31 अध्याय

प्रायश्चित्त-प्रकरणमें कपालमोचन-तीर्थका आख्यान

ऋषय ऊचुः कथं देवेन रुद्रेण शंकरेणामितौजसा।

कपालं ब्रह्मणः पूर्वं स्थापितं देहजं भुवि॥ १ ॥

तत्त्व ऋषियों ने पूछा-अमित तेजस्वी देव शंकर रुद्र ने पूर्वकालमें किस प्रकार ब्रह्माजीके शरीर से उत्पन्न कपाल को पृथ्वीपर स्थापित किया? ॥१॥

सूत उवाच

शृणुध्वमृषयः पुण्यां कथां पापप्रणाशिनीम्।

माहात्म्यं देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ २ ॥

सूतजी बोले-ऋषियो! आप लोग पापको नष्ट करनेवाली इस पुण्य कथा एवं धीमान् देवाधिदेव महादेवके माहात्म्यको सुनें-॥२॥

पुरा पितामहं देवं मेरुशृङ्गे महर्षयः।

प्रोचुः प्रणम्य लोकादिं किमेकं तत्त्वमव्ययम्॥ ३ ॥

स मायया महेशस्य मोहितो लोकसम्भवः।

अविज्ञाय परं भावं स्वात्मानं प्राह धर्षिणम्॥ ४ ॥

अहं धाता जगद्योनिः स्वयम्भूरेक ईश्वरः ।

अनादिमत्परं ब्रह्म मामभ्यर्च्य विमुच्यते॥ ५ ॥

अहं हि सर्वदेवानां प्रवर्तकनिवर्तकः।

न विद्यते चाभ्यधिको मत्तो लोकेषु कश्चन ॥ ६ ॥

प्राचीन कालमें मेरुशृंगपर लोकोंके मूल कारण देव पितामहको प्रणाम कर महर्षियोंने उनसे पूछा-अव्यय अद्वितीय तत्त्व क्या है? महेश्वरकी माया से मोहित, लोकोंको उत्पन्न करनेवाले उन ब्रह्मा ने (महर्षियोंके) परम भावको न जानते हुए अभिमानपूर्वक स्वयं को ही (अव्यय) बतलाया (और कहा-) मैं ही जगत्का मूल कारण, धाता, स्वयम्भू तथा अद्वितीय अनादि परम ब्रह्म ईश्वर हूँ। मेरी आराधना करनेसे मुक्ति हो जाती है। मैं ही सभी देवों का प्रवर्तक तथा निवर्तक हूँ। लोकोंमें मुझसे महान् और कोई नहीं है॥३-६॥

तस्यैवं मन्यमानस्य जज्ञे नारायणांशजः।

प्रोवाच प्रहसन् वाक्यं रोषताम्रविलोचनः ।। ७ ॥

किं कारणमिदं ब्रह्मन् वर्तते तव साम्प्रतम्।

अज्ञानयोगयुक्तस्य न त्वेतदुचितं तव॥ ८॥

अहं धाता हि लोकानां यज्ञो नारायणः प्रभुः।

न मामृतेऽस्य जगतो जीवनं सर्वदा क्वचित्॥ ९ ॥

अहमेव परं ज्योतिरहमेव परा गतिः।

मत्प्रेरितेन भवता सृष्टं भुवनमण्डलम्॥१०॥

(पितामह अहंभावपूर्वक) ऐसा कह ही रहे थे कि नारायणके अंशसे उत्पन्न यज्ञभगवान्ने क्रोधसे आरक्तनेत्र होकर परिहास करते हुए यह वाक्य कहा-ब्रह्मन्! सम्प्रति आपके ऐसे व्यवहारका क्या कारण है? आप अज्ञानसे युक्त हैं, आपके लिये यह उचित नहीं है। मैं लोकोंका धाता यज्ञरूप नारायण प्रभु हूँ, मेरे बिना इस संसारमें जीवन कभी भी नहीं रह सकता। मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही परम गति हूँ, मेरे द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर आपने इस भुवनमण्डल की रचना की है॥७-१०॥

एवं विवदतोर्मोहात् परस्परजयैषिणोः।

आजग्मुर्यत्र तौ देवौ वेदाश्चत्वार एव हि॥११॥

अन्वीक्ष्य देवं ब्रह्माणं यज्ञात्मानं च संस्थितम्।

प्रोचुः संविग्नहृदया याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥१२॥

परस्पर विजयके अभिलाषी उन दोनोंके मोहपूर्वक इस प्रकार विवाद करते समय ही जहाँ वे दोनों देव (पितामह एवं यज्ञभगवान्) थे, वहीं चारों वेद (मूर्तिमान् होकर) आ गये। देव ब्रह्मा तथा यज्ञात्मा विष्णु को स्थित देखकर संविग्रहृदय होकर उन्होंने ब्रह्मा से यथार्थ तत्त्व कहा-॥११-१२॥

ऋग्वेद उवाच

यस्यान्तःस्थानि भूतानि यस्मात् सर्वं प्रवर्तते।

यदाहुस्तत्परं तत्त्वं स देवः स्यान्महेश्वरः॥१३॥

(मूर्तिमान्) ऋग्वेदने कहा-जिसके भीतर सभी प्राणी प्रतिष्ठित हैं, जिससे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जिसे परम तत्त्व कहा गया है, उन्हें ही महेश्वर देव समझना चाहिये ॥१३॥

यजुर्वेद उवाच

यो यज्ञैरखिलैरीशो योगेन च समर्च्यते।

यमाहुरीश्वरं देवं स देवः स्यात् पिनाकधृक् ॥१४॥

यजुर्वेदने कहा-जो ईश सभी यज्ञों तथा योग के द्वारा अर्चित होते हैं और जिन देवको ईश्वर कहा गया है, वे देव ही पिनाक धारण करनेवाले (शंकर) हैं॥ १४॥

