23 अध्याय

यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-

वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं

वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य

पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे

श्रीकृष्णका आविर्भाव,वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन

सूत उवाच

क्रोष्टोरेकोऽभवत् पुत्रो वृजिनीवानिति श्रुतिः।

तस्य पुत्रो महान् स्वातिरुशद्गुस्तत्सुतोऽभवत्॥१॥

उशद्गोरभवत् पुत्रो नाम्ना चित्ररथो बली।

अथ चैत्ररथिर्लोके शशबिन्दुरिति स्मृतः॥२॥

तस्य पुत्रः पृथुयशा राजाभूद् धर्मतत्परः।

पृथुकर्मा च तत्पुत्रस्तस्मात् पृथुजयोऽभवत्॥३॥

सूतजीने कहा-क्रोष्टुका एक पुत्र हुआ जो वृजिनीवान् नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका महान् पुत्र स्वाति हुआ और उसका पुत्र उशद्गु हुआ। उशद्गुका चित्ररथ नाम का बलवान् पुत्र हुआ। चित्ररथका पुत्र लोकमें शशबिन्दु नामसे विख्यात हुआ। उसका पृथुयशा नामवाला पुत्र धर्मपरायण राजा हुआ। उसका पुत्र पृथुकर्मा और उससे पृथुजय हुआ॥१-३॥

पृथुकीर्तिरभूत् तस्मात् पृथुदानस्ततोऽभवत्।

पृथुश्रवास्तस्य पुत्रस्तस्यासीत् पृथुसत्तमः॥ ४ ॥

उससे पृथुकीर्ति और उससे पृथुदान हुआ। उसका पुत्र पृथुश्रवा और उसका पुत्र था-पृथुसत्तम ॥४॥

उशना तस्य पुत्रोऽभूत् सितेषुस्तत्सुतोऽभवत्।

तस्याभूद्रुक्मकवचः परावृत् तस्य सत्तमाः॥ ५ ॥

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उस (पृथुसत्तम)-का पुत्र उशना हुआ और उसका सितेषु पुत्र हुआ। फिर उसका रुक्मकवच और उस (रुक्मकवच)-का परावृत् हुआ॥५॥

परावृतः सुतो जज्ञे ज्यामघो लोकविश्रुतः।

तस्माद् विदर्भ: संजज्ञे विदर्भात् क्रथकैशिकौ॥ ६ ॥

रोमपादस्तृतीयस्तु बभ्रुस्तस्यात्मजो नृपः।

धृतिस्तस्याभवत् पुत्रः संस्तस्तस्याप्यभूत् सुतः॥ ७ ॥

संस्तस्य पुत्रो बलवान् नाम्ना विश्वसहस्तु सः।

तस्य पुत्रो महावीर्यः प्रजावान् कौशिकस्ततः।

अभूत् तस्य सुतो धीमान् सुमन्तुस्तत्सुतोऽनलः॥ ८ ॥

कैशिकस्य सुतश्चेदिश्चैद्यास्तस्याभवन् सुताः।

तेषां प्रधानो ज्योतिष्मान् वपुष्मांस्तत्सुतोऽभवत्॥ ९ ॥

वपुष्मतो बृहन्मेधा श्रीदेवस्तत्सुतोऽभवत्।

तस्य वीतरथो विप्रा रुद्रभक्तो महाबलः॥१०॥

परावृत्ने संसारमें विख्यात ज्यामघ नामक पुत्र उत्पन्न किया। उससे विदर्भ उत्पन्न हुआ और विदर्भ से क्रथ, कैशिक और तीसरा रोमपाद नामक पुत्र हुआ। उस (रोमपाद)-का पुत्र बभ्रु राजा था। धृति उसका पुत्र हुआ और उसका भी संस्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। संस्तका विश्वसह नामवाला बलवान् पुत्र था। उसका पुत्र महान् पराक्रमी प्रजावान् और उसका पुत्र कौशिक हुआ। उस (कौशिक)-का बुद्धिमान् सुमन्तु नामक पुत्र था और उसका पुत्र अनल था। कैशिकका पुत्र चेदि था और उस चेदिके पुत्र चैद्य हुए। उन चैद्यों में ज्योतिष्मान् प्रधान था और वपुष्मान् उसका पुत्र हुआ। वपुष्मान्से बृहन्मेधा और श्रीदेव उसका पुत्र हुआ। ब्राह्मणो! उसका वीतरथ नामक पुत्र महान् बलशाली और रुद्रका भक्त था॥६-१०॥

