26 अध्याय

दानधर्मका निरूपण एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा विमल-चतुर्विध दान-भेद, दानके

अधिकारी तथा अनधिकारी, कामना-भेदसे विविध देवताओंकी आराधनाका

विधान, ब्राह्मणकी महिमा तथा दानधर्मप्रकरणका उपसंहार

व्यास उवाच

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दानधर्ममनुत्तमम्।

ब्रह्मणाभिहितं पूर्वमृषीणां ब्रह्मवादिनाम्॥ १ ॥

व्यासजीने कहा--अब मैं श्रेष्ठ दानधर्मका वर्णन करूँगा। इसे पूर्वमें ब्रह्माजीने ब्रह्मवादी ऋषियोंसे कहा था-॥१॥

अर्थानामुदिते पात्रे श्रद्धया प्रतिपादनम्।

दानमित्यभिनिर्दिष्टं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ २ ॥

यद् ददाति विशिष्टेभ्यः श्रद्धया परया युतः।

तद् वै वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति ॥ ३ ॥

नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं दानमुच्यते।

चतुर्थं विमलं प्रोक्तं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥ ४ ॥

उदित अर्थात् वेदवेदाङ्गाध्ययन करनेवाले प्रशस्त पात्रमें अर्थके श्रद्धापूर्वक प्रतिपादनको दान कहा गया है। यह भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाला है। विशिष्ट अर्थात् सदाचारसम्पन्न व्यक्तियों (ब्राह्मणों)-को अत्यन्त श्रद्धासम्पन्न होकर जो धन दिया जाता है, उसे ही मैं धन मानता हूँ। अवशिष्ट धन (तो किसी दूसरेका ही है, वह) किसी अन्यकी रक्षा करता है। नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य-इस प्रकारसे दान तीन प्रकारका कहा गया है। चौथा दान विमल-दान कहा गया है, जो सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है॥२-४॥

अहन्यहनि यत् किंचिद् दीयतेऽनुपकारिणे।

अनुद्दिश्य फलं तस्माद् ब्राह्मणाय तु नित्यकम्॥ ५ ॥

यत् तु पापोपशान्त्यर्थं दीयते विदुषां करे।

नैमित्तिकं तदुद्दिष्टं दानं सद्भिरनुष्ठितम्॥ ६ ॥

अपत्यविजयैश्वर्यस्वर्गार्थं यत् प्रदीयते।

दानं तत् काम्यमाख्यातमृषिभिर्धर्मचिन्तकैः॥ ७ ॥

यदीश्वरप्रीणनार्थं ब्रह्मवित्सु प्रदीयते।

चेतसा धर्मयुक्तेन दानं तद् विमलं शिवम्॥ ८ ॥

प्रत्येक दिन बिना किसी फल-प्राप्तिरूप प्रयोजनके अर्थात् नि:स्वार्थभावसे (कर्तव्य समझकर) जो कुछ भी अनुपकारी (जिससे अपना उपकार करानेकी तनिक भी आशा न हो ऐसे) ब्राह्मणको दिया जाता है, वह नित्य-दान कहलाता है। पापके शमन करनेके लिये

विद्वान् (ब्राह्मणों)-के हाथमें जो दिया जाता है, उसे नैमित्तिक दान कहा गया है। सज्जनोंद्वारा इसका अनुष्ठान किया जाता है। संतान, विजय, ऐश्वर्य तथा स्वर्ग-प्राप्तिके लिये जो दान दिया जाता है, वह धर्मविचारक ऋषियोंके द्वारा काम्य-दान कहा गया है। ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये धर्मभावनासे ब्रह्मज्ञानियोंको जो दिया जाता है, वह कल्याणकारी दान विमल दान कहलाता है।५-८॥

