18 अध्याय

गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी

महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र,

अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले

पञ्चमहायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान

ऋषय ऊचुः

अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां महामुने।

तदाचक्ष्वाखिलं कर्म येन मुच्येत बन्धनात्॥ १ ॥

ऋषियोंने कहा-महामुने! आप द्विजोंके प्रतिदिन किये जानेवाले उन कर्मोंका सम्पूर्ण-रूपसे वर्णन करें, जिनका अनुष्ठान करनेसे बन्धनसे मुक्ति प्राप्त होती है॥१॥

व्यास उवाच

वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं गदतो मम।

अहन्यहनि कर्तव्यं ब्राह्मणानां क्रमाद् विधिम्॥ २ ॥

ब्राह्म मुहूर्ते तूत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्।

कायक्लेशं तदुद्भूतं ध्यायीत मनसेश्वरम्॥ ३ ॥

उषःकालेऽथ सम्प्राप्ते कृत्वा चावश्यकं बुधः।

स्नायानदीषु शुद्धासु शौचं कृत्वा यथाविधि॥ ४ ॥

प्रातःस्नानेन पूयन्ते येऽपि पापकृतो जनाः।

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रातःस्नानं समाचरेत्॥ ५ ॥

व्यासजी बोले-मैं बतला रहा हूँ। आप लोग ध्यानपूर्वक मेरे द्वारा कहे जा रहे ब्राह्मणोंके प्रतिदिन किये जानेवाले कर्मोंको और उनके विधानको सुनें। ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर धर्म और अर्थ एवं (उनकी सम्पन्नताके लिये) अपेक्षित शारीरिक आयास (क्या कब कैसे करना है आदि)-का चिन्तन करे तथा मन से ईश्वरका ध्यान करे। बुद्धिमान्को चाहिये कि ऊषाकाल होनेपर आवश्यक कर्मोको करके विधिपूर्वक शौच आदिसे निवृत्त होकर शुद्ध जलवाली नदियोंमें स्नान करे। प्रातःस्नान करनेसे पाप करनेवाले व्यक्ति भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नों से प्रात:काल स्नान करना चाहिये ॥२-५॥

प्रातःस्नानं प्रशंसन्ति दृष्टादृष्टकरं शुभम्।

ऋषीणामृषिता नित्यं प्रातःस्नानान्न संशयः॥ ६ ॥

मुखे सुप्तस्य सततं लाला याः संस्त्रवन्ति हि।

ततो नैवाचरेत् कर्म अकृत्वा स्नानमादितः॥ ७ ॥

अलक्ष्मीः कालकर्णी च दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम्।

प्रातःस्नानेन पापानि पूयन्ते नात्र संशयः॥ ८॥

न च स्नानं विना पुंसां पावनं कर्म सुस्मृतम्।

होमे जप्ये विशेषेण तस्मात् स्नानं समाचरेत्॥ ९ ॥

अशक्तावशिरस्कं वा स्नानमस्य विधीयते।

आर्द्रण वाससा वाथ मार्जनं कापिलं स्मृतम्॥१०॥

दृष्ट और अदृष्ट फल देनेवाले प्रात:कालीन शुभ स्नानकी सभी प्रशंसा करते हैं। नित्य प्रातःकाल स्नान करनेसे ही ऋषियोंका ऋषित्व है, इसमें संशय नहीं; क्योंकि सोये व्यक्तिके मुखसे निरन्तर लार बहती रहती है, अत: सर्वप्रथम स्नान किये बिना कोई कर्म नहीं करना चाहिये। प्रात:- स्नानसे अलक्ष्मी, कालकर्णी (अलक्ष्मीविशेष) दुःस्वप्न, बुरे विचार और अन्य पाप दूर हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। बिना स्नानके मनुष्योंको पवित्र करनेवाला कोई कर्म नहीं बतलाया गया है। अतः होम तथा जपके समय विशेष-रूपसे स्नान करना चाहिये। असमर्थताकी स्थिति में सिर को छोड़कर स्नान करनेका विधान किया गया है। अथवा भीगे वस्त्रसे शरीरका मार्जन करना चाहिये, इसे कपिलस्नान कहा गया है॥६-१०॥

असामर्थ्य समुत्पन्ने स्नानमेवं समाचरेत्।

ब्राह्मादीनि यथाशक्तो स्नानान्याहुर्मनीषिणः॥११॥

ब्राह्ममाग्नेयमुद्दिष्टं वायव्यं दिव्यमेव च।

वारुणं यौगिकं तद्वत् षोढा स्नानं प्रकीर्तितम्॥१२॥

ब्राह्मं तु मार्जनं मन्त्रैः कुशैः सोदकबिन्दुभिः ।

आग्नेयं भस्मना पादमस्तकाद्देहधूलनम्॥१३॥

गवां हि रजसा प्रोक्तं वायव्यं स्नानमुत्तमम्।

यत्तु सातपवर्षेण स्नानं तद् दिव्यमुच्यते॥ १४॥

वारुणं चावगाहस्तु मानसं त्वात्मवेदनम्।

यौगिकं स्नानमाख्यातं योगो विष्णुविचिन्तनम्॥१५॥

सामर्थ्य न रहनेपर यही (कपिल-) स्नान करना चाहिये। मनीषियोंने यथाशक्ति किये जानेवाले ब्राह्म आदि स्नानोंको बतलाया है। ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण तथा यौगिक-ये छ: स्नान कहे गये हैं। कुशोंके द्वारा जलबिन्दुओंसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक मार्जन करना ब्राह्म-स्नान कहलाता है। मस्तकसे पैरोंतक समस्त देहमें भस्मका उपलेपन करना आग्नेय-स्नान है। गायोंकी धूलसे सम्पन्न उत्तम स्नानको वायव्य- स्नान कहा गया है। धूपमें वर्षाके जलसे जो स्नान किया जाता है, वह दिव्य-स्नान कहलाता है। (जलमें) डुबकी लगाकर किया गया स्नान वारुण-स्नान और मनसे आत्मतत्त्वका चिन्तन करना यौगिक-स्नान कहा गया है। विष्णुका चिन्तन ही योग है॥११-१५॥