क्रथस्याप्यभवत् कुन्तिर्वृष्णिस्तस्याभवत् सुतः।

वृष्णेर्निवृत्तिरुत्पन्नो दशार्हस्तस्य तु द्विजाः॥११

दशाहपुत्रोऽप्यारोहो जीमूतस्तत्सुतोऽभवत्।

जैमूतिरभवद् वीरो विकृतिः परवीरहा॥१२॥

तस्य भीमरथः पुत्रः तस्मान्नवरथोऽभवत्।

दानधर्मरतो नित्यं सम्यक्शीलपरायणः॥१३॥

ब्राह्मणो! क्रथका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र वृष्णि हुआ। वृष्णिसे निवृत्ति उत्पन्न हुआ और दशाह उसका पुत्र हुआ। दशार्हका पुत्र आरोह था और उसका जीमूत पुत्र हुआ। जीमूतका विकृति नामक बलवान् पुत्र शत्रु-वीरों का नाशक था। उसका भीमरथ नामक पुत्र हुआ, उससे नवरथ हुआ, जो नित्य दानधर्ममें परायण तथा पूर्णरूपसे शील-सम्पन्न था ॥११-१३ ॥

कदाचिन्मृगयां यातो दृष्ट्वा राक्षसमूर्जितम्।

दुद्राव महताविष्टो भयेन मुनिपुंगवाः॥१४॥

अन्वधावत संक्रुद्धो राक्षसस्तं महाबलः।

दुर्योधनोऽग्निसंकाशः शूलासक्तमहाकरः॥१५॥

श्रेष्ठ मुनियो! किसी समय आखेटके लिये जाते हुए वह (नवरथ) एक बलवान् राक्षसको देखकर अत्यन्त भयभीत होकर भागने लगा। अग्निके समान प्रज्वलित वह महाबलवान् दुर्योधन नामक राक्षस क्रुद्ध होकर अपने विशाल हाथमें शूल लेकर उसके पीछे दौड़ा॥१४-१५॥

राजा नवरथो भीत्या नातिदूरादनुत्तमम्।

अपश्यत् परमं स्थानं सरस्वत्या सुगोपितम्॥१६॥

स तद्वेगेन महता सम्प्राप्य मतिमान् नृपः।

ववन्दे शिरसा दृष्ट्वा साक्षाद् देवी सरस्वतीम्॥१७॥

भयभीत राजा नवरथने समीपमें ही (देवी) सरस्वती से रक्षित एक परम श्रेष्ठ स्थान देखा। वह बुद्धिमान् राजा अति शीघ्र ही वहाँ पहुँचा और साक्षात् देवी सरस्वतीका दर्शन करके उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया॥१६-१७॥

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्बद्धाञ्जलिरमित्रजित्।

पपात दण्डवद् भूमौ त्वामहं शरणं गतः॥१८॥

नमस्यामि महादेवीं साक्षाद् देवी सरस्वतीम्।

वाग्देवतामनाद्यन्तामीश्वरी ब्रह्मचारिणीम्॥१९॥

नमस्ते जगतां योनिं योगिनीं परमां कलाम्।

हिरण्यगर्भमहिषीं त्रिनेत्रां चन्द्रशेखराम्॥२०॥

उस शत्रुजयीने हाथ जोड़ते हुए अभीष्ट स्तुतियों द्वारा | स्तुति की, वह भूमिपर दण्डवत् गिर पड़ा और कहा-'मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप अनादि, अनन्त, ब्रह्मचारिणी, ईश्वरी, महादेवी, वाग्देवता साक्षात् देवी सरस्वतीको नमस्कार करता हूँ। जगत्की मूल कारणरूपा,

