कूर्म महा पुराण
44 अध्याय
प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन,
शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी
विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी
वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी
वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन
कूर्म उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिसर्गमनुत्तमम्।
प्राकृतं हि समासेन शृणुध्वं गदतो मम॥१॥
(भगवान्) कूर्मने कहा-इसके अनन्तर अब मैं उत्तम प्राकृत प्रलयका संक्षेपमें वर्णन करूँगा। उसे आप सब श्रवण करें॥१॥
गते परार्धद्वितये कालो लोकप्रकालनः।
कालाग्निर्भस्मसात् कर्तुं करोति निखिलं मतिम्॥२॥
स्वात्मन्यात्मानमावेश्य भूत्वा देवो महेश्वरः।
दहेदशेषं ब्रह्माण्डं सदेवासुरमानुषम्॥३॥
तमाविश्य महादेवो भगवान्नीललोहितः।
करोति लोकसंहारं भीषणं रूपमाश्रितः॥४॥
प्रविश्य मण्डलं सौरं कृत्वासौ बहुधा पुनः।
निर्दहत्यखिलं लोकं सप्तसप्तिस्वरूपधृक् ॥५॥
द्वितीय* परार्ध (अर्थात् ब्रह्माजीकी परमायु-दिव्य १०० वर्षका समय)-के बीत जानेपर समस्त लोकों का लय करनेवाला कालरूप कालाग्नि सम्पूर्ण जगत्को भस्मसात् करनेका निश्चय करता है। महेश्वर देव अपनी आत्मामें आत्मा (जीवात्मा)-को आविष्टकर देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध करते हैं। भगवान् नीललोहित महादेव भीषण रूप धारणकर उस अग्निमें प्रविष्ट होकर अर्थात् महाकाल रूप होकर लोकका संहार करते हैं। सौर-मण्डलमें प्रविष्ट होकर उसे पुन: अनेक रूपवाला बनाकर सात-सात किरणोंवाले सूर्यरूपधारी वे महेश्वर सम्पूर्ण लोकों को दग्ध करते हैं॥२-५॥
स दग्ध्वा सकलं सत्त्वमस्त्रं ब्रह्मशिरो महत्।
देवतानां शरीरेषु क्षिपत्यखिलदाहकम्॥६॥
दग्धेष्वशेषदेवेषु देवी गिरिवरात्मजा।
एका सा साक्षिणी शम्भोस्तिष्ठते वैदिकी श्रुतिः॥७॥
समस्त सत्त्व (पदार्थों)-को दग्ध करके वे महेश्वर देवताओंके शरीरपर सभीको जलानेमें समर्थ ब्रह्मशिर नामक महान् अस्त्रको छोड़ते हैं। सम्पूर्ण देवताओं के दग्ध हो जानेपर श्रेष्ठ पर्वत (हिमवान्)-की पुत्री देवी पार्वती अकेली ही साक्षीके रूपमें उन (शिव)के पास स्थित रहती हैं-ऐसी वैदिकी श्रुति है॥६-७॥
शिरःकपालैर्देवानां कृतस्त्रग्वरभूषणः।
आदित्यचन्द्रादिगणैः पूरयन् व्योममण्डलम्॥ ८ ॥
सहस्रनयनो देवः सहस्राकृतिरीश्वरः ।
सहस्त्रहस्तचरणः सहस्रार्चिमहाभुजः॥ ९ ॥
दंष्ट्राकरालवदनः प्रदीप्तानललोचनः।
त्रिशूली कृत्तिवसनो योगमैश्वरमास्थितः॥१०॥
पीत्वा तत्परमानन्दं प्रभूतममृतं स्वयम्।
करोति ताण्डवं देवीमालोक्य परमेश्वरः॥११॥
देवताओंके मस्तकके कपालसे निर्मित माला को आभूषणरूपमें धारण करनेवाले, हजारों नेत्रवाले, हजारों आकृतिवाले, हजारों हाथ-पैरवाले, हजारों किरणवाले, भीषण दंष्ट्रा (दाढ़)-के कारण भयंकर मुखोंवाले, प्रदीप्त अग्निके समान नेत्रोंवाले, त्रिशूली चर्माम्बरधारी वे देव महेश्वर अनन्त सूर्य एवं चन्द्रके समूहोंसे समस्त आकाशमण्डलको व्याप्तकर ऐश्वरयोगमें स्थित हो जाते हैं और भगवती पार्वतीको देखते हुए परमानन्दमय अमृतका पानकर स्वयं ताण्डव नृत्य करते हैं॥८-११॥
पीत्वा नृत्तामृतं देवी भर्तुः परममङ्गला।
योगमास्थाय देवस्य देहमायाति शूलिनः॥१२॥
संत्यक्त्वा ताण्डवरसंस्वेच्छयैव पिनाकधृक् ।
ज्योतिः स्वभावं भगवान् दग्ध्वा ब्रह्माण्डमण्डलम्॥१३॥
संस्थितेष्वथ देवेषु ब्रह्मविष्णुपिनाकिषु।
गुणैरशेषैः पृथिवी विलयं याति वारिषु॥१४॥
सवारितत्त्वं सगुणं ग्रसते हव्यवाहनः।
तेजस्तु गुणसंयुक्तं वायौ संयाति संक्षयम्॥१५॥
पतिके नृत्यरूपी अमृतका पानकर परम कल्याणरूपिणी देवी (पार्वती) योगका आश्रय लेते हुए त्रिशूली शिवके शरीरमें प्रविष्ट हो जाती हैं। ब्रह्माण्डमण्डलको दग्ध करनेके अनन्तर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् (शिव) अपनी इच्छासे ही ताण्डव (-के आनन्द) रस का परित्यागकर ज्योतिःस्वरूप अपने भावमें स्थित हो जाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा पिनाकी शिवके इस प्रकार स्थित हो जानेपर अपने सम्पूर्ण गुणोंके साथ पृथ्वी जलमें विलीन हो जाती है। अपने गुणोंसहित उस जल-तत्त्वको हव्यवाहन अग्नि ग्रहण कर लेता है और अपने गुणोंसहित वह तेज (अग्नि) वायु में विलीन हो जाता है॥ १२-१५ ॥
आकाशे सगुणो वायुः प्रलयं याति विश्वभृत्।
भूतादौ च तथाकाशं लीयते गुणसंयुतम्॥१६॥
इन्द्रियाणि च सर्वाणि तैजसे यान्ति संक्षयम्।
वैकारिके देवगणाः प्रलयं यान्ति सत्तमाः॥१७॥
वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चेति सत्तमाः।
त्रिविधोऽयमहंकारो महति प्रलयं व्रजेत्॥१८॥
विश्वका भरण-पोषण करनेवाला वायु अपने गुणों के साथ आकाश (तत्त्व)-में लीन हो जाता है और अपने गुणसहित वह आकाश भूतादि अर्थात् तामस अहंकार में लीन हो जाता है। सत्तमो! सभी इन्द्रियाँ तैजस अर्थात् राजस अहंकारमें विलीन हो जाती हैं और (इन्द्रियों के अधिष्ठाता) देवगण वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहंकार में प्रलीन हो जाते हैं। श्रेष्ठो! वैकारिक, तैजस तथा भूतादि (तामस) नामक तीन प्रकारका अहंकार महत्तत्त्व में लीन हो जाता है।।१६-१८॥
महान्तमेभिः सहितं ब्रह्माणमतितेजसम्।
अव्यक्तं जगतो योनिः संहरेदेकमव्ययम्॥१९॥
एवं संहृत्य भूतानि तत्त्वानि च महेश्वरः।
