कूर्म महा पुराण
51 अध्याय
कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात
मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार
सूत उवाच
वेदव्यासावताराणि द्वापरे कथितानि तु।
महादेवावताराणि कलौ शृणुत सुव्रताः॥ १ ॥
आद्ये कलियुगे श्वेतो देवदेवो महाद्युतिः।
नाम्ना हिताय विप्राणामभूद् वैवस्वतेऽन्तरे॥ २ ॥
हिमवच्छिखरे रम्ये छगले पर्वतोत्तमे।
तस्य शिष्याः शिखायुक्ता बभूवुरमितप्रभाः॥ ३ ॥
श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः।
चत्वारस्ते महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४ ॥
सूतजी बोले-सुव्रतो! द्वापरमें (होनेवाले) वेदव्यास के अवतारोंको कहा गया, अब (आपलोग) कलियुग में होनेवाले महादेवके अवतारोंको सुनें-वैवस्वत मन्वन्तर के पहले कलियुगमें विप्रोंके हितार्थ अतितेजस्वी देवाधिदेव (शंकर) श्वेत नामसे पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके रमणीय छगल नामक शिखरपर अवतरित हुए। उनके शिष्य शिखायुक्त और अमित प्रभावाले हुए। श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित-ये चार वेदके पारंगत महात्मा ब्राह्मण (प्रथम कलियुगमें) थे॥१-४॥
सुभानो दमनश्चाथ सुहोत्रः कङ्कणस्तथा।
लोकाक्षिरथ योगीन्द्रो जैगीषव्यस्तु सप्तमे ॥ ५ ॥
अष्टमे दधिवाहः स्यान्नवमे वृषभः प्रभुः।
भृगुस्तु दशमे प्रोक्तस्तस्मादुनः परः स्मृतः॥ ६ ॥
द्वादशेऽत्रिः समाख्यातो बली चाथ त्रयोदशे।
चतुर्दशे गौतमस्तु वेदशीर्षा ततः परम्॥ ७ ॥
सुभान, दमन, सुहोत्र, कङ्कण और योगीन्द्र लोकाक्षि के रूपमें क्रमशः दूसरेसे छठे कलियुगतक महादेव का अवतार हुआ तथा सातवें (कलियुग)-में जैगीषव्य नामसे महादेवका अवतार हुआ। आठवेंमें दधिवाह, नवें में प्रभु वृषभ, दसवेंमें भृगु और उसके आगे (ग्यारहवें कलियुगमें) उग्रके रूपमें महादेवका अवतार हुआ। बारहवेंमें अत्रि, तेरहवेंमें बली, चौदहवेंमें गौतम और उसके बाद (पंद्रहवें कलियुगमें) वेदशी के रूपमें महादेव अवतरित हुए॥५-७॥
गोकर्णश्चाभवत् तस्माद् गुहावासः शिखण्ड्यथ।
जटामाल्यट्टहासश्च दारुको लाङ्गली क्रमात्॥ ८ ॥
श्वेतस्तथा परः शूली डिण्डी मुण्डी च वै क्रमात्।
सहिष्णुः सोमशर्मा च नकुलीशोऽन्तिमे प्रभुः॥ ९ ॥
तदनन्तर क्रमश: गोकर्ण, गुहावास, शिखण्डी, जटामाली, अट्टहास, दारुक, लाङ्गली और इनके बाद श्वेत, शूली, डिण्डी, मुण्डी, सहिष्णु, सोमशर्मा तथा अन्तिम प्रभु नकुलीशके रूपमें महादेवका अवतार हुआ॥८-९॥
वैवस्वतेऽन्तरे शम्भोरवतारास्त्रिशूलिनः।
अष्टाविंशतिराख्याता ह्यन्ते कलियुगे प्रभोः ।
तीर्थे कायावतारे स्याद् देवेशो नकुलीश्वरः॥१०॥
तत्र देवादिदेवस्य चत्वारः सुतपोधनाः।
शिष्या बभूवुश्चान्येषां प्रत्येकं मुनिपुंगवाः ॥११॥
प्रसन्नमनसो दान्ता ऐश्वरीं भक्तिमाश्रिताः।
क्रमेण तान् प्रवक्ष्यामि योगिनो योगवित्तमान्॥१२॥
वैवस्वत मन्वन्तरमें त्रिशूल धारण करनेवाले प्रभु शम्भुके अट्ठाईस अवतार कहे गये हैं। अन्तिम कलियुग में कायावतार नामक तीर्थमें देवेश्वर नकुलीश्वरके रूप में महादेवका अवतार होगा। मुनिपुंगवो! उस समय देवों के आदिदेव (महादेव)-के तीव्र तपस्याके धनी चार शिष्य हुए। अन्य अवतारोंमें भी प्रत्येकके (चार) शिष्य हुए। वे सभी प्रसन्न मनवाले, इन्द्रियनिग्रही और ईश्वर की भक्ति करनेवाले थे। उन श्रेष्ठ योग जाननेवाले योगियोंका मैं क्रमश: वर्णन करता हूँ-॥१०-१२ ।।