आत्मतीर्थमिति ख्यातं सेवितं ब्रह्मवादिभिः ।

मनःशुचिकरं पुंसां नित्यं तत् स्नानमाचरेत् ॥ १६॥

शक्तश्चेद् वारुणं विद्वान् प्राजापत्यं तथैव च।

प्रक्षाल्य दन्तकाष्ठं वै भक्षयित्वा विधानतः॥१७॥

ब्रह्मवादियोंसे सेवित इस (यौगिक) स्नानको आत्मतीर्थ कहा गया है। यह मनुष्योंके मनको पवित्र बनानेवाला है। इसलिये यह स्नान नित्य करना चाहिये। समर्थ होनेपर विद्वान्को वारुण तथा प्राजापत्य (ब्राह्म)-स्नान करना चाहिये। दन्तकाष्ठको धोकर विधिपूर्वक उसका भक्षण (चर्वण) करना चाहिये॥१६-१७॥

आचम्य प्रयतो नित्यं स्नानं प्रातः समाचरेत् ।

मध्याङ्गुलिसमस्थौल्यं द्वादशाङ्गुलसम्मितम्॥१८॥

सत्वचं दन्तकाष्ठं स्यात् तदग्रेण तु धावयेत्।

क्षीरवृक्षसमुद्भूतं मालतीसम्भवं शुभम्।

अपामार्ग च बिल्वं च करवीरं विशेषतः॥१९॥

वर्जयित्वा निन्दितानि गृहीत्वैकं यथोदितम्।

परिहृत्य दिनं पापं भक्षयेद् वै विधानवित्॥२०॥

नोत्पाटयेद् दन्तकाष्ठं नाङ्गुल्या धावयेत् क्वचित्।

प्रक्षाल्य भङ्क्त्वा तज्जह्याच्छुचौ देशे समाहितः॥२१॥

(दतुअन करके) आचमनकर (मुख-प्रक्षालनकर) प्रयत्नपूर्वक नित्य प्रात:स्नान करना चाहिये। मध्यमा अंगुलि के समान मोटा और बारह अंगुलके बराबर लंबा छिलके-युक्त दन्तकाष्ठके अग्रभागसे मुखशुद्धि करनी चाहिये। विशेषरूपसे दूधवाले वृक्ष, मालती (चमेली), अपामार्ग, बिल्व तथा करवीर (कनेर)-की लकड़ीका दन्तकाष्ठ शुभ होता है। विधिके ज्ञाताको चाहिये कि दोषपूर्ण (निषिद्ध) दिनको छोड़कर तथा निन्दित काष्ठों को छोड़कर बताये गये दन्तकाष्ठोंमेंसे किसी एकको ग्रहणकर दन्तधावन करना चाहिये। दन्तकाष्ठको उखाड़ना नहीं चाहिये (अर्थात् किसी छोटे पौधेको पूरा उखाड़कर उससे दन्तधावन नहीं करना चाहिये) और न कभी अँगुलीसे दतुअन करना चाहिये। (मुख) धोनेके उपरान्त उसे (दन्तकाष्ठको) तोड़कर सावधानीसे किसी पवित्र स्थानमें (यथास्थान) त्याग देना चाहिये॥१८-२१॥

स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा।

आचम्य मन्त्रवन्नित्यं पुनराचम्य वाग्यतः॥२२॥

अनन्तर पवित्र देशमें स्नान करके आचमनपूर्वक देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको यथाधिकार मन्त्रपूर्वक यथाविधि तृप्त करना चाहिये॥ २२॥

सम्माय॑ मन्त्रैरात्मानं कुशैः सोदकबिन्दुभिः ।

आपो हि ष्ठा व्याहृतिभिः सावित्र्या वारुणैः शुभैः॥२३॥

ओङ्कारव्याहृतियुतां गायत्रीं वेदमातरम्।

जप्त्वा जलाञ्जलिं दद्याद् भास्करं प्रति तन्मनाः ॥२४॥

प्राक्कूलेषु समासीनो दर्भेषु सुसमाहितः।

प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेत् संध्यामिति श्रुतिः ॥२५॥

तदनन्तर पुनः आचमन करे और संयतवाणीवाला होकर 'आपो हि ष्ठा' इत्यादि मन्त्र, व्याहृतियों, गायत्रीमन्त्र तथा वरुण-सम्बन्धी शुभ मन्त्रोंका पाठ करते हुए जलबिन्दुओंसे युक्त कुशोंके द्वारा अपना मार्जन करे। ओंकार एवं व्याहृतियोंसे युक्त वेदमाता गायत्री (-मन्त्र)- -का जप करके तन्मय होकर सूर्यको जलाञ्जलि देनी चाहिये। तदनन्तर पूर्वकी ओर बिछे हुए कुशासनपर सावधानीपूर्वक बैठकर तीन प्राणायाम करके संध्याका ध्यान करना चाहिये। ऐसा श्रुतिका विधान है॥ २३-२५॥

या संध्या सा जगत्सूतिर्मायातीता हि निष्कला।

ऐश्वरी तु पराशक्तिस्तत्त्वत्रयसमुद्भवा ॥ २६॥

ध्यात्वार्कमण्डलगतां सावित्रीं वैजपन् बुधः।

प्राङ्मुखः सततं विप्रः संध्योपासनमाचरेत्॥२७॥

संध्याहीनोऽशुचिनित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।

यदन्यत् कुरुते किञ्चिन्न तस्य फलमाप्नुयात्॥२८॥

अनन्यचेतसः शान्ता ब्राह्मणा वेदपारगाः।

उपास्य विधिवत् संध्यां प्राप्ताः पूर्वं परां गतिम्॥२९॥

योऽन्यत्र कुरुते यत्नं धर्मकार्ये द्विजोत्तमः ।

विहाय संध्याप्रणतिं स याति नरकायुतम्॥३०॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन संध्योपासनमाचरेत्।

उपासितो भवेत् तेन देवो योगतनुः परः ।। ३१ ।।

जो संध्या है वही जगत्को उत्पन्न करनेवाली है, मायातीत है, निष्कल है और तीन तत्त्वोंसे उत्पन्न होनेवाली ईश्वरकी पराशक्ति है। विद्वान् ब्राह्मण (द्विज)- को पूर्वाभिमुख होकर सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित सावित्री (गायत्रीमन्त्र)-का ध्यानपूर्वक जप करते हुए संध्योपासना करनी चाहिये। संध्यासे हीन व्यक्ति (द्विज) नित्य अपवित्र और सभी कर्मों को करनेके लिये अयोग्य होता है। वह जो भी कार्य करता है, उसका उसे कोई फल प्राप्त नहीं होता। पूर्वकालमें वेदके पारंगत शान्त ब्राह्मणोंने अनन्य-मनसे संध्योपासना करके परम गतिको प्राप्त किया था। जो द्विजोत्तम संध्यावन्दनको छोड़कर दूसरे धार्मिक कार्योंके लिये प्रयत्न करता है, वह सहस्रों नरकोंमें जाता है। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे संध्योपासना करनी चाहिये। उस उपासनासे योगविग्रह परमदेव की उपासना हो जाती है॥२६-३१ ।।

