कूर्म महा पुराण
14 अध्याय
ब्रह्मचारीके आचारका वर्णन, गुरुसे अध्ययन आदिकी विधि, ब्रह्मचारीका धर्म, गुरु
तथा गुरुपत्नीके साथ व्यवहारका वर्णन, वेदाध्ययन और गायत्रीकी महिमा,
अनध्यायोंका वर्णन, ब्रह्मचारी-धर्मका उपसंहार
व्यास उवाच
एवं दण्डादिभिर्युक्तः शौचाचारसमन्वितः।
आहूतोऽध्ययनं कुर्याद् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥१॥
नित्यमुद्यतपाणि: स्यात् साध्वाचारः सुसंयतः।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः॥२॥
प्रतिश्रवणसम्भाषे शयानो न समाचरेत्।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः॥३॥
नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत्॥४॥
व्यासजीने कहा-इस प्रकार दण्ड आदिसे युक्त और शौचाचारसे सम्पन्न (ब्रह्मचारी)-को गुरुजीके द्वारा बुलाये जानेपर उनके अभिमुख होकर अध्ययन करना चाहिये। सदाचारसम्पन्न और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी नित्य उत्तरीयसे दाहिना हाथ बाहर निकाले हुए गुरुके द्वारा बैठनेके लिये कहे जानेपर उनके सम्मुख बैठे। सोते हुए, बैठे हुए, भोजन करते हुए, खड़े होकर तथा गुरुकी ओर पीठ करके उनकी किसी आज्ञाका ग्रहण या उनसे बातचीत नहीं करनी चाहिये। गुरुके पासमें शिष्यको शय्या या आसन सदा गुरुकी शय्या एवं आसनकी अपेक्षा नीचा (कम ऊँचा) होना चाहिये। गुरुके देखते रहनेपर मनमाने ढंगसे नहीं बैठना चाहिये॥१-४॥
नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम्।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषणचेष्टितम्॥ ५ ॥
इनका (गुरुका) केवल नाम (सम्मानबोधक उपाधि आदिसे शून्य नाम) परोक्षमें भी नहीं लेना चाहिये। इनके चलनेकी क्रिया, बात करनेके ढंग और अन्य क्रियाओंकी नकल उपहासकी दृष्टि से नहीं करनी चाहिये॥५॥
गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा चापि प्रवर्तते।
कौँ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः॥ ६ ॥
दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः।
न चैवास्योत्तरं ब्रूयात् स्थितो नासीत संनिधौ॥ ७ ॥
गुरुका जहाँ परीवाद (विद्यमान दोषका कथन) हो रहा हो अथवा जहाँ उनकी निन्दा हो रही हो, वहाँ अपने दोनों कानोंको बंद कर ले अथवा वहाँसे अन्यत्र चला जाय। दूर विद्यमान शिष्य (किसी अन्यको गुरुकी पूजाके लिये नियुक्त कर उसके द्वारा) गुरुकी पूजा न करवाये, (यदि स्वयं गुरुके समीप जाकर पूजा करनेमें समर्थ हो। स्वयं गुरुके समीप जानेमें असमर्थ होनेपर तो अन्यके द्वारा भी गुरुकी पूजा करवायी जा सकती है।) क्रोधके आवेशमें रहनेपर शिष्यको स्वयं भी गुरुकी पूजा नहीं करनी चाहिये। यदि गुरु स्त्रीके समीप हों तो उस समय उनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। गुरुकी बातका उत्तर नहीं देना चाहिये और गुरुके निकट रहनेपर उनकी आज्ञाके बिना बैठना भी नहीं चाहिये॥६-७॥
उदकुम्भं कुशान् पुष्पं समिधोऽस्याहरेत् सदा।
मार्जनं लेपनं नित्यमङ्गानां वै समाचरेत्॥ ८ ॥
नास्य निर्माल्यशयनं पादुकोपानहावपि।
आक्रमेदासनं चास्य छायादीन् वा कदाचन॥ ९ ॥
साधयेद् दन्तकाष्ठादीन् लब्धं चास्मै निवेदयेत्।
अनापृच्छ्य न गन्तव्यं भवेत् प्रियहिते रतः॥१०॥
(शिष्यको चाहिये कि ) गुरुके लिये सर्वदा जलसे पूर्ण घड़ा, कुश, पुष्प तथा समिधा लाये और नित्य उनके अङ्गोंका मार्जन (गुरुको स्नान कराना) तथा (गन्धादिद्वारा) लेपन (शरीरका सुगन्धीकरण) करे। उनके निर्माल्य (गुरुकी सेवामें समर्पित माला आदि), शय्या, खड़ाऊँ, जूता, आसन तथा छाया आदिका कभी भी लंघन नहीं करना चाहिये। गुरुके लिये दन्तकाष्ठ