श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः ।
दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तथा।
विकेशश्च विशोकश्च विशापः शापनाशनः ॥१३॥
सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्दमो दुरतिक्रमः ।
सनः सनातनश्चैव कुमारश्च सनन्दनः ॥१४॥
दालभ्यश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः ।
सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपात्रज एव च॥१५॥
श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य, श्वेतलोहित, दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक, केतुमान्, विकेश, विशोक, विशाप, शापनाशन, सुमुख, दुर्मुख, दुर्दम, दुरतिक्रम, सनक, सनातन, सनत्कुमार, सनन्दन, महायोगी दालभ्य, सुधामा, विरजा और शङ्खपात्रज-ये धर्मात्मा और महान् ओजस्वी थे। १३-१५॥
सारस्वतस्तथा मेघो घनवाहः सुवाहनः ।
कपिलश्चासुरिश्चैव वोदुः पञ्चशिखो मुनिः॥१६॥
पराशरश्च गर्गश्च भार्गवश्चाङ्गिरास्तथा।
बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः ॥१७॥
लम्बोदरश्च लम्बश्च लम्ब लम्बकेशकः।
सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सत्यस्तथैव च ॥१८॥
सुधामा काश्यपश्चैव वसिष्ठो विरजास्तथा।
अत्रिरुग्रस्तथा चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः॥१९॥
कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशरीरः कुनेत्रकः।
कश्यपो ह्युशना चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः॥२०॥
उतथ्यो वामदेवश्च महाकायो महानिलः।
वाचश्रवाः सुपीकश्च श्यावाश्वः सपथीश्वरः॥२१॥
(ऐसे ही) सारस्वत, मेघ, घनवाह, सुवाहन, कपिल, आसुरि, वोढु, मुनि, पञ्चशिख, पराशर, गर्ग, भार्गव, अङ्गिरा, बलबन्धु, निरामित्र, तपोधन, केतुशृंग, लम्बोदर, लम्ब, लम्बाक्ष, लम्बकेशक, सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य, सत्य, सुधामा, काश्यप, वसिष्ठ, विरजा, अत्रि, उग्र, श्रवण, श्रविष्ठक, कुणि, कुणिबाहु, कुशरीर, कुनेत्रक, कश्यप, उशना, च्यवन, बृहस्पति, उतथ्य, वामदेव, महाकाय, महानिल, वाचवा, सुपीक, श्यावाश्व और सपथीश्वर (नामक शिष्य महादेवके अवतारोंके थे) ॥ १६-२१॥
हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षिः कुथुमिस्तथा।
सुमन्तुर्वर्चरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ।। २२॥
प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा।
भल्लापी मधुपिङ्गश्च श्वेतकेतुस्तपोनिधिः ।। २३॥
उशिजो बृहदुक्थश्च देवल: कपिरेव च।
शालिहोत्रोऽग्निवेश्यश्च युवनाश्वः शरद्वसुः॥२४॥
छगलः कुण्डकर्णश्च कुम्भश्चैव प्रवाहकः।
उलूको विद्युतश्चैव शाद्वलो ह्याश्वलायनः ॥२५॥
अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च।
कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रको ऋष्य एव च ॥ २६ ॥
(इनके अतिरिक्त) हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षि, कुथुमि, सुमन्तु, वर्चरी, विद्वान् कबन्ध, कुशिकन्धर, प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान्, गौतम, भल्लापी, मधुपिङ्ग, तपोनिधि श्वेतकेतु, उशिज, बृहदुक्थ, देवल, कपि, शालिहोत्र, अग्निवेश्य, युवनाश्व, शरद्धसु, छगल, कुण्डकर्ण, कुम्भ, प्रवाहक, उलूक, विद्युत, शाद्वल, आश्वलायन, अक्षपाद, कुमार, उलूक, वत्स, कुशिक, गर्ग, मित्रक और ऋष्य (नामक शिष्य थे) ॥२२-२६॥