सहस्रपरमां नित्यं शतमध्यां दशावराम्।

सावित्रीं वै जपेद् विद्वान् प्राङ्मुखः प्रयतः स्थितः ॥३२॥

अथोपतिष्ठेदादित्यमुदयन्तं समाहितः।

मन्त्रैस्तु विविधैः सौरैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥३३॥

उपस्थाय महायोगं देवदेवं दिवाकरम्।

कुर्वीत प्रणतिं भूमौ मूर्जा तेनैव मन्त्रतः॥३४॥

विद्वान् व्यक्तिको नित्य पूर्वाभिमुख होकर सावित्री (-मन्त्र)-का सावधानीपूर्वक जप करना चाहिये। हजार बारका जप उत्कृष्ट, सौ बार किया गया जप मध्यम तथा दस बारका जप निम्नकोटिका होता है। इसके बाद खड़े होकर ध्यान लगाकर उदित होते हुए सूर्यकी ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें वर्णित सूर्य-सम्बन्धी विविध मन्त्रोंद्वारा उपासना करनी चाहिये। महायोगरूप देवाधिदेव दिवाकरका उपस्थान करके उसी मन्त्रद्वारा भूमिपर मस्तक झुकाकर प्रणाम करना चाहिये और निम्रलिखित मन्त्रोंसे प्रार्थना करनी चाहिये-॥३२-३४॥

ओं खखोल्काय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।

निवेदयामि चात्मानं नमस्ते ज्ञानरूपिणे।

नमस्ते घृणिने तुभ्यं सूर्याय ब्रह्मरूपिणे॥३५॥

त्वमेव ब्रह्म परममापो ज्योती रसोऽमृतम्।

भूर्भुवः स्वस्त्वमोङ्कारः सर्वे रुद्राः सनातनाः।

पुरुषः सन्महोऽतस्त्वां प्रणमामि कपर्दिनम्।। ३६ ।।

त्वमेव विश्वं बहुधा सदसत् सूयते च यत्।

नमो रुद्राय सूर्याय त्वामहं शरणं गतः ॥३७॥

प्रचेतसे नमस्तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।

नमो नमस्ते रुद्राय त्वामहं शरणं गतः ।। ३८॥

हिरण्यबाहवे तुभ्यं हिरण्यपतये नमः।

अम्बिकापतये तुभ्यमुमायाः पतये नमः ॥३९॥

नमोऽस्तु नीलग्रीवाय नमस्तुभ्यं पिनाकिने।

विलोहिताय भर्गाय सहस्त्राक्षाय ते नमः॥४०॥

मैं ओंकाररूप शान्त, कारणत्रयके हेतुरूप खखोल्क (सूर्य)-के प्रति अपनेको समर्पित करता हूँ। ज्ञानरूपी आप (सूर्य)-को नमस्कार है। ब्रह्मरूपी घृणि सूर्य! आपको नमस्कार है। आप ही परम ब्रह्म, अप्, ज्योति, रस और अमृतस्वरूप हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः, ओंकार तथा समस्त सनातन रुद्र हैं। आप सत्स्वरूप और महान् पुरुष हैं। आप कपर्दीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप ही अनेक रूपवाले सत्-असत्-रूप समस्त विश्वको उत्पन्न करते हैं। सूर्यरूप रुद्रको नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रचेताको नमस्कार है। मीढुष्टम ! आपको नमस्कार है। रुद्र के लिये बार-बार नमस्कार है। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप हिरण्यबाहु तथा हिरण्यपतिको नमस्कार है। अम्बिकाके पति तथा उमाके पति आपको नमस्कार है। नीलग्रीवको नमस्कार है तथा आप पिनाकी को नमस्कार है। विलोहित, भर्ग तथा सहस्राक्ष! आपको

नमस्कार है॥ ३५-४०॥

नमो हंसाय ते नित्यमादित्याय नमोऽस्तु ते।

नमस्ते वज्रहस्ताय त्र्यम्बकाय नमोऽस्तु ते॥४१॥

प्रपद्ये त्वां विरूपाक्षं महान्तं परमेश्वरम्।

हिरण्मयं गृहे गुप्तमात्मानं सर्वदेहिनाम्॥४२॥

नमस्यामि परं ज्योतिर्ब्रह्माणं त्वां परां गतिम्।

विश्वं पशुपतिं भीमं नरनारीशरीरिणम्॥४३॥

नमः सूर्याय रुद्राय भास्वते परमेष्ठिने।

उग्राय सर्वभक्ताय त्वां प्रपद्ये सदैव हि ॥४४।।

आप हंसको नित्य नमस्कार है। आदित्य ! आपको नमस्कार है। वज्रहस्त तथा त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है। मैं आप विरूपाक्ष महान् परमेश्वरकी शरणमें हूँ। सभी देहधारियोंके हिरण्मय गृहमें (हृदयमें) आप अपनेको गुह्यरूपसे प्रतिष्ठित किये हैं। परम ज्योतिरूप, परमगति, विश्वरूप, पशुपति, भीम तथा अर्ध-नारीश्वर- रूपवाले आप ब्रह्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रकाशमान सूर्यरूप परमेष्ठी रुद्रको नमस्कार है। उग्र तथा सभी के भजनीय५ आपकी मैं सदा ही शरण ग्रहण करता हूँ॥ ४१-४४॥

एतद् वै सूर्यहृदयं जप्त्वा स्तवमनुत्तमम्।

प्रातःकालेऽथ मध्याह्ने नमस्कुर्याद् दिवाकरम्॥ ४५ ॥

इस सूर्यहृदय (नामक) उत्तम स्तोत्रका प्रात:काल तथा मध्याह्नकालमें जपकर दिवाकरको नमस्कार करना चाहिये ॥ ४५ ॥