(दाँतोंको स्वच्छ करनेके लिये दतुअन) आदि लाये और (भिक्षादिमें) प्राप्त पदार्थोंको गुरुको निवेदित करे। गुरुसे बिना पूछे कहीं जाये नहीं तथा सदा गुरुके प्रिय तथा हित करने में लगा रहे ॥८-१०॥
न पादौ सारयेदस्य संनिधाने कदाचन।
जृम्भितं हसितं चैव कण्ठप्रावरणं तथा।
वर्जयेत् संनिधौ नित्यमवस्फोटनमेव च ॥११॥
यथाकालमधीयीत यावन्न विमना गुरुः।
आसीताधो गुरोः कूर्चे फलके वा समाहितः ॥१२॥
गुरुके समीप कभी भी पैर फैलाकर बैठना नहीं चाहिये और उनके समीप जंभाई, हँसी, कण्ठाच्छादन (सुन्दर माला, हार आदि गले में पहनना) तथा ताली इत्यादिकी ध्वनि (ताल ठोंकना आदि निरर्थक एवं उद्दण्डता-सूचक हलचल) न करे। अध्ययन तबतक करते रहना चाहिये जबतक गुरु बेमन न हो जायँ (अध्यापनके प्रति सोत्साह रहें)। सावधानीपूर्वक गुरुके सम्मुख नीचे कुशासन या काष्ठासन इत्यादिपर बैठना चाहिये॥११-१२॥
आसने शयने याने नैव तिष्ठेत् कदाचन।
धावन्तमनुधावेत गच्छन्तमनुगच्छति॥१३॥
गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये ॥१३॥
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च।
आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च ॥१४॥
जितेन्द्रियः स्यात् सततं वश्यात्माक्रोधनः शुचिः ।
प्रयुञ्जीत सदा वाचं मधुरां हितभाषिणीम्॥१५॥
बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, वटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणी का प्रयोग करे ॥ १४-१५॥
गन्धमाल्यं रसं कल्यां शुक्तं प्राणिविहिंसनम्।
अभ्यङ्गं चाञ्जनोपानच्छत्रधारणमेव च ॥१६॥
कामं लोभं भयं निद्रां गीतवादित्रनर्तनम्।
आतर्जनं परीवादं स्त्रीप्रेक्षालम्भनं तथा।
परोपघातं पैशुन्यं प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥१७॥
ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगुलखोरी आदिका परित्याग करे॥१६-१७॥
उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकां कुशान्।
आहरेद् यावदानि भैक्ष्यं चाहरहश्चरेत्॥१८॥
कृतं च लवणं सर्वं वयँ पर्युषितं च यत्।
अनृत्यदर्शी सततं भवेद् गीतादिनिःस्पृहः ॥१९॥
नादित्यं वै समीक्षेत न चरेद् दन्तधावनम्।
एकान्तमशुचिस्त्रीभिः शूद्रान्त्यैरभिभाषणम्॥२०॥
जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश-इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये। प्रतिदिन भिक्षा
माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे निःस्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना चाहिये एवं दन्तधावन नहीं करना चाहिये। एकान्तमें अपवित्र स्त्रियों, शूद्रों तथा अन्त्यजोंसे सम्भाषण नहीं करना चाहिये ॥ १८-२०॥
गुरूच्छिष्टं भेषजार्थं प्रयुञ्जीत न कामतः।
मलापकर्षणस्नानं नाचरेद्धि कदाचन॥२१॥
न कुर्यान्मानसं विप्रो गुरोस्त्यागे कदाचन।
मोहाद् वा यदि वा लोभात् त्यक्तेन पतितो भवेत् ॥ २२॥
गुरुसे बचा हुआ भोजन लोभवश नहीं करना चाहिये। कभी भी शरीरके मैलको दूर करते हुए रागवश स्नान नहीं करना चाहिये। (ब्रह्मचर्यव्रतका अङ्गभूत स्नान ही यथाविधि करना चाहिये)। विप्रको (द्विजको) गुरुका कभी मनसे भी त्याग करनेका विचार नहीं करना चाहिये। मोह या लोभसे इनका (गुरुका) त्याग करनेसे वह (द्विज) पतित हो जाता है ॥ २१-२२ ॥
लौकिकं वैदिकं चापि तथाध्यात्मिकमेव च।
आददीत यतो ज्ञानं न तं द्रुह्येत् कदाचन ॥२३॥
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।
उत्पथप्रतिपन्नस्य मनुस्त्यागं समब्रवीत्॥२४॥
जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक किसी भी प्रकारका ज्ञान प्राप्त करे, उससे कभी भी द्रोह न करे। महापातकयुक्त कार्य और अकार्यको न जाननेवाले तथा कुमार्गगामी गुरुका त्याग करना चाहिये-ऐसा मनुका कहना है॥ २३-२४॥