सामवेद उवाच

येनेदं भ्राम्यते चक्रं यदाकाशान्तरं शिवम्।

योगिभिर्विद्यते तत्त्वं महादेवः स शंकरः॥१५॥

सामवेदने कहा-जिसके द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डरूपी चक्र प्रवर्तित है, जो (निरतिशय अवकाशस्वरूप) आकाश के मध्य प्रतिष्ठित है, शिवस्वरूप है, योगियोंके द्वारा वेद्य है, वह परम तत्त्व ही शंकर हैं, महादेव हैं॥ १५ ॥

अथर्ववेद उवाच

यं प्रपश्यन्ति योगेशं यजन्तो यतयः परम्।

महेशं पुरुषं रुद्रं स देवो भगवान् भवः ॥१६॥

अथर्ववेदने कहा- यति लोग प्रयत्नपूर्वक जिन परम योगेश्वर महेशका दर्शन करते हैं, वे पुरुष रुद्र ही देव भगवान् भव हैं ।। १६ ।।

एवं स भगवान् ब्रह्मा वेदानामीरितं शुभम्।

श्रुत्वाह प्रहसन् वाक्यं विश्वात्मापि विमोहितः॥१७॥

कथं तत्परमं ब्रह्म सर्वसंगविवर्जितम्।

रमते भार्यया सार्धं प्रमथैश्चातिगर्वितैः॥१८॥

इस प्रकार विश्वात्मा होनेपर भी वे भगवान् ब्रह्मा मोहित होनेके कारण वेदों के द्वारा बनाये गये कल्याणकारी तत्त्वको सुननेपर भी हँसते हुए कहने लगे-जब वे परम ब्रह्म महेश सभी आसक्तियोंसे रहित हैं तो कैसे अपनी भार्याके साथ रमण करते हैं तथा अतिगर्वित अपने प्रमथगणोंके साथ सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं? ॥ १७-१८॥

इतीरितेऽथ भगवान् प्रणवात्मा सनातनः।

अमूर्तो मूर्तिमान् भूत्वा वचः प्राह पितामहम्॥१९॥

ऐसा कहे जानेपर सनातन, अमूर्त भगवान् प्रणव ने मूर्तिमान् होकर पितामहसे कहा- ॥ १९॥

प्रणव उवाच

न ह्येष भगवान् पल्या स्वात्मनो व्यतिरिक्तया।

कदाचिद् रमते रुद्रस्तादृशो हि महेश्वरः॥२०॥

अयं स भगवानीश: स्वयंज्योतिः सनातनः ।

स्वानन्दभूता कथिता देवी नागन्तुका शिवा ॥२१॥

प्रणव बोले-ये वे महेश्वर हैं, जो स्वात्माराम हैं। ये अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं। इनकी आत्मा ही इनकी पत्नी हैं। यही वे भगवान् ईश स्वयंज्योति, सनातन हैं और देवी शिवा आत्मानन्द-स्वरूपिणी कही गयी हैं, वे आगन्तुक (देवी उन भगवान्से पृथक्) नहीं हैं ॥ २०-२१॥

इत्येवमुक्तेऽपि तदा यज्ञमूर्तेरजस्य च।

नाज्ञानमगमन्नाशमीश्वरस्यैव मायया ॥२२॥

तदन्तरे महाज्योतिर्विरिञ्चो विश्वभावनः।

प्रापश्यदद्भुतं दिव्यं पूरयन् गगनान्तरम्॥२३॥

तन्मध्यसंस्थं विमलं मण्डलं तेजसोज्ज्वलम्।

व्योममध्यगतं दिव्यं प्रादुरासीद् द्विजोत्तमाः॥२४॥

इस प्रकार कहे जानेपर भी उस समय ईश्वरकी ही मायासे (मोहित) यज्ञमूर्ति भगवान् तथा ब्रह्मा का अज्ञान नष्ट नहीं हुआ। इसी बीच विश्वभावन ब्रह्मा ने आकाश मध्य को व्याप्त करते हुए अद्भुत एवं दिव्य महाज्योतिका दर्शन किया। द्विजोत्तमो! उस (महाज्योति)- के मध्य स्थित तेजसे उज्ज्वल दिव्य निर्मल मण्डल आकाशके मध्यमें प्रकट हुआ॥ २२-२४॥

स दृष्ट्वा वदनं दिव्यं मूर्ध्नि लोकपितामहः।

तेन तन्मण्डलं घोरमालोकयदनिन्दितम्॥ २५॥

वह अनिन्दित मण्डल दिव्य था और तेजोमय होने के कारण घोर (भीषण) था तथा मूर्धापर (सबसे ऊपर) स्थित था। उसे देखकर ब्रह्माने अपने मुखको, सबसे ऊपर विद्यमान उस मण्डलके आलोकसे आलोकित किया;॥ २५ ॥

प्रजज्वालातिकोपेन ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः।

क्षणाददृश्यत महान् पुरुषो नीललोहितः॥२६॥

त्रिशूलपिङ्गलो देवो नागयज्ञोपवीतवान्।

तं प्राह भगवान् ब्रह्मा शंकरं नीललोहितम्॥२७॥

जानामि भवतः पूर्वं ललाटादेव शंकर।

प्रादुर्भावं महेशान मामेव शरणं व्रज॥२८॥

पर उसी समय अज्ञानवश अति कुपित ब्रह्माके ही अति कोपसे उन (ब्रह्मा)-का पाँचवाँ सिर जलने लगा। उसी क्षण भगवान् नीललोहित रुद्र (महेश्वर के गणके देवविशेष) प्रकट हुए। वे रुद्रदेव त्रिशूल धारण किये हुए थे, पिङ्गलवर्णके थे तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। उन नीललोहित शंकर रुद्र से भगवान् ब्रह्माने कहा-हे महेशान! आपका मेरे ही ललाटसे सर्वप्रथम प्रादुर्भाव हुआ था, यह मैं जानता हूँ। आप मेरी शरणमें आयें ॥ २६-२८॥