परम कलास्वरूपा, तीन नेत्रवाली, मस्तकपर चन्द्रमा को धारण करनेवाली एवं हिरण्यगर्भकी महिषी योगिनी को नमस्कार है॥ १८-२०॥

नमस्ये परमानन्दां चित्कलां ब्रह्मरूपिणीम्।

पाहि मां परमेशानि भीतं शरणमागतम्॥२१॥

चित्कलारूप, परमानन्दस्वरूपा ब्रह्मरूपिणीको नमस्कार है। परमेशानि! भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा करो॥ २१ ॥

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धो राजानं राक्षसेश्वरः।

हन्तुं समागतः स्थानं यत्र देवी सरस्वती॥२२॥

समुद्यम्य तदा शूलं प्रवेष्टुं बलदर्पितः।

त्रिलोकमातुस्तत्स्थानं शशाङ्कादित्यसंनिभम्॥२३॥

तदन्तरे महद् भूतं युगान्तादित्यसंनिभम्।

शूलेनोरसि निर्भिद्य पातयामास तं भुवि॥२४॥

गच्छेत्याह महाराज न स्थातव्यं त्वया पुनः।

इदानीं निर्भयस्तूर्णं स्थानेऽस्मिन् राक्षसो हतः ॥२५॥

इसी बीच क्रुद्ध वह राक्षसराज राजाको मारने के लिये उसी स्थान पर आ पहुंचा, जहाँ देवी सरस्वती थीं। बलसे दर्पित वह राक्षस शूल उठाकर तीनों लोकोंकी जननीके उस सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित स्थानमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करने लगा। इसी बीच किसी प्रलयकालीन सूर्यके समान महान् बलशाली ने शूलसे उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर पृथ्वीपर गिरा दिया और कहा-महाराज! आप अब निर्भय होकर शीघ्र ही इस स्थानसे चले जायँ, यहाँ अब फिर रुकें नहीं, राक्षस मारा जा चुका है।। २२-२५ ॥

ततः प्रणम्य हष्टात्मा राजा नवरथः पराम्।

पुरी जगाम विप्रेन्द्राः पुरंदरपुरोपमाम्॥२६॥

स्थापयामास देवेशी तत्र भक्तिसमन्वितः।

ईजे च विविधैर्य झैमैर्देवी सरस्वतीम्॥२७॥

तस्य चासीद् दशरथः पुत्रः परमधार्मिकः।

देव्या भक्तो महातेजाः शकुनिस्तस्य चात्मजः॥२८॥

तस्मात् करम्भः सम्भूतो देवरातोऽभवत् ततः।

इंजे स चाश्वमेधेन देवक्षत्रश्च तत्सुतः॥२९॥

मधुस्तस्य तु दायादस्तस्मात् कुरुवशोऽभवत्।

पुत्रद्वयमभूत् तस्य सुत्रामा चानुरेव च॥३०॥

ब्राह्मणो! तब प्रसन्न मनवाला वह नवरथ उन परादेवीको प्रणामकर इन्द्रकी नगरीके समान अपनी नगरीको चला गया। वहाँ उसने भक्तियुक्त होकर देवेश्वरी सरस्वतीकी स्थापना की और विविध यज्ञों तथा होमोंके द्वारा उन देवीका यजन किया। उसका दशरथ नामक परम धार्मिक पुत्र था। वह महातेजस्वी देवीका भक्त था। उसका पुत्र शकुनि था। उससे करम्भ

हुआ, उसका देवरात हुआ, उसने अश्वमेध यज्ञ किया (जिसके फलस्वरूप) उसको देवक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (देवक्षत्र)-का पुत्र मधु हुआ, उससे कुरुवश हुआ। उसके सुत्रामा तथा अनु नामक दो पुत्र हुए॥ २६-३०॥