गुरोर्गुरौ संनिहिते गुरुवद् भक्तिमाचरेत्।
न चातिसृष्टो गुरुणा स्वान् गुरूनभिवादयेत्।। २५ ।।
विद्यागुरुष्वेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु।
प्रतिषेधत्सु चाधर्माद्धितं चोपदिशत्स्वपि॥ २६॥
श्रेयस्सु गुरुवद् वृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रेषु दारेषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु॥२७॥
गुरुके गुरुका यदि संनिधान प्राप्त हो तो उनके प्रति गुरुके समान ही अभिवादन आदि व्यवहार करना चाहिये और (गुरुगृहमें रहते हुए शिष्यको) गुरुकी अनुमतिके बिना अपने (माता-पितादि) गुरुजनोंका अभिवादन नहीं करना चाहिये। विद्या देनेवाले गुरुओं (उपाध्यायों), अपने जन्मके कारण-रूप (माता-पितादि), अधर्मसे रोकनेवालों और हितकारी धर्मतत्त्वका उपदेश देनेवालोंके प्रति नित्य इसी प्रकारका गुरुके समान ही आचरण करना चाहिये। विद्या एवं तपमें अपनी अपेक्षा अधिक समृद्ध लोगोंके प्रति, अपनी अवस्थाकी दृष्टिसे बड़े, समानजातीय गुरुपत्नी-पुत्रोंके प्रति और गुरुकी ज्ञाति (बन्धु-बान्धव) पितृव्य (चाचा) आदिके प्रति सदा गुरुके समान ही आदरपूर्ण व्यवहार करना चाहिये ॥ २५-२७॥
बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि।
अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ॥२८॥
उत्सादनं वै गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने।
न कुर्याद् गुरुपुत्रस्य पादयोः शौचमेव च ॥ २९॥
गुरुवत् परिपूज्यास्तु सवर्णा गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु सम्पूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ॥३०॥
अपनेसे छोटा गुरुका पुत्र अथवा समान अवस्थावाला तथा यज्ञकर्ममें (अपना) शिष्य होनेपर भी यदि वह अध्यापन करता हो तो गुरुके समान ही सम्मान प्राप्त करने योग्य है। किंतु गुरु-पुत्रके शरीरकी मालिश, उसे स्नान कराना, उसका उच्छिष्ट भोजन तथा उसके पादका प्रक्षालन नहीं करना चाहिये। गुरुकी सवर्ण स्त्रियाँ गुरुके समान ही पूज्य हैं, पर (गुरुकी) असवर्ण पत्नियोंकी केवल प्रत्युत्थान (उनके आनेपर खड़े हो जाना) एवं अभिवादनके द्वारा ही पूजा करनी चाहिये ॥ २८-३० ॥
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च।
गुरुपल्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम्॥३१॥
गुरुपत्नी तु युवती नाभिवाद्येह पादयोः।
कुर्वीत वन्दनं भूम्यामसावहमिति ब्रुवन्॥३२॥
गुरुपत्नीके शरीरमें उबटन लगाना, उन्हें स्नान कराना, उनके शरीरकी मालिश और केशोंके सँवारनेका कार्य नहीं करना चाहिये। यदि गुरुपत्नी युवावस्थावाली हों तो उनके चरणोंको छूकर प्रणाम नहीं करना चाहिये। 'मैं अमुक हूँ' ऐसा कहते हुए उनके सम्मुख पृथ्वीपर प्रणाम करना चाहिये ।। ३१-३२॥
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम्।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन्॥३३॥
मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूश्चाथ पितृष्वसा।
सम्पूज्या गुरुपत्नीव समास्ता गुरुभार्यया॥३४॥
भ्रातुर्भार्योपसंग्राह्या सवर्णाहन्यहन्यपि।
विप्रोष्य तूपसंग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः॥३५॥
पर यदि शिष्य प्रवाससे आये तो शिष्टोंके आचारका स्मरण करते हुए युवती गुरुपत्नीका पादग्रहणपूर्वक ही अभिवादन करे। मौसी, मामी, सास और बुआ (फुआ)-ये गुरुकी पत्नीके समान पूज्य हैं। ये सभी गुरुपत्नीके समान ही हैं। भाईकी सवर्ण स्त्री (भाभी)- को प्रतिदिन अवश्य प्रणाम करना चाहिये। ज्ञाति (पितापक्षके चाचा आदि), सम्बन्धी (मातापक्षके नाना
आदि)-की पत्नियोंका तो प्रवाससे आनेपर अवश्य अभिवादन करना चाहिये ॥ ३३-३५॥
पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि।
मातृवद् वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी॥३६॥
एवमाचारसम्पन्नमात्मवन्तमदाम्भिकम्
वेदमध्यापयेद् धर्मं पुराणाङ्गानि नित्यशः॥ ३७॥
माता-पिताकी बहिन तथा अपनी बड़ी बहिनके प्रति भी माताके समान व्यवहार करना चाहिये, किंतु माता इनसे श्रेष्ठ होती है। इस प्रकारके सदाचारसे सम्पन्न, आत्मवान् तथा दम्भरहित (ब्रह्मचारी)-को ही नित्य वेद, धर्मशास्त्र, पुराण और वेदाङ्गोंको पढ़ाना चाहिये ॥ ३६-३७॥
संवत्सरोषिते शिष्ये गुरुर्ज्ञानमनिर्दिशन्।
हरते दुष्कृतं तस्य शिष्यस्य वसतो गुरुः॥३८॥
आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः।
शक्तोऽन्नदोऽर्थी स्वःसाधुरध्याप्या दश धर्मतः ॥ ३९॥
कृतज्ञश्च तथाद्रोही मेधावी शुभकृन्नरः।
आप्तः प्रियोऽथ विधिवत् षडध्याप्या द्विजातयः।
एतेषु ब्राह्मणो दानमन्यत्र तु यथोदितान्॥४०॥
एक वर्षसे यथाविधि गुरुकी सेवा करते हुए उनके समीप निवास करनेवाले शिष्यको यदि गुरु ज्ञानका उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते हैं तो शिष्यके दुष्कृत उनमें आ जाते हैं। आचार्यका पुत्र, सेवा-शुश्रूषा करनेवाला, ज्ञान प्रदान करनेवाला (एक विद्या देकर दूसरी विद्या लेनेवाला), धार्मिक, पवित्र, शक्तिसम्पन्न (अध्ययनके सामर्थ्यसे युक्त), अन्नदाता (गुरुकी अपेक्षाके अनुसार पर्याप्त अन्न देनेवाला), अर्थी (गुरुकी सेवामें पर्याप्त धन देनेवाला), साधु (शीलवान्) तथा आत्मीय-ये दस धर्मकी मर्यादासे अध्यापन कराने योग्य हैं। कृतज्ञ, अद्रोही, मेधासम्पन्न, कल्याण करनेवाला, विश्वस्त तथा प्रिय व्यक्ति-ये छः प्रकारके द्विजाति भी विधिपूर्वक पढ़ाने योग्य हैं। इन्हें ब्रह्मज्ञान, वेदज्ञान प्रदान करना चाहिये। इनसे अतिरिक्त जो जिज्ञासु हों उन्हें अन्य यथापेक्ष ज्ञान देना चाहिये । ३८-४०॥
आचम्य संयतो नित्यमधीयीत उदङ्मुखः।
उपसंगृह्य तत्पादौ वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्।
अधीष्व भो इति ब्रूयाद् विरामोऽस्त्विति चारमेत् ॥४१॥
आचमन करके संयत होकर उत्तरकी ओर मुख करके गुरुके चरणोंमें प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए नित्य अध्ययन करना चाहिये। (गुरुके द्वारा) 'पढ़ो' कहनेपर अध्ययन प्रारम्भ करे और 'विराम हो' ऐसा कहनेपर अध्ययन बंद कर दे॥४१॥
प्राक्कूलान् पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः।
प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओङ्कारमर्हति ॥४२॥
ब्राह्मणः प्रणवं कुर्यादन्ते च विधिवद् द्विजः।
कुर्यादध्ययनं नित्यं स ब्रह्माञ्जलिपूर्वतः॥४३॥
सर्वेषामेव भूतानां वेदश्चक्षुः सनातनम्।
अधीयीताप्ययं नित्यं ब्राह्मण्याच्च्यवतेऽन्यथा॥४४॥
पूर्व दिशाकी ओर अग्रभागवाले कुशोंके आसनपर बैठकर, दोनों हाथोंमें विद्यमान पवित्र कुशोंसे पावित (पवित्रीकृत) होकर तथा तीन प्राणायामोंद्वारा पवित्र होनेके अनन्तर ही (द्विज) अध्ययनके लिये ओंकारके उच्चारणका अधिकारी होता है। द्विजन्मा (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को (स्वाध्यायके) आरम्भ और अन्तमें विधिपूर्वक प्रणवका उच्चारण करना चाहिये। नित्य अञ्जलिबद्ध होकर ही अध्ययन (स्वाध्याय) करना चाहिये। सभी प्राणियोंके लिये वेद सनातन नेत्र-रूप हैं। (ब्राह्मणको) नित्य इनका अध्ययन करना चाहिये अन्यथा वह ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है ।। ४२-४४॥
योऽधीयीत ऋचो नित्यं क्षीराहुत्या स देवताः।
प्रीणाति तर्पयन्त्येनं कामैस्तृप्ताः सदैव हि॥४५॥
यजूंष्यधीते नियतं दध्ना प्रीणाति देवताः।