श्रुत्वा सगर्ववचनं पद्मयोनेरथेश्वरः।

प्राहिणोत् पुरुषं कालं भैरवं लोकदाहकम्॥२९॥

स कृत्वा सुमहद् युद्धं ब्रह्मणा कालभैरवः ।

चकर्त तस्य वदनं विरिञ्चस्याथ पञ्चमम्॥३०॥

तदनन्तर पद्मयोनिके गर्वयुक्त वचनको सुनकर ईश्वर (नीललोहित रुद्र)-ने लोकको जलानेवाले पुरुष कालभैरवको भेजा। उस कालभैरवने ब्रह्माके साथ महान् युद्ध किया और उन ब्रह्माके पाँचवें मुखको काटडाला ॥ २९-३०॥

निकृत्तवदनो देवो ब्रह्मा देवेन शम्भुना।

ममार चेशयोगेन जीवितं प्राप विश्वसृक्॥३१॥

थानुपश्यद् गिरिशं मण्डलान्तरसंस्थितम्।

समासीनं महादेव्या महादेवं सनातनम्॥३२॥

भुजङ्गराजवलयं चन्द्रावयवभूषणम्।

कोटिसूर्यप्रतीकाशं जटाजूटविराजितम्॥३३॥

शार्दूलचर्मवसनं दिव्यमालासमन्वितम्।

त्रिशूलपाणिं दुष्प्रेक्ष्यं योगिनं भूतिभूषणम्॥३४॥

यमन्तरा योगनिष्ठाः प्रपश्यन्ति हृदीश्वरम्।

तमादिदेवं ब्रह्माणं महादेवं ददर्श ह॥३५॥

देव शम्भुकी प्रेरणा से कालभैरवद्वारा ब्रह्माका मस्तक काट दिये जानेपर उन देव ब्रह्माकी मृत्यु हो गयी, किंतु ईश्वर के योग से पुन: वे विश्व स्रष्टा (ब्रह्मा) जीवित हो गये। तदनन्तर (ब्रह्माने) उस मण्डलके मध्यमें स्थित सनातन महादेव (गिरिश) महेश्वरको महादेवीके साथ विराजमान देखा। वे सर्पराजका कङ्कण पहने थे, चन्द्रमाके अवयव को (द्वितीयाके चन्द्रमाको) भूषणरूपमें धारण किये थे। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा जटाजूट धारण किये हुए थे। उन्होंने व्याघ्रचर्मका वस्त्र धारण किया था, दिव्य मालाओंसे समन्वित थे, हाथमें त्रिशूल धारण किये थे, कठिनतासे देखे जा सकने योग्य तथा भस्मसे सुशोभित ऐसे योगी (शंकर)-को उन्होंने देखा। योगनिष्ठ अपने हृदयके मध्य जिन ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन ब्रह्मस्वरूप आदिदेव महादेवको (ब्रह्माने) देखा ॥ ३१-३५॥

यस्य सा परमा देवी शक्तिराकाशसंस्थिता।

सोऽनन्तैश्वर्ययोगात्मा महेशो दृश्यते किल॥३६॥

यस्याशेषजगद् बीजं विलयं याति मोहनम्।

सकृत्प्रणाममात्रेण स रुद्रः खलु दृश्यते॥३७॥

योऽथ नाचारनिरतान् स्वभक्तानेव केवलम्।

विमोचयति लोकानां नायको दृश्यते किल॥३८॥

आकाशमें स्थित वे परमा देवी जिनकी शक्ति हैं, वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न योगात्मा महेश्वर मुझे दिखलायी पड़ रहे हैं। जिन्हें एक बार प्रणाम मात्र कर लेने से ही प्रणाम करनेवालेके सम्पूर्ण मोहको उत्पन्न करनेवाला संसारका बीज विलीन हो जाता है, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। वे लोकोंके नायक दिखलायी पड़ रहे हैं, जो उन लोगोंको भी मुक्त कर देते हैं जो आचारयुक्त न होनेपर भी केवल उनकी भक्ति करते हैं॥३६-३८॥

यस्य वेदविदः शान्ता निर्द्वन्द्वा ब्रह्मचारिणः।

विदन्ति विमलं रूपं स शम्भुर्दृश्यते किल॥३९॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा ऋषयो ब्रह्मवादिनः।

अर्चयन्ति सदा लिङ्गं विश्वेशः खलु दृश्यते॥४०॥

वेदोंके ज्ञाता, शान्त तथा द्वन्द्वरहित ब्रह्मचारी जिनके विशुद्ध स्वरूपको जानते हैं, वे शम्भु दिखलायी पड़ रहे हैं। ब्रह्मा आदि देवता तथा ब्रह्मवादी ऋषिजन जिनके लिङ्गकी सदा आराधना करते हैं, वे विश्वेश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं ॥ ३९-४० ॥

यस्याशेषजगद् बीजं विलयं याति मोहनम्।

सकृत्प्रणाममात्रेण स रुद्रः खलु दृश्यते॥४१॥

विद्यासहायो भगवान् यस्यासौ मण्डलान्तरम्।

हिरण्यगर्भपुत्रोऽसावीश्वरो दृश्यते किल॥४२॥

यस्याशेषजगत्सूतिर्विज्ञानतनुरीश्वरी

न मुञ्चति सदा पार्वं शंकरोऽसावदृश्यत॥४३॥

पुष्पं वा यदि वा पत्रं यत्पादयुगले जलम्।

दत्त्वा तरति संसारं रुद्रोऽसौ दृश्यते किल॥४४॥

तत्संनिधाने सकलं नियच्छति सनातनः।

कालः किल स योगात्मा कालकालो हि दृश्यते॥ ४५ ॥

जिन्हें एक बार प्रणाममात्र कर लेनेसे ही प्रणाम करनेवालेके सम्पूर्ण मोहको उत्पन्न करनेवाला संसार का बीज विलीन हो जाता है, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे

हैं। जिनके मण्डलके मध्य सरस्वतीके साथ ये भगवान् ब्रह्मा स्थित हैं, हिरण्यगर्भके पुत्र वे ईश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं। सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न करनेवाली विज्ञान-तनुरूपी (विज्ञानमयी) ईश्वरी (शक्ति) जिनके पार्श्व का कभी त्याग नहीं करती, वे शंकर दिखलायी पड़ रहे हैं। जिनके चरणकमलोंमें पत्र, पुष्प अथवा जल अर्पण करनेसे (प्राणी) संसारसे पार हो जाते हैं, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। जिनकी संनिधिमात्रसे (अमोघशक्ति प्राप्तकर) सनातन (शाश्वतकाल) सब कुछ प्राणि मात्र को प्रदान करता है, वे कालके भी काल योगात्मा महेश्वर दृष्टिगोचर हो रहे हैं॥ ४१-४५ ॥

जीवनं सर्वलोकानां त्रिलोकस्यैव भूषणम्।

सोमः स दृश्यते देवः सोमो यस्य विभूषणम्॥ ४६॥

देव्या सह सदा साक्षाद्यस्य योगः स्वभावतः।

गीयते परमा मुक्तिः स योगी दृश्यते किल॥४७॥

योगिनो योगतत्त्वज्ञा वियोगाभिमुखाऽनिशम् ।

योगं ध्यायन्ति देव्याऽसौ स योगी दृश्यते किल॥४८॥

जो सम्पूर्ण लोकोंके जीवन हैं, तीनों लोकोंके भूषण हैं तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है, वे देव सोम (उमाके साथ महेश्वर) दिखलायी पड़ रहे हैं। देवी उमा (पार्वती)-के साथ जिनका स्वभावसे ही नित्य साक्षात् संयोग है एवं जिनके अनुग्रहसे परम मुक्ति की प्राप्ति शास्त्रोंमें बतायी जाती है, वे योगी महेश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं। वैराग्यकी ओर उन्मुख, योगके तत्त्वको जाननेवाले योगीजन देवीके साथ निरन्तर जिनके योगका ध्यान करते हैं, वे ही योगी (शंकर) दिखलायी पड़ रहे हैं ॥ ४६-४८॥

सोऽनुवीक्ष्य महादेवं महादेव्या सनातनम्।

वरासने समासीनमवाप परमां स्मृतिम्॥४९॥

लब्ब्वा माहेश्वरीं दिव्यां संस्मृतिं भगवानजः।

तोषयामास वरदं सोमं सोमविभूषणम्॥५०॥

महादेवीके साथ सनातन महादेवको श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर ब्रह्माको परम स्मृति प्राप्त हुई। भगवान् ब्रह्माने दिव्य माहेश्वरी स्मृतिको प्राप्तकर चन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले तथा वर प्रदान करनेवाले सोम (शंकर)-को स्तुतिद्वारा प्रसन्न किया ॥ ४९-५०॥

ब्रह्मोवाच

नमो देवाय महते महादेव्यै नमो नमः।

नमः शिवाय शान्ताय शिवायै शान्तये नमः॥५१॥

ब्रह्माने कहा-महान् देव (महादेव)-को नमस्कार है। महादेवीको बार-बार नमस्कार है। शिवको, शान्तको नमस्कार है, शिवाको, शान्तिको नमस्कार है॥५१॥

