कूर्म महा पुराण
30 अध्याय
वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य,
शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त
सूत उवाच
स शिष्यैः संवृतो धीमान् गुरुद्वैपायनो मुनिः।
जगाम विपुलं लिङ्गमोंकारं मुक्तिदायकम्॥ १ ॥
तत्राभ्यर्च्य महादेवं शिष्यैः सह महामुनिः।
प्रोवाच तस्य माहात्म्यं मुनीनां भावितात्मनाम्॥ २ ॥
सूतजी बोले-शिष्योंसे घिरे हुए बुद्धिमान् वे गुरु द्वैपायन मुनि मुक्ति प्रदान करनेवाले विशाल ओङ्कार लिङ्ग की संनिधिमें गये। शिष्योंके साथ महामुनिने वहाँ महादेवको भलीभाँति पूजा करके पवित्र आत्मावाले मुनियोंको उस ओङ्कार लिङ्गका माहात्म्य बताया ॥ १-२॥
इदं तद् विमलं लिङ्गमोंकारं नाम शोभनम्।
अस्य स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः॥ ३ ॥
एतत् परतरं ज्ञानं पञ्चायतनमुत्तमम्।
सेवितं सूरिभिर्नित्यं वाराणस्यां विमोक्षदम्॥ ४ ॥
अत्र साक्षान्महादेवः पञ्चायतनविग्रहः।
रमते भगवान् रुद्रो जन्तूनामपवर्गदः॥ ५ ॥
ओङ्कार नामवाला यह लिङ्ग पवित्र एवं सुन्दर है, इसके स्मरणमात्रसे सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। वाराणसीमें विद्वानोंके द्वारा मुक्ति प्रदान करनेवाले इस अतिश्रेष्ठ ज्ञानरूप उत्तम पञ्चायतनकी नित्य पूजा जाती है। यहाँ प्राणियोंको मोक्ष देनेवाले साक्षात् महादेव भगवान् रुद्र पञ्चायतन-शरीर धारणकर रमण करते रहते हैं॥३-५॥
यत् तत् गुपतं ज्ञानं पञ्चार्थमिति शब्दयते।
तदेतद् विमलं लिङ्गमोङ्कारे समवस्थितम्॥ ६ ॥
शान्त्यतीता तथा शान्तिर्विद्या चैव परा कला।
प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्च पञ्चा) लिङ्गमैश्वरम्॥ ७ ॥
पञ्चानामपि देवानां ब्रह्मादीनां सदाश्रयम्।
ओंकारबोधकं लिङ्गं पञ्चायतनमुच्यते॥ ८ ॥
संस्मरेदैश्वरं लिङ्गं पञ्चायतनमव्ययम्।
देहान्ते तत्परं ज्योतिरानन्दं विशते बुधः॥ ९ ॥
अत्र देवर्षयः पूर्वं सिद्धा ब्रह्मर्षयस्तथा।
उपास्य देवमीशानं प्राप्तवन्तः परं पदम्॥१०॥
मत्स्योदर्यास्तटे पुण्यं स्थानं गुह्यतमं शुभम्।
गोचर्ममात्रं विप्रेन्द्रा ओङ्कारेश्वरमुत्तमम्॥११॥
जो वह पाशुपत ज्ञान 'पञ्चार्थ' शब्दसे कहा जाता है, वही ज्ञान इस पवित्र लिङ्गके रूपमें ओङ्कार में अवस्थित है। अतीता शान्ति, शान्ति, उत्कृष्ट कलावाली विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति- इन्हीं पाँच अर्थों के लिये इनके प्रतिनिधि-रूपमें महादेवका (ओङ्कार) लिङ्ग प्रतिष्ठित है। ब्रह्मा आदि पाँच देवोंका भी नित्य आश्रयरूप यही ओङ्कारबोधक लिङ्ग पञ्चायतन कहलाता है। अविनाशी पञ्चायतनरूप ईश्वरीय लिङ्गका स्मरण करना चाहिये, ऐसा करनेसे मनुष्य देहान्त होने पर आनन्दस्वरूप परम ज्योतिमें प्रवेश करता है। पूर्वकाल में देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों तथा सिद्धोंने यहींपर भगवान् ईशान की उपासना कर परमपद प्राप्त किया था। विप्रेन्द्रो! मत्स्योदरी के किनारे गोचर्म के बराबर गुह्यतम शुभ पुण्य स्थान है, वही ओङ्कारेश्वरका उत्तम क्षेत्र है॥६-११॥
