6 अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी

भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना

ईश्वर उवाच

शृणुध्वमृषयः सर्वे यथावत् परमेष्ठिनः।

वक्ष्यामीशस्य माहात्म्यं यत्तद्वेदविदो विदुः॥१॥

ईश्वरने कहा-हे ऋषिगणो! आप सभी सुनें। मैं परमेष्ठी ईशके उस माहात्म्यका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, जिसे वेदज्ञ लोग जानते हैं॥ १॥

सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।

सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥२॥

सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।

मध्ये चान्तः स्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः॥३॥

मैं सनातन सर्वात्मा सभी लोकोंका एकमात्र निर्माण करनेवाला, सभी लोकोंका एक अद्वितीय रक्षक और सभी लोकोंका एकमात्र संहार करनेवाला हूँ। सभी वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता मैं ही हूँ। मध्य तथा अन्त सब कुछ मुझमें स्थित है, किंतु मैं सर्वत्र स्थित नहीं हूँ अर्थात् मेरी कोई सीमा नहीं है॥ २-३ ॥

भवद्भिद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।

ममैषा युपमा विप्रा मायया दर्शिता मया ॥४॥

सर्वेषामेव भावानामन्तरा समवस्थितः।

प्रेरयामि जगत् कृत्स्नं क्रियाशक्तिरियं मम॥५॥

ययेदं चेष्टते विश्वं तत्स्वभावानुवर्ति च।

सोऽहं कालो जगत् कृत्स्नं प्रेरयामि कलात्मकम्॥६॥

विप्रो! आप लोगोंने मेरे जिस अद्भुत रूपको देखा है, वह केवल मेरी उपमा (प्रतीक) है, जिसे मैंने (अपनी) मायाद्वारा दिखलाया। मैं सभी पदार्थों के भीतर स्थित (व्याप्त) रहते हुए सम्पूर्ण जगत्को प्रेरित करता हूँ। यह मेरी क्रियाशक्ति है। यह विश्व जिसके द्वारा चेष्टा करता है और जिसके स्वभावका अनुसरण करता है, कालरूप वही मैं सम्पूर्ण कलात्मक (अपने

अंशरूप) जगत्को प्रेरित करता हूँ॥४-६॥

एकांशेन जगत् कृत्स्नं करोमि मुनिपुंगवाः ।

संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु॥ ७ ॥

आदिमध्यान्तनिर्मुक्तो मायातत्त्वप्रवर्तकः।

क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ॥ ८ ॥

ताभ्यां संजायते विश्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम्।

महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृम्भते॥ ९ ॥

यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः।

हिरण्यगर्भो मार्तण्डः सोऽपि मद्देहसम्भवः ॥१०॥

मुनिश्रेष्ठो! मैं एक अंशसे सम्पूर्ण संसारकी रचना करता हूँ और दूसरे रूप(अंश)-से संहार करता हूँ इस प्रकारकी ये दोनों अवस्थाएँ मेरी ही हैं। आदि, मध्य और अन्तरहित माया-तत्त्वका प्रवर्तन करनेवाला मैं सृष्टिके आरम्भमें प्रधान तथा पुरुष-दोनोंको क्षुब्ध (प्रेरित) करता हूँ। उन दोनोंके परस्पर संयोगसे विश्व उत्पन्न होता है। महत्-तत्त्वादिके क्रमसे मेरा ही तेज विस्तारको प्राप्त होता है। जो सारे संसारके साक्षी और कालचक्रको चलानेवाले हिरण्यगर्भ मार्तण्ड (सूर्य) हैं, वे भी मेरे ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं॥७-१०॥

तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम्।

दत्तवानात्मजान् वेदान् कल्पादौ चतुरो द्विजाः॥११॥

स मन्नियोगतो देवो ब्रह्मा मद्भावभावितः।

दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम्॥१२॥

स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित्।

भूत्वा चतुर्मुखः सर्ग सृजत्येवात्मसम्भवः ॥१३॥

योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः।

ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम्॥१४॥

द्विजो! कल्पके आदिमें मैंने ही उन्हें अपना दिव्य, ऐश्वर्यमय सनातन ज्ञानयोग और अपनेसे उत्पन्न चारों वेद प्रदान किये। वे मेरे भावसे भावित देव ब्रह्मा मेरे आदेशसे मेरे उस दिव्य ऐश्वर्यको स्वयं सदा वहन करते हैं। सभी लोकोंका निर्माण करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले आत्मसम्भव (मुझसे ही उत्पन्न) वे (ब्रह्मा) मेरे निर्देशसे चार मुखवाले होकर सृष्टि की रचना करते हैं। जो लोकोंको उत्पन्न करनेवाले अव्यय अनन्त नारायण हैं और जगत्का परिपालन करते हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं ॥११-१४॥

योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः ।

मदाज्ञयासौ सततं संहरिष्यति मे तनुः॥१५॥

सभी प्राणियोंका संहार करनेवाले जो प्रभु कालात्मक रुद्र हैं, वे मेरी ही आज्ञासे निरन्तर संहार करते रहते हैं, वे भी मेरी मूर्ति हैं॥ १५ ॥

हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।

पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः॥१६॥

भुक्तमाहारजातं च पचते तदहर्निशम्।

वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियोगतः॥१७॥

जो देवताओंको हव्य (हवनीय द्रव्य) पहुँचाते हैं और कव्य ग्रहण करनेवाले पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं तथा जो पाकमें (सब कुछ पचा लेनेमें) समर्थ हैं, वे अग्निदेव भी मेरी ही शक्तिसे प्रेरित होकर यह सब करते हैं। ईश्वर (शंकर)-के निर्देशसे ही भगवान् वैश्वानर अग्नि रात-दिन ग्रहण किये गये आहार को पचाते रहते हैं ।। १६-१७॥

योऽपि सर्वाम्भसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः।

सोऽपि संजीवयेत् कृत्स्नमीशस्यैव नियोगतः॥१८॥

योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवः प्रभञ्जनः ।

मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि॥१९॥

योऽपि संजीवनो नृणां देवानाममृताकरः।

सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते॥२०॥

सम्पूर्ण जलके मूल कारण जो देवश्रेष्ठ वरुण हैं, वे भी ईश्वरके ही निर्देशसे सम्पूर्ण विश्वको जीवन (जल) प्रदान करते हैं, जो प्राणियोंके भीतर और बाहर वर्तमान रहनेवाले वायुदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं। मनुष्योंको जीवित रखनेवाले जो देवताओं के अमृतके निधान सोमदेव (चन्द्रमा) हैं, वे भी मेरे ही निर्देशसे प्रेरित होकर कार्य करते हैं॥१८-२०॥

यः स्वभासा जगत् कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा।

सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयम्भुवः॥२१॥

योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः।

यज्वनां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥२२॥

यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह।

यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगतः ।। २३॥

योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां सम्प्रदायकः।

सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा॥२४॥

यः सर्वरक्षसां नाथस्तामसानां फलप्रदः।

मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा॥२५॥

जो अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण संसारको सदा प्रकाशित करते हैं, वे सूर्यदेव भी स्वयम्भू (ईश्वर)-की आज्ञा से वृष्टिका विस्तार करते हैं। जो सारे संसारके शासक, सभी देवताओंके ईश्वर तथा यज्ञ करनेवालोंको फल प्रदान करनेवाले इन्द्रदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्रवृत्त होते हैं। जो दुष्टोंके शासक हैं और नियमके अनुसार व्यवहार करनेवाले विवस्वान्के पुत्र यमदेव हैं, वे भी देवाधिदेव (शंकर)-के निर्देशसे व्यवहार करते हैं। जो सभी प्रकारके सम्पत्तियों के स्वामी और धन प्रदान करनेवाले कुबेर हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे ही सदा प्रवृत्त होते हैं। जो सभी राक्षसोंके स्वामी हैं तथा तमोगुणियों को (अपने कर्मका) फल प्रदान करनेवाले हैं, वे निर्ऋतिदेव मेरे ही निर्देशसे सदा प्रवर्तित होते हैं॥२१-२५॥

वेतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः।

ईशानः किल भक्तानां सोऽपि तिष्ठन्ममाज्ञया॥२६॥

यो वामदेवोऽङ्गिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः।

रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २७॥

यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः।

विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात् किल॥२८॥

योऽपि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः।

स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयम्भूर्विधिचोदितः॥२९॥

ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः।

सृजन्ति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ॥३०॥

जो बेतालगणों और भूतोंके स्वामी और भक्तोंको भोगरूपी फल प्रदान करनेवाले ईशानदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञामें स्थित रहते हैं। जो अङ्गिराके शिष्य, रुद्रदेव के गणोंमें अग्रगण्य और योगियोंके रक्षक हैं, वे वामदेव भी मेरी ही आज्ञाद्वारा नित्य व्यवहार करते हैं। जो सम्पूर्ण संसारके पूज्य, विघ्नकारक धर्मनेता विनायक हैं, वे भी मेरे आदेशसे चलते हैं। जो ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, देवोंके सेनापति स्वयम्भू प्रभु स्कन्द हैं, वे भी नित्य विधिकी प्रेरणासे प्रेरित होते हैं। जो प्रजाओंके पति मरीचि आदि महर्षि हैं, वे भी परात्पर (परमेश्वर)-की आज्ञासे ही विविध लोकोंकी सृष्टि करते हैं ॥ २६-३०॥

या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम्।

पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात्॥३१॥

वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती।

सापीश्वरनियोगेन चोदिता सम्प्रवर्तते॥३२॥

याशेषपुरुषान् घोरान्नरकात् तारयिष्यति।

सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी॥३३॥

पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी।

यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्वचनानुगा॥३४॥

जो सभी प्राणियोंकी श्री (शोभा) हैं और विपुल ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वे नारायणकी पत्नी (लक्ष्मी) मेरे ही अनुग्रहसे व्यवहार करती हैं। जो सरस्वतीदेवी विपुल वाणी प्रदान करती हैं, वे भी ईश्वरके नियोग से प्रेरित होकर प्रवर्तित होती हैं। जो सभी पुरुषों को घोर नरकोंसे तारनेवाली सावित्रीदेवी कही गयी हैं, वे भी देवकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली हैं। ध्यान

करनेपर ब्रह्मविद्याको प्रदान करनेवाली जो श्रेष्ठ पार्वती- देवी हैं, वे भी विशेषरूपसे मेरे ही वचनोंका पालन करती हैं। ३१-३४॥

योऽनन्तमहिमानन्तः शेषोऽशेषामरप्रभुः।

दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः॥३५ ।।

अनन्त महिमावाले और सभी देवताओंके स्वामी जो अनन्त शेष हैं, वे भी देव (शंकर)-के निर्देश से ही संसारको सिरपर धारण करते हैं॥३५॥

योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः।

पिबत्यखिलमम्भोधिमीश्वरस्य नियोगतः॥३६॥

ये चतुर्दश लोकेऽस्मिन् मनवः प्रथितौजसः।

पालयन्ति प्रजाः सर्वास्तेऽपि तस्य नियोगतः ।। ३७॥

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ।

अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छास्त्रेणैव धिष्ठिताः॥३८॥

गन्धर्वा गरुडा ऋक्षा: सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।

यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिता: शास्त्रे स्वयम्भुवः॥३९॥

कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।

ऋतवः पक्षमासाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापतेः॥४०॥

जो संवर्तक अग्नि नित्य वडवाके रूपमें स्थित हैं, वे भी ईश्वरकी आज्ञासे ही सम्पूर्ण समुद्रको पीते रहते हैं। इस संसारमें अत्यन्त तेजस्वी जो चौदह मनु हैं, वे सभी मुझ (ईश्वर)-के आदेशसे सभी प्रजाओं का पालन करते हैं। आदित्य, वसुगण, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा अन्य सभी देवता मेरी ही आज्ञा में प्रतिष्ठित हैं। गन्धर्व, गरुड, ऋक्ष, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच-ये सभी स्वयम्भूकी आज्ञामें ही स्थित हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतुएँ, पक्ष तथा मास-ये मुझ प्रजापति (शिव) के शासनमें स्थित हैं॥ ३६-४० ॥