ओं नमो ब्रह्मणे तुभ्यं विद्यायै ते नमो नमः ।

नमो मूलप्रकृतये महेशाय नमो नमः॥५२॥

नमो विज्ञानदेहाय चिन्तायै ते नमो नमः।

नमस्ते कालकालाय ईश्वरायै नमो नमः॥५३॥

नमो नमोऽस्तु रुद्राय रुद्राण्यै ते नमो नमः।

नमो नमस्ते कामाय मायायै च नमो नमः॥५४॥

नियन्त्रे सर्वकार्याणां क्षोभिकायै नमो नमः ।

नमोऽस्तु ते प्रकृतये नमो नारायणाय च॥५५॥

योगदायै नमस्तुभ्यं योगिनां गुरवे नमः।

नमः संसारनाशाय संसारोत्पत्तये नमः ।।५६ ।।

नित्यानन्दाय विभवे नमोऽस्त्वानन्दमूर्तये।

नमः कार्यविहीनाय विश्वप्रकृतये नमः॥५७॥

ओंकारमूर्तये तुभ्यं तदन्तःसंस्थिताय च।

नमस्ते व्योमसंस्थाय व्योमशक्त्यै नमो नमः॥५८॥

ओंकार ब्रह्मरूप आपको नमस्कार है, विद्यारूप आपको नमस्कार है। मूलप्रकृतिको नमस्कार है, महेश्वरको बार-बार नमस्कार है। विज्ञानस्वरूप देहवाले (महेश्वर) को नमस्कार है, चिन्तन (विचारशक्ति-चितिस्वरूप) आप (देवी)-को नमस्कार है। कालके भी काल आपको नमस्कार है, ईश्वरीको बार-बार नमस्कार है। रुद्रके लिये बार-बार नमस्कार है, रुद्राणी आपको बार-बार नमस्कार है। काम (समस्त प्रपञ्चको मोहित करनेवाले) आपको बार-बार नमस्कार है और माया को बार-बार नमस्कार है। सभी कार्योंके नियामक (महेश्वर) और क्षोभ उत्पन्न करनेवाली (सृष्टिके लिये कूटस्थ परब्रह्ममें उत्कट इच्छा जाग्रत् करनेवाली (उमा)-को बारंबार नमस्कार है। प्रकृतिरूप आप (देवी)-को तथा नारायण (महेश्वर)-को नमस्कार है। योग प्रदान करनेवाली आपको नमस्कार है और योगियोंके गुरु (शंकर) को नमस्कार है। संसारका विनाश (प्रलय) करनेवाले (महेश्वर)-को नमस्कार है तथा संसारकी उत्पत्ति करनेवाली (देवी)-को नमस्कार है। नित्यानन्द, विभु तथा आनन्दमूर्तिको नमस्कार है। कार्यविहीन (विकाररहित) को नमस्कार है, विश्वप्रकृति (देवी)-को नमस्कार है। ओंकारमूर्ति तथा उसके भीतर प्रतिष्ठित रहनेवाले आपको नमस्कार है। आकाशमें स्थित व्योमशक्ति* (ब्रह्मशक्ति देवी)-को बार-बार नमस्कार है॥५२-५८॥

इति सोमाष्टकेनेशं प्रणनाम पितामहः।

पपात दण्डवद् भूमौ गृणन् वै शतरुद्रियम्॥५९॥

अथ देवो महादेवः प्रणतार्तिहरो हरः।

प्रोवाचोत्थाप्य हस्ताभ्यां प्रीतोऽस्मि तव साम्प्रतम्॥६०॥

इस प्रकार पितामह ब्रह्माने इस सोमाष्टक (नामक स्तुति)-से ईशको प्रणाम किया और शतरुद्रियका पाठ करते हुए उन्होंने दण्डवत् भूमिपर गिरकर साष्टाङ्ग प्रणिपात किया। तदनन्तर प्रणतजनोंके कष्टको हरनेवाले देव, हर, महादेवने दोनों हाथोंसे उन्हें (ब्रह्माको) उठाया और कहा-इस समय मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ॥५९-६०॥

दत्त्वासौ परमं योगमैश्वर्यमतुलं महत्।

प्रोवाचाग्रे स्थितं देवं नीललोहितमीश्वरम्॥६१॥

एष ब्रह्मास्य जगतः सम्पूज्यः प्रथमः सुतः।

आत्मनो रक्षणीयस्ते गुरुयेष्ठः पिता तव॥६२॥

अनन्तर उन्हें (ब्रह्माको) परम योग और अतुल महान् ऐश्वर्य प्रदानकर महादेवने सम्मुख स्थित ईश्वर नीललोहित देवसे कहा-ये ब्रह्मा मेरे प्रथम पुत्र हैं, इस संसारके पूज्यके रूपमें प्रसिद्ध हैं। गुरु, ज्येष्ठ एवं आपके पिता हैं, आपको इनकी रक्षा करनी चाहिये ॥६१-६२॥

अयं पुराणपुरुषो न हन्तव्यस्त्वयानघ।

स्वयोगैश्वर्यमाहात्म्यान्मामेव शरणं गतः ॥ ६३॥

अयं च यज्ञो भगवान् सगर्वो भवतानघ।

शासितव्यो विरिञ्चस्य धारणीयं शिरस्त्वया॥६४॥

ब्रह्महत्यापनोदार्थं व्रतं लोकाय दर्शयन्।

चरस्व सततं भिक्षा संस्थापय सुरद्विजान्॥६५॥

अनघ! आपको इन पुराणपुरुषकी हत्या नहीं करनी चाहिये। ये अपने योगैश्वर्यके माहात्म्यसे मेरी ही शरण में आये हैं। पुनः महेश्वरने नीललोहित रुद्रको सम्बोधित करते हुए नारायणके अंशसे उत्पन्न यज्ञभगवान्के विषयमें कहा-हे अनघ! ये भगवान् यज्ञ हैं। ब्रह्माको मोहग्रस्त देखकर सगर्व हो गये हैं, इनका शासन करें तथा ब्रह्माके (कटे हुए) सिरको धारण करें और आप संसारको यह दिखाते हुए भिक्षाचरणपूर्वक भ्रमण करें कि मैं ब्रह्महत्याके निवारणके लिये व्रत कर रहा हूँ। आप देवताओं एवं ब्राह्मणोंको (अर्थात् उनकी मर्यादाको) संस्थापित करें॥६३-६५ ॥

इत्येतदुक्त्वा वचनं भगवान् परमेश्वरः।

स्थानं स्वाभाविकं दिव्यं ययौ तत्परमं पदम्॥६६॥

ततः स भगवानीश: कपर्दी नीललोहितः।

ग्राहयामास वदनं ब्रह्मणः कालभैरवम्।। ६७॥

चर त्वं पापनाशार्थ व्रतं लोकहितावहम्।

कपालहस्तो भगवान् भिक्षां गृह्णातु सर्वतः॥१८॥

उक्त्वैवं प्राहिणोत् कन्यां ब्रह्महत्यामिति श्रुताम्।

दंष्ट्राकरालवदनां ज्वालामालाविभूषणाम्॥६९॥

यावद् वाराणसी दिव्यां पुरीमेष गमिष्यति।

तावत् त्वं भीषणे कालमनुगच्छ त्रिलोचनम्॥७०॥

ऐसा वचन कहकर भगवान् परमेश्वर अपने परम पदरूप स्वाभाविक दिव्य स्थानको चले गये। तदनन्तर जटाधारी नीललोहित उन भगवान् ईश (रुद्र)-ने ब्रह्मा का मुख कालभैरवको ग्रहण कराया (तथा कहा-) पाप को नष्ट करनेके लिये आप लोककल्याणकारी व्रतका पालन करें और कपाल हाथमें धारणकर आप भगवान् सर्वत्र जायँ तथा भिक्षा ग्रहण करें। ऐसा कहकर उन्होंने भयंकर दाढ़ और मुखवाली ज्वालासमूहको ही आभूषण- रूप में धारण करनेवाली ब्रह्महत्या नामसे प्रसिद्ध कन्या को भी यह कहकर भेजा-हे भीषण आकारवाली! ये कालभैरव त्रिलोचन जबतक दिव्य वाराणसीपुरीमें पहुँचे, तबतक तुम इनके पीछे-पीछे जाओ॥६६-७०॥