सामान्यधीते प्रीणाति घृताहुतिभिरन्वहम्॥४६॥
अथर्वाङ्गिरसो नित्यं मध्वा प्रीणाति देवताः।
धर्माङ्गानि पुराणानि मांसैस्तर्पयते सुरान्॥४७॥
जो द्विज नित्य ऋग्वेदका अध्ययन करता है और देवताओंको क्षीरकी आहुतियोंसे प्रसन्न करता है, देवता उसकी कामनाएँ पूर्णकर सदैव तृप्त करते हैं। (ऐसे ही) जो द्विज नियमपूर्वक याजुष मन्त्रोंका अध्ययन करता है और दधि (-की आहुतियों)-से देवताओंको प्रसन्न करता है, उसकी भी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी प्रकार जो द्विज साममन्त्रोंका अध्ययन करता
और प्रतिदिन घृतकी आहुतियोंसे देवोंको प्रसन्न करता है तो उसकी भी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। अथर्ववेदका भी अध्ययन करनेवाला (द्विज) मधु (-की आहुतियों)- द्वारा देवताओंको प्रसन्नकर अभिलषित प्राप्त करता है। धर्मशास्त्र, वेदाङ्गों तथा पुराणोंका अध्ययन करनेवाले
यथोपलब्ध पदार्थोंसे देवताओंको संतृप्तकर इष्ट प्राप्त करते हैं ॥ ४५-४७॥
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमाश्रितः।
गायत्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः॥४८॥
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्।
गायत्रीं वै जपेन्नित्यं जपयज्ञः प्रकीर्तितः॥४९॥
गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलयाऽतोलयत् प्रभुः।
एकतश्चतुरो वेदान् गायत्री च तथैकतः॥५०॥
नित्यकर्मकी विधिका आश्रय लेकर वनमें जाकर सावधानीपूर्वक जलके समीप नियमितरूपसे गायत्री (-मन्त्र)- -का जप भी करे। गायत्रीदेवी (मन्त्र)-का हजार बार जप करना श्रेष्ठ, सौ बारका जप मध्यम तथा दस बार जप करना निम्न कोटिका है। गायत्रीका नित्य जप करना चाहिये। इसे जपयज्ञ कहा गया है। ईश्वरने गायत्री और वेदोंको तुलामें तौला। तुलामें एक ओर चारों वेदोंको और एक ओर गायत्रीको रखा (समग्र वेदोंका सार गायत्री-मन्त्र वेदोंके समान ही रहा)॥४८-५०॥
ओंकारमादितः कृत्वा व्याहृतीस्तदनन्तरम्।
ततोऽधीयीत सावित्रीमेकाग्रः श्रद्धयान्वितः॥५१॥
आदिमें ओंकार लगाकर तदनन्तर (भूर्भुवः स्वः) महाव्याहृतियोंके साथ गायत्री (-मन्त्र)-का श्रद्धापूर्वक एकाग्रमनसे जप करना चाहिये ॥५१॥
पुराकल्पे समुत्पन्ना भूर्भुवःस्वः सनातनाः।
महाव्याहृतयस्तिस्त्रः सर्वाशुभनिबर्हणाः॥५२॥
प्रधानं पुरुषः कालो विष्णुर्ब्रह्मा महेश्वरः ।
सत्त्वं रजस्तमस्तिस्त्रः क्रमाद्व्याहृतयः स्मृताः॥५३॥
ओंकारस्तत् परं ब्रह्म सावित्री स्यात् तदक्षरम्।
एष मन्त्रो महायोगः सारात् सार उदाहृतः॥५४॥
योऽधीतेऽहन्यहन्येतां गायत्रीं वेदमातरम्।
विज्ञायार्थं ब्रह्मचारी स याति परमां गतिम्॥५५॥
गायत्री वेदजननी गायत्री लोकपावनी।
न गायत्र्याः परं जप्यमेतद् विज्ञाय मुच्यते॥५६॥
प्राचीन कल्पमें सभी प्रकारके अमङ्गलोंको दूर करनेवाली 'भूः' 'भुवः' तथा 'स्वः' ये तीन सनातन महाव्याहृतियाँ समुद्भूत हुईं। ये तीनों व्याहृतियाँ क्रमशः प्रधान, पुरुष तथा काल और विष्णु, ब्रह्मा, महेश्वर एवं सत्त्व, रज तथा तमोगुणरूप कही गयी हैं। ओंकार परम ब्रह्मस्वरूप और सावित्री अविनश्वर परम तत्त्वरूप है। इस मन्त्रको महायोग और सारोंका भी सार-रूप
कहा गया है। जो ब्रह्मचारी (गायत्री-मन्त्रके) अर्थको जानते हुए प्रत्येक दिन इन वेदमाता गायत्रीका अध्ययन करता है (जप करता है), उसे परमगति प्राप्त होती है। गायत्री वेदोंकी माता और लोकको पवित्र करनेवाली है। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र जपने योग्य नहीं है। इसके ज्ञानसे मुक्ति मिल जाती है॥ ५२-५६ ॥
श्रावणस्य तु मासस्य पौर्णमास्यां द्विजोत्तमाः।
आषाढ्यां प्रोष्ठपद्यां वा वेदोपाकरणं स्मृतम्॥५७॥