शिष्या एते महात्मानः सर्वावर्तेषु योगिनाम्।
विमला ब्रह्मभूयिष्ठा ज्ञानयोगपरायणाः ॥२७॥
कुर्वन्ति चावताराणि ब्राह्मणानां हिताय हि।
योगेश्वराणामादेशाद् वेदसंस्थापनाय वै॥२८॥
योगियोंके* समस्त अवतारोंकी आवृत्तिमें ये ही महात्मा शिष्य होते हैं। ये सभी शुद्ध, ब्रह्मभूयिष्ठ और ज्ञान-योगपरायण हैं। ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये तथा वेदोंकी स्थापनाके लिये योगेश्वर(परब्रह्म)-के आदेश से (ये महात्मा) अवतार धारण करते हैं ॥ २७-२८॥
ये ब्राह्मणाः संस्मरन्ति नमस्यन्ति च सर्वदा।
तर्पयन्त्यर्चयन्त्येतान् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयुः ॥२९॥
इदं वैवस्वतं प्रोक्तमन्तरं विस्तरेण तु।
भविष्यति च सावर्णो दक्षसावर्ण एव च॥३०॥
दशमो ब्रह्मसावर्णो धर्मसावर्ण एव च।
द्वादशो रुद्रसावर्णो रोचमानस्त्रयोदशः।
भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्तो भविष्या मनवः क्रमात्॥३१॥
जो ब्राह्मण सर्वदा इनका स्मरण करते हैं, इन्हें नमस्कार करते हैं, इनका तर्पण करते हैं और इनकी पूजा करते हैं, वे ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरका विस्तारसे वर्णन किया। सावर्ण (आठवाँ) तथा (नवाँ) दक्षसावर्ण मन्वन्तर भविष्यमें होंगे। दसवाँ ब्रह्मसावर्ण, ग्यारहवाँ धर्मसावर्ण, बारहवाँ रुद्रसावर्ण तथा तेरहवाँ रोचमान मन्वन्तर है। चौदहवाँ भौत्य मन्वन्तर कहा गया है। ये मनु क्रमसे भविष्य में होंगे।। २९-३१॥
अयं वः कथितो ह्यंशः पूर्वो नारायणेरितः।
भूतभव्यैर्वर्तमानैराख्यानैरुपबृंहितः ॥३२॥
यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद् वा द्विजोत्तमान्।
स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणा सह मोदते॥३३॥
पठेद् देवालये स्नात्वा नदीतीरेषु चैव हि।
नारायणं नमस्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमम्॥३४॥
नमो देवादिदेवाय देवानां परमात्मने।
पुरुषाय पुराणाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥३५॥
मैंने नारायणद्वारा कहे गये भूत, भविष्य तथा वर्तमानके आख्यानोंसे उपबृंहित इस पूर्वभागको आप लोगोंसे कहा। जो (ब्राह्मण) इसे पढ़ेगा, सुनेगा अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको* सुनायेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्माके साथ आनन्द प्राप्त करेगा। स्नान करनेके अनन्तर नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरमें भक्तिभावसे पुरुषोत्तम नारायणको नमस्कार कर इसका पाठ करना चाहिये। देवोंके आदिदेव, देवोंके परमात्मा, पुराण पुरुष
कूर्मरूपी विष्णुको नमस्कार है॥ ३२-३५ ॥
Summary of chapter 49 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta outlines the geography, rivers, mountains, and righteous life of inhabitants in Plakshadvīpa, Shālmalīdvīpa, Kushadvīpa, Kraunchadvīpa, and Shākadvīpa. Inhabitants of these outer continents live long, disease-free lives worshipping Bhagavān Nārāyaṇa and Mahādeva through natural elemental vows.