एवमाभाष्य कालाग्निं प्राह देवो महेश्वरः।

अटस्व निखिलं लोकं भिक्षार्थी मन्नियोगतः॥७१॥

यदा द्रक्ष्यसि देवेशं नारायणमनामयम्।

तदासौ वक्ष्यति स्पष्टमुपायं पापशोधनम्॥७२॥

ऐसा कहनेके बाद महेश्वरदेवने कालाग्नि (भैरव) से कहा-मेरे निर्देशानुसार आप भिक्षा माँगते हुए सम्पूर्ण लोक में भ्रमण करें। जब आप देवेश अनामय नारायण का दर्शन करेंगे, तब वे (श्रीनारायण) पापकी शुद्धिका स्पष्ट उपाय (आपको) बतायेंगे॥७१-७२ ॥

स देवदेवतावाक्यमाकर्ण्य भगवान् हरः।

कपालपाणिर्विश्वात्मा चचार भुवनत्रयम्॥७३॥

आस्थाय विकृतं वेषं दीप्यमानं स्वतेजसा।

श्रीमत् पवित्रमतुलं जटाजूटविराजितम्॥७४॥

कोटिसूर्यप्रतीकाशैः प्रमथैश्चातिगर्वितैः।

भाति कालाग्निनयनो महादेवः समावृतः॥७५॥

पीत्वा तदमृतं दिव्यमानन्दं परमेष्ठिनः।

लीलाविलासबहुलो लोकानागच्छतीश्वरः॥७६ ॥

देवाधिदेवका वाक्य सुनकर कपालपाणि वे विश्वात्मा भगवान् हर (कालभैरव) तीनों लोकोंमें भ्रमण करने लगे। विकृत वेष बनाकर अपने तेजसे प्रकाशित, श्रीसम्पन्न, अत्यन्त पवित्र, जटाजूटसे सुशोभित, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, अत्यन्त गर्वित प्रमथगणों से आवृत, कालाग्निके समान नेत्रवाले महादेव (कालभैरव) सुशोभित होने लगे॥७३-७५ ॥

परमेष्ठीके उस दिव्य अमृतस्वरूप आनन्द का पान- कर अतिशय लीला-विलास करनेवाले ईश्वर लोगों के पास आये॥७६॥

तं दृष्ट्वा कालवदनं शंकरं कालभैरवम्।

रूपलावण्यसम्पन्न नारीकुलमगादनु॥७७॥

गायन्ति विविधं गीतं नृत्यन्ति पुरतः प्रभोः।

सस्मितं प्रेक्ष्य वदनं चक्रुर्भूभङ्गमेव च॥७८॥

अस्तु, उन कालात्मा महेश्वरके प्रमुख गण कालभैरव शंकरको रूप एवं लावण्यसे सम्पन्न देखकर नारी- समूह उनके पीछे चलने लगा। वे स्त्रियाँ प्रभुके सामने विविध प्रकारके गीत गाने लगीं और नृत्य करने लगीं तथा मन्द मुसकानके साथ उनके मुखको देखकर भौंहोंसे हाव-भाव प्रदर्शित करने लगीं ॥७७-७८॥

स देवदानवादीनां देशानभ्येत्य शूलधृक् ।

जगाम विष्णोर्भवनं यत्रास्ते मधुसूदनः ॥७९॥

निरीक्ष्य दिव्यभवनं शंकरो लोकशंकरः।

सहैव भूतप्रवरैः प्रवेष्टुमुपचक्रमे॥८०॥

वे शूलधारी कालभैरव देवों तथा दानवों आदि के देशों में जानेके अनन्तर विष्णुके भवनमें गये, जहाँ मधुसूदन निवास करते हैं। उस दिव्य भवनको देखकर लोकोंके कल्याणकारी शंकर (कालभैरव) श्रेष्ठ भूतों के साथ ही उसमें प्रवेश करने लगे। ७९-८०॥

अविज्ञाय परं भावं दिव्यं तत्पारमेश्वरम्।

न्यवारयत् त्रिशूलाङ्कं द्वारपालो महाबलः ॥८१॥

शङ्खचक्रगदापाणि: पीतवासा महाभुजः ।

विष्वक्सेन इति ख्यातो विष्णोरंशसमुद्भवः॥८२॥

अथैनं शंकरगणो युयुधे विष्णुसम्भवम्।

भीषणो भैरवादेशात् कालवेग इति श्रुतः ।। ८३ ।।

विजित्य तं कालवेगं क्रोधसंरक्तलोचनः ।

रुद्रायाभिमुखं रौद्रं चिक्षेप च सुदर्शनम्॥८४॥

अथ देवो महादेवस्त्रिपुरारिस्त्रिशूलभृत्।

तमापतन्तं सावज्ञमालोकयदमित्रजित्॥८५॥

उन (कालभैरव)-के दिव्य परम पारमेश्वर भावको न समझते हुए शंख, चक्र तथा गदा हाथोंमें लिये हुए, पीत वस्त्र धारण किये, महान् भुजावाले, विष्णुके अंशसे उत्पन्न विष्वक्सेन नामसे प्रसिद्ध महाबलवान् द्वारपालने त्रिशूलधारी उन कालभैरवको रोका। तब भैरवकी आज्ञासे कालवेग इस नामसे प्रसिद्ध शंकर का भयंकर गण विष्णु-समुद्भूत (विष्वक्सेन)-से युद्ध करने लगा। उस कालवेगको जीतकर क्रोधसे लाल हुए नेत्रोंवाला (द्वारपाल) रुद्र (कालभैरव)-की ओर भयंकर सुदर्शनचक्र फेंका। तब त्रिशूलधारी शत्रुजित् त्रिपुरारिदेव महादेव (कालभैरव)-ने उस आते हुए चक्रको अवज्ञापूर्वक देखा ॥८१-८५ ॥