इदं पुत्राय शिष्याय धार्मिकाय द्विजातये।

प्रदेयं सूर्यहृदयं ब्रह्मणा तु प्रदर्शितम्॥ ४६॥

सर्वपापप्रशमनं वेदसारसमुद्भवम्।

ब्राह्मणानां हितं पुण्यमृषिसधैर्निषेवितम्॥४७॥

ब्रह्माके द्वारा प्रदर्शित, सभी पापोंका शमन करनेवाले, वेदोंके सारसे प्रकट हुए, ब्राह्मणोंके हितकारी, पवित्र और ऋषिसमूहोंद्वारा सेवित इस सूर्यहृदय (स्तोत्र) का द्विजाति-कुलोत्पन्न धार्मिक पुत्र एवं शिष्यके लिये उपदेश करना चाहिये ॥ ४६-४७॥

अथागम्य गृहं विप्रः समाचम्य यथाविधि।

प्रज्वाल्य वह्निं विधिवज्जुहुयाज्जातवेदसम्॥४८॥

ऋत्विक्पुत्रोऽथ पत्नी वा शिष्यो वापि सहोदरः।

प्राप्यानुज्ञां विशेषेण जुहुयुर्वा यथाविधि॥४९॥

पवित्रपाणिः पूतात्मा शुक्लाम्बरधरोत्तरः।

अनन्यमानसो वह्निं जुहुयात् संयतेन्द्रियः॥५०॥

तदनन्तर घर आकर ब्राह्मण (द्विज)-को विधिपूर्वक आचमन करके अग्नि प्रज्वलित कर यथाविधि अग्नि में हवन (अग्निहोत्र) करना चाहिये। (अग्न्याधान करनेवाला यजमान द्विजाति यदि किसी अपरिहार्य कारणवश स्वयं अग्निहोत्र नहीं कर सकता है तो उसके प्रतिनिधि- रूपमें) ऋत्विक्का पुत्र (यज्ञोपवीत-संस्कार-सम्पन्न पुत्र), पत्नी, शिष्य (यज्ञोपवीती) अथवा (यज्ञोपवीती) सहोदर भाई भी विशेषरूपसे आज्ञा प्राप्तकर विधिपूर्वक हवन (अग्निहोत्र) कर सकता है। हाथमें पवित्री धारणकर, पवित्रात्मा होकर, शुक्लवर्णका वस्त्र एवं उत्तरीय वस्त्र धारणकर एकाग्रमनसे इन्द्रियोंको संयमित

करते हुए अग्निमें हवन करे ॥ ४८-५० ॥

विना दर्भेण यत्कर्म विना सूत्रेण वा पुनः।

राक्षसं तद्भवेत् सर्वं नामुत्रेह फलप्रदम्॥५१॥

दैवतानि नमस्कुर्याद् देयसारान्निवेदयेत्।

दद्यात् पुष्पादिकं तेषां वृद्धांश्चैवाभिवादयेत्॥५२॥

गुरुं चैवाप्युपासीत हितं चास्य समाचरेत्।

वेदाभ्यासंततः कुर्यात् प्रयत्नाच्छक्तितो द्विजः॥५३॥

जपेदध्यापयेच्छिष्यान् धारयेच्च विचारयेत्।

अवेक्षेत च शास्त्राणि धर्मादीनि द्विजोत्तमः।

वैदिकांश्चैव निगमान् वेदाङ्गानि विशेषतः॥५४॥

बिना कुशके और बिना यज्ञोपवीतके जो भी कर्म किया जाता है, वह सब राक्षसी कर्म होता है, वह न इस लोकमें फल देता है और न परलोकमें ॥५१॥

देवताओंको नमस्कार करना चाहिये। उन्हें प्रदान की जानेवाली (शास्त्रविहित) वस्तुओंमें उत्तमोत्तम वस्तुओंको ही निवेदित करना चाहिये। उन्हें (देवताओंको) पुष्प आदि (पदार्थ) समर्पित करना चाहिये और वृद्धजनोंका अभिवादन करना चाहिये। गुरुकी भी उपासना करनी चाहिये, उनका हित करना चाहिये। तदनन्तर द्विजको यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक वेदोंका अभ्यास करना चाहिये। द्विजोत्तमको जप करना चाहिये। शिष्योंको पढ़ाना चाहिये। (पढ़े विषयोंको) धारण करना चाहिये और (उसपर) विचार करना चाहिये। शास्त्रोंका अवलोकन तथा धर्मका-विशेषरूपसे वैदिक तथा वेदसम्मत शास्त्रों और वेदाङ्गोंका चिन्तन करना चाहिये॥५२-५४॥

उपेयादीश्वरं चाथ योगक्षेमप्रसिद्धये।

साधयेद् विविधानर्थान् कुटुम्बार्थे ततो द्विजः॥५५॥

अनन्तर योग (अप्राप्तकी प्राप्ति), क्षेम (प्राप्तकी रक्षा)-के लिये ईश्वर (धार्मिक राजा अथवा श्रीमान्) के समीप जाना चाहिये और द्विजको कुटुम्बके भरण-पोषण के लिये विविध प्रकारको सम्पत्तियोंका (न्यायपूर्वक) साधन (चिन्तन, अर्जन) करना चाहिये॥ ५५ ॥

ततो मध्याह्नसमये स्नानार्थं मृदमाहरेत्।

पुष्पाक्षतान् कुशतिलान् गोमयं शुद्धमेव च ॥५६॥

नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरस्सु च।

स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च॥५७॥

परकीयनिपानेषु न स्नायाद् वै कदाचन।

पञ्चपिण्डान्समुद्धृत्य स्नायाद्वासम्भवे पुनः॥५८॥

मृदैकया शिरः क्षाल्यं द्वाभ्यां नाभेस्तथोपरि।

अधश्च तिसृभिः कायं पादौ षड्भिस्तथैव च॥५९॥

मृत्तिका च समुद्दिष्टा त्वार्द्रामलकमात्रिका।

गोमयस्य प्रमाणं तत् तेनाङ्गं लेपयेत् ततः ।। ६०॥

तदनन्तर मध्याह्न-समयमें स्नानके लिये मिट्टी, पुष्प, अक्षत, कुश, तिल तथा शुद्ध गोबर लाना चाहिये। नदियों (पुराण आदिमें प्रसिद्ध देव, ऋषिनिर्मित), अगाध जलवाले कुण्डों, (जलाशयों), सरोवरों, झरनों तथा बावलियोंमें नित्य स्नान करना चाहिये। दूसरों के तालाब आदिमें कभी भी स्नान नहीं करना चाहिये। (अन्यत्र स्नान) असम्भव होनेपर (तालाब आदिमेंसे) मिट्टीके पाँच पिण्डोंको निकालकर स्नान करना चाहिये। मिट्टी से एक बार सिर धोकर दो बार नाभिके ऊपर (-के अङ्गोंको) धोना चाहिये। नीचेका शरीर तीन बार तथा छः बार पाँवोंको धोना चाहिये। आँवलेके बराबर गीली मिट्टी लेनेका विधान है। गोबरका भी इतना ही प्रमाण है। उससे अङ्गोंका लेपन करे॥५६-६०॥