युगमन्वन्तराण्येव मम तिष्ठन्ति शासने।

पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथा परे।। ४१॥

चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।

नियोगादेव वर्तन्ते देवस्य परमात्मनः॥४२॥

पातालानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात्।

ब्रह्माण्डानि च वर्तन्ते सर्वाण्येव स्वयम्भुवः॥४३॥

अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि ममाज्ञया।

प्रवृत्तानि पदार्थोघैः सहितानि समन्ततः॥४४॥

ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मगैः।

वहिष्यन्ति सदैवाज्ञां परस्य परमात्मनः।। ४५ ॥

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगे मम वर्तते॥४६॥

युग, मन्वन्तर, पर तथा परार्ध-ये सभी तथा अन्य कालके सभी भेद मेरे ही शासनमें स्थित रहते हैं। (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज तथा जरायुज-ये) चार प्रकारके प्राणी और स्थावर-जंगमात्मक जगत् मुझ परमात्मा देवके निर्देशसे ही प्रवर्तित होते हैं। सभी पाताल और भुवन, सभी ब्रह्माण्ड स्वयम्भू परमेश्वरकी आज्ञासे प्रवर्तित हैं। बीते हुए भी जो पदार्थोके समूहोंसहित असंख्य ब्रह्माण्ड थे, वे मेरी ही आज्ञासे सर्वत्र प्रवृत्त थे। आगे भी जो ब्रह्माण्ड होंगे, वे भी सदैव परात्पर परमात्माकी आज्ञाका आत्मगत (अपने अधीन) वस्तुओंके' द्वारा पालन करेंगे। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, भूतादि (तामस अहंकार) और आदि प्रकृति ये सभी मेरी आज्ञासे कार्य करते हैं॥४१-४६॥

याशेषजगतां योनिर्मोहिनी सर्वदेहिनाम्।

माया विवर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः॥४७॥

यो वै देहभृतां देवः पुरुषः पठ्यते परः।

आत्मासौ वर्तते नित्यमीश्वरस्य नियोगतः॥४८॥

जो सम्पूर्ण संसारकी योनि और सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली माया है, वह भी ईश्वरके निर्देश से ही नित्य (विभिन्न रूपोंमें) विवर्तित होती रहती है। जो देहधारियोंके आत्मस्वरूप परात्पर पुरुष देव कहे जाते हैं, वे भी नित्य ईश्वरके नियोगसे ही कार्य करते हैं॥ ४७-४८॥

विधूय मोहकलिलं यया पश्यति तत् पदम्।

सापि विद्या महेशस्य नियोगवशवर्तिनी॥४९॥

बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत्।

मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं मय्येव प्रलयं व्रजेत्॥५०॥

जिसके द्वारा मोहरूपी कल्मषको धोकर उस परमपदका दर्शन होता है, वह विद्या भी महेश की आज्ञाके वशमें रहनेवाली है। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय, यह संसार मेरी ही शक्तिसे शक्तिमान् है। मेरे द्वारा ही सम्पूर्ण (जगत्) प्रेरित किया जाता है और मुझमें ही उसका लय भी हो जाता है॥ ४९-५०॥

अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः।

परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥५१॥

मैं ही भगवान्, ईश, स्वयं प्रकाश, सनातन और परमात्मा परम ब्रह्म हूँ, मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।॥५१॥

इत्येतत् परमं ज्ञानं युष्माकं कथितं मया।

ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥५२॥

इस प्रकार यह परम ज्ञान मैंने आप लोगोंसे कहा, इसे जान लेनेसे प्राणी जन्म तथा संसारके बन्धन से मुक्त हो जाता है॥५२॥