दानधर्म निषेवेत पात्रमासाद्य शक्तितः।

उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत् तारयति सर्वतः॥ ९ ॥

कुटुम्बभक्तवसनाद् देयं यदतिरिच्यते।

अन्यथा दीयते यद्धि न तद् दानं फलप्रदम्॥१०॥

सत्पात्र उपलब्ध होनेपर यथाशक्ति दानधर्मका पालन अवश्य करना चाहिये, क्योंकि वह सत्पात्र कदाचित् ही सौभाग्यसे उपलब्ध होता है जो दाताका हर तरहसे उद्धार कर देता है। कुटुम्बके भरण-पोषणसे अधिक अवशिष्ट पदार्थका दान करना चाहिये। इससे भिन्न प्रकार का दिया जानेवाला दान फलप्रद नहीं होता॥९-१०॥

श्रोत्रियाय कुलीनाय विनीताय तपस्विने।

वृत्तस्थाय दरिद्राय प्रदेयं भक्तिपूर्वकम्॥११॥

यस्तु दद्यान्महीं भक्त्या ब्राह्मणायाहिताग्नये।

स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥१२॥

इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम्।

ददाति वेदविदुषे यः स भूयो न जायते॥१३॥

गोचर्ममात्रामपि वा यो भूमिं सम्प्रयच्छति।

ब्राह्मणाय दरिद्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते॥१४॥

भूमिदानात् परं दानं विद्यते नेह किञ्चन।

अन्नदानं तेन तुल्यं विद्यादानं ततोऽधिकम्॥१५॥

श्रोत्रिय, कुलीन, विनयी, तपस्वी, सदाचारी तथा धनहीन (ब्राह्मण)-को भक्तिपूर्वक दान देना चाहिये। जो अग्निहोत्री ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक भूमिका दान करता है, वह उस परमपदको प्राप्त करता है, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता। ईख, जौ तथा गेहूँसे फली

हुई विस्तृत भूमिको जो वेदज्ञ (ब्राह्मण)-को दानमें देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। अथवा गोचर्म* (भूमिकी एक विशेष नाप)-के बराबर भूमि जो धनहीन ब्राह्मणको दानमें देता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। इस संसारमें भूमिदानसे श्रेष्ठ दान और कुछ भी नहीं है। उसके समान ही अन्नदान है और विद्यादान उससे बड़ा है॥११-१५॥

यो ब्राह्मणाय शान्ताय शुचये धर्मशालिने।

ददाति विद्यां विधिना ब्रह्मलोके महीयते॥१६॥

दद्यादहरहस्त्वन्नं श्रद्धया ब्रह्मचारिणे।

सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मणः स्थानमाप्नुयात्॥१७॥

गृहस्थायान्नदानेन फलं प्राप्नोति मानवः ।

आममेवास्य दातव्यं दत्त्वाप्नोति परां गतिम्॥१८॥

जो पवित्र, शान्त, धर्माचरणसम्पन्न ब्राह्मणको विधिपूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ब्रह्मचारीको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अन्नदान करना चाहिये। इससे (दाता) सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। गृहस्थ (ब्राह्मण)-को अन्नदान करनेसे मनुष्य (महान्) फल प्राप्त करता है। इसे आमान्न अर्थात् अपक्व अन्न ही देना चाहिये, दान देकर वह परम गति प्राप्त करता है॥ १६-१८॥

वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।

उपोष्य विधिना शान्तः शुचिः प्रयतमानसः॥१९॥

पूजयित्वा तिलैः कृष्णैर्मधुना च विशेषतः।

गन्धादिभिः समभ्यर्च्य वाचयेद्वा स्वयंवदेत्॥२०॥

प्रीयतां धर्मराजेति यद् वा मनसि वर्तते।

यावजीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥२१॥

वैशाखमासकी पूर्णमासीको संयतचित्तसे उपवासकर शान्ति और पवित्रतापूर्वक सात या पाँच ब्राह्मणों की विधिपूर्वक काले तिलों विशेषरूपसे मधु तथा गन्ध आदि उपचारोंसे अच्छी प्रकारसे पूजा करे तथा (सविधि भोजन कराकर) जो मनमें है उसका स्मरण करते हुए उन ब्राह्मणोंसे 'प्रीयतां धर्मराज' अर्थात् 'धर्मराज प्रसन्न हों' यह वाक्य कहलाये अथवा स्वयं कहे। इससे सम्पूर्ण जीवनमें किया हुआ पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है ॥ १९-२१॥

कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा हिरण्यं मधुसर्पिषी।

ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम्॥२२॥

कृष्णाजिन नामके वृक्ष विशेषसे निर्मित पात्र में तिल, स्वर्ण, मधु तथा घृत रखकर जो ब्राह्मणको देता है, वह सभी पापोंसे पार हो जाता है॥ २२॥

कृतान्नमुदकुम्भं च वैशाख्यां च विशेषतः।

निर्दिश्य धर्मराजाय विप्रेभ्यो मुच्यते भयात्॥२३॥

सुवर्णतिलयुक्तैस्तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।

तर्पयेदुदपात्रैस्तु ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥२४॥

माघमासे तु विप्रस्तु द्वादश्यां समुपोषितः ।

शुक्लाम्बरधरः कृष्णैस्तिलैर्तुत्वा हुताशनम्॥२५॥

प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु तिलानेव समाहितः।

जन्मप्रभृति यत्पापं सर्वं तरति वै द्विजः॥२६॥

विशेषरूपसे वैशाखमासकी पूर्णिमाको ब्राह्मणों को जो कृतान्न-पक्वान्न (अथवा सत्तू) तथा जलसे भरा घड़ा धर्मराजके उद्देश्यसे देता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है। जो सात अथवा पाँच ब्राह्मणोंको स्वर्ण तथा तिलसे युक्त जलपूर्ण घड़ोंसे संतुष्ट करता है, वह ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है। माघमासकी (कृष्ण) द्वादशीको उपवास करके शुक्ल वस्त्र धारणकर काले तिलोंसे अग्नि में हवन कर जो विप्र (द्विज) समाहित होकर ब्राह्मणों को (कृष्ण) तिल दान करता है, वह (द्विज) जन्मसे आजतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३-२६ ॥

अमावस्यामनुप्राप्य ब्राह्मणाय तपस्विने।

यत्किंचिद् देवदेवेशं दद्याच्चोद्दिश्य शंकरम्॥२७॥

प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः।

सप्तजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥२८॥

अमावस्या आनेपर जो देवदेवेश भगवान् शंकरको उद्दिष्ट कर 'प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः अर्थात् (इस दानसे) 'सनातन महादेव ईश्वर सोम प्रसन्न हों' ऐसा कहकर तपस्वी ब्राह्मणको जो कुछ भी दान देता है, उससे सात जन्मोंमें किया हुआ उसका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है॥ २७-२८॥

यस्तु कृष्णचतुर्दश्यां स्नात्वा देवं पिनाकिनम्।

आराधयेद् द्विजमुखे न तस्यास्ति पुनर्भवः॥२९॥

कृष्णाष्टम्यां विशेषेण धार्मिकाय द्विजातये।

स्नात्वाभ्यर्च्य यथान्यायं पादप्रक्षालनादिभिः॥३०॥

प्रीयतां मे महादेवो दद्याद्व्यं स्वकीयकम्।

सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥३१॥

जो कृष्ण चतुर्दशीको स्नान करनेके अनन्तर भगवान् पिनाकीकी आराधनाकर ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। विशेषरूपसे कृष्णपक्ष की अष्टमी को स्नान करके पादप्रक्षालन आदिके द्वारा विधिपूर्वक धार्मिक द्विजाति (ब्राह्मण)-की अर्चना करके जो 'प्रीयतां मे महादेवाः' ऐसा कहकर अपना द्रव्य प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करता है॥२९-३१॥