वियोजयति चान्योन्यं प्रधानं पुरुषं परम्॥२०॥
यह महत्तत्त्व पृथ्वीसे अहंकारपर्यन्त समस्त तत्त्वों का मूल होनेके कारण एक प्रकारसे अमित तेजस्वी ब्रह्मा ही हैं। अतः ब्रह्मारूप तथा अपनेमें पृथ्वी आदि समस्त तत्त्वोंको समाविष्ट कर लेनेवाले इस अद्वितीय महत्तत्त्व का संहार वह प्रकृति कर देती है, जो अव्यक्त है एवं समस्त जगत्का मूल कारण है। इस प्रकार (पञ्च) भूतों तथा तत्त्वोंका संहारकर महेश्वर प्रधान-प्रकृति और पुरुषको परस्पर वियुक्त कर देते हैं। १९-२० ॥
प्रधानपुंसोरजयोरेष संहार ईरितः।
महेश्वरेच्छाजनितो न स्वयं विद्यते लयः ॥२१॥
गुणसाम्यं तदव्यक्तं प्रकृतिः परिगीयते।
प्रधानं जगतो योनिर्मायातत्त्वमचेतनम्॥२२॥
इस (प्रकृति-पुरुष वियोगको) ही अनादि प्रकृति और पुरुषका संहार कहा जाता है (क्योंकि सांख्यशास्त्र के अनुसार इन दोनोंके नित्य होनेसे इनका लय कहीं नहीं हो सकता)। यह (वियोगरूप) लय भी महेश्वरकी इच्छासे ही होनेवाला है, स्वयं नहीं हो सकता। गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है और अव्यक्त है। जगत्का मूल कारण प्रधान है। वह अचेतन है, इसे माया के रूप में समझना चाहिये ॥ २१-२२॥
कूटस्थश्चिन्मयो ह्यात्मा केवलः पञ्चविंशकः।
गीयते मुनिभिः साक्षी महानेकः पितामहः॥ २३॥
एवं संहारकरणी शक्तिर्माहेश्वरी ध्रुवा।
प्रधानाद्यं विशेषान्तं दहेद् रुद्र इति श्रुतिः॥२४॥
योगिनामथ सर्वेषां ज्ञानविन्यस्तचेतसाम्।
आत्यन्तिकं चैव लयं विदधातीह शंकरः॥२५॥
कूटस्थ, अद्वितीय पचीसवाँ तत्त्वरूप आत्मा चिन्मय-चेतन होता है। मुनिगण इसे साक्षी, महान् तथा पितामह कहते हैं। इतनेसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरकी शाश्वत शक्ति ही संहार करती है। श्रुतिका भी यही कथन है कि रुद्र प्रधान अर्थात् प्रकृतिसे विशेष अर्थात् स्थूल-भूतपर्यन्त सभी तत्त्वोंको दग्ध करते हैं। ज्ञानपरायण सभी योगियोंका आत्यन्तिक प्रलय भी शंकर ही करते हैं ।। २३-२५॥
इत्येष भगवान् रुद्रः संहारं कुरुते वशी।
स्थापिका मोहनी शक्तिर्नारायण इति श्रुतिः॥२६॥
हिरण्यगर्भो भगवान् जगत् सदसदात्मकम्।
सृजेदशेष प्रकृतेस्तन्मयः पञ्चविंशकः॥२७॥
इस प्रकार सबको अपने वशमें रखनेवाले ये भगवान् रुद्र ही संहार करते हैं। श्रुतिके अनुसार (जगत्की) स्थापना करनेवाली (रुद्रकी) मोहनी शक्तिको ही नारायण कहते हैं। पचीसवें तत्त्व अर्थात् पुरुषस्वरूप भगवान् | हिरण्यगर्भ प्रकृतिसे तन्मय (संयुक्त) होकर सम्पूर्ण सत् असदात्मक जगत्की सृष्टि करते हैं ।। २६-२७॥
सर्वज्ञाः सर्वगाः शान्ताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः।
शक्तयो ब्रह्मविष्णवीशा भुक्तिमुक्तिफलप्रदाः।। २८॥
सर्वेश्वराः सर्ववन्द्याः शाश्वतानन्तभोगिनः ।
एकमेवाक्षरं तत्त्वं पुंप्रधानेश्वरात्मकम्॥२९॥
अपनी आत्मामें ही व्यवस्थित रहनेवाली (अर्थात् स्वयंमें ही अधिष्ठित वस्तुतः निरधिष्ठान) ब्रह्मा, विष्णु तथा ईश (महेश्वर) नामक सर्वज्ञ, सर्वव्यापी तथा शान्त तीन शक्तियाँ भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाली हैं।
ये शक्तियाँ सर्वेश्वरस्वरूप, सभीके द्वारा वन्दनीय, शाश्वत और अनन्त भोगोंसे सम्पन्न हैं। अद्वितीय अक्षर तत्त्व ही पुरुष, प्रधान और ईश्वररूप है॥ २८-२९॥
अन्याश्च शक्तयो दिव्याः सन्ति तत्र सहस्रशः।
इज्यन्ते विविधैर्यज्ञैः शक्रादित्यादयोऽमराः॥३०॥
एकैकस्य सहस्राणि देहानां वै शतानि च।
कथ्यन्ते चैव माहात्म्याच्छक्तिरेकैव निर्गुणा॥३१॥
उस परमात्मा (अव्यक्त अक्षर-तत्त्व)-में अन्य भी इन्द्र, सूर्य आदि हजारों दिव्य शक्तियाँ हैं। इनकी भी विविध यज्ञोंके द्वारा आराधना की जाती है। इन इन्द्र, सूर्य आदि एक-एक देवका भी ऐसा माहात्म्य है कि इनके सैकड़ों-हजारों अर्थात् अनन्त शरीर हैं और इन शरीरोंमें लोक-कल्याणके लिये अनन्त
शक्तियाँ हैं, पर वस्तुतः इन सबका मूल एक ही निर्गुण शक्ति है-॥३०-३१॥
तां तां शक्तिं समाधाय स्वयं देवो महेश्वरः।
करोति देहान् विविधान् ग्रसते चैव लीलया॥३२॥
इज्यते सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणैर्वेदवादिभिः ।
सर्वकामप्रदो रुद्र इत्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ ३३॥
सर्वासामेव शक्तीनां ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
प्राधान्येन स्मृता देवाः शक्तयः परमात्मनः ।। ३४।।
अव्यक्त अक्षर अद्वितीय तत्त्व। उन-उन शक्तियों का आश्रयण कर महेश्वरदेव स्वयं लीलापूर्वक विविध देहोंकी सृष्टि करते हैं और उनका संहार भी करते हैं। वेदवादी (वेदज्ञ) ब्राह्मणोंके द्वारा समस्त यज्ञोंमें उन (महेश्वर) का पूजन किया जाता है। ये ही रुद्र हैं तथा सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले हैं-ऐसा वेदका कथन है। परमात्माकी सभी शक्तियोंमें ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर देव प्रधान शक्तिके रूपमें माने गये हैं। ३२-३४॥
आद्यः परस्ताद् भगवान् परमात्मा सनातनः ।
गीयते सर्वशक्त्यात्मा शूलपाणिमहेश्वरः ॥ ३५॥
एनमेके वदन्त्यग्निं नारायणमथापरे।
इन्द्रमेके परे विश्वान् ब्रह्माणमपरे जगुः ॥ ३६॥
शूलपाणि' महेश्वर (कारणब्रह्म-तुरीय तत्त्व) तो आद्य, सबसे परे, भगवान्, परमात्मा, सनातन एवं सर्वशक्त्यात्मा (समस्त शक्तियोंके मूल उद्गम एवं अधिष्ठान)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित हैं। इसलिये कुछ लोग इन्हें अग्नि तथा कुछ लोग नारायण कहते हैं। ऐसे ही कोई इन्हें इन्द्र, कोई विश्वेदेव तथा कोई ब्रह्मा कहते हैं ॥ ३५-३६॥