अनोस्तु पुरुकुत्सोऽभूदंशस्तस्य च रिक्थभाक्।

अथांशोः सत्त्वतो नाम विष्णुभक्तः प्रतापवान्।

महात्मा दाननिरतो धनुर्वेदविदां वरः॥३१॥

स नारदस्य वचनाद् वासुदेवार्चनान्वितम्।

शास्त्र प्रवर्तयामास कुण्डगोलादिभिः श्रुतम्॥३२॥

अनुका पुरुकुत्स हुआ तथा उसका पुत्र अंशु था। अंशुका पुत्र सत्त्वत था, जो विष्णुभक्त, प्रतापी, महात्मा, दानशील और धनुर्वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ था। उसने नारदजीके कहनेपर वासुदेवकी पूजासे युक्त शास्त्र का प्रवर्तन किया, जिसे कुण्डगोलकोंने सुना।।३१-३२ ॥

तस्य नाम्ना तु विख्यातं सात्त्वतं नाम शोभनम्।

प्रवर्तते महाशास्त्रं कुण्डादीनां हितावहम्॥३३॥

सात्त्वतस्तस्य पुत्रोऽभूत्

सर्वशास्त्रविशारदः ।

पुण्यश्लोको महाराजस्तेन वै तत्प्रवर्तितम्॥ ३४॥

सात्त्वतः सत्त्वसम्पन्नः कौशल्यां सुषुवे सुतान्।

अन्धकं वै महाभोजं वृष्णिं देवावृधं नृपम्।

ज्येष्ठं च भजमानाख्यं धनुर्वेदविदां वरम्॥ ३५॥

उसके नामसे सात्त्वत ऐसा विख्यात कुण्डादिकों के लिये कल्याणकारी सुन्दर शास्त्र प्रवर्तित हुआ। उस (सत्त्वत)-का सभी शास्त्रोंमें पारंगत सात्त्वत नामक पुत्र हुआ, वह महाराज पुण्यश्लोक था। उसने उस सात्त्वत शास्त्रका प्रवर्तन किया। सत्त्वसम्पन्न सात्त्वतकी

पत्नी कौशल्याने अन्धक, महाभोज, वृष्णि, राजा देवावृध तथा धनुर्वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ भजमान नामक ज्येष्ठ पुत्रको जन्म दिया ॥३३-३५॥

तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः।

पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति प्रभुः॥३६॥

तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोकोऽभवन्नृपः।

धार्मिको रूपसम्पन्नस्तत्त्वज्ञानरतः सदा ॥३७॥

भजमानस्य सृञ्जय्यां भजमाना विजज्ञिरे।

तेषां प्रधानौ विख्यातौ निमिः कृकण एव च॥ ३८॥

महाभोजकुले जाता भोजा वैमार्तिकास्तथा।

वृष्णे: सुमित्रो बलवाननमित्रः शिनिस्तथा ॥३९॥

अनमित्रादभून्निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।

प्रसेनस्तु महाभागः सत्राजिन्नाम चोत्तमः ॥ ४०॥

उनमेंसे राजा देवावृधने 'मुझे सभी गुणोंसे सम्पन्न शक्तिशाली पुत्र हो' इस आशयसे परम तप किया। उसका पुत्र बभ्रु नामसे विख्यात पुण्यश्लोक राजा हुआ। वह धर्मात्मा, रूप-सम्पन्न तथा सदा तत्त्वज्ञान-परायण रहता था। भजमानके सृञ्जयी (पत्नी)-से भजमान ही नामवाले (अनेक) पुत्र हुए। उनमेंसे निमि तथा कृकण-ये दो प्रधान तथा विख्यात थे। महाभोज के वंशमें भोज तथा वैमार्तिक उत्पन्न हुए। वृष्णिके बलवान् सुमित्र, अनमित्र तथा शिनि हुए। अनमित्रसे निघ्न हुआ और निघ्नके महाभाग्यवान् प्रसेन तथा श्रेष्ठ सत्राजित् नामवाले दो पुत्र हुए। ३६-४०॥

अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।

सत्यवान् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तत्सुतोऽभवत्॥४१॥

सात्यकिर्युयुधानस्तु तस्यासङ्गोऽभवत् सुतः।

कुणिस्तस्य सुतो धीमांस्तस्य पुत्रो युगंधरः॥४२॥

माद्या वृष्णेः सुतो जज्ञे पृश्निः यदुनन्दनः ।

जज्ञाते तनयौ पृश्नेः श्वफल्कश्चित्रकश्च ह॥४३॥

श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।

तस्यामजनयत् पुत्रमळूरं नाम धार्मिकम्।

उपमङ्गुस्तथा मङ्गुरन्ये च बहवः सुताः॥४४॥

अक्रूरस्य स्मृतः पुत्रो देववानिति विश्रुतः।

उपदेवश्च पुण्यात्मा तयोर्विश्वप्रमाथिनौ॥ ४५ ॥

कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनि उत्पन्न हुआ। उसका सत्यक नामक पुत्र हुआ जो सत्य बोलनेवाला तथा सत्यसम्पन्न था। सत्यकका पुत्र युयुधान और उसका पुत्र असङ्ग हुआ। उसका पुत्र बुद्धिमान् कुणि था और युगन्धर उसका पुत्र हुआ। वृष्णिको माद्री से यदुनन्दन पृश्नि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। पृश्निको श्वफल्क तथा चित्रक नामवाले दो पुत्र हुए। श्वफल्कने

काशिराजकी पुत्रीको अपनी भार्या बनाया और उससे अक्रूर नामक धार्मिक पुत्र उत्पन्न किया। उपमङ्गु तथा मङ्गु नामवाले उनके बहुतसे पुत्र थे। अक्रूरका देववान् इस नामसे प्रसिद्ध पुत्र कहा गया है। पुण्यात्मा उपदेव भी उसका पुत्र हुआ। उन दोनोंको विश्व तथा प्रमाथी नामक दो पुत्र हुए॥ ४१-४५ ॥

चित्रकस्याभवत् पुत्रः पृथुर्विपृथुरेव च।

अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ ॥४६॥

अन्धकात् काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।

कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलबर्हिषम्॥४७॥

कुकुरस्य सुतो वृष्णिवृष्णेस्तु तनयोऽभवत्।

कपोतरोमा विपुलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥४८॥

चित्रकके पृथु, विपृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुपार्श्वक तथा गवेषण नामक पुत्र हुए। काश्यकी पुत्रीने अन्धक से कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हिष नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और वृष्णिका पुत्र कपोतरोमा विपुल हुआ। उसका पुत्र

विलोमक हुआ॥४६-४८॥

तस्यासीत् तुम्बुरुसखा विद्वान् पुत्रो नलः किल।

ख्यायते तस्य नामानुरनोरानकदुन्दुभिः ॥४९॥

उस (विलोमक)-का विद्वान् नल नामक पुत्र हुआ जो तुम्बुरुका मित्र था, अनु भी उसका नाम हुआ। अनुका पुत्र आनकदुन्दुभि हुआ। ४९ ।।

स गोवर्धनमासाद्य तताप विपुलं तपः।

वरं तस्मै ददौ देवो ब्रह्मा लोकमहेश्वरः ।।५०॥

वंशस्य चाक्षयां कीर्तिं गानयोगमनुत्तमम्।

गुरोरभ्यधिकं विप्राः कामरूपित्वमेव च ॥५१॥

ब्राह्मणो! उसने गोवर्धन पर्वतपर जाकर महान् तप किया। तब लोकमहेश्वर देव ब्रह्माने उसे वर प्रदान किया और कहा-तुम्हारे वंशकी अक्षय कीर्ति होगी तथा तुम्हें गुरुसे भी अधिक श्रेष्ठ गानयोग (संगीत-कला की स्वाभाविक प्रतिभा) और इच्छानुसार रूप धारण करनेकी योग्यता प्राप्त होगी॥५०-५१॥