द्विजैः कृष्णचतुर्दश्यां कृष्णाष्टम्यां विशेषतः।

अमावास्यायां भक्तैस्तु पूजनीयस्त्रिलोचनः॥३२॥

एकादश्यां निराहारो द्वादश्यां पुरुषोत्तमम्।

अर्चयेद् ब्राह्मणमुखे स गच्छेत् परमं पदम्॥३३॥

एषा तिथिर्वैष्णवी स्याद्वादशी शुक्लपक्षके।

तस्यामाराधयेद् देवं प्रयत्नेन जनार्दनम् ॥ ३४॥

यत्किञ्चिद् देवमीशानमुद्दिश्य ब्राह्मणेशुचौ।

दीयते विष्णवे वापि तदनन्तफलप्रदम्॥३५॥

भक्त द्विजोंको कृष्ण चतुर्दशी विशेषरूपसे कृष्णाष्टमी और अमावास्याको त्रिलोचन (महादेव)-की पूजा करनी चाहिये। एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीके दिन ब्राह्मणको भोजन कराकर जो पुरुषोत्तमकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि वैष्णवी तिथि है। इस तिथिको प्रयत्नपूर्वक भगवान् जनार्दनकी आराधना करनी चाहिये। भगवान् ईशान (शंकर)-को अथवा विष्णुको उद्दिष्ट कर पवित्र ब्राह्मणको जो कुछ दान दिया जाता है, वह अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है॥३२-३५ ॥

यो हि यां देवतामिच्छेत् समाराधयितुं नरः।

ब्राह्मणान् पूजयेद् यत्नात् स तस्यां तोषयेत् ततः॥३६॥

जो मनुष्य जिस देवताकी आराधना करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक (उस आराध्य देवताकी प्रतिमूर्ति-रूपमें) ब्राह्मणोंकी पूजा करे, इससे वह आराध्य देवता संतुष्ट हो जाते हैं ॥ ३६॥

द्विजानां वपुरास्थाय नित्यं तिष्ठन्ति देवताः।

पूज्यन्ते ब्राह्मणालाभे प्रतिमादिष्वपि क्वचित्॥३७॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत् तत् फलमभीप्सता।

द्विजेषु देवता नित्यं पूजनीया विशेषतः॥३८॥

देवता नित्य ही ब्राह्मणोंके शरीरका आश्रय ग्रहणकर प्रतिष्ठित रहते हैं। कभी ब्राह्मणोंके प्राप्त न होनेपर प्रतिमा आदिमें भी उन देवताओंकी पूजा की जाती है। इसलिये उन-उन फलोंकी प्राप्तिकी इच्छासे सभी प्रकार के प्रयत्नोंसे विशेषरूपसे ब्राह्मणोंमें देवताओंकी नित्य पूजा

करनी चाहिये ॥ ३७-३८॥

विभूतिकामः सततं पूजयेद् वै पुरन्दरम्।

ब्रह्मवर्चसकामस्तु ब्रह्माणं ब्रह्मकामुकः॥ ३९॥

आरोग्यकामोऽथ रविंधनकामो हुताशनम्।

कर्मणां सिद्धिकामस्तु पूजयेद् वै विनायकम्॥४०॥

ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको सर्वदा इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मतेज और ब्रह्मप्राप्तिके अभिलाषी को ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये। आरोग्यकी इच्छावालेको सूर्यकी, धनाभिलाषीको अग्निकी और कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेकी (अपने कार्यकी निर्विघ्न सम्पन्नताकी) इच्छावालेको विनायककी पूजा करनी चाहिये।। ३९-४० ॥