ब्रह्मविष्ण्वग्निवरुणाः सर्वे देवास्तथर्षयः।
एकस्यैवाथ रुद्रस्य भेदास्ते परिकीर्तिताः ॥३७॥
यं यं भेदं समाश्रित्य यजन्ति परमेश्वरम्।
तत् तद्रूपं समास्थाय प्रददाति फलं शिवः ।।३८॥
तस्मादेकतरं भेदं समाश्रित्यापि शाश्वतम्।
आराधयन्महादेवं याति तत्परमं पदम्॥ ३९ ॥
किन्तु देवं महादेवं सर्वशक्तिं सनातनम्।
आराधयेद् वै गिरिशं सगुणं वाथ निर्गुणम्॥ ४० ।।
ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वरुण तथा अन्य सभी देवता और महर्षिगण एक ही रुद्र (महेश्वर)-के विभिन्न स्वरूप कहे गये हैं। मनुष्य इन स्वरूपोंमेंसे जिस भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर परमेश्वरकी आराधना करते हैं, शिव (महेश्वर) उसी स्वरूपको ग्रहणकर फल प्रदान करते हैं। अतः इनमेंसे किसी एक भी भेद (स्वरूप)-का अवलम्बन कर सनातन महादेव की आराधना करनेवालेको उस परम (शिव) पदकी प्राप्ति होती है। निष्कर्ष यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न सनातन, देव, गिरिश महादेवकी सगुण अथवा निर्गुण किसी भी रूपमें आराधना अवश्य करनी चाहिये ॥ ३७-४०॥
मया प्रोक्तो हि भवतां योगः प्रागेव निर्गुणः ।
आरुरुक्षुस्तु सगुणं पूजयेत् परमेश्वरम्॥४१॥
पिनाकिनं त्रिनयनं जटिलं कृत्तवाससम्।
पद्मासनस्थं रुक्माभं चिन्तयेद् वैदिकी श्रुतिः॥४२॥
मैंने आप लोगोंको निर्गुण-योग (निर्बीज समाधि) पहले ही बता दिया है। सगुणरूप (-की उपासना) में आरूढ़ होनेकी इच्छा करनेवालेको भी परमेश्वर की पूजा (आराधना) करनी चाहिये। वेदके कथनके अनुसार पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, तीन नेत्रवाले, जटाधारी, चर्माम्बरधारी, पद्मासनमें स्थित तथा स्वर्णिम आभावाले (शंकर)- )-का ध्यान करना चाहिये। ४१-४२॥
एष योगः समुद्दिष्टः सबीजो मुनिसत्तमाः।
तस्मात् सर्वान् परित्यज्य देवान् ब्रह्मपुरोगमान्।
आराधयेद् विरूपाक्षमादिमध्यान्तसंस्थितम्॥४३॥
भक्तियोगसमायुक्तः स्वधर्मनिरतः शुचिः।
तादृशं रूपमास्थाय समायात्यन्तिकं शिवम्॥४४॥
एष योगः समुद्दिष्टः सबीजोऽत्यन्तभावने।
यथाविधि प्रकुर्वाणः प्राप्नुयादैश्वरं पदम्॥ ४५ ॥
मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार इस सबीज* योगका वर्णन किया गया। (इस संक्षिप्त वर्णनसे यह स्पष्ट है कि महेश्वरतत्त्व ही सर्वस्व, परम ध्येय है) इसलिये ब्रह्मा आदि प्रधान सभी देवोंको छोड़कर आदि, मध्य तथा अन्तमें रहनेवाले (शाश्वत तत्त्व) विरूपाक्ष (शंकर) की आराधना करनी चाहिये। अपने धर्ममें निरत रहनेवाला, पवित्र तथा भक्तियोग-परायण व्यक्ति वैसा ही (शंकरके समान) रूप धारणकर शिवके समीप आता है। अत्यन्त भावना-ध्येयाकार चित्तवृत्तिवाले इस सबीज योगका वर्णन किया गया। इसका यथाविधि अनुष्ठान करता हुआ व्यक्ति ऐश्वर (ईश्वर)-पदको प्राप्त करता है॥४३-४५॥
अत्राप्यशक्तोऽथ हरं। ब्रह्माणमर्चयेत्।
अथ चेदसमर्थः स्यात् तत्रापि मुनिपुंगवाः।
ततो वाय्वग्निशक्रादीन् पूजयेद् भक्तिसंयुतः॥४६॥
ये चान्ये भावने शुद्धे प्रागुक्ते भवतामिह ।
अथापि कथितो योगो निर्बीजश्च सबीजकः॥४७॥
ज्ञानं तदुक्तं निर्बीजं पूर्वं हि भवतां मया।
विष्णुंरुद्रं विरञ्चिं च सबीजं भावयेद् बुधः।
अथवाग्न्यादिकान् देवांस्तत्परः संयतेन्द्रियः॥४८॥
पूजयेत् पुरुषं विष्णुं चतुर्मूर्तिधरं हरिम्।
अनादिनिधनं देवं वासुदेवं सनातनम्॥४९॥
नारायणं जगद्योनिमाकाशं परमं पदम्।
तल्लिङ्गधारी नियतं तद्भक्तस्तदपाश्रयः।
एष एव विधिर्बाह्ये भावने चान्तिके मतः॥५०॥
मुनिश्रेष्ठो! यदि मनुष्य इसमें भी असमर्थ हो तो उसे हर, विष्णु एवं ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये और उसमें भी असमर्थ होनेपर भक्तियुक्त होकर (कार्यब्रह्मकी शक्ति) वायु, अग्नि तथा इन्द्र आदि देवताओंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वमें आप लोगों को जो दो शुद्ध भावनाएँ बतायी गयी हैं (वे भी कल्याणकर हैं)। साथ ही निर्बीज तथा सबीज योगका भी वर्णन किया गया है (ये भी परम उपादेय हैं)। मैंने पूर्व में भी यह निर्बीज ज्ञान (योग) आप लोगोंको बताया था। बुद्धिमान् व्यक्तिको सर्वप्रथम सबीज (साकाररूपमें)
ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी भावना करनी चाहिये अथवा प्रारम्भमें जितेन्द्रिय होकर अग्नि आदि देवताओं की तत्परतापूर्वक (इन देवताओंको ही परम ध्येय मानकर) आराधना करनी चाहिये। विष्णुके भक्त एवं विष्णुपरायण पुरुषको वैष्णव चिह्न (शंख-चक्रादि) धारणकर नियमपूर्वक (नारायण, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धरूप) चार मूर्ति धारण करनेवाले, अनादिनिधन, जगद्योनि, आकाशरूप, परमपदरूप सनातन देव वासुदेव पुरुष विष्णुकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मी भावना (विष्णुको ही ब्रह्म माननेकी भावना)-में भी यही विधि श्रीविष्णुका सामीप्य प्राप्त करनेके लिये मान्य है॥ ४६-५०॥
इत्येतत् कथितं ज्ञानं भावनासंश्रयं परम्।
इन्द्रद्युम्नाय मुनये कथितं यन्मया पुरा॥५१॥
अव्यक्तात्मकमेवेदं चेतनाचेतनं जगत्।
तदीश्वरः परं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥५२॥