उत्सृज्य ग्रामनगरं मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्।
अधीयीत शुचौ देशे ब्रह्मचारी समाहितः॥५८॥
पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद् बहिरुत्सर्जनं द्विजः।
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्ने प्रथमेऽहनि॥५९॥
छन्दांस्यूर्ध्वमथोऽभ्यस्येच्छुक्लपक्षेषु वै द्विजः।
वेदाङ्गानि पुराणानि कृष्णपक्षे च मानवम्॥६०॥
श्रेष्ठ द्विजो! श्रावण, आषाढ़ अथवा भाद्रपद मासकी पौर्णमासीको (अपने-अपने गृह्यसूत्रानुसार) वेदोंका उपाकर्म (संस्कारपूर्वक वेदग्रहण) करना बतलाया गया है। ग्राम और नगरको छोड़कर ब्रह्मचारी ब्राह्मण (द्विजमात्र)-को एकाग्रचित्तसे पवित्र स्थानमें साढ़े पाँच महीनेतक (वेदोंका) अध्ययन करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि वह (पौष मासके) पुष्य नक्षत्रमें अथवा माघ मासके प्रथम दिन पूर्वाह्नमें (ग्रामके) बाहर वेदोंका उत्सर्जन (उत्सर्ग नामका संस्कारविशेष) करे। इसके बाद द्विजको शुक्लपक्षमें वेदोंका और कृष्णपक्षमें वेदाङ्गों, पुराण तथा मानवधर्मशास्त्र (मनुस्मृति आदि)- का अभ्यास करना चाहिये ॥५७-६०॥
इमान् नित्यमनध्यायानधीयानो विवर्जयेत्।
अध्यापनं च कुर्वाणो ह्यभ्यस्यन्नपि यत्नतः॥६१॥
कर्णश्रवेऽनिले रात्रौ दिवा पांशुसमूहने।
विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च सम्प्लवे।
आकालिकमनध्यायमेतेष्वाह प्रजापतिः॥२॥
अध्ययन करनेवालेको इन (अग्रनिर्दिष्ट) अनध्यायोंमें अध्ययनका सदा परित्याग करना चाहिये। इसी प्रकार अध्यापन और अभ्यास करते हुए भी प्रयत्नपूर्वक अनध्यायोंमें अध्ययनका त्याग करना चाहिये। प्रजापति (ब्रह्मा)-ने कहा है कि रात्रिमें कानोंसे सुने जाने योग्य वायुके बहते रहनेपर, दिनमें धूलके समूहको उड़ा लेनेमें समर्थ वायुके बहते रहनेपर, विद्युत्की चमक एवं (मेघ) गर्जनके साथ वर्षा होनेपर और बड़ी- बड़ी उल्काओंके इधर-उधर गिरते रहनेपर आकालिक (जबसे ये निमित्त आरम्भ हों तबसे अग्रिम दिन सूर्योदयपर्यन्त) अनध्याय होता है॥६१-६२ ॥
एतानभ्युदितान् विद्याद् यदा प्रादुष्कृताग्निषु।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने॥६३॥
निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने।
एतानाकालिकान् विद्यादनध्यायानृतावपि॥६४॥
प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिस्वने।
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषरात्रौ यथा दिवा॥६५॥
अग्निहोत्रके लिये प्रज्वलित अग्निकी अवस्था (प्रात:- सायं-संध्याकाल)-में जब ये सभी (उत्पात) एक साथ प्रकट हों और बिना ऋतुके मेघ दिखलायी पड़ें तो अनध्याय समझना चाहिये। वज्रपात, भूकम्प, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण एवं अन्य ताराओंके उपसर्ग (टूटना आदि) होनेपर, ऋतु होनेपर भी आकालिक (इन निमित्तोंके प्रारम्भसे अग्रिम दिन सूर्योदयपर्यन्त) अनध्याय समझना चाहिये। अग्निके प्रकट होने, बिजलीके चमकने तथा मेघके गर्जन होनेपर प्रकाश रहनेपर भी अनध्याय होता है। दिनके समान ही रात्रिमें भी अनध्याय होता है॥६३-६५॥
नित्यानध्याय एव स्याद् ग्रामेषु नगरेषु च।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च नित्यशः॥६६॥
अन्तःशवगते ग्रामे वृषलस्य च संनिधौ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च॥६७॥
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रे च विसर्जने।
उच्छिष्टः श्राद्धभुक् चैव मनसापिन चिन्तयेत्॥६८॥
प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोदिष्टस्य केतनम्।
त्र्यहं न कीर्तयेद् ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके॥६९॥