भोगकामस्तु शशिनं बलकाम: समीरणम्।

मुमुक्षुः सर्वसंसारात् प्रयत्नेनार्चयेद्धरिम्॥४१॥

यस्तु योगं तथा मोक्षमन्विच्छेज्ज्ञानमैश्वरम्।

सोऽर्चयेद् वै विरूपाक्षं प्रयत्नेनेश्वरेश्वरम्॥४२॥

ये वाञ्छन्ति महायोगान् ज्ञानानि च महेश्वरम्।

ते पूजयन्ति भूतेशं केशवं चापि भोगिनः॥४३॥

भोग-प्राप्तिकी इच्छावालेको चन्द्रमाकी, बलप्राप्तिकी इच्छावालेको वायुकी और समस्त संसारसे मुक्तिके अभिलाषीको प्रयत्नपूर्वक विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। जो योग, मोक्ष तथा ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक ईश्वरोंके भी ईश्वर विरूपाक्ष (शंकर)-की पूजा करनी चाहिये। जो महायोग और ज्ञानकी इच्छा करते हैं, वे भूताधिपति महेश्वर की पूजा करते हैं और योगीजन केशवकी आराधना करते हैं ॥ ४१-४३॥

वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नदः।

तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदश्चक्षुरुत्तमम्॥४४॥

भूमिदः सर्वमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः।

गृहदोऽग्रयाणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्॥४५॥

वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ।

अनडुदः श्रियं पुष्टां गोदो व्रध्नस्य विष्टपम्॥४६॥

यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः।

धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसात्म्यताम्॥४७॥

धान्यान्यपि यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत्।

वेदवित्सु विशिष्टेषु प्रेत्य स्वर्ग समश्नुते॥४८॥

जलदान करनेवाला तृप्ति प्राप्त करता है, अन्नदान करनेवाला अक्षय सुख प्राप्त करता है, तिलदान करनेवाला इच्छित संतान प्राप्त करता है और दीपदान करनेवाला उत्तम ज्योति (चक्षु) प्राप्त करता है। भूमिदान करनेवाला सब कुछ प्राप्त करता है। स्वर्णदाता दीर्घ आयु, गृह-दान करनेवाला ऊँचे महल तथा चाँदी दान करनेवाला उत्तम रूप प्राप्त करता है। वस्त्र दान करनेवाला चन्द्रलोकमें निवास करता है और अश्व-दान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है। वृषभ-दान करनेवाले को पुष्ट लक्ष्मी और गो-दान करनेवालेको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। यान (सवारी) और शय्या-दान करनेवालेको भार्या तथा अभयदाताको ऐश्वर्य प्राप्त होता है। धान्यदाता शाश्वत सौख्य तथा वेदविद्याका दान करनेवाला ब्रह्म- तादात्म्यको प्राप्त करता है। विशिष्ट वेदज्ञाता ब्राह्मणों को यथाशक्ति धान्य भी प्रदान करना चाहिये। ऐसा करने से मृत्युके अनन्तर स्वर्गकी प्राप्ति होती है।  ४४-४८॥

गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।

इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते नरः॥४९॥

फलमूलानि शाकानि भोज्यानि विविधानि च।

प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु मुदा युक्तः सदा भवेत्॥५०॥

औषधं स्नेहमाहारं रोगिणे रोगशान्तये।

ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च॥५१॥

असिपत्रवनं मार्ग क्षुरधारासमन्वितम्।

तीव्रतापं च तरति छत्रोपानत्प्रदो नरः॥५२॥

यद् यदिष्टतमं लोके यच्चापि दयितं गृहे।

तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥५३॥

गौओंको घास प्रदान करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधनका दान करनेसे मनुष्य प्रदीप्त (जाठर) अग्निवाला (उत्तम पाचनशक्ति-सम्पन्न) होता है। जो ब्राह्मणोंको फल, मूल, शाक तथा विविध भोज्य पदार्थ प्रदान करता है, वह सर्वदा आनन्दित रहता है। रोगीके रोग-शान्तिके लिये जो उन्हें औषधि, स्नेह (तेल, घृत आदि) तथा आहार प्रदान करता है, वह रोगरहित, सुखी तथा दीर्घ आयुवाला होता है। छाता और जूता प्रदान करनेवाला मनुष्य छुरेकी धारसे पूर्ण असिपत्रवनके मार्गमें तीव्र तापको पार कर लेता है। संसारमें जो-जो भी स्वयंको अत्यन्त अभीष्ट हो और जो घरमें सबके लिये अत्यन्त प्रिय वस्तु हो, उस-उस वस्तुको गुणवान् ब्राह्मणको दान में देना चाहिये, ऐसा करनेसे अभीष्ट एवं प्रिय वस्तु अक्षय होकर प्राप्त होती है॥ ४९-५३॥

अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः ।

संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम्॥५४॥

प्रयागादिषु तीर्थेषु पुण्येष्वायतनेषु च।

दत्त्वा चाक्षयमाप्नोति नदीषु च वनेषु च ॥५५॥

अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन), विषुव (मेष और तुला-संक्रान्ति), चन्द्र और सूर्यग्रहण तथा (अन्य) संक्रान्ति आदि समयोंमें दिया हुआ दान अक्षय होता है। प्रयाग आदि तीर्थों, पवित्र मन्दिरों, नदियोंके किनारों तथा (नैमिष आदि पुण्यप्रद) अरण्योंमें दान देनेसे अक्षय (फल) प्राप्त होता है।५४-५५ ॥

दानधर्मात् परो धर्मो भूतानां नेह विद्यते।

तस्माद् विप्राय दातव्यं श्रोत्रियाय द्विजातिभिः॥५६॥

स्वर्गायुभूतिकामेन तथा पापोपशान्तये।

मुमुक्षुणा च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यस्तथाऽन्वहम्॥५७॥

इस संसारमें प्राणियोंके लिये दानसे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये द्विजातियोंको श्रोत्रिय ब्राह्मण को दान देना चाहिये। स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यका अभिलाषी और पापकी शान्तिके इच्छुक तथा मोक्षार्थी पुरुषको प्रतिदिन ब्राह्मणोंके निमित्त दान करना चाहिये ॥५६-५७॥

दीयमानं तु यो मोहाद् गोविप्राग्निसुरेषु च।

निवारयति पापात्मा तिर्यग्योनिं व्रजेत् तु सः॥५८॥

यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा नार्चयेद् ब्राह्मणान् सुरान्।

सर्वस्वमपहृत्यैनं राजा राष्ट्रात् प्रवासयेत्॥५९॥

जो व्यक्ति मोहवश गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवताओंके निमित्त दिये जा रहे दानको रोकता है, वह पापात्मा तिर्यग्योनिमें जाता है। जो द्रव्यका अर्जन करके ब्राह्मणों तथा देवताओंकी पूजा नहीं करता है (अर्थात् धर्मसम्मत, लोकसम्मत-रूपमें धनका उपयोग नहीं करता है तो) उसका सर्वस्व अपहरण करके उसे राष्ट्रसे बाहर निकाल देना राजाका कर्तव्य है ॥५८-५९॥

यस्तु दुर्भिक्षवेलायामन्नाद्यं न प्रयच्छति।

म्रियमाणेषु विप्रेषु ब्राह्मणः स तु गर्हितः॥६०॥

न तस्मात् प्रतिगृह्णीयुर्न विशेयुश्च तेन हि।

अङ्कयित्वा स्वकाद् राष्ट्रात्तं राजा विप्रवासयेत्॥६१॥

यस्त्वसद्भ्यो ददातीह स्वद्रव्यं धर्मसाधनम्।

स पूर्वाभ्यधिकः पापी नरके पच्यते नरः॥६२॥

जो व्यक्ति दुर्भिक्षके समय मरणप्राय विप्रोंको अन्न आदि नहीं देता, वह ब्राह्मण (या मनुष्य) निन्दित होता है, उसके साथ न आदान-प्रदानका व्यवहार करना चाहिये और न उसके साथ बैठना ही चाहिये। राजा उसको चिह्नितकर अपने राष्ट्रसे बाहर निकाल दे। संसारमें अपने धर्मके साधनरूप द्रव्यको जो असज्जनों (दानके अयोग्यों)-को दान करता है, वह मनुष्य पूर्वसे (पूर्वोक्त वर्णित सभी पापियोंसे) भी अधिक पापी होता है और नरकमें पड़ता है॥ ६०-६२॥