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं मध्यमेश्वरमुत्तमम्।
विश्वेश्वरं तथोंकारं कपर्दीश्वरमेव च॥१२॥
एतानि गुह्यलिङ्गानि वाराणस्यां द्विजोत्तमाः।
न कश्चिदिह जानाति विना शम्भोरनुग्रहात्॥१३॥
एवमुक्त्वा ययौ कृष्णः पाराशर्यो महामुनिः।
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं द्रष्टुं देवस्य शूलिनः॥१४॥
द्विजोत्तमो! कृत्तिवासेश्वर, श्रेष्ठ मध्यमेश्वर, विश्वेश्वर, ओङ्कारेश्वर तथा कपर्दीश्वर-ये वाराणसीके गुह्य लिङ्ग हैं, बिना शंकरकी कृपाके कोई इन्हें यहाँ जान नहीं सकता। ऐसा कहकर पराशरके पुत्र महामुनि कृष्णद्वैपायन शूलधारी महादेवके कृत्तिवासेश्वर नामक लिङ्गका दर्शन करने गये॥१२-१४॥
समभ्यर्च्य तथा शिष्यैर्माहात्म्यं कृत्तिवाससः।
कथयामास शिष्येभ्यो भगवान् ब्रह्मवित्तमः ॥ १५॥
ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् व्यासने शिष्यों के साथ लिङ्गका पूजनकर शिष्योंको कृत्तिवासेश्वरका माहात्म्य बतलाया ॥१५॥
अस्मिन् स्थाने पुरा दैत्यो हस्ती भूत्वा भवान्तिकम्।
ब्राह्मणान् हन्तुमायातो येऽत्र नित्यमुपासते॥१६॥
तेषां लिङ्गान्महादेव: प्रादुरासीत् त्रिलोचनः ।
रक्षणार्थं द्विजश्रेष्ठा भक्तानां भक्तवत्सलः॥१७॥
हत्वा गजाकृतिं दैत्यं शूलेनावज्ञया हरः।
वासस्तस्याकरोत् कृत्तिं कृत्तिवासेश्वरस्ततः॥१८॥
प्राचीन कालमें एक दैत्य हाथीका रूप धारणकर यहाँ शंकरके समीप नित्य उपासना करनेवाले ब्राह्मणों को मारनेके लिये आया। द्विजश्रेष्ठो! उन भक्तोंकी रक्षा के लिये इस लिङ्गसे भक्तवत्सल महादेव त्रिलोचन प्रकट हुए। हाथीकी आकृतिवाले उस दैत्यको अवज्ञापूर्वक शूलसे मारकर शंकरने उसके चर्मका वस्त्र धारण किया। उसी समयसे वे कृत्तिवासेश्वर हो गये ॥१६-१८॥
अत्र सिद्धिं परां प्राप्ता मुनयो मुनिपुंगवाः।
तेनैव च शरीरेण प्राप्तास्तत् परमं पदम्॥१९॥
विद्या विद्येश्वरा रुद्राः शिवाये च प्रकीर्तिताः।
कृत्तिवासेश्वरं लिङ्गं नित्यमावृत्य संस्थिताः॥२०॥
ज्ञात्वा कलियुगं घोरमधर्मबहुलं जनाः।
कृत्तिवासं न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते न संशयः॥२१॥
जन्मान्तरसहस्रेण मोक्षोऽन्यत्राप्यते न वा।
एकेन जन्मना मोक्षः कृत्तिवासे तु लभ्यते॥ २२ ॥
श्रेष्ठ मुनियो! यहाँ मुनियोंने परम सिद्धि प्राप्त की और उसी शरीरसे परम पद अर्थात् मोक्ष भी प्राप्त किया। विद्या, विद्येश्वर, रुद्र एवं शिव नामसे कहे जानेवाले कृत्तिवासेश्वर लिङ्गको सभी देवता नित्य आवृतकर स्थित रहते हैं। घोर कलियुग और अधार्मिक लोगों की बहुलताको समझकर जो लोग कृत्तिवासेश्वरका परित्याग नहीं करते वे नि:संदेह कृतार्थ हो जाते हैं। हजारों जन्मान्तरों में भी दूसरे स्थानपर मोक्ष प्राप्त होता हो अथवा नहीं, किंतु कृत्तिवास-क्षेत्रमें एक जन्ममें ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १९-२२ ॥
आलयः सर्वसिद्धानामेतत् स्थानं वदन्ति हि।
गोपितं देवदेवेन महादेवेन शम्भुना ॥२३॥