लेपयित्वा तु तीरस्थस्तल्लिङ्गैरेव मन्त्रतः।

प्रक्षाल्याचम्य विधिवत् ततः स्नायात् समाहितः।। ६१॥

(नदी आदिके) किनारे बैठकर तल्लिङ्गक* मन्त्रों के द्वारा (अङ्गोंमें मृत्तिका आदिका यथाविधि) लेपकर विधिपूर्वक प्रक्षालन एवं आचमन करके सावधानी पूर्वक स्नान करना चाहिये॥६१॥

अभिमन्त्र्य जलं मन्त्रैस्तल्लिङ्गैर्वारुणैः शुभैः।

भावपूतस्तदव्यक्तं ध्यायन् वै विष्णुमव्ययम्॥२॥

आपो नारायणोद्भूतास्ता एवास्यायनं पुनः।

तस्मानारायणं देवं स्नानकाले स्मरेद् बुधः॥६३॥

प्रोच्य सोंकारमादित्यं त्रिर्निमज्जेजलाशये।

आचान्तः पुनराचामेन्मन्त्रेणानेन मन्त्रवित्॥ ६४॥

अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः।

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥६५॥

तल्लिङ्गक शुभ वरुण-सम्बन्धी मन्त्रोंके द्वारा जल का अभिमन्त्रणकर पवित्र भावसे उन अव्यक्त अविनाशी विष्णुका ध्यान करे। 'जल'की उत्पत्ति नारायणसे ही हुई है, पुन: वही जल उन (नारायण)-का अयन (निवास) हुआ, अतः स्नानके समय विद्वान्को चाहिये कि वह नारायणदेव का स्मरण करे। ओंकारके साथ आदित्य का उच्चारण करके जलके भीतर तीन बार डुबकी लगानी चाहिये। आचमन किये रहनेपर भी मन्त्रवेत्ताको पुनः इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये-अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्। अर्थात् (हे भगवन्!) सभी ओर मुखवाले आप सभी प्राणियोंके भीतर (हृदयरूपी) गुहामें विचरण करते हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही वषट्कार, जल, ज्योति, रस तथा अमृतरूप हैं ॥६२-६५ ॥

द्रुपदां वा त्रिरभ्यसेद् व्याहृतिप्रणवान्विताम्।

सावित्री वा जपेद् विद्वान् तथा चैवाघमर्षणम्॥६६॥

अथवा विद्वान् व्यक्तिको तीन बार द्रुपदा (दो चरणवाली) या व्याहृति अथवा प्रणवसे युक्त गायत्री और अघमर्षण-मन्त्रका जप करना चाहिये॥६६॥

ततः सम्मार्जनं कुर्यादापो हि ष्ठा मयोभुवः।

इदमापः प्र वहत व्याहृतिभिस्तथैव च॥१७॥

ततोऽभिमन्त्र्य तत् तीर्थमापो हि ष्ठादिमन्त्रकैः।

अन्तर्जलगतो मग्नो जपेत् त्रिरघमर्षणम्॥६८॥

त्रिपदां वाथ सावित्री तद्विष्णोः परमं पदम्।

आवर्तयेद् वा प्रणवं देवं वा संस्मरेद्धरिम्॥६९॥

तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा मयो- भुव:०१, 'इदमाप: प्र वहत० इन मन्त्रों और व्याहृतियोंद्वारा मार्जन करना चाहिये। तदनन्तर 'आपो हि ष्ठा०' इत्यादि मन्त्रोंसे उस जल (स्नानीय नदी आदिके जल)-का अभिमन्त्रण करके जलके भीतर डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्र का जप करना चाहिये। अथवा त्रिपदा गायत्री-मन्त्र 'तद्विष्णोः परमं पदम्०' इस मन्त्र या प्रणव का जप करे अथवा भगवान् विष्णुका स्मरण करे॥ ६७-६९॥

द्रुपदादिव यो मन्त्री यजुर्वेदे प्रतिष्ठितः ।

अन्तर्जले त्रिरावर्त्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥७०॥

अप: पाणौ समादाय जप्त्वा वै मार्जने कृते।

विन्यस्य मूर्ध्नि तत् तोयं मुच्यते सर्वपातकैः॥७१॥

यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनः ।

तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम्॥७२॥

यजुर्वेदमें 'द्रुपदादिव०" इस प्रकारसे जो मन्त्र प्रतिष्ठित है, उसका जलके भीतर तीन बार जप करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। मार्जन करनेके बाद हाथमें जल लेकर मन्त्र (द्रुपदादिव०) जपपूर्वक उस जलको सिरपर रखनेसे (अघमर्षण करनेसे) सम्पूर्ण पापों से मुक्ति हो जाती है। जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ समस्त यज्ञोंके राजाके समान है और समस्त पापों को दूर करनेवाला है, उसी प्रकार अघमर्षणसूक्त भी (सभी सूक्तोंका सम्राट् और) सभी पापोंको दूर करनेवाला है॥७०-७२ ॥

अथोपतिष्ठेदादित्यं मूर्ध्नि पुष्पान्विताञ्जलिम्।

प्रक्षिप्यालोकयेद् देवमुद्वयं तमसस्परि॥७३॥

उदु त्यं चित्रमित्येते तच्चक्षुरिति मन्त्रतः।

हंसः शुचिषदेतेन सावित्र्या च विशेषतः॥७४।।

अन्यैश्च वैदिकैर्मन्त्रैः सौरैः पापप्रणाशनैः।

सावित्रीं वै जपेत् पश्चाजपयज्ञः स वै स्मृतः॥७५॥

इसके बाद सूर्योपस्थान करना चाहिये। (इसकी प्रक्रिया यह है-) पुष्पयुक्त अञ्जलि मस्तकसे लगाकर उस फूलको ऊपर (सूर्य)-की ओर उछालकर उन

सूर्यका दर्शन करते हुए 'उद्वयं तमसस्परि', 'चित्रं० 'उदु त्यं०', 'तच्चक्षुः० "हंसः शुचिषद्'१० एवं विशेष-रूपसे सावित्री-मन्त्र और सूर्य-सम्बन्धी अन्य भी पापको नष्ट करनेवाले वैदिक मन्त्रोंके जपके द्वारा सूर्यको प्रसन्न किया जाय, यही सूर्योपस्थान है। इसके अनन्तर गायत्रीमन्त्रका जप करना चाहिये। इस (गायत्रीजपको) ही जपयज्ञ कहा गया है।७३-७५॥