स्वाध्यायवन्तो ये विप्रा विद्यावन्तो जितेन्द्रियाः।

सत्यसंयमसंयुक्तास्तेभ्यो दद्याद् द्विजोत्तमाः।। ६३ ।।

सुभुक्तमपि विद्वांसं धार्मिकं भोजयेद् द्विजम्।

न तु मूर्खमवृत्तस्थं दशरात्रमुपोषितम्॥६४॥

हे द्विजोत्तमो! जो ब्राह्मण स्वाध्यायनिरत, विद्यावान्, जितेन्द्रिय तथा सत्य और संयम-सम्पन्न है, उसे दान देना चाहिये। भोजन किये रहनेपर भी विद्वान् धार्मिक द्विजको भोजन कराना चाहिये, किंतु मूर्ख और सदाचारहीन ब्राह्मणको दस दिनोंका भूखा होनेपर भी भोजन नहीं कराना चाहिये ॥६३-६४॥

संनिकृष्टमतिक्रम्य श्रोत्रियं यः प्रयच्छति।

स तेन कर्मणा पापी दहत्यासप्तमं कुलम्॥६५॥

यदि स्यादधिको विप्रः शीलविद्यादिभिः स्वयम्।

तस्मै यत्नेन दातव्यं अतिक्रम्यापि संनिधिम्॥६६॥

योऽर्चितं प्रतिगृह्णीयाद् दद्यादर्चितमेव च।

तावुभौ गच्छतः स्वर्ग नरकं तु विपर्यये॥६७॥

न वार्यपि प्रयच्छेत नास्तिके हैतुकेऽपि च।

पाषण्डेषु च सर्वेषु नावेदविदि धर्मवित्॥ ६८॥

जो समीपमें स्थित श्रोत्रियकी अवमानना कर अन्य (ब्राह्मण)-को दान देता है, वह पापी अपने उस पापके कारण अपने सात पीढ़ीतकको दग्ध कर डालता है। यदि कोई ब्राह्मण शील, विद्या आदिमें अधिक गुणसम्पन्न हो, तो समीपके ब्राह्मणका भी अतिक्रमण कर यापूर्वक उसे दान देना चाहिये। जो आदरपूर्वक दान ग्रहण करता है और जो आदरपूर्वक देता है, वे दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत करनेवाले नरक जाते हैं। धर्मज्ञको नास्तिक, कुतर्की, सभी पाखंडियों तथा वेदज्ञानसे हीन व्यक्तिके निमित्त जलका भी दान नहीं करना चाहिये ॥६५-६८॥

अपूपं च हिरण्यं च गामश्वं पृथिवीं तिलान्।

अविद्वान् प्रतिगृह्णानो भस्मीभवति काष्ठवत्॥६९॥

द्विजातिभ्यो धनं लिप्सेत् प्रशस्तेभ्यो द्विजोत्तमः ।

अपि वा जातिमात्रेभ्यो न तु शूद्रात् कथञ्चन॥७०॥

अपूप (पुआ), स्वर्ण, गौ, अश्व, पृथ्वी तथा तिलका दान ग्रहण करनेवाला अविद्वान् व्यक्ति लकड़ीके समान भस्म हो जाता है (अर्थात् दान लेनेकी योग्यता न रहनेपर लोभवश दान नहीं लेना चाहिये)। श्रेष्ठ द्विजको प्रशस्त द्विजातियोंसे धनकी इच्छा करनी चाहिये अथवा अपनी जातिवालोंसे ही धन ग्रहण करना चाहिये, किंतु शूद्रसे किसी प्रकार धन नहीं लेना चाहिये ॥ ६९-७०॥