तदन्तरे महद्भूतं युगान्तदहनोपमम्।

शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि॥८६॥

सशूलाभिहतोऽत्यर्थं त्यक्त्वा स्वं परमं बलम्।

तत्याज जीवितं दृष्ट्वा मृत्युं व्याधिहता इव ॥८७॥

उसी समय महादेव (कालभैरव)-ने त्रिशूलके द्वारा प्रलयकालीन अग्निके तुल्य अति भीषण विष्वक्सेन के वक्षःस्थलमें प्रहारकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया। त्रिशूल से आहत होने पर अपने महान् बल का त्याग कर उस विष्वक्सेनने अपने प्राणोंका उसी प्रकार परित्याग कर दिया, जैसे व्याधिसे आहत प्राणी मृत्युको देखकर अपने प्राणोंका परित्याग कर देता है।। ८६-८७ ॥

निहत्य विष्णुपुरुषं सार्धं प्रमथपुंगवैः।

विवेश चान्तरगृहं समादाय कलेवरम्॥८८॥

निरीक्ष्य जगतो हेतुमीश्वरं भगवान् हरिः।

शिरो ललाटात् सम्भिद्य रक्तधारामपातयत्।। ८९॥

गृहाण भगवन् भिक्षा मदीयाममितद्युते।

न विद्यतेऽनाभ्युदिता तव त्रिपुरमर्दन ॥९०॥

विष्णुके पुरुष (विष्वक्सेन)-को मारकर (उसके) कलेवर (मृत शरीर)-को लेकर श्रेष्ठ प्रमथगणोंके साथ महादेव (कालभैरव) भवनके अंदर प्रविष्ट हुए। जगत्के कारणरूप ईश्वर (कालभैरव)-को देखकर भगवान् हरिने अपने ललाटका भेदनकर रक्तकी धारा गिरायी और कहा-अपरिमेय तेजरूप भगवन् ! आप मेरी भिक्षा ग्रहण करें। त्रिपुरमर्दन! आपके लिये कोई अप्रकट (अमङ्गलजनक भिक्षा) नहीं है ॥८८-९०॥

न सम्पूर्ण कपालं तद् ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु सा च धारा प्रवाहिता॥ ९१ ॥

अथाब्रवीत् कालरुद्रं हरिर्नारायणः प्रभुः।

संस्तूय वैदिकैर्मन्त्रैर्बहुमानपुरःसरम्॥ ९२ ॥

किमर्थमेतद् वदनं ब्रह्मणो भवता धृतम्।

प्रोवाच वृत्तमखिलं भगवान् परमेश्वरः॥ ९३ ॥

हजारों दिव्य वर्षोंतक वह (रक्तकी) धारा प्रवाहित होती रही, किंतु परमेष्ठी ब्रह्माका वह (कालभैरवके हाथमें विद्यमान) कपाल भरा नहीं। तब नारायण प्रभु हरिने वैदिक मन्त्रोंद्वारा अत्यन्त आदरपूर्वक स्तुति कर भगवान् कालरुद्रसे कहा-आपने ब्रह्माका यह सिर किस कारणसे धारण कर रखा है? तब परमेश्वर भगवान् (कालभैरव)-ने सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया ।। ९१-९३॥

समाहूय हृषीकेशो ब्रह्महत्यामथाच्युतः ।

प्रार्थयामास देवेशो विमुञ्चेति त्रिशूलिनम्॥ ९४ ॥

नतत्याजाथ सा पार्वं व्याहृतापि मुरारिणा।

चिरंध्यात्वा जगद्योनिः शंकरं प्राह सर्ववित्॥ ९५ ॥

व्रजस्व भगवन् दिव्यां पुरीं वाराणसी शुभाम्।

यत्राखिलजगद्दोषं क्षिप्रं नाशयतीश्वरः॥ ९६ ॥

तदनन्तर हषीकेश देवेश भगवान् अच्युतने ब्रह्महत्याको बुलाकर प्रार्थना की–त्रिशूली (कालभैरव)-को छोड़ दो। मुरारि विष्णुद्वारा प्रार्थना करनेपर भी उसने (कालभैरवके) पार्श्वका त्याग नहीं किया। तब जगद्योनि सर्वज्ञ (विष्णु ने देरतक ध्यानकर शंकर (कालभैरव) से कहा-भगवन् ! आप दिव्य एवं मङ्गल करनेवाली वाराणसीपुरी जायँ, जहाँ ईश्वर सम्पूर्ण सांसारिक दोषोंको शीघ्र ही नष्ट कर देते हैं।९४-९६ ॥