विविधानि पवित्राणि गुह्यविद्यास्तथैव च।

शतरुद्रीयमथर्वशिरः सौरांश्च शक्तितः॥७६॥

प्राक्कूलेषु समासीनः कुशेषु प्राङ्मुखः शुचिः।

तिष्ठंश्चेदीक्षमाणोऽर्क जप्यं कुर्यात् समाहितः।।७७॥

स्फाटिकेन्द्राक्षरुद्राक्षैः पुत्रजीवसमुद्भवैः ।

कर्तव्या त्वक्षमाला स्यादुत्तरादुत्तमा स्मृता॥ ७८॥

पूर्वाग्र कुशोंपर पूर्वाभिमुख पवित्र होकर बैठना चाहिये और सूर्यका दर्शन करते हुए समाहित-चित्त होकर विविध पवित्र मन्त्रों, गुह्यविद्याओं, शतरुद्रिय, अथर्वशिरस् एवं सूर्यदेवताके मन्त्रोंका जप करना चाहिये। स्फटिक, इन्द्राक्ष (इन्द्र वृक्ष-विशेषके फलकी माला), रुद्राक्ष तथा पुत्रजीवककी (वृक्ष-विशेषके फलकी माला*) अक्षमाला बनानी चाहिये। इनमें पूर्वसे बादवाली माला क्रमश: उत्तम कही गयी है॥७६-७८॥

जपकाले न भाषेत नान्यानि प्रेक्षयेद् बुधः।

'न कम्पयेच्छिरोग्रीवां दन्तान् नैव प्रकाशयेत्॥७९॥

गुह्यका राक्षसा सिद्धा हरन्ति प्रसभं यतः।

एकान्ते सुशुभे देशे तस्माज्जप्यं समाचरेत्॥८०॥

बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह जप करते समय बोले नहीं, दूसरे लोगोंकी ओर न देखे। सिर और गरदन को न हिलाये और न ही दाँतोंको दिखलाये, क्योंकि (ऐसा करनेसे) गुह्यक, राक्षस तथा सिद्ध उस जपके फलका बलात् हरण कर लेते हैं, अत: किसी एकान्त अत्यन्त शुभ स्थानमें जप करना चाहिये॥ ७९-८०॥

चण्डालाशौचपतितान् दृष्ट्वाचम्य पुनर्जपेत् ।

तैरेव भाषणं कृत्वा स्नात्वा चैव जपेत् पुनः ।। ८१॥

आचम्य प्रयतो नित्यं जपेदशुचिदर्शने।

सौरान् मन्त्रान् शक्तितो वैपावमानीस्तु कामतः॥८२॥

यदि स्यात् क्लिन्नवासा वै वारिमध्यगतो जपेत्।

अन्यथा तु शुचौ भूम्यां दर्भेषु सुसमाहितः ।। ८३॥

चाण्डाल, आशौच-युक्त व्यक्ति तथा पतित को देखनेपर आचमन करके पुनः जप करना चाहिये। इनके साथ बात करनेपर स्नान करनेके बाद ही पुनः जप

करना चाहिये। अपवित्र पदार्थके दिख जानेपर आचमन करके प्रयत्नपूर्वक यथाशक्ति नित्य सूर्यसम्बन्धी मन्त्रों और पावमानी मन्त्रोंका इच्छानुसार (मनस्तुष्टिपर्यन्त) जप करना चाहिये। यदि भींगे वस्त्र पहने हों तो जलके मध्य स्थित होकर जप करना चाहिये। अन्यथा पवित्र भूमिमें कुशासनके ऊपर बैठकर एकाग्रतापूर्वक जप करना चाहिये॥ ८१-८३॥

प्रदक्षिणं समावृत्य नमस्कृत्वा तत: क्षितौ।

आचम्य च यथाशास्त्रं शक्त्या स्वाध्यायमाचरेत्॥८४॥

ततः संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा।

आदावोंकारमुच्चार्य नमोऽन्ते तर्पयामि वः॥८५॥

(जप पूरा करनेके बाद) प्रदक्षिणा करके पृथ्वीपर नमस्कार करके और आचमन करके शास्त्रानुसार यथाशक्ति स्वाध्याय करना चाहिये, तदनन्तर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। प्रारम्भमें ओंकारका उच्चारण कर और अन्तमें 'नमः' लगाकर आपका तर्पण करता हूँ' (व: तर्पयामि)-ऐसा कहना चाहिये ।। ८४-८५॥

देवान् ब्रह्मऋषींश्चैव तर्पयेदक्षतोदकैः।

तिलोदकैः पितॄन् भक्त्या स्वसूत्रोक्तविधानतः ॥८६॥

देवताओं तथा ब्रह्मर्षियोंका तर्पण अक्षत और जलसे करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रोक्त विधि के अनुसार पितरोंका तर्पण तिल और जलसे भक्तिपूर्वक करना चाहिये ॥ ८६॥

अन्वारब्धेन सव्येन पाणिना दक्षिणेन तु।

देवर्षीस्तर्पयेद् धीमानुदकाञ्जलिभिः पितॄन्॥८७॥

यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणे।

प्राचीनावीती पित्र्ये तु स्वेन तीर्थेन भावतः ।।८८॥

बुद्धिमान् (आस्तिक अधिकारी व्यक्ति)-को सव्य (बाँयें) हाथसे अन्वारब्ध (सम्बद्ध) दाहिने हाथ से अर्थात् दोनों हाथोंकी अञ्जलिद्वारा जलसे देवताओं,

ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करना चाहिये। यज्ञोपवीती' अर्थात् सव्य होकर देवताओंका, निवीती होकर अर्थात् मालाकी तरह कण्ठमें यज्ञोपवीत धारणकर ऋषियों का और प्राचीनावीती अर्थात् अपसव्य होकर भक्तिभाव से (देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके) अपने-अपने तीर्थों से तर्पण करना चाहिये ।। ८७-८८॥

