ हाथोंसे स्पर्श करते हुए पुनः कहा ॥५६॥

धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि त्वादृशोऽन्यो न विद्यते।

त्रैलोक्ये शंकरे नूनं भक्तः परपुरञ्जय॥५७॥

दृष्टवानसि तं देवं विश्वाक्षं विश्वतोमुखम्।

प्रत्यक्षमेव सर्वेशं रुद्रं सर्वजगद्गुरुम्॥५८॥

ज्ञानं तदैश्वरं दिव्यं यथावद् विदितं त्वया।

स्वयमेव हृषीकेशः प्रीत्योवाच सनातनः॥५९॥

गच्छ गच्छ स्वकं स्थानं न शोकं कर्तुमर्हसि।

व्रजस्व परया भक्त्या शरण्यं शरणं शिवम्॥६०॥

शत्रुके नगरको जीतनेवाले (अर्जुन!) निश्चय ही तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान शंकरका भक्त कोई दूसरा नहीं है, तुम धन्य हो, अनुगृहीत (भगवान् शंकर के अनुग्रहके भाजन) हो। तुमने सभी ओर नेत्र तथा सभी ओर मुखवाले, सारे संसारके गुरु, सर्वेश, रुद्रदेव का प्रत्यक्ष ही दर्शन किया है। ईश्वर (शंकर)-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान तुम्हें यथार्थरूपसे विदित है। स्वयं सनातन हृषीकेशने प्रीतिपूर्वक तुम्हें सब बतलाया था। शीघ्र अपने स्थानको जाओ, तुम शोक करने योग्य नहीं हो। शरणागतवत्सल शिवकी परा भक्तिकी शरण ग्रहण करो॥५७-६०॥

एवमुक्त्वा स भगवाननुगृह्यार्जुनं प्रभुः।

जगाम शंकरपुरीं समाराधयितुं भवम्॥६१॥

पाण्डवेयोऽपि तद्वाक्यात् सम्प्राप्य शरणं शिवम्।

संत्यज्य सर्वकर्माणि तद्भक्तिपरमोऽभवत्॥६२॥

ऐसा कहकर वे भगवान् प्रभु (व्यास) अर्जुन पर कृपा करके शंकरकी आराधना करनेके लिये शंकर की पुरी को गये। पाण्डुपुत्र अर्जुन भी उनके कहनेसे शिव की शरणमें पहुंचे और सभी कर्मोंका परित्यागकर उनकी भक्तिमें ही दत्तचित्त हो गये॥६१-६२॥

नार्जुनेन समः शम्भोर्भक्त्या भूतो भविष्यति।

मुक्त्वा सत्यवतीसूनुं कृष्णं वा देवकीसुतम्॥६३॥

तस्मै भगवते नित्यं नमः सत्याय धीमते।

पाराशर्याय मुनये व्यासायामिततेजसे॥६४॥

कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् विष्णुरेव सनातनः।

को ह्यन्यस्तत्त्वतो रुद्रं वेत्ति तं परमेश्वरम्॥६५॥

नमः कुरुध्वं तमृषि कृष्णं सत्यवतीसुतम्।

पाराशर्यं महात्मानं योगिनं विष्णुमव्ययम्॥६६॥

एवमुक्तास्तु मुनयः सर्व एव समाहिताः।

प्रणेमुस्तं महात्मानं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥६७॥

सत्यवतीके पुत्र व्यास या देवकीके पुत्र कृष्ण को छोड़कर अन्य कोई भी अर्जुनके समान शंकरकी भक्ति करनेवाला न तो हुआ और न होगा। उन सत्यस्वरूप, धीमान् पराशरके पुत्र अमित तेजस्वी भगवान् व्यासमुनि को नित्य नमस्कार है। कृष्णद्वैपायन (व्यास) साक्षात् सनातन विष्णु ही हैं, इनके अतिरिक्त उन परमेश्वर रुद्रको यथार्थरूपसे अन्य कौन जानता है। इन सत्यवतीनन्दन, पराशरपुत्र, महात्मा योगी, अव्यय विष्णुस्वरूप कृष्णद्वैपायन (व्यास) ऋषिको आपलोग नमस्कार करें। इस प्रकार से कहे जानेपर सभी मुनियोंने एकाग्रचित्त होकर सत्यवतीके पुत्र उन महात्मा व्यासको नमस्कार किया॥६३-६७॥