इस प्रकार यह पवित्र भावनापर आश्रित परम ज्ञान बतलाया गया। प्राचीन कालमें मैंने इस ज्ञानको इन्द्रद्युम्न मुनिसे कहा था। यह चेतनात्मक एवं अचेतनात्मक जगत् अव्यक्त (अक्षर अद्वितीय तत्त्व महेश्वर)-स्वरूप ही है। वह ईश्वर (महेश्वर) ही परम ब्रह्म है, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है ॥५१-५२॥
सूत उवाच
एतावदुक्त्वा भगवान् विरराम जनार्दनः।
तुष्टुवुर्मुनयो विष्णुं शक्रेण सह माधवम्॥५३॥
सूतजीने कहा-इतना कहकर भगवान् जनार्दन (कूर्म) चुप हो गये। तब इन्द्रके साथ मुनिगण माधव विष्णु (कूर्म)-की स्तुति करने लगे-॥५३॥
मुनय ऊचुः
नमस्ते कूर्मरूपाय विष्णवे परमात्मने।
नारायणाय विश्वाय वासुदेवाय ते नमः॥५४॥
नमो नमस्ते कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।
माधवाय नमस्तुभ्यं नमो यज्ञेश्वराय च॥५५॥
मुनियोंने कहा-कूर्मरूपधारी परमात्मा विष्णु को नमस्कार है। विश्वरूप नारायण वासुदेव! आपको नमस्कार है। कृष्णको बार-बार नमस्कार है। गोविन्द को बारम्बार नमस्कार है। माधव! आपको नमस्कार है। यज्ञेश्वरको नमस्कार है॥५४-५५ ॥
सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः।
नमः सहस्त्रहस्ताय सहस्त्रचरणाय च॥५६॥
ॐ नमो ज्ञानरूपाय परमात्मस्वरूपिणे।
आनन्दाय नमस्तुभ्यं मायातीताय ते नमः॥५७॥
नमो गूढशरीराय निर्गुणाय नमोऽस्तु ते।
पुरुषाय पुराणाय सत्तामात्रस्वरूपिणे॥५८॥
नमः सांख्याय योगाय केवलाय नमोऽस्तु ते।
धर्मज्ञानाधिगम्याय निष्कलाय नमो नमः॥५९॥
नमोऽस्तु व्योमतत्त्वाय महायोगेश्वराय च।
परावराणां प्रभवे वेदवेद्याय ते नमः॥६०॥
हजारों सिरवाले तथा हजारों नेत्रवाले आपको नमस्कार है। हजारों हाथ तथा हजारों चरणवाले आपको नमस्कार है। प्रणवस्वरूप-ज्ञानरूप परमात्माको नमस्कार है। आनन्दरूप आपको नमस्कार है। आप मायातीत को नमस्कार है। गूढ (रहस्यमय) शरीरवाले आपको नमस्कार है। आप निर्गुणको नमस्कार है। पुराणपुरुष तथा सत्तामात्र स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। सांख्य तथा योगरूप आपको नमस्कार है। अद्वितीय (तत्त्वरूप) आपको नमस्कार है। धर्म तथा ज्ञानद्वारा प्राप्त होनेवाले आपको तथा निष्कल आपको बार-बार नमस्कार है। व्योमतत्त्वरूप महायोगेश्वरको नमस्कार है। पर तथा अवर पदार्थों को उत्पन्न करनेवाले वेदद्वारा वेद्य आपको नमस्कार है।।५६-६०॥
नमो बुद्धाय शुद्धाय नमो युक्ताय हेतवे।
नमो नमो नमस्तुभ्यं मायिने वेधसे नमः॥६१॥
शुद्ध (निराकारस्वरूप) आपको नमस्कार है, बुद्ध (ज्ञानस्वरूप) आपको नमस्कार है। योगयुक्त तथा हेतु (अनन्त प्रपञ्चके मूल कारण)-रूपको नमस्कार है। आपको बार-बार नमस्कार है। मायावी (मायाके नियन्त्रक) वेधा (विश्व-प्रपञ्चके स्रष्टा)-को नमस्कार है॥६१॥
नमोऽस्तु ते वराहाय नारसिंहाय ते नमः।
वामनाय नमस्तुभ्यं हृषीकेशाय ते नमः॥६२॥
नमोऽस्तु कालरुद्राय कालरूपाय ते नमः।
स्वर्गापवर्गदात्रे च नमोऽप्रतिहतात्मने ॥६३॥
वराहरूप आपको नमस्कार है। आप नरसिंह रूप धारी को नमस्कार है। वामनरूप आपको नमस्कार है। आप हृषीकेश (इन्द्रियके ईश)-को नमस्कार है। कालरुद्रको नमस्कार है। कालरूप आपको नमस्कार है। स्वर्ग तथा अपवर्ग प्रदान करनेवाले और अप्रतिहत आत्मा (शाश्वत अद्वितीय)-को नमस्कार है॥ ६२-६३॥
नमो योगाधिगम्याय योगिने योगदायिने।
देवानां पतये तुभ्यं देवार्तिशमनाय ते॥६४॥
योगाधिगम्य, योगी और योगदाताको नमस्कार है। देवताओंके स्वामी तथा देवताओंके कष्टका शमन करनेवाले आपको नमस्कार है॥६४॥
भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वसंसारनाशनम्।
अस्माभिर्विदितं ज्ञानं यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते॥६५॥
श्रुतास्तु विविधा धर्मा वंशा मन्वन्तराणि च।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तरः॥६६॥
त्वं हि सर्वजगत्साक्षी विश्वो नारायणः परः।
त्रातुमर्हस्यनन्तात्मंस्त्वमेव शरणं गतिः॥६७॥
भगवन्! आपकी कृपासे समस्त संसार (भवबन्धन) का नाश हो जाता है। हमें आपसे वह ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिसे जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। हम लोगों ने विविध धर्म, वंश, मन्वन्तर, सर्ग, प्रतिसर्ग तथा इस ब्रह्माण्डके विस्तारके विषयमें आपसे सुना। आप ही सम्पूर्ण जगत्के साक्षी, विश्वरूप और परम नारायण हैं। अनन्तात्मन्! आप ही हम लोगोंकी शरण और गति हैं। आप हमारी रक्षा करें॥६५-६७॥
सूत उवाच
एतद् वः कथितं विप्रा योगमोक्षप्रदायकम्।
कौम पुराणमखिलं यज्जगाद गदाधरः॥६८॥
अस्मिन् पुराणे लक्ष्यास्तु सम्भवः कथितः पुरा।
मोहायाशेषभूतानां वासुदेवेन योजनम्॥ ६९॥
प्रजापतीनां सर्गस्तु वर्णधर्माश्च वृत्तयः।
धर्मार्थकाममोक्षाणां यथावल्लक्षणं शुभम्॥७०॥
पितामहस्य विष्णोश्च महेशस्य च धीमतः।
एकत्वं च पृथक्त्वं च विशेषश्चोपवर्णितः॥७१॥
भक्तानां लक्षणं प्रोक्तं समाचारश्च शोभनः ।
वर्णाश्रमाणां कथितं यथावदिह लक्षणम्॥७२॥