निष्पीड्य स्नानवस्त्रं तु समाचम्य च वाग्यतः।

स्वैर्मन्त्रैरर्चयेद् देवान् पुष्पैः पत्रैरथाम्बुभिः॥८९॥

ब्रह्माणं शंकरं सूर्यं तथैव मधुसूदनम्।

अन्यांश्चाभिमतान् देवान् भक्त्या चाक्रोधनोऽत्वरः ।। ९०॥

स्नानके वस्त्रको निचोड़कर संयतवाणीसे युक्त होकर आचमन करके तत्तद् मन्त्रोंसे पत्र, पुष्प तथा जलके द्वारा देवताओंका पूजन करना चाहिये। क्रोध और शीघ्रताका सर्वथा परित्यागकर भक्तिपूर्वक ब्रह्मा, शंकर, सूर्य, विष्णु तथा अन्य जो भी अभीष्ट देवता हों, उनकी पूजा करनी चाहिये॥ ८९-९० ॥

प्रदद्याद् वाथ पुष्पाणि सूक्तेन पौरुषेण तु।

आपो वा देवताः सर्वास्तेन सम्यक् समर्चिताः॥९१॥

ध्यात्वा प्रणवपूर्वं वै दैवतानि समाहितः।

नमस्कारेण पुष्पाणि विन्यसेद्वै पृथक् पृथक्॥९२॥

न विष्ण्वाराधनात् पुण्यं विद्यते कर्म वैदिकम्।

तस्मादनादिमध्यान्तं नित्यमाराधयेद्धरिम्॥९३॥

पुरुषसूक्तके द्वारा पुष्प अर्पित करना चाहिये। अथवा जल सभी देवताओंका स्वरूप है, अत: उसके द्वारा पूजन करनेसे सभी देवताओंकी भलीभाँति पूजा हो जाती है। एकाग्रमनसे प्रणवका उच्चारण कर देवताओंका ध्यान करना चाहिये। नमस्कारकर पृथक्- पृथक् देवोंपर पुष्प चढ़ाना चाहिये। विष्णुको आराधना से अधिक पुण्यप्रद और कोई वैदिक कर्म नहीं है। इसलिये आदि, मध्य और अन्तसे रहित विष्णुको नित्य आराधना करनी चाहिये। ९१-९३ ॥

तद्विष्णोरिति मन्त्रेण सूक्तेन पुरुषेण तु।

नैताभ्यां सदृशो मन्त्रो वेदेषूक्तश्चतुर्ध्वपि॥ ९४॥

'तद्विष्णो:०६ इस मन्त्रसे तथा पुरुषसूक्तसे श्रीविष्णु की आराधना करनी चाहिये। चारों वेदोंमें भी इन दोनों ('तद्विष्णो:०' एवं 'पुरुष सूक्त') मन्त्रोंके सदृश अन्य कोई मन्त्र नहीं कहा गया है॥९४॥

निवेदयेत स्वात्मानं विष्णावमलतेजसि।

तदात्मा तन्मनाः शान्तस्तद्विष्णोरिति मन्त्रतः॥ ९५ ॥

अथवा देवमीशानं भगवन्तं सनातनम्।

आराधयेन्महादेवं भावपूतो महेश्वरम्॥ ९६ ॥

'तद्विष्णोः०' इस मन्त्रके द्वारा तदात्मा और तन्मय होकर शान्तिपूर्वक अपनेको विशुद्ध तेज:स्वरूप विष्णुमें निवेदित करना चाहिये। अथवा पवित्र भावनासे सनातन भगवान् ईशान महेश्वरदेव महादेवकी आराधना करनी चाहिये ।। ९५-९६ ॥

मन्त्रेण रुद्रगायत्र्या प्रणवेनाथ वा पुनः।

ईशानेनाथ वा रुद्रैस्त्र्यम्बकेन समाहितः॥ ९७ ॥

पुष्पैः पत्ररथाद्भिर्वा चन्दनाद्यैर्महेश्वरम्।

उक्त्वा नमः शिवायेति मन्त्रेणानेन योजयेत्॥ ९८ ॥

नमस्कुर्यान्महादेवं ऋतं सत्यमितीश्वरम्।

निवेदयीत स्वात्मानं यो ब्रह्माणमितीश्वरम्॥ ९९ ॥

प्रदक्षिणं द्विजः कुर्यात् पञ्च ब्रह्माणि वै जपन्।

ध्यायीत देवमीशानं व्योममध्यगतं शिवम्॥ १००॥

रुद्रगायत्री, प्रणव, ईशान-मन्त्र, रुद्र तथा त्र्यम्बक- मन्त्रसे एकाग्र-मन होकर पुष्प, पत्र, जल तथा चन्दन आदिके द्वारा महेश्वरकी आराधना करनी चाहिये और मन्त्रका उच्चारणकर मन्त्रके साथ 'नमः शिवाय' को जोड़ना चाहिये। तदनन्तर ऋत एवं सत्यस्वरूप ईश्वर महादेवको नमस्कार करना चाहिये और 'यो ब्रह्माणं." इस मन्त्रके द्वारा अपनेको ईश्वरके लिये समर्पित करे। द्विजको पाँच ब्रह्म (शिवके पाँच नामों) का जप करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये और आकाशके मध्य स्थित ईशानदेव शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७-१००॥

अथावलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यूचा।

कुर्यात् पञ्च महायज्ञान् गृहं गत्वा समाहितः॥१०१॥

देवयज्ञं पितृयज्ञं भूतयज्ञं तथैव च।

मानुष्यं ब्रह्मयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते॥१०२॥

इसके अनन्तर 'हंसः शुचिषद्' इस ऋचासे सूर्यका दर्शन करे और घर जाकर ध्यानपूर्वक पञ्चयज्ञोंको करे। देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ- ये पाँच (महा-) यज्ञ कहे गये हैं ॥ १०१-१०२॥