स लब्ध्वा वरमव्यग्रो वरेण्यं वृषवाहनम्।

पूजयामास गानेन स्थाणुं त्रिदशपूजितम् ।।५२॥

तस्य गानरतस्याथ भगवानम्बिकापतिः।

कन्यारतं ददौ देवो दुर्लभं त्रिदशैरपि॥५३॥

तया स सङ्गतो राजा गानयोगमनुत्तमम्।

अशिक्षयदमित्रघ्नः प्रियां तां भ्रान्तलोचनाम्॥५४॥

तस्यामुत्पादयामास सुभुजं नाम शोभनम्।

रूपलावण्यसम्पन्नां ह्रीमतीमपि कन्यकाम्॥५५॥

वर प्राप्तकर प्रशान्त (मनवाले) उसने देवताओं द्वारा पूजित, वरणीय और वृषवाहन स्थाणु (शंकर)-की गान (संगीत)-द्वारा पूजा की। गानमें रत उस (आनकदुन्दुभि)- को भगवान् देव अम्बिकापति (शंकर)-ने देवताओं के लिये भी दुर्लभ विवाह करने योग्य कन्यारूपी रत्न प्रदान किया। भार्या-रूपमें उसका साथ प्राप्तकर शत्रुनाशक राजाने उस चञ्चल आँखोंवाली अपनी प्रिया भ्रान्तलोचना को श्रेष्ठ गानयोग सिखलाया। (राजाने) उससे सुन्दर भुजावाले शोभन नामक पुत्र तथा रूप और लावण्यसे सम्पन्न ह्रीमती नामकी कन्याको उत्पन्न किया ॥५२-५५॥

ततस्तं जननी पुत्रं बाल्ये वयसि शोभनम्।

शिक्षयामास विधिवद् गानविद्यां च कन्यकाम्॥५६॥

कृतोपनयनो वेदानधीत्य विधिवद् गुरोः ।

उद्ववाहात्मजां कन्यां गन्धर्वाणां तु मानसीम्॥५७॥

तस्यामुत्पादयामास पञ्च पुत्राननुत्तमान्।

वीणावादनतत्त्वज्ञान् गानशास्त्रविशारदान्॥५८॥

तब माता (भ्रान्तलोचना)-ने बाल्यावस्थामें ही उस शोभन नामक पुत्रको तथा कन्या (ह्रीमती)-को भी विधिवत् गानविद्याकी शिक्षा प्रदान की। उपनयन होने के अनन्तर विधिपूर्वक गुरुसे वेदोंका अध्ययनकर (शोभन ने) गन्धर्वो की मानसी नामक कन्यासे विवाह किया और उससे वीणा बजानेका तत्त्व जाननेवाले तथा संगीतशास्त्र में पारंगत पाँच श्रेष्ठ पुत्रोंको उत्पन्न किया॥५६-५८॥

पुत्रैः पौत्रैः सपत्नीको राजा गानविशारदः ।

पूजयामास गानेन देवं त्रिपुरनाशनम्॥५९॥

ह्रीमती चापि या कन्या श्रीरिवायतलोचना।

सुबाहुर्नाम गन्धर्वस्तामादाय ययौ पुरीम्॥६०॥

तस्यामप्यभवन् पुत्रा गन्धर्वस्य सुतेजसः।

सुषेणवीरसुग्रीवसुभोजनरवाहनाः ॥६१॥

पुत्र-पौत्र तथा पत्नीसहित गानविद्यामें पारंगत उस राजाने गायनद्वारा त्रिपुरका नाश करनेवाले देव (शंकर) की पूजा की। लक्ष्मीके सदृश विशाल नेत्रोंवाली जो ह्रीमती नामकी कन्या थी, सुबाहु नामक गन्धर्व उसे लेकर अपनी पुरीमें चला गया। अत्यन्त तेजस्वी गन्धर्वको भी उस (ह्रीमती)-से सुषेण, वीर, सुग्रीव, सुभोज तथा नरवाहन नामके पुत्र हुए ॥ ५९-६१ ॥

अथासीदभिजित् पुत्रो वीरस्त्वानकदुन्दुभेः ।

पुनर्वसुश्चाभिजितः सम्बभूवाहुकः तः॥ ६२॥

आनकदुन्दुभिका अभिजित् नामक एक वीर पुत्र था। अभिजित्का पुनर्वसु और उससे आहुक का जन्म हुआ॥६२॥