ततः सर्वाणि गुह्यानि तीर्थान्यायतनानि च।

जगाम लीलया देवो लोकानां हितकाम्यया॥ ९७ ॥

संस्तूयमानः प्रमथैर्महायोगैरितस्ततः।

नृत्यमानो महायोगी हस्तन्यस्तकलेवरः॥ ९८ ॥

तमभ्यधावद्भगवान् हरिनारायणः स्वयम्।

अथास्थायापरं रूपं नृत्यदर्शनलालसः॥ ९९ ॥

तब वे महायोगी कालभैरव अपने हाथमें (विष्णु- पार्षद विष्वक्सेनका) कलेवर लेकर वाराणसीपुरी के दर्शनकी प्रसन्नतामें नृत्य करते हुए सर्वप्रथम अति- गोपनीय सभी तीर्थों एवं देवस्थानोंमें देवताओंके हितकी कामनासे गये। कालभैरवके चारों ओर महायोगी प्रमथगण उनकी स्तुति करते हुए चल रहे थे। उन (कालभैरव)-का नृत्य देखनेकी लालसावाले भगवान् नारायण हरि दूसरा रूप धारणकर स्वयं उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ ९७-९९॥

निरीक्षमाणो गोविन्दं वृषेन्द्राङ्कितशासनः।

सस्मितोऽनन्तयोगात्मा नृत्यति स्म पुनः पुनः॥१००॥

अथ सानुचरो रुद्रः सहरिधर्मवाहनः।

भेजे महादेवपुरीं वाराणसीमिति श्रुताम्॥१०१॥

श्रेष्ठ वृषभके चिह्नसे अङ्कित शासन (ध्वजा) वाले अनन्त योगात्मरूप (शंकर) गोविन्दको देखते हुए प्रसन्नतापूर्वक बार-बार नृत्य करने लगे। तदनन्तर अनुचरों और हरिके सहित धर्मरूपी वृषभ को वाहनके रूपमें स्वीकार करनेवाले रुद्र (कालभैरव) वाराणसी इस नामसे प्रसिद्ध महादेवकी पुरी में पहुँचे॥ १००-१०१॥

प्रविष्टमात्रे देवेशे ब्रह्महत्या कपर्दिनि।

हा हेत्युक्त्वा सनादंसा पातालं प्राप दुःखिता॥१०२॥

कपर्दी देवेशके वहाँ प्रवेश करते ही वह ब्रह्महत्या तीव्र स्वरसे हाहाकार करती हुई दुःखी होकर पाताल में चली गयी ॥ १०२॥

प्रविश्य परमं स्थानं कपालं ब्रह्मणो हरः।

गणानामग्रतो देवः स्थापयामास शंकरः॥ १०३॥

स्थापयित्वा महादेवो ददौ तच्च कलेवरम्।

उक्त्वा सजीवमस्त्वीशो विष्णवे स घृणानिधिः ॥१०४॥

श्रेष्ठ स्थान (वाराणसी)-में प्रविष्ट होकर देव हर शंकर (कालभैरव)-ने गणोंके सामने ब्रह्माके कपाल को स्थापित किया और उन्हीं करुणानिधि ईश महादेव (कालभैरव)-ने 'जीवित हो जाय' ऐसा कहकर (विष्वक्सेनका) कलेवर विष्णु (हरि भगवान्)-को दे दिया ॥ १०३-१०४॥

ये स्मरन्ति ममाजस्रं कापालं वेषमुत्तमम्।

तेषां विनश्यति क्षिप्रमिहामुत्र च पातकम्॥१०५॥

आगम्य तीर्थप्रवरे स्नानं कृत्वा विधानतः।

तर्पयित्वा पितॄन् देवान् मुच्यते ब्रह्महत्यया॥१०६॥

अशाश्वतं जगज्ज्ञात्वा येऽस्मिन् स्थाने वसन्ति वै।

देहान्ते तत् परं ज्ञानं ददामि परमं पदम्॥१०७॥

इतीदमुक्त्वा भगवान् समालिङ्य जनार्दनम्।

सहैव प्रमथेशानैः क्षणादन्तरधीयत॥१०८॥

मेरे इस कपालयुक्त उत्तम वेषका (रूपका) निरन्तर स्मरण करनेसे ऐहलौकिक तथा पारलौकिक सब पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। इस श्रेष्ठ (वाराणसी के कपालमोचन) तीर्थमें आकर स्नान करके विधिपूर्वक पितरों तथा देवताओंका तर्पण करनेसे ब्रह्महत्यासे मुक्ति मिल जाती है। संसारको अनित्य जानकर जो इस स्थानमें निवास करते हैं, उन्हें देहान्तके समयमें परम ज्ञान और परम पद प्रदान करता हूँ। ऐसा कहकर भगवान् (कालभैरव) जनार्दनका आलिंगनकर प्रमथेश्वरों के साथ ही क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये॥१०५-१०८॥

स लब्ध्वा भगवान् कृष्णो विष्वक्सेनं त्रिशूलिनः।

स्वं देशमगमत् तूर्णं गृहीत्वा परमं वपुः॥१०९॥

वे भगवान् कृष्ण (हरि) त्रिशूलीसे विष्वक्सेन को प्राप्तकर* अपना परम रूप धारणकर शीघ्र ही अपने स्थानको चले गये॥१०९॥

एतद् वः कथितं पुण्यं महापातकनाशनम्।

कपालमोचनं तीर्थं स्थाणोः प्रियकरं शुभम्॥११०॥

य इमं पठतेऽध्यायं ब्राह्मणानां समीपतः।

वाचिकैर्मानसैः पापैः कायिकैश्च विमुच्यते॥१११॥

आप लोगोंसे स्थाणु (शंकर)-को अत्यन्त प्रिय, महापातकोंको नष्ट करनेवाले, पवित्र एवं मङ्गलकारी इस कपालमोचन तीर्थके विषयमें मैंने बताया। जो ब्राह्मणोंके समीप इस अध्यायका पाठ करता है, वह कायिक, वाचिक तथा मानसिक (त्रिविध) पापोंसे मुक्त हो जाता है॥११०-१११॥