यदि स्यात् तर्पणादर्वाक् ब्रह्मयज्ञः कृतो न हि।

कृत्वा मनुष्ययज्ञं वै ततः स्वाध्यायमाचरेत्॥१०३॥

अग्नेः पश्चिमतो देशे भूतयज्ञान्त एव वा।

कुशपुजे समासीनः कुशपाणिः समाहितः॥१०४॥

शालाग्नौ लौकिके वाग्नौ जले भूम्यामथापि वा।

वैश्वदेवं ततः कुर्याद् देवयज्ञः स वै स्मृतः॥१०५॥

यदि स्याल्लौकिके पक्वं ततोऽन्नं तत्र हूयते।

शालाग्नौ तत्र देवान्नं विधिरेष सनातनः ॥ १०६॥

देवेभ्यस्तु हुतादनाच्छेषाद् भूतबलिं हरेत्।

भूतयज्ञः स वै ज्ञेयो भूतिदः सर्वदेहिनाम्॥१०७॥

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च पतितादिभ्य एव च।

दद्याद् भूमौ बलिं त्वन्नं पक्षिभ्योऽथ द्विजोत्तमः ॥१०८॥

यदि तर्पणसे पहले ब्रह्मयज्ञ न किया हो तो मनुष्ययज्ञ करनेके बाद स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये अथवा भूतयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर हाथमें कुश लेकर अग्निके पश्चिमकी दिशामें कुशपुंजपर बैठकर यज्ञशालाकी अग्नि, लौकिकाग्नि अथवा जलमें या भूमिपर वैश्वदेव करना चाहिये। यह देवयज्ञ कहलाता है। यदि लौकिकाग्निमें अन्न पकाया गया हो तो उसीमें हवन किया जाता है और यदि शालाकी अग्निमें अन्न तैयार किया गया हो तो शालाग्निमें ही वैश्वदेव होम करना चाहिये। यही सनातन विधि है। वैश्वदेव होमके पश्चात् बचे हुए अन्नद्वारा भूतबलिकर्म करना चाहिये। इसे भूतयज्ञ जानना चाहिये। यह सर्वप्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करता है। द्विजोत्तमको (घरके बाहर) भूमिपर कुत्ता, चाण्डाल, पतित आदि तथा पक्षियोंको अन्नकी बलि देनी चाहिये॥१०३-१०८॥

सायं चान्नस्य सिद्धस्य पल्यमन्त्रं बलिं हरेत्।

भूतयज्ञस्त्वयं नित्यं सायं प्रातर्विधीयते॥१०९॥

एकं तु भोजयेद् विप्रं पितॄनुद्दिश्य सत्तमम्।

नित्यश्राद्धं तदुद्दिष्टं पितृयज्ञो गतिप्रदः॥११०॥

पत्नी सायंकाल पके हुए अन्नकी बलि बिना मन्त्रके प्रदान करे, यही भूतयज्ञ है, जो नित्य सायंकाल और प्रात:काल किया जाता है। पितरोंके उद्देश्यसे एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, इसे नित्य-श्राद्ध कहा गया है। यह पितृयज्ञ (उत्तम) गति प्रदान करनेवाला है॥१०९-११०॥

उद्धृत्य वा यथाशक्ति किञ्चिदन्नं समाहितः।

वेदतत्त्वार्थविदुषे द्विजायैवोपपादयेत्॥१११॥

पूजयेदतिथिं नित्यं नमस्येदर्चयेद् द्विजम्।

मनोवाक्कर्मभिः शान्तमागतं स्वगृहं ततः॥ ११२॥

हन्तकारमथाग्रं वा भिक्षां वा शक्तितो द्विजः।

दद्यादतिथये नित्यं बुध्येत परमेश्वरम्॥११३॥

अथवा यथाशक्ति कुछ अन्न निकालकर वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्राह्मणको समाहित होकर देना चाहिये। तदनन्तर अपने घर आये हुए शान्त द्विज अतिथिका मन, वाणी तथा कर्मके द्वारा नित्य नमस्कार, पूजन एवं अर्चन करना चाहिये। द्विज अतिथिको यथाशक्ति नित्य 'हन्तकार', 'अग्र' अथवा भिक्षा प्रदान करे और उसे परमेश्वरका रूप समझे ॥१११-११३॥

भिक्षामाहुासमात्रमग्रं तस्याश्चतुर्गुणम्।

पुष्कलं हन्तकारं तु तच्चतुर्गुणमुच्यते॥११४॥

गोदोहमानं कालं वै प्रतीक्ष्यो ह्यतिथिः स्वयम्।

अभ्यागतान् यथाशक्ति पूजयेदतिथिं यथा ॥ ११५॥

ग्रासमात्र (अन्न)-को भिक्षा और उसके चौगुने अर्थात् चार ग्रासके बराबर अन्नको अग्र कहा जाता है। अग्रके चौगुने अर्थात् सोलह ग्रासके बराबर पर्याप्त अन्नको हन्तकार कहा जाता है। गोदोहनकाल- पर्यन्त अतिथिकी स्वयं प्रतीक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार अतिथिकी पूजा की जाती है, उसी प्रकार अभ्यागतोंकी भी यथाशक्ति पूजा (सेवा) करनी चाहिये॥११४-११५॥

भिक्षां वै भिक्षवे दद्याद् विधिवद् ब्रह्मचारिणे।

दद्यादन्नं यथाशक्ति त्वर्थिभ्यो लोभवर्जितः॥११६॥

सर्वेषामप्यलाभे तु अन्नं गोभ्यो निवेदयेत्।

भुजीत बन्धुभिः सार्धं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्॥११७॥

ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा प्रदान करे। लोभरहित होकर याचकोंको यथाशक्ति अन्न प्रदान करे, इन सभीके न मिलनेपर गौओंको अन्न निवेदित करे। तदनन्तर भोजनकी निन्दा न करते हुए बन्धुओंके साथ मौन होकर भोजन करे॥११६-११७॥

अकृत्वा तु द्विजः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमाः।

भुञ्जीत चेत् स मूढात्मा तिर्यग्योनिं स गच्छति ॥११८॥

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा।

नाशयत्याशु पापानि देवानामर्चनं तथा॥११९॥

यो मोहादथवालस्यादकृत्वा देवतार्चनम्।

भुङ्क्ते स याति नरकान् शूकरेष्वभिजायते॥१२०॥

द्विजोत्तमो! यदि द्विज पञ्च महायज्ञोंको बिना किये ही भोजन करता है तो वह मूढात्मा तिर्यग्योनि प्राप्त करता है। प्रतिदिन यथाशक्ति किया गया वेदों का अभ्यास, महायज्ञ कर्म, क्षमाका भाव और देवताओं का पूजन-ये शीघ्र ही पापोंका नाश करते हैं। जो मोहपूर्वक अथवा आलस्यसे देवताओंकी पूजा किये बिना भोजन करता है, वह नरकोंको प्राप्त करता है और बाद में शूकरकी योनिमें जन्म लेता है॥ ११८-१२० ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कृत्वा कर्माणि वै द्विजाः।

भुजीत स्वजनैः सार्धंस याति परमां गतिम्॥१२१॥

द्विजो! इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा (नित्य) (अपने अधिकारानुसार शास्त्रविहित) कर्मों को (श्रद्धापूर्वक) करनेके बाद स्वजनोंके साथ भोजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला परमगति प्राप्त करता है॥१२१॥