वृत्तिसंकोचमन्विच्छन्नेहेत धनविस्तरम्।

धनलोभे प्रसक्तस्तु ब्राह्मण्यादेव हीयते॥७१॥

वेदानधीत्य सकलान् यज्ञांश्चावाप्य सर्वशः।

न तां गतिमवाप्नोति संकोचा यामवाप्नुयात्॥७२॥

प्रतिग्रहरुचिर्न स्यात् यात्रार्थं तु समाहरेत् ।

स्थित्यर्थादधिकं गृह्णन् ब्राह्मणो यात्यधोगतिम्।। ७३ ।।

ब्राह्मणको वृत्तिके संकोचकी इच्छा रखनी चाहिये, उसे धनका विस्तार करनेकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। धनके लोभमें आसक्त ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है। सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करने और सभी यज्ञों को कर लेनेपर भी वह गति नहीं प्राप्त होती जो (वृत्तिके) संकोचसे प्राप्त होती है (अर्थात् जीवननिर्वाहके लिये जीविकाका अधिक-से-अधिक विस्तार उचित नहीं है)। दान लेने में रुचि नहीं होनी चाहिये। मात्र जीवन- निर्वाहके लिये धन ग्रहण करना चाहिये। अपनी स्थितिमात्रसे अधिक धन लेनेवाला ब्राह्मण अधोगति प्राप्त करता है (अर्थात् अपने तथा अपने परिवार के पोषणके लिये जितना अत्यावश्यक है, उतना ही लेना चाहिये।) ॥७१-७३॥

यस्तु याचनको नित्यं न स स्वर्गस्य भाजनम्।

उद्वेजयति भूतानि यथा चौरस्तथैव सः॥७४॥

गुरून् भृत्यांश्चोजिहीर्घरर्चिष्यन् देवतातिथीन्।

सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः॥७५॥

जो नित्य याचना करता है, वह स्वर्गका भागी नहीं होता। वह प्राणियोंको उद्विग्न करता है, वह चोर के ही समान होता है। गुरुजनों तथा सेवकोंके उद्धार की इच्छा करनेवाला तथा देवता और अतिथियोंकी आराधना करनेवाला सबसे दान ग्रहण कर सकता है, किंतु उस

दानसे वह अपनी तृप्ति न करे।।७४-७५ ॥

एवं गृहस्थो युक्तात्मा देवतातिथिपूजकः।

वर्तमानः संयतात्मा याति तत् परमं पदम्॥७६॥

पुत्रे निधाय वा सर्वं गत्वारण्यं तु तत्त्ववित्।

एकाकी विचरेन्नित्यमुदासीनः समाहितः॥७७॥

एष वः कथितो धर्मो गृहस्थानां द्विजोत्तमाः।

ज्ञात्वानुतिष्ठेन्नियतं तथानुष्ठापयेद् द्विजान्॥७८॥

इस प्रकार संयत आत्मावाला, देवताओं तथा अतिथियोंकी पूजा करनेवाला युक्तात्मा गृहस्थ परमपद को प्राप्त करता है। अथवा पुत्रको अपना सर्वस्व समर्पित कर तत्त्वज्ञानी पुरुषको वनमें जाकर समाहित होकर विरक्तभावसे नित्य एकाकी विचरण करना चाहिये।

हे द्विजोत्तमो! यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंका धर्म बतलाया। इसे जानकर इसका नियमप•क स्वयं अनुष्ठान करना चाहिये और अन्य द्विजोंसे इसका पालन करवाना चाहिये ॥७६-७८॥

इति देवमनादिमेकमीशं गृहधर्मेण समर्चयेदजस्रम्।

समतीत्य स सर्वभूतयोनि प्रकृतिं याति परं न याति जन्म॥७९॥

इस प्रकार गृहस्थधर्मके द्वारा अनादि, अद्वितीय देव ईश्वरकी सतत आराधना करनी चाहिये। (ऐसा करनेवाला) वह व्यक्ति समस्त प्राणियोंके मूल कारण प्रकृतिका अतिक्रमण कर परमपदको प्राप्त कर लेता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता ।। ७९ ॥