यावदेकोऽनुदिष्टस्य स्नेहो गन्धश्च तिष्ठति।
विप्रस्य विदुषो देहे तावद् ब्रह्म न कीर्तयेत्॥७०॥
धर्ममें निपुणता प्राप्त करनेकी इच्छावालोंके लिये नगर, ग्राम एवं दुर्गन्धयुक्त स्थानमें नित्य ही अनध्याय होता है। ग्राममें शव पड़े रहनेपर, अधार्मिक जनके समीप रहनेपर, रुदन होने और मनुष्योंका समूह (कार्यान्तरके लिये) एकत्र होनेपर अनध्याय होता है। जलके मध्य, आधी रातमें, मल-मूत्रके विसर्जनके समय, उच्छिष्ट अवस्थामें और श्राद्धमें भोजन करनेपर (श्राद्धमें निमन्त्रणसे लेकर श्राद्ध-भोजनके दिन-राततक) मनसे भी (वेदादिका) चिन्तन नहीं करना चाहिये। विद्वान् द्विजको एकोदिष्टका निमन्त्रण स्वीकार कर, राजाके पुत्रजन्म आदिके सूतक तथा राहुके (ग्रहणजन्य) सूतकमें तीन दिनतक वेदका अध्ययन नहीं करना
चाहिये। ब्राह्मणके शरीरमें जबतक एकोदिष्ट-श्राद्ध- सम्बन्धी भोजनके समयका (घृत आदि) स्निग्ध द्रव्य एवं (सुगन्धित द्रव्यका) लेप रहे, तबतक विद्वान् ब्राह्मणको वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये॥६६-७०॥
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा चैवावसक्थिकाम्।
नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च॥७१॥
नीहारे बाणशब्दे च संध्ययोरुभयोरपि।
अमावास्यां चतुर्दश्यां पौर्णमास्यष्टमीषु च ॥७२॥
उपाकर्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षपणं स्मृतम्।
अष्टकासु त्वहोरात्रं ऋत्वन्त्यासु च रात्रिषु॥७३॥
सोते हुए, उकडूं बैठे हुए (आसनारूढपाद), दोनों जानुओंको वस्त्रादिसे बाँधे हुए, मांस और सूतकादिसे सम्बन्धित अन्न खाकर, कुहरा पड़ते रहनेपर, बाणका शब्द होते समय, दोनों संध्याकालमें, अमावास्या, चतुर्दशी, पौर्णमासी तथा अष्टमी तिथियों में (अनध्याय होता है, अतः) अध्ययन नहीं करना चाहिये। उपाकर्म और उत्सर्ग नामक कर्म करनेके अनन्तर तीन राततक अनध्याय होता है। अष्टकाओंमें एक दिन-रात और ऋतुकी अन्तिम रात्रियोंमें अनध्याय होता है॥७१-७३॥
मार्गशीर्षे तथा पौषे माघमासे तथैव च।
तिस्रोऽष्टका: समाख्याता कृष्णपक्षे तु सूरिभिः॥ ७४॥
श्लेष्मातकस्य छायायां शाल्मलेर्मधुकस्य च।
कदाचिदपि नाध्येयं कोविदारकपित्थयोः॥७५॥
विद्वानोंने मार्गशीर्ष (अगहन), पौष और माघमास के कृष्णपक्षमें तीन अष्टकाओंका वर्णन किया है।लिसोढ़ा, सेमल, महुआ, कचनार और कैथ वृक्षकी छायामें कभी भी (वेदका) अध्ययन नहीं करना चाहिये।७४-७५॥
समानविद्ये च मृते तथा सब्रह्मचारिणि।
आचार्य संस्थिते वापि त्रिरात्रं क्षपणं स्मृतम्।।७६॥
छिद्राण्येतानि विप्राणां येऽनध्यायाः प्रकीर्तिताः।
हिंसन्ति राक्षसास्तेषु तस्मादेतान् विवर्जयेत्॥७७॥
अपने समान विद्या पढ़नेवाले, अपने ही समान सहपाठी ब्रह्मचारीकी मृत्यु होनेपर और आचार्यके अपने यहाँ आनेपर तीन रातका अनध्याय कहा गया है। जो अनध्याय बतलाये गये हैं, ये ब्राह्मणों (द्विजों)- के छिद्र-रूप हैं। इन अवसरोंपर राक्षस प्रहार करते हैं, इसलिये इनका परित्याग करना चाहिये । ७६-७७॥
नैत्यिके नास्त्यनध्यायः संध्योपासन एव च।
उपाकर्मणि कर्मान्ते होममन्त्रेषु चैव हि ॥७८॥
एकामृचमथैकं वा यजुः सामाथवा पुनः ।
अष्टकाद्यास्वधीयीत मारुते चातिवायति॥७९॥
अनध्यायस्तु नाङ्गेषु नेतिहासपुराणयोः ।
न धर्मशास्त्रेष्वन्येषु पर्वण्येतानि वर्जयेत्॥८०॥
एष धर्मः समासेन कीर्तितो ब्रह्मचारिणाम्।
ब्रह्मणाभिहितः पूर्वमृषीणां भावितात्मनाम्॥८१॥