सूतजीने कहा-विप्रो! योग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उस सम्पूर्ण कूर्मपुराणको मैंने आप लोगोंको बतलाया, जिसे गदाधर (कूर्मभगवान्)-ने कहा था। पहले इस पुराणमें सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये लक्ष्मी की उत्पत्ति तथा वासुदेवके साथ उनके संयोगका वर्णन किया गया है। तदनन्तर प्रजापतियोंकी सृष्टि, वर्गों के धर्मों और उनकी वृत्तियोंका वर्णन तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के शुभ लक्षणोंका यथावत् वर्णन किया गया है। इसमें पितामह (ब्रह्मा), विष्णु तथा धीमान् महेश्वरके एकत्व, पृथक्त्व और वैशिष्ट्यका वर्णन हुआ है। भक्तोंके लक्षण तथा सुन्दर सदाचारको कहा गया है। साथ ही वर्णों तथा आश्रमों के लक्षणों को शास्त्रानुसार बतलाया गया है ।। ६८-७२ ।।
आदिसर्गस्ततः पश्चादण्डावरणसप्तकम्।
हिरण्यगर्भसर्गश्च कीर्तितो वाः॥७३॥
कालसंख्याप्रकथनं माहात्म्यं चेश्वरस्य च।
ब्रह्मणः शयनं चाप्सु नामनिर्वचनं तथा॥७४॥
वराहवपुषा भूयो भूमेरुद्धरणं पुनः।
मुख्यादिसर्गकथनं मुनिसर्गस्तथापरः॥७५॥
व्याख्यातो रुद्रसर्गश्च ऋषिसर्गश्च तापसः।
धर्मस्य च प्रजासर्गस्तामसात् पूर्वमेव तु॥७६॥
तदनन्तर आदिसर्ग पुनः सात आवरणयुक्त ब्रह्माण्ड का वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! फिर हिरण्यगर्भसर्ग कहा गया है। काल-गणनाका विवरण, ईश्वरका माहात्म्य, ब्रह्मा का जल में शयन तथा भगवान्के नामोंकी निरुक्तिका वर्णन हुआ है। (विष्णुद्वारा) वराह-शरीर धारणकर भूमि (पृथ्वी) के उद्धार करनेका भी इसमें वर्णन हुआ है। तदनन्तर पहले मुख्यसर्ग आदि और पुनः मुनिसर्ग बताया गया है। (इस पुराणमें) रुद्रसर्ग, ऋषिसर्ग, तापससर्ग और तामससर्ग से पहले धर्मका प्रजासर्ग बताया गया है॥७३-७६।।
ब्रह्मविष्णुविवादः स्यादन्तदेहप्रवेशनम्।
पद्मोद्भवत्वं देवस्य मोहस्तस्य च धीमतः॥७७॥
ब्रह्मा एवं विष्णुके विवाद और (परस्पर) एक दूसरे के देह के अन्तर्गत प्रविष्ट होने, ब्रह्माके कमल से उत्पन्न होने और धीमान् देव (ब्रह्मा)-के मोहका (इस पुराणमें) वर्णन हुआ है॥७७॥
दर्शनं च महेशस्य माहात्म्यं विष्णुनेरितम्।
दिव्यदृष्टिप्रदानं च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥७८॥
संस्तवो देवदेवस्य ब्रह्मणा परमेष्ठिना।
प्रसादो गिरिशस्याथ वरदानं तथैव च ॥७९॥
संवादो विष्णुना सार्धं शंकरस्य महात्मनः।
वरदानं तथापूर्वमन्तर्धानं पिनाकिनः॥८०॥
तत्पश्चात् (ब्रह्माद्वारा) महेशका दर्शन करने, विष्णु द्वारा कहे गये उनके माहात्म्य और परमेष्ठी ब्रह्माको दिव्य दृष्टि प्रदान करनेका वर्णन हुआ है। परमेष्ठी ब्रह्माद्वारा देवाधिदेव (महेश्वर)-की स्तुति, (प्रसन्न होकर) गिरिशद्वारा अनुग्रह तथा वर प्रदान करनेका भी वर्णन हुआ है। विष्णुके साथ महात्मा शंकरके संवाद, पिनाकीद्वारा वर प्रदान करने और उनके अन्तर्धान होनेका वर्णन हुआ है॥७८-८०॥
वधश्च कथितो विप्रा मधुकैटभयोः पुरा।
अवतारोऽथ देवस्य ब्रह्मणो नाभिपङ्कजात्॥८१॥
एकीभावश्च देवस्य विष्णुना कथितस्ततः।
विमोहो ब्रह्मणश्चाथ संज्ञालाभो हरेस्ततः॥८२॥
विप्रो! इसमें प्राचीन कालमें हुए मधुकैटभ के वधका तथा देव (विष्णु)-के नाभिकमलसे ब्रह्मा के अवतारका वर्णन हुआ है। तदनन्तर विष्णुसे देव ब्रह्मा के एकीभावको कहा गया है और ब्रह्माका मोहित होना तदनन्तर हरिसे चेतनाप्राप्तिको बताया गया है॥८१-८२॥
तपश्चरणमाख्यातं देवदेवस्य धीमतः।
प्रादुर्भावो महेशस्य ललाटात् कथितस्ततः॥८३॥
रुद्राणां कथिता सृष्टिब्रह्मणः प्रतिषेधनम्।
भूतिश्च देवदेवस्य वरदानोपदेशकौ॥८४॥
अन्तर्धानं च रुद्रस्य तपश्चर्याण्डजस्य च।
दर्शनं देवदेवस्य नरनारीशरीरता॥८५॥
तदुपरान्त धीमान् देवाधिदेवकी तपश्चर्याका वर्णन है और फिर उनके (ब्रह्माके) मस्तकसे महेश्वरके प्रादुर्भाव का वर्णन किया गया है। रुद्रोंकी सृष्टि करनेपर ब्रह्माके द्वारा उसके प्रतिषेधका वर्णन हुआ है। देवाधिदेव (शंकर) के ऐश्वर्य एवं ब्रह्माको वरदान और उपदेश देनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात् रुद्रके अन्तर्धान होने, ब्रह्मा की तपश्चर्या, देवाधिदेवके दर्शन और उनके नर-नारी-शरीर धारण करनेका वर्णन किया गया है॥८३-८५॥
देव्या विभागकथनं देवदेवात् पिनाकिनः।
देव्यास्तु पश्चात् कथितं दक्षपुत्रीत्वमेव च ॥८६॥
हिमवदुहितृत्वं च देव्या माहात्म्यमेव च।
दर्शनं दिव्यरूपस्य वैश्वरूपस्य दर्शनम्॥८७॥
नानां सहस्त्रं कथितं पित्रा हिमवता स्वयम्।
उपदेशो महादेव्या वरदानं तथैव च॥८८॥
देवाधिदेव पिनाकीसे देवी (सती)-के अलगावका कथन हुआ है और फिर देवीका दक्षपुत्रीके रूपमें जन्म लेनेका वर्णन हुआ है। देवीकी हिमवान्की पुत्री होना और उनके माहात्म्य का वर्णन किया गया है तथा (उनके) दिव्यरूपके दर्शन और विश्वरूपके दर्शनका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त स्वयं पिता हिमालयद्वारा कहे गये (देवीके) सहस्रनाम, महादेवीके द्वारा प्रदत्त उपदेश और वरदानका भी वर्णन हुआ है।८६-८८॥
भृग्वादीनां प्रजासर्गो राज्ञां वंशस्य विस्तरः।
प्राचेतसत्वं दक्षस्य दक्षयज्ञविमर्दनम्॥८९॥
दधीचस्य च दक्षस्य विवादः कथितस्तदा।
ततश्च शापः कथितो मुनीनां मुनिपुंगवाः॥९०॥
भृगु आदि ऋषियोंका प्रजासर्ग, राजाओंके वंशका विस्तार, दक्षके प्रचेताके पुत्र होने और दक्षयज्ञ-विध्वंसका वर्णन हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर दधीच और दक्षके विवादको बतलाया गया है, फिर मुनियोंके शापका वर्णन हुआ है।। ८९-९०॥
रुद्रागतिः प्रसादश्च अन्तर्धानं पिनाकिनः।
पितामहस्योपदेशः कीर्त्यते रक्षणाय तु॥९१॥
तदुपरान्त रुद्रके आगमन एवं अनुग्रह और उन पिना की रुद्र के अन्तर्धान होने तथा (दक्षकी) रक्षा के लिये पितामहद्वारा उपदेश करनेका वर्णन हुआ है ॥ ९१॥
