कूर्म महा पुराण
18 अध्याय
महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण
आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी
कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना
सूत उवाच
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासंतानकारणात्।
कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार सुमहत् तपः॥१॥
तस्य वै तपतोऽत्यर्थं प्रादुर्भूतौ सुताविमौ।
वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ॥२॥
वत्सरान्नैध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहायशाः।
रैभ्यस्य जज्ञिरे रैभ्याः पुत्रा द्युतिमतां वराः॥३॥
च्यवनस्य सुता पत्नी नैध्रुवस्य महात्मनः।
सुमेधा जनयामास पुत्रान् वै कुण्डपायिनः॥४॥
असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः समपद्यत।
नाम्ना वै देवलः पुत्रो योगाचार्यों महातपाः॥५॥
शाण्डिल्यानां परः श्रीमान् सर्वतत्त्वार्थवित् सुधीः।
प्रसादात् पार्वतीशस्य योगमुत्तममाप्तवान्॥ ६ ॥
सूतजी बोले-प्रजाकी अभिवृद्धिके लिये इन पुत्रों को उत्पन्न कर पुत्राभिलाषी कश्यप अत्यन्त महान् तप करने लगे। कठोर तप कर रहे उनके 'वत्सर' तथा 'असित' नामके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे नैध्रुव और रैभ्य नामके महान् यशस्वी पुत्र उत्पन्न हुए। रैथ्यके तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ रैभ्य नामक पुत्र हुआ। च्यवन ऋषिकी (सुमेधा नामवाली) पुत्री महात्मा नैध्रुव की पत्नी थी। सुमेधाने 'कुण्डपायी' पुत्रोंको उत्पन्न किया। असितकी एकपर्णा नामक पत्नीने ब्रह्मिष्ठ पुत्र को उत्पन्न किया जो देवल नामवाले थे, वे योगके आचार्य, महान् तपस्वी शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, श्रीमान्, सभी तत्त्वार्थों को जाननेवाले तथा विद्वान् थे। पार्वतीके पति भगवान् शंकरकी कृपासे उन्होंने श्रेष्ठ योग प्राप्त किया॥१-६॥
शाण्डिल्या नैध्रुवारैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ।
नरप्रकृतयो विप्राः पुलस्त्यस्य वदामि वः॥ ७ ॥
तृणबिन्दोः सुता विप्रा नाम्ना त्विलविला स्मृता।
पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत्॥ ८॥
ऋषिस्त्वैलविलिस्तस्यां विश्रवाः समपद्यत।
तस्य पल्यश्चतस्त्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धिकाः॥ ९ ॥
पुष्पोत्कटा चराका च कैकसी देववर्णिनी।
रूपलावण्यसम्पन्नास्तासां वै शृणुत प्रजाः॥१०॥
शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य-ये तीनों शाखाएँ कश्यपवंशीय और मानव प्रकृतिवाली हैं