नित्य-कर्म, संध्योपासन, उपाकर्म, आरब्धकर्मके अन्तमें और होममन्त्रोंमें अनध्याय नहीं होता (अर्थात् अनध्यायकालमें भी इनसे सम्बद्ध मन्त्र बोले जाते हैं।) अष्टकाओं और प्रबल वायुके चलनेपर भी ऋग्वेद, यजुर्वेद अथवा सामवेदके एक मन्त्रका पाठ (अवश्य) करना चाहिये। वेदाङ्गों और इतिहास-पुराणके अध्ययन और अन्य धर्मशास्त्रोंके अध्ययनमें अनध्याय नहीं होता, किंतु पर्वोमें इनके अध्ययनका त्याग करना चाहिये। संक्षेपमें यह ब्रह्मचारियोंका धर्म बतलाया गया। पूर्वकालमें ब्रह्माने इसे शुद्धात्मा ऋषियोंको बतलाया था। ७८-८१॥
योऽन्यत्र कुरुते यत्नमनधीत्य श्रुतिं द्विजः ।
स सम्मूढो न सम्भाष्यो वेदबाह्यो द्विजातिभिः॥८२॥
न वेदपाठमात्रेण संतुष्टो वै भवेद् द्विजः ।
पाठमात्रावसन्नस्तु पङ्के गौरिव सीदति॥८३॥
योऽधीत्य विधिवद्वेदं वेदार्थं न विचारयेत्।
स सान्वयः शूद्रकल्पः पात्रतां न प्रपद्यते॥८४॥
जो द्विज वेदका अध्ययन न कर अन्यत्र (दूसरे शास्त्रोंको पढ़नेमें) प्रयत्न करता है, उस वेदबाह्य मूढ व्यक्तिके साथ द्विजातियोंको सम्भाषण नहीं करना चाहिये*। द्विजको वेदके पाठमात्रसे संतुष्ट नहीं होना चाहिये। पाठमात्रसे वेदाध्ययनको समाप्त करनेवाला कीचड़में फँसी गौके समान कष्ट पाता है। जो विधिपूर्वक वेदका अध्ययन कर वेदके अर्थपर विचार नहीं करता है, वह अपने वंशके साथ शूद्रके समान है। वह (वास्तवमें) पात्रता (योग्यता)-को नहीं प्राप्त
करता है (अर्थात् वेदाध्ययन करनेवाला वेदार्थ अवश्य जाने यही तात्पर्य है।)॥८२-८४॥
यदि त्वात्यन्तिकं वासं कर्तुमिच्छति वै गुरौ।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोक्षणात्॥८५॥
यदि गुरुके पास ही जीवनपर्यन्त रहनेकी इच्छा हो तो शरीरके अन्त होनेतक बड़ी ही सावधानीपूर्वक इनकी (गुरुकी) सेवा करनी चाहिये ।। ८५ ॥
गत्वा वनं वा विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम्।
अधीयीत सदा नित्यं ब्रह्मनिष्ठः समाहितः॥८६॥
सावित्रीं शतरुद्रीयं वेदान्तांश्च विशेषतः।
अभ्यसेत् सततं युक्तो भस्मस्नानपरायणः ।।८७॥
अथवा (गुरु, गुरुपत्नी या उनके किसी सपिण्डके न रहनेपर) वनमें जाकर विधिपूर्वक अग्निमें हवन करना चाहिये और समाहित होकर ब्रह्ममें अत्यन्त निष्ठा रखते हुए नित्य वेदाभ्यास करना चाहिये। नित्य भस्म-स्नान करते हुए गायत्री, शतरुद्रिय और वेदान्त-शास्त्रोंका विशेष
रूपसे निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिये॥८६-८७॥
एतद् विधानं परमं पुराणं
वेदागमे सम्यगिहेरितं वः।
पुरा महर्षिप्रवराभिपृष्टः
स्वायम्भुवो यन्मनुराह देवः॥८८॥
एवमीश्वरसमर्पितान्तरो
योऽनुतिष्ठति विधि विधानवित्।
मोहजालमपहाय सोऽमृतो
याति तत् पदमनामयं शिवम्॥ ८९॥
वेदज्ञानकी प्राप्तिका यह सनातन विधान आप लोगोंको बतलाया गया, प्राचीन कालमें श्रेष्ठ महर्षियोंके पूछनेपर भगवान् स्वायम्भुव मनुने स्वयं ही इसे कहा था। इस प्रकार अपने अन्त:करणको ईश्वरमें समर्पित करके विधानको जाननेवाले जो पुरुष इस (ब्रह्मचर्य) विधिका अनुष्ठान (यथावत् पालन) करता है, वह क्रमशः समस्त मोह- जालका परित्यागकर, अमर होते हुए अनामय शिवपद को प्राप्त करता है तथा अमर हो जाता है अर्थात् ब्रह्मस्वरूप होकर कृतकृत्य हो जाता है॥ ८८-८९॥
Summary of chapter 63 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Ishvara describes the unmanifest Linga as the self-effulgent, formless, and auspicious representation of Parabrahma, which shines in the supreme space beyond the reach of physical senses. This divine reality is not illuminated by the sun, moon, stars, lightning, or fire, but shines by its own intrinsic spiritual radiance. Dedicated Brahmavits, through silent meditation upon the sacred Omkāra and total withdrawal of the Indriyas, behold this supreme Linga within their own hearts and attain absolute liberation.