27 अध्याय

वानप्रस्थ-आश्रम तथा वानप्रस्थ-धर्मका वर्णन, वानप्रस्थीके कर्तव्योंका निरूपण

व्यास उवाच

एवं गृहाश्रमे स्थित्वा द्वितीय भागमायुषः।

वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् सदारः साग्निरेव च॥ १ ॥

निक्षिप्य भार्या पुत्रेषु गच्छेद् वनमथापि वा।

दृष्ट्वापत्यस्य चापत्यं जर्जरीकृतविग्रहः॥२॥

शुक्लपक्षस्य पूर्वाह्ने प्रशस्ते चोत्तरायणे।

गत्वारण्यं नियमवांस्तपः कुर्यात् समाहितः॥ ३ ॥

व्यासजीने कहा-इस प्रकार आयुके द्वितीय भागतक गृहस्थाश्रममें रहकर (तृतीय भागमें) अग्नि तथा भार्यासहित वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करना चाहिये। अथवा पुत्रके भी पुत्रको देखकर और शरीरके जर्जर हो जानेपर अपनी पत्नीको पुत्रोंके संरक्षणमें रख दे तथा स्वयं वनमें चला जाय। प्रशस्त उत्तरायणमें शुक्लपक्षके पूर्वाह्नमें वनमें जाकर नियम ग्रहणकर समाहित होकर तप करना चाहिये ॥१-३॥

फलमूलानि पूतानि नित्यमाहारमाहरेत्।

यताहारो भवेत् तेन पूजयेत् पितृदेवताः॥ ४ ॥

पूजयित्वातिथिं नित्यं स्नात्वा चाभ्यर्चयेत् सुरान्।

गृहादाहृत्य चाश्नीयादष्टौ ग्रासान् समाहितः॥ ५ ॥

जटाश्च बिभृयान्नित्यं नखरोमाणि नोत्सृजेत्।

स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यानियच्छेद् वाचमन्यतः॥ ६ ॥

नित्य पवित्र फल-मूलोंको आहारके लिये स्वीकार करना चाहिये और इस प्रकार संयत आहारवाला होकर उसी फल-मूल आदिसे पितरों तथा देवताओंका पूजन (संतर्पण) करना चाहिये। स्नान करके नित्य अतिथियों का पूजन करके देवताओंका पूजन करे। घरसे लाकर

एकाग्रतापूर्वक आठ ग्रास भोजन करे। नित्य जटा धारण करे, नख तथा रोम न कटवाये। सर्वदा स्वाध्याय करे और अन्य विषयोंसे वाणीको रोके॥४-६॥

अग्निहोत्रं च जुहुयात् पञ्चयज्ञान् समाचरेत्।

मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा॥ ७ ॥

चीरवासा भवेन्नित्यं स्नायात् त्रिषवणंशुचिः।

सर्वभूतानुकम्पी स्यात् प्रतिग्रहविवर्जितः॥ ८ ॥

दर्शन पौर्णमासेन यजेत नियतं द्विजः ।

ऋक्षेष्वाग्रयणे चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत्।

उत्तरायणं च क्रमशो दक्षस्यायनमेव च॥ ९॥

वासन्तैः शारदैर्मेध्यैर्मुन्यन्नैः स्वयमाहृतैः।

पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवनिर्वपेत् पृथक् ॥१०॥

देवताभ्यश्च तद् हुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः।

शेषं समुपभुञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम्॥११॥

अग्निहोत्र करे और (वनमें स्वयं उत्पन्न होनेवाले) मुनियोंके विविध प्रकारके पवित्र अन्नों एवं शाक, मूल अथवा फलोंसे पञ्चमहायज्ञोंको सम्पन्न करे। नित्य चीररूपी (अचला, कौपीनमात्र) वस्त्र धारण करे, तीनों संध्याओंमें पवित्रतापूर्वक स्नान करे। सभी प्राणियोंपर

दया रखे और दान ग्रहण न करे। (वानप्रस्थी) द्विजको नियमसे दर्श-पौर्णमासयाग, नक्षत्रयाग, आग्रयण (नवशस्येष्टि) और चातुर्मासयाग करना चाहिये तथा क्रमशः उत्तरायण