आहुकस्योग्रसेनश्च देवकश्च द्विजोत्तमाः।

देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः॥६३॥

देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः।

तेषां स्वसार: सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ॥६४॥

वृकदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता।

श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा च सुव्रता।

देवकी चापि तासां तु वरिष्ठाभूत् सुमध्यमा॥६५॥

द्विजोत्तमो! आहुक के दो पुत्र हुए-उग्रसेन और देवक। देवकके देवताओंके समान देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित नामवाले चार वीर पुत्र हुए। इनकी सात बहनें थीं-वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा, सुव्रता तथा देवकी। इनमें सुन्दर मध्यभागवाली देवकी सबसे बड़ी थी। ये सभी वसुदेवको दी गयीं॥६३-६५ ॥

उग्रसेनस्य पुत्रोऽभून्यग्रोधः कंस एव च।

सुभूमी राष्ट्रपालश्च तुष्टिमाञ्छङ्कुरेव च॥६६॥

भजमानादभूत् पुत्रः प्रख्यातोऽसौ विदूरथः।

तस्य शूरः शमिस्तस्मात् प्रतिक्षत्रस्ततोऽभवत्॥६७॥

स्वयम्भोजस्ततस्तस्माद् हृदिकः शत्रुतापनः ।

कृतवर्माथ तत्पुत्रो देवरस्तत्सुतः स्मृतः।

स शूरस्तत्सुतो धीमान् वसुदेवोऽथ तत्सुतः॥ ६८॥

उग्रसेनके न्यग्रोध, कंस, सुभूमि, राष्ट्रपाल, तुष्टिमान् तथा शङ्कु नामवाले पुत्र थे। भजमानका प्रख्यात विदूरथ नामवाला पुत्र हुआ। उसका पुत्र शूर, उससे शमि और शमिका प्रतिक्षत्र नामक पुत्र हुआ। उस (प्रतिक्षत्र) से स्वयम्भोज और उससे शत्रुओंको ताप पहुँचानेवाला पुत्र हृदिक हुआ। उसका पुत्र कृतवर्मा और उसका पुत्र देवर कहलाया। उस शूरसे धीमान् हुआ और उसका पुत्र वसुदेव था॥ ६६-६८॥

वसुदेवान्महाबाहुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।

बभूव देवकीपुत्रो देवैरभ्यर्थितो हरिः ॥६९॥

रोहिणी च महाभागा वसुदेवस्य शोभना।

असूत पत्नी संकर्षं रामं ज्येष्ठं हलायुधम्॥७०।।

स एव परमात्मासौ वासुदेवो जगन्मयः।

हलायुधः स्वयं साक्षाच्छेषः संकर्षणः प्रभुः॥७१॥

देवताओंके प्रार्थना करनेपर महाबाहु जगद्गुरु वासुदेव विष्णु वसुदेवसे देवकी-पुत्रके रूपमें प्रकट हुए। वसुदेव की महाभाग्यशालिनी सुन्दर रोहिणी नामक पत्नीने हल को आयुधके रूपमें धारण करनेवाले ज्येष्ठ पुत्र संकर्षण राम (बलराम)-को जन्म दिया। वह परमात्मा (विष्णु) ही ये जगन्मय (वसुदेवपुत्र) वासुदेव हैं। हलायुध (बलराम) संकर्षण स्वयं साक्षात् प्रभु शेष हैं ॥ ६९-७१॥

भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।

बभूव तस्यां देवक्यां रोहिण्यामपि माधवः॥७२॥

उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।

नियोगाद् वासुदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥७३॥

भृगुके शापके कारण वे माधव विष्णु भी मनुष्य शरीर स्वीकार कर उन देवकी तथा रोहिणीसे उत्पन्न हुए। उमाकी देहसे उत्पन्न योगनिद्रारूप कौशिकीदेवी वासुदेवकी आज्ञासे यशोदाकी पुत्री हुई ॥७२-७३ ।।