दक्षस्य च प्रजासर्गः कश्यपस्य महात्मनः।
हिरण्यकशिपोर्नाशो हिरण्याक्षवधस्तथा॥ १२ ॥
ततश्च शापः कथितो देवदारुवनौकसाम्।
निग्रहश्चान्धकस्याथ गाणपत्यमनुत्तमम्॥ १३ ॥
तदुपरान्त दक्षके तथा महात्मा कश्यपसे होनेवाली प्रजासृष्टिका वर्णन है। हिरण्यकशिपुके नष्ट होने तथा | हिरण्याक्षके वधका वर्णन हुआ है। इसके बाद देवदारुवन में निवास करनेवाले मुनियोंकी शापप्राप्तिका कथन है, अन्धकके निग्रह और उसको श्रेष्ठ गाणपत्यपद प्रदान करनेका वर्णन हुआ है।९२-९३॥
प्रहादनिग्रहश्चाथ बलेः संयमनं ततः।
बाणस्य निग्रहश्चाथ प्रसादस्तस्य शूलिनः॥ ९४ ॥
ऋषीणां वंशविस्तारो राज्ञां वंशाः प्रकीर्तिताः।
वसुदेवात् ततो विष्णोरुत्पत्तिः स्वेच्छया हरेः॥ ९५ ॥
तदनन्तर प्रह्लादके निग्रह, बलिके बाँधे जाने, त्रिशूली (शंकर)-द्वारा बाणासुरके निग्रह और फिर उसपर कृपा करनेका वर्णन हुआ है। इसके पश्चात्
ऋषियोंके वंशका विस्तार तथा राजाओंके वंशका वर्णन हुआ है और फिर स्वेच्छासे वसुदेवके पुत्रके रूप में हरिविष्णुकी उत्पत्तिका वर्णन है॥९४-९५ ॥
दर्शनं चोपमन्यो( तपश्चरणमेव च।
वरलाभो महादेवं दृष्ट्वा साम्बं त्रिलोचनम्॥ ९६ ॥
कैलासगमनं चाथ निवासस्तत्र शाङ्गिणः।
ततश्च कथ्यते भीतिरवत्या निवासिनाम्॥ ९७ ।।
रक्षणं गरुडेनाथ जित्वा शत्रून् महाबलान्।
नारदागमनं चैव यात्रा चैव गरुत्मतः॥ ९८ ॥
उपमन्युका दर्शन करने और तपश्चर्या करनेका वर्णन है। तत्पश्चात् अम्बासहित त्रिलोचन महादेवका दर्शन कर वर प्राप्त करनेका वर्णन हुआ है। तदनन्तर शार्की (कृष्ण) का कैलासपर जाने और वहाँ निवास करनेका वर्णन
है फिर द्वारवती-निवासियोंके भयभीत होनेका वर्णन है। इसके बाद महाबलशाली शत्रुओंको जीतकर गरुड के द्वारा (द्वारकावासियोंकी) रक्षा करने, नारद-आगमन और गरुडकी यात्राका वर्णन हुआ है॥९६-९८॥
ततश्च कृष्णागमनं मुनीनामागतिस्ततः।
नैत्यकं वासुदेवस्य शिवलिङ्गार्चनं तथा॥ ९९ ॥
मार्कण्डेयस्य च मुनेः प्रश्नः प्रोक्तस्ततः परम्।
लिङ्गार्चननिमित्तं च लिङ्गस्यापि सलिङ्गिनः॥१००॥
तदनन्तर कृष्णके आगमन, मुनियोंके आने और वासुदेव (विष्णु)-द्वारा नित्य किये जानेवाले शिव-लिंङ्गार्चनका वर्णन है। तदुपरान्त मुनि मार्कण्डेयजीद्वारा (लिङ्गके विषयमें) प्रश्न करने तथा (वासुदेवद्वारा) लिङ्गार्चनके प्रयोजन और लिङ्गी (शंकर)-के लिङ्ग के स्वरूपका निरूपण हुआ है॥९९-१००॥
याथात्म्यकथनं चाथ लिङ्गाविर्भाव एव च।
ब्रह्मविष्ण्वोस्तथा मध्ये कीर्तितो मुनिपुंगवाः॥१०१॥
मोहस्तयोस्तुकथितो गमनं चोर्ध्वतोऽप्यधः ।
संस्तवो देवदेवस्य प्रसादः परमेष्ठिनः॥१०२॥
मुनिश्रेष्ठो! फिर ब्रह्मा तथा विष्णुके मध्य ज्योतिर्लिङ्गके आविर्भाव तथा उसके वास्तविक स्वरूपका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त उन दोनोंके मोहित होने तथा (लिङ्गका परिमाण जाननेके लिये) ऊर्ध्वलोक एवं अधोलोकमें जाने, पुनः परमेष्ठी देवाधिदेव (महादेव)-की स्तुति करने और उनके द्वारा अनुग्रह प्रदान करनेका वर्णन हुआ है॥१०१-१०२॥
अन्तर्धानं च लिङ्गस्य साम्बोत्पत्तिस्ततः परम्।
कीर्तिता चानिरुद्धस्य समुत्पत्तिर्द्विजोत्तमाः॥१०३॥
कृष्णस्य गमने बुद्धिर्ऋषीणामागतिस्तथा।
अनुशासितं च कृष्णेन वरदानं महात्मनः॥१०४॥
द्विजोत्तमो! तदनन्तर लिङ्गके अन्तर्धान होने और फिर साम्ब तथा अनिरुद्धकी उत्पत्तिका वर्णन हुआ है। तदुपरान्त महात्मा कृष्णका (अपने लोक) जानेका निश्चय, ऋषियोंका (द्वारकामें) आगमन, कृष्णद्वारा उन्हें उपदेश तथा वरदान देनेका वर्णन किया गया है ॥ १०३-१०४॥
गमनं चैव कृष्णस्य पार्थस्यापि च दर्शनम्।
कृष्णद्वैपायनस्योक्ता युगधर्माः सनातनाः॥१०५॥
अनुग्रहोऽथ पार्थस्य वाराणसीगतिस्ततः।
पाराशर्यस्य च मुनेासस्याद्भुतकर्मणः॥१०६ ।।
इसके अनन्तर कृष्णका (स्वधाम) गमन, अर्जुनद्वारा कृष्णद्वैपायनका दर्शन एवं उनके द्वारा कहे गये सनातन युगधर्मोंका वर्णन हुआ है। आगे अर्जुनके ऊपर (व्यासद्वारा) अनुग्रह और पराशरपुत्र अद्भुतकर्मा व्यास मुनिका वाराणसीमें जानेका वर्णन है।।१०५-१०६ ॥
वाराणस्याश्च माहात्म्यं तीर्थानां चैववर्णनम्।
तीर्थयात्रा च व्यासस्य देव्याश्चैवाथ दर्शनम्।
उद्वासनं च कथितं वरदानं तथैव च॥१०७॥
प्रयागस्य च माहात्म्यं क्षेत्राणामथ कीर्तनम्।
फलंच विपुलं विप्रा मार्कण्डेयस्य निर्गमः ॥१०८॥
तदुपरान्त वाराणसीका माहात्म्य, तीर्थोंका वर्णन, व्यास की तीर्थयात्रा और देवीके दर्शन करनेका वर्णन है। साथ ही (देवीद्वारा वाराणसीसे व्यासके) निष्कासन और वरदान देनेका वर्णन हुआ है। ब्राह्मणो! तदनन्तर प्रयागका माहात्म्य, (पुण्य) क्षेत्रोंका वर्णन, (तीर्थोंका) महान् फल और मार्कण्डेय मुनिके निगमनका वर्णन है॥ १०७-१०८॥
भुवनानां स्वरूपंच ज्योतिषां च निवेशनम्।
कीर्त्यन्ते चैव वर्षाणि नदीनां चैव निर्णयः॥१०९॥
पर्वतानां च कथनं स्थानानि च दिवौकसाम्।
द्वीपानां प्रविभागश्च श्वेतद्वीपोपवर्णनम्॥११०॥
(इसके पश्चात्) भुवनोंके स्वरूप, ग्रहों तथा नक्षत्रों की स्थिति और वर्षों तथा नदियोंके निर्णयका वर्णन किया गया है। पर्वतों तथा देवताओंके स्थानों, द्वीपोंके विभाग तथा श्वेतद्वीपका वर्णन किया गया है॥१०९-११०॥
शयनं केशवस्याथ माहात्म्यं च महात्मनः।
मन्वन्तराणां कथनं विष्णोर्माहात्म्यमेव च॥१११॥
वेदशाखाप्रणयनं व्यासानां कथनं ततः।