एवं दक्षिणायन याग करना चाहिये। वसन्त तथा शरत्कालमें उत्पन्न स्वयं लाये हुए पवित्र मुन्यन्त्रों से पृथक्-पृथक् पुरोडाश एवं चरु बनाकर देवताओं (तथा पितरों)-को अतिपवित्र वन्य हवि प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर अवशिष्ट उस हविको लवण मिलाकर स्वयं भक्षण करना चाहिये॥७-११॥

वर्जयेन्मधुमांसानि भौमानि कवकानि च।

भूस्तृणं शिकं चैव श्लेष्मातकफलानि च॥१२॥

मधु, मांस, भूमिमें उत्पन्न कवक (कुकुरमुत्ता), भूस्तृण (शाकविशेष), शिग्रुक (सहिजन) तथा श्लेष्मातक (लिसोढ़ा)-के फलोंका त्याग करना चाहिये॥१२॥

न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित्।

न ग्रामजातान्यार्तोऽपि पुष्पाणि च फलानि च॥१३॥

अश्मकुट्टो भवेद् वापि कालपक्वभुगेव वा॥२३॥

हलसे जोती हुई भूमिमें उत्पन्न और दूसरोंके द्वारा परित्यक्त पदार्थका भक्षण नहीं करना चाहिये। कष्ट में होते हुए भी ग्राममें उत्पन्न पुष्पों-फलोंका भक्षण नहीं करना चाहिये॥१३॥

श्रावणेनैव विधिना वह्निं परिचरेत् सदा।

न द्रुह्येत् सर्वभूतानि निर्द्वन्द्वो निर्भयो भवेत्॥१४॥

न नक्तं किंचिदश्नीयाद्रात्रौ ध्यानपरो भवेत्।

जितेन्द्रियो जितक्रोधस्तत्त्वज्ञानविचिन्तकः।

ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं न पत्नीमपि संश्रयेत्॥१५॥

सर्वदा श्रावणी विधिके अनुसार अग्निकी परिचर्या करे। किसी भी प्राणीसे द्रोह न करे, द्वन्द्वोंसे परे और भयरहित रहे। रातमें कुछ भी भोजन न करे, रात्रिमें केवल ध्यानपरायण रहे। नित्य इन्द्रियजयी, क्रोधजयी, तत्त्वज्ञानका चिन्तक तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहे। पत्नीका

भी आश्रय न ले॥१४-१५॥

यस्तु पल्या वनं गत्वा मैथुनं कामतश्चरेत्।

तद् व्रतं तस्य लुप्येत प्रायश्चित्तीयते द्विजः॥१६॥

तत्र यो जायते गर्भो न संस्पृश्यो द्विजातिभिः।

न हि वेदेऽधिकारोऽस्य तद्वंशेऽप्येवमेव हि ॥१७॥

अधः शयीत सततं सावित्रीजाप्यतत्परः।

शरण्यः सर्वभूतानां संविभागपरः सदा ॥१८॥

जो (द्विज) वनमें जाकर कामवश पत्नीके साथ मैथुन करता है तो वह व्रत (वानप्रस्थव्रत)-से च्युत हो जाता है और प्रायश्चित्तका भागी होता है। वहाँ (वानप्रस्थाश्रममें) जो संतान उत्पन्न होती है, वह द्विजातियोंके द्वारा स्पर्शके योग्य नहीं होती। उसका वेदमें अधिकार नहीं होता और उसके वंशमें भी यही स्थिति रहती है। (वानप्रस्थीको) नित्य भूमिपर शयन करना चाहिये। गायत्रीके जपमें तत्पर रहना चाहिये। सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला होना चाहिये और दानशील होना चाहिये॥१६-१८॥