ये चान्ये वसुदेवस्य वासुदेवाग्रजाः सुताः।

प्रागेव कंसस्तान् सर्वान् जघान मुनिपुंगवाः ॥७४॥

सुषेणश्च तथोदायी भद्रसेनो महाबलः।

ऋजुदासो भद्रदासः कीर्तिमानपि पूर्वजः॥७५॥

हतेष्वेतेषु सर्वेषु रोहिणी वसुदेवतः।

असूत रामं लोकेशं बलभद्रं हलायुधम्॥ ७६॥

मुनिश्रेष्ठो! वसुदेवके अन्य जो वासुदेव नामवाले ज्येष्ठ पुत्र थे उन सबको कंसने पहले ही मार डाला। सुषेण, उदायी, भद्रसेन, महाबल, ऋजुदास, भद्रदास और पूर्व में उत्पन्न कीर्तिमान्-इन सभी (वासुदेवके बड़े भाइयों) के मारे जानेपर रोहिणीने वसुदेवसे संसारके स्वामी हलायुध बलभद्र राम (बलराम)-को जन्म दिया॥७४-७६ ॥

जातेऽथ रामे देवानामादिमात्मानमच्युतम्।

असूत देवकी कृष्णं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्॥७७॥

राम (बलराम)-के उत्पन्न होनेके पश्चात् देवकी ने देवताओंके आदि कारण, आत्मरूप, श्रीवत्स-चिह्न से सुशोभित वक्षःस्थलवाले अच्युत कृष्णको जन्म दिया।।७७॥

रेवती नाम रामस्य भार्यासीत् सुगुणान्विता।

तस्यामुत्पादयामास पुत्रौ द्वौ निशठोल्मुकौ॥७८॥

बलरामकी सुन्दर गुणोंसे युक्त रेवती नामकी भार्या थीं। उन्होंने उनसे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया॥७८॥

षोडशस्त्रीसहस्त्राणि कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः।

बभूवुरात्मजास्तासु शतशोऽथ सहस्रशः॥७९॥

चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः।

चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः शंख एव च॥८॥

रुक्मिण्यां वासुदेवस्य महाबलपराक्रमाः।

विशिष्टाः सर्वपुत्राणां सम्बभूवुरिमे सुताः॥८१॥

(वसुदेव-देवकीसे उत्पन्न साक्षात् विष्णु) अक्लिष्टकर्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार पत्नियाँ थीं और उनसे सैकड़ों हजारों पुत्र हुए। वासुदेव श्रीकृष्णकी पत्नी रुक्मिणी से चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयशा, प्रद्युम्न तथा शङ्ख नामवाले महान् बलशाली और पराक्रम सम्पन्न पुत्र हुए। ये पुत्र सभी पुत्रोंमें विशिष्ट हुए॥७९-८१॥

तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् शैक्मिणेयाजनार्दनम्।

जाम्बवत्यब्रवीत् कृष्णं भार्या तस्य शुचिस्मिता॥८२॥

मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तमम्।

सुरेशसदृशं पुत्रं देहि दानवसूदन॥८३॥

जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथः स्वयं हरिः।

समारेभे तपः कर्तुं तपोनिधिररिंदमः ॥८४॥

रुक्मिणीसे उत्पन्न इन वीर पुत्रोंको देखकर पवित्र मुसकानवाली पत्नी जाम्बवतीने अपने पति जनार्दन श्रीकृष्ण से कहा-पुण्डरीकाक्ष! दानवसूदन! आप मुझे इन्द्र के समान विशिष्ट गुणवानोंमें श्रेष्ठ पुत्र प्रदान करें। जाम्बवती का कथन सुनकर शत्रुओंका दमन करनेवाले तपोनिधि जगन्नाथ स्वयं हरिने तप करना प्रारम्भ किया ॥ ८२-८४॥

तच्छृणुध्वं मुनिश्रेष्ठा यथासौ देवकीसुतः।

दृष्ट्वा लेभे सुतं रुद्रं तप्त्वा तीवं महत् तपः॥८५॥

मुनिश्रेष्ठो! उन देवकीपुत्र (श्रीकृष्ण)-ने जिस प्रकार अत्यन्त तीव्र महान् तपके द्वारा रुद्रका दर्शनकर पुत्र प्राप्त किया, उस (वृत्तान्त)-को आपलोग सुनें ॥ ८५॥