अवेदस्य च वेदानां कथनं मुनिपुंगवाः ॥११२॥
योगेश्वराणां च कथा शिष्याणां चाथ कीर्तनम्।
गीताश्च विविधा गुह्या ईश्वरस्याथ कीर्तिताः॥११३॥
महात्मा केशवके शयन, उनके माहात्म्य, मन्वन्तरों और विष्णुके माहात्म्यका निरूपण हुआ है। मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर वेदकी शाखाओंका प्रणयन, व्यासोंका नाम परिगणन और अवेद (वेदबाह्य सिद्धान्तों) तथा वेदों का कथन किया गया है। (इसके अनन्तर) योगेश्वरों की कथा, (उनके) शिष्योंका वर्णन और ईश्वर-सम्बन्धी अनेक गुह्य गीताओंका उल्लेख हुआ है॥ १११-११३॥
वर्णाश्रमाणामाचाराः प्रायश्चित्तविधिस्ततः।
कपालित्वं च रुद्रस्य भिक्षाचरणमेव च ॥११४॥
पतिव्रतायाश्चाख्यानं तीर्थानां च विनिर्णयः।
तथा मङ्कणकस्याथ निग्रहः कीर्त्यते द्विजाः॥११५॥
तदनन्तर वर्णों और आश्रमोंके सदाचार, प्रायश्चित्तविधि, रुद्रके कपाली होने और (उनके) भिक्षा माँगनेका वर्णन | हुआ है। द्विजो! इसके बाद पतिव्रताके आख्यान, तीर्थोंके निर्णय और मङ्कणक मुनिके निग्रह करने का उल्लेख हुआ है॥ ११४-११५ ॥
वधश्च कथितो विप्राः कालस्य च समासतः।
देवदारुवने शम्भोः प्रवेशो माधवस्य च॥११६॥
दर्शनं षट्कुलीयानां देवदेवस्य धीमतः।
वरदानं च देवस्य नन्दिने तु प्रकीर्तितम्॥११७॥
नैमित्तिकस्तु कथितः प्रतिसर्गस्ततः परम्।
प्राकृतः प्रलयश्चोर्ध्वं सबीजो योग एव च॥११८॥
ब्राह्मणो! (तदनन्तर) संक्षेपमें कालके वध और शंकर तथा विष्णुके देवदारुवनमें प्रवेश करनेका उल्लेख है। छः कुलोंमें उत्पन्न ऋषियोंद्वारा धीमान् देवाधिदेव के दर्शन करने और महादेवद्वारा नन्दीको वरदान देने का वर्णन हुआ है। इसके बाद नैमित्तिक प्रलय कहा गया है और फिर आगे प्राकृत प्रलय एवं सबीज योग बतलाया गया है॥११६-११८॥
एवं ज्ञात्वा पुराणस्य संक्षेपं कीर्तयेत् तु यः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥११९॥
इस प्रकार संक्षेपमें (इस कूर्म) पुराणको जान कर जो उसका उपदेश करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११९ ॥
एवमुक्त्वा श्रियं देवीमादाय पुरुषोत्तमः ।
संत्यज्य कूर्मसंस्थानं स्वस्थानं च जगाम ह॥१२०॥
देवाश्च सर्वेमुनयः स्वानि स्थानानि भेजिरे।
प्रणम्य पुरुषं विष्णुंगृहीत्वा ह्यमृतं द्विजाः॥१२१॥
एतत् पुराणं परमं भाषितं कूर्मरूपिणा।
साक्षाद् देवादिदेवेन विष्णुना विश्वयोनिना॥१२२॥
इतना कहकर कूर्मरूपका परित्यागकर देवी लक्ष्मी के साथ पुरुषोत्तम (विष्णु) अपने धामको चले गये। द्विजो! सभी देवता तथा मुनिगण भी परम पुरुष विष्णु के (उपदेशरूपी) अमृतको प्राप्तकर तथा उन्हें प्रणामकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये। यह श्रेष्ठ (कूर्म) पुराण कूर्मरूपधारी विश्वयोनि साक्षात् देवोंके आदिदेव विष्णुद्वारा कहा गया है॥१२०-१२२ ॥
यः पठेत् सततं मर्यो नियमेन समाहितः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥१२३॥
लिखित्वा चैव यो दद्याद् वैशाखे मासि सुव्रतः।
विप्राय वेदविदुषे तस्य पुण्यं निबोधत॥१२४॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः।
भुक्त्वा च विपुलान् स्वर्गे भोगान् दिव्यान् सुशोभनान् ॥ १२५॥
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो विप्राणां जायते कुले।
पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद्ब्रह्मविद्यामवाप्नुयात्॥१२६॥
जो मनुष्य एकाग्रचित्तसे नियमपूर्वक इस पुराण को पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो पुरुष शास्त्रानुसार व्रतनिष्ठ होते हुए इस पुराणको लिखकर वैशाखमासमें वेदज्ञ ब्राह्मण को दान करता है, उसका पुण्य सुनो-वह सभी पापों से रहित और सभी ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होते हुए (मृत्युके बाद) स्वर्ग में प्रचुर मात्रामें दिव्य तथा सुन्दर भोगोंका उपभोग करता है, तत्पश्चात् स्वर्गसे इस लोकमें आकर ब्राह्मणों के वंशमें उत्पन्न होता है और पूर्व-संस्कारोंकी महिमा के कारण ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेता है॥१२३-१२६॥
पठित्वाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते।
योऽर्थं विचारयेत् सम्यक् स प्राप्नोति परं पदम्॥१२७॥
अध्येतव्यमिदं नित्यं विप्रैः पर्वणि पर्वणि।
श्रोतव्यं च द्विजश्रेष्ठा महापातकनाशनम्॥१२८॥
एकतस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः।
एकत्र
चेदं परममेतदेवातिरिच्यते॥१२९॥
धर्मनैपुण्यकामानां ज्ञाननैपुण्यकामिनाम्।
इदं पुराणं मुक्त्वैकं नास्त्यन्यत् साधनं परम्॥१३०॥
इस (पुराण)-के एक ही अध्यायके पाठ करने से सभी पापोंसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है और जो इसके अर्थ पर ठीक-ठीक विचार करता है, वह परमपद प्राप्त करता है। श्रेष्ठ द्विजो! ब्राह्मणोंको प्रत्येक पर्वपर महापातकोंका नाश करनेवाले इस पुराणका नित्य अध्ययन एवं श्रवण करना चाहिये। एक ओर सभी इतिहास-पुराणोंको (शास्त्रीय विचारणाकी कसौटीपर) रखा जाय और दूसरी ओर अकेले इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको रखा जाय तो यही अपेक्षाकृत अतिशय विशिष्ट सिद्ध होगा। जो व्यक्ति धर्ममें निपुणता प्राप्त करना चाहते हों, और जो ज्ञानमें निपुणता प्राप्त करने के अभिलाषी हों उनके लिये एकमात्र इस पुराणको छोड़कर और कोई दूसरा श्रेष्ठ उपाय नहीं है॥१२७-१३०॥