युगे युगे ह्यत्र दान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः।
उपासते महादेवं जपन्ति शतरुद्रियम्॥ २४॥
स्तुवन्ति सततं देवं त्र्यम्बकं कृत्तिवाससम्।
ध्यायन्ति हृदये देवं स्थाणुं सर्वान्तरं शिवम्॥२५॥
लोगोंका कहना है कि सभी सिद्धोंका आश्रयरूप यह स्थान देवाधिदेव महादेव शम्भुके द्वारा सुरक्षित है। प्रत्येक युगमें वेदमें पारंगत इन्द्रियनिग्रही ब्राह्मण यहाँ महादेवकी उपासना करते हैं और शतरुद्रियका जप करते हैं। हृदयमें सर्वान्तरात्मा स्थाणुदेव शिवका ध्यान करते हुए कृत्तिवासा त्र्यम्बक देव (त्रिलोचन महादेव) की निरन्तर स्तुति करते हैं ।। २३-२५ ॥
गायन्ति सिद्धाः किल गीतकानि
ये वाराणस्यां निवसन्ति विप्राः।
तेषामथैकेन भवेन्मुक्ति-
र्ये कृत्तिवासं शरणं प्रपन्नाः॥२६॥
सम्प्राप्य लोके जगतामभीष्टं
सुदुर्लभं विप्रकुलेषु जन्म।
ध्याने समाधाय जपन्ति रुद्रं
ध्यायन्ति चित्ते यतयो महेशम्॥ २७॥
विप्रो! सिद्धजन यह गीत गाते हैं कि जो लोग वाराणसी में निवास करते हैं और कृत्तिवासा भगवान् शिवकी शरण ग्रहण करते हैं, उनकी एक ही जन्म में मुक्ति हो जाती है। इस लोकमें संसारको अभीष्ट अत्यन्त दुर्लभ विप्रकुलमें जन्म प्राप्तकर संयमी लोग ध्यान में समाधिस्थ होकर रुद्रका जप करते हैं और चित्त में महेश्वरका ध्यान करते रहते हैं ॥ २६-२७॥
आराधयन्ति प्रभुमीशितारं
वाराणसीमध्यगता मुनीन्द्राः।
यजन्ति यज्ञैरभिसंधिहीनाः
स्तुवन्ति रुद्रं प्रणमन्ति शम्भुम्॥२८॥
वाराणसीमें निवास करनेवाले श्रेष्ठ मुनिजन प्रभु शंकर की आराधना करते हैं, फलकी आकांक्षा किये बिना यज्ञोंद्वारा (उनका) यजन करते हैं, रुद्र-रूप में उनकी स्तुति करते हैं और शम्भु-रूपमें उन्हें प्रणाम करते हैं ॥ २८॥
नमो भवायामलयोगधाम्ने
स्थाणुं प्रपद्ये गिरिशं पुराणम्।
स्मरामि रुद्रं हृदये निविष्टं
जाने महादेवमनेकरूपम् ॥ २९॥
विशुद्ध योगके आश्रयरूप भवको नमस्कार है, मैं स्थाणु पुराण गिरिशकी शरण ग्रहण करता हूँ, हृदय में अवस्थित रुद्रका स्मरण करता हूँ और महादेव को अनेक रूपोंमें स्थित मानता हूँ॥२९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे त्रिंशोऽध्यायः॥३०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
Summary of chapter 30 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Vyāsadeva continues his dialogue with Arjuna, revealing that despite the rampant moral decay in Kaliyuga, it possesses one supreme spiritual advantage. In Kṛtayuga, spiritual liberation required centuries of arduous Tapas, in Tretāyuga elaborate Yajñas, and in Dvāparayuga detailed Pūjā; but in Kaliyuga, simple, sincere chanting of the divine names of Nārāyaṇa and Mahādeva, combined with pure devotion and truthfulness, yields instant spiritual merit and liberation. Vyāsa urges spiritual seekers in Kaliyuga to take refuge in Hari-Hara worship and righteous living to easily overcome the illusions of Māyā.