परिवादं मृषावादं निद्रालस्यं विवर्जयेत्।

एकाग्निरनिकेत: स्यात् प्रोक्षितां भूमिमाश्रयेत्॥१९॥

मृगैः सह चरेद् वासं तैः सहैव च संवसेत्।

शिलायां शर्करायां वा शयीत सुसमाहितः॥२०॥

सद्यः प्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा।

षण्मासनिचयो वा स्यात् समानिचय एव वा ॥२१॥

परिवाद (परनिन्दा), असत्यभाषण, निद्रा तथा आलस्यका परित्याग करना चाहिये। एकाग्नि और घर से रहित होना चाहिये। प्रोक्षित की गयी भूमिपर रहना चाहिये। (वनमें) मृगोंके साथ विचरण करना चाहिये और उन्हींके साथ रहना चाहिये (अर्थात् असंग हो वनमें ही रहे)। शिला या बालूके ऊपर शयन करना चाहिये और सदा समाहितचित्त रहना चाहिये। शीघ्र ही समाप्त होने योग्य फल-मूल आदिका संग्रह करनेवाला होना चाहिये अथवा एक महीनेतक, छ: महीनेतक या एक वर्षतक उपयोग किये जानेवाले (फल- मूलादि)- -का संग्रह करनेवाला होना चाहिये॥१९-२१॥

त्यजेदाश्वयुजे मासि सम्पन्नं पूर्वसंचितम्।

जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥२२॥

दन्तोलूखलिको वा स्यात् कापोतीं वृत्तिमाश्रयेत्।

पूर्वसंचित पदार्थों, जीर्ण वस्त्रों तथा शाक, फल, मूल आदिका आश्विनमासमें परित्याग कर देना चाहिये। दाँतोंको ही ऊखल (तथा मूसल) समझना चाहिये। कापोतीवृत्ति (कबूतरकी तरह दाना चुगकर खानेवाली वृत्ति)- -का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥२२-२३॥

नक्तं चान्नं समश्नीयाद् दिवा चाहृत्य शक्तितः।

चतुर्थकालिको वा स्यात् स्याद्वाप्यष्टमकालिकः॥२४॥

चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्ले कृष्णेच वर्तयेत्।

पक्षे पक्षे समश्नीयाद्यवागूक्वथितां सकृत्॥२५॥

अथवा पत्थरपर ही कूटकर अन्नका भक्षण करनेवाला होना चाहिये या समयानुसार पके हुए (फल-मूलादि)- का भक्षण करनेवाला होना चहिये। यथाशक्ति दिन में अन्न (फल-मूलादि) लाकर रात्रिमें भक्षण करना चाहिये अथवा चतुर्थकालिक या अष्टमकालिक भोजन

करनेवाला होना चाहिये। अथवा शुक्ल और कृष्णपक्षमें चान्द्रायणविधिसे रहे। या प्रत्येक पक्षमें एक बार उबाले गये यवागूका भक्षण करे ॥ २४-२५ ।।

पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत् सदा।

स्वाभाविकैः स्वयं शीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥२६॥

भूमौ वा परिवर्तेत तिष्ठेद् वा प्रपदैर्दिनम्।

स्थानासनाभ्यां विहरेन्न क्वचिद् धैर्यमुत्सृजेत्॥ २७॥

ग्रीष्मे पञ्चतपाश्च स्याद्वर्षास्वभावकाशकः ।

आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २८॥

अथवा सर्वदा वैखानस (वानप्रस्थ) व्रतका पालन करते हुए केवल स्वाभाविक रीतिसे अपने-आप (वृक्षसे) गिरे हुए पुष्प, मूल एवं फलोंसे निर्वाह करता रहे। भूमिपर लेटना एवं रहना चाहिये। दिनमें पंजों के बल उठना, बैठना या चलना चाहिये। धैर्य कभी भी न छोड़े। ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्नि-तप (तप-विशेष का सेवन) करे। वर्षाके दिनोंमें खुले आकाशके नीचे रहे और हेमन्तमें गीले वस्त्र धारण करे-इस प्रकार क्रमश: तपस्याको बढ़ाता रहे ॥ २६–२८॥

उपस्पृश्य त्रिषवणं पितृदेवांश्च तर्पयेत्।

एकपादेन तिष्ठेत मरीचीन् वा पिबेत् तदा ॥२९॥

पञ्चाग्निधूमपो वा स्यादुष्मपः सोमपोऽपि वा।

पयः पिबेच्छुक्लपक्षे कृष्णपक्षे तु गोमयम्।

शीर्णपर्णाशनो वा स्यात् कृच्छैर्वा वर्तयेत् सदा॥३०॥

आचमनकर तीनों संध्याओंमें स्नान तथा पितरों और देवताओंका तर्पण (एवं पूजन) करे। उस समय एक पैरसे खड़ा रहे अथवा सूर्यकिरणोंका पान करे। पञ्चाग्निका सेवन करे अथवा धुएँका पान करे या ऊष्माका पान करे अथवा सोमपान करे। शुक्ल पक्ष में दुग्ध-पान करे और कृष्णपक्षमें गोमयका सेवन करे अथवा गिरे हुए पत्तोंका सेवन करे या सदा कृच्छ्रव्रत का पालन करता रहे ॥ २९-३०॥

योगाभ्यासरतश्च स्याद्द्राध्यायी भवेत् सदा।

अथर्वशिरसोऽध्येता वेदान्ताभ्यासतत्परः॥३१॥

यमान् सेवेत सततं नियमांश्चाप्यतन्द्रितः।

कृष्णाजिनी सोत्तरीयः शुक्लयज्ञोपवीतवान्॥३२॥

अथ चाग्नीन्समारोप्य स्वात्मनि ध्यानतत्परः।

अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मोक्षपरो भवेत्॥३३॥

सदा योगका अभ्यास करता रहे, रुद्राध्याय का अध्ययन करता रहे। अथर्वशिरस्के अध्ययन और वेदान्तके अभ्यासमें तत्पर रहे। आलस्यरहित होकर निरन्तर यमों और नियमोंका पालन करे। कृष्ण-मृगचर्म, उत्तरीय और शुक्ल यज्ञोपवीत धारण करे। अग्नियों को अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित कर ध्यान-परायण रहे। अग्नि (गृह्याग्नि) और गृहका परित्याग कर दे और मुनिव्रत द्वारा मोक्षकी प्राप्तिका प्रयत्न करता रहे ॥ ३१-३३॥

तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत्।

गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ ३४॥

जीवन-निर्वाहके लिये तपस्वी ब्राह्मणोंसे ही भिक्षा माँगे। अथवा अन्य गृहस्थों तथा वनवासी द्विजोंसे भिक्षा लेनी चाहिये॥३४॥

ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान् वने वसन्।

प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा॥३५॥

अथवा वनमें रहते हुए ग्रामसे लाकर मात्र आठ ग्रास भोजन करना चाहिये। पत्तोंके दोने, हाथ अथवा कसोरे (मिट्टीके पात्र) इत्यादिके टुकड़े में ही भोजन ग्रहण करना चाहिये ॥ ३५ ॥

विविधाश्चोपनिषद आत्मसंसिद्धये जपेत्।

विद्याविशेषान् सावित्रीं रुद्राध्यायं तथैव च ॥ ३६॥

महाप्रास्थानिकं चासौ कुर्यादनशनं तु वा।

अग्निप्रवेशमन्यद्वा ब्रह्मार्पणविधौ स्थितः ।। ३७॥

आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये (विधिपूर्वक) विविध उपनिषदोंका निरन्तर पाठ करना चाहिये। इसी प्रकार विशिष्ट विद्याओं, गायत्री तथा रुद्राध्यायकी आवृत्ति करनी चाहिये। अथवा ब्रह्मार्पण-विधिमें स्थित रहते हुए महाप्रस्थान (मृत्यु-पथ)-के उद्देश्यसे अनशन करे या अग्निमें प्रवेश करे। ३६-३७॥

यस्तु सम्यगिममाश्रमं शिवं संश्रयेदशिवपुञ्जनाशनम्

तापसः स परमैश्वरं पदं याति यत्र जगतोऽस्य संस्थितिः॥३८॥।

जो तपस्वी अमंगल-समूहका नाश करनेवाले तथा कल्याणकारी इस (वानप्रस्थ) आश्रमका भलीभाँति आश्रयण करता है, वह उस परम ऐश्वर पदको प्राप्त करता है, जिसमें इस जगत्की स्थिति है॥ ३८॥