यथावदत्र भगवान् देवो नारायणो हरिः।
कथ्यते हि यथा विष्णुर्न तथान्येषु सुव्रताः॥१३१॥
ब्राह्मी पौराणिकी चेयं संहिता पापनाशिनी।
अत्र तत् परमं ब्रह्म कीर्त्यते हि यथार्थतः॥१३२॥
तीर्थानां परमं तीर्थं तपसां च परं तपः।
ज्ञानानां परमं ज्ञानं व्रतानां परमं व्रतम्॥१३३॥
सुव्रतो! इस पुराणमें जिस प्रकारसे भगवान् हरि नारायण देव विष्णुका कीर्तन हुआ है, वैसा अन्यत्र नहीं है। यह पौराणिकी ब्राह्मीसंहिता पापोंका नाश करनेवाली है। इसमें परम ब्रह्मका यथार्थरूपमें कीर्तन किया गया है। यह तीर्थों में परम तीर्थ, तपोंमें परम तप, ज्ञानों में परम ज्ञान और व्रतोंमें परम व्रत है॥ १३१-१३३ ॥
नाध्येतव्यमिदं शास्त्रं वृषलस्य च संनिधौ।
योऽधीतेस तुमोहात्मा सयाति नरकान्बहून्॥१३४॥
इस शास्त्रका अध्ययन वृषल (अधार्मिक व्यक्ति) के समीप नहीं करना चाहिये। जो अध्ययन करता है, वह अज्ञानी है, वह बहुतसे नरकोंको प्राप्त करता है ॥ १३४॥
श्राद्धे वा दैविके कार्ये श्रावणीयं द्विजातिभिः ।
यज्ञान्ते तु विशेषेण सर्वदोषविशोधनम्॥१३५॥
द्विजातियोंके श्राद्ध अथवा देवकार्यमें इस ब्राह्मीसंहिता (कूर्मपुराण)-को सुनाना चाहिये। यज्ञकी पूर्णता पर विशेषरूपसे (इसका पाठ करनेसे एवं) श्रवण करने से सभी दोषोंसे शुद्धि हो जाती है ॥ १३५ ॥
मुमुक्षूणामिदं शास्त्रमध्येतव्यं विशेषतः
श्रोतव्यं चाथ मन्तव्यं वेदार्थपरिबंहणम्॥१३६॥
मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवालों को विशेषरूपसे वेदके अर्थका विस्तार करनेवाले इस शास्त्रका श्रवण, अध्ययन तथा मनन करना चाहिये१३६॥
ज्ञात्वा यथावद् विप्रेन्द्रान् श्रावयेद्भक्तिसंयुतान्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात्॥१३७॥
योऽश्रद्दधाने पुरुषे दद्याच्चाधार्मिके तथा।
स प्रेत्य गत्वा निरयान्शुनां योनिं व्रजत्यधः॥१३८॥
नमस्कृत्वा हरिं विष्णुंजगद्योनि सनातनम्।
अध्येतव्यमिदं शास्त्रं कृष्णद्वैपायनं तथा॥१३९ ॥
इत्याज्ञा देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः।
पाराशर्यस्य विप्रर्व्यासस्य च महात्मनः ॥१४०॥
इसका ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्तकर भक्तियुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इसे (सबको) सुनाना चाहिये। इससे वह व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त करता है। जो (व्यक्ति) श्रद्धारहित तथा अधार्मिक पुरुषको इसका उपदेश देता है, वह परलोकमें जाकर नरकोंका भोग भोगकर पुनः मृत्युलोकमें कुत्तेकी योनि में जन्म लेता है। 'संसारके मूल कारण सनातन हरि विष्णु तथा कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार करके इस शास्त्र (पुराण)-का अध्ययन करना चाहिये'-अमित तेजस्वी देवाधिदेव विष्णु और पराशरके पुत्र महात्मा विप्रर्षि व्यासकी ऐसी आज्ञा है ॥ १३६-१४० ॥
श्रुत्वा नारायणा दिव्यां नारदो भगवानृषिः।
गौतमाय ददौ पूर्वं तस्माच्चैव पराशरः॥१४१॥
पराशरोऽपि भगवान् गङ्गाद्वारे मुनीश्वराः।
मुनिभ्यः कथयामास धर्मकामार्थमोक्षदम्॥१४२॥
ब्रह्मणा कथितं पूर्वं सनकाय च धीमते।
सनत्कुमाराय तथा सर्वपापप्रणाशनम्॥१४३॥
सनका भगवान् साक्षाद् देवलो योगवित्तमः।
अवाप्तवान् पञ्चशिखो देवलादिदमुत्तमम्॥१४४॥
सनत्कुमारा भगवान् मुनिः सत्यवतीसुतः।
लेभे पुराणं परमं व्यासः सर्वार्थसंचयम्॥१४५॥
नारायणसे इस दिव्य संहिताको सुनकर भगवान् नारद ऋषिने पूर्वकालमें गौतमको इसका उपदेश दिया था और उनसे पराशरको यह (शास्त्र) प्राप्त हुआ। मुनीश्वरो! भगवान् पराशरने भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाले इस पुराणको मुनियोंसे कहा। पूर्वकालमें धीमान् सनक और सनत्कुमारको सभी पापोंका नाश करनेवाले इस शास्त्र का उपेदश ब्रह्माने दिया था। सनकसे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ साक्षात् भगवान् देवलने और देवलसे पञ्चशिखने इस उत्तम शास्त्रको प्राप्त किया। सत्यवतीके पुत्र भगवान् व्यास मुनिने सभी अर्थोंका संचय करनेवाले इस श्रेष्ठ पुराण को सनत्कुमारसे प्राप्त किया। १४१–१४५ ॥
तस्माद्व्यासादहं श्रुत्वा भवतां पापनाशनम्।
ऊचिवान् वैभवद्भिश्च दातव्यं धार्मिके जने॥१४६ ॥
उन व्याससे सुनकर मैंने आप लोगोंसे पापोंका नाश करनेवाले इस पुराणको कहा है। आप लोगोंको भी धार्मिक व्यक्तिको (इसका उपदेश) प्रदान करना चाहिये॥१४६॥
तस्मै व्यासाय गुरवे सर्वज्ञाय महर्षये।
पाराशर्याय शान्ताय नमो नारायणात्मने ॥१४७॥
यस्मात् संजायते कृत्स्नं यत्र चैव प्रलीयते।
नमस्तस्मै सुरेशाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥१४८॥
पराशरके पुत्र सर्वज्ञ, गुरु, शान्त तथा नारायण स्वरूप महर्षि व्यासको नमस्कार है। जिनसे सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब लीन हो जाता है, उन देवताओंके स्वामी कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् श्रीविष्णुको नमस्कार है॥ १४७-१४८॥
Summary of chapter 93 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa describes the divine glory of Gayā Tīrtha, established upon the body of the noble Asura Gayāsura. He details how performing Piṇḍadāna and Śrāddha at Gayāśiras and Vishṇupada permanently liberates ancestors from all lower realms, elevating them to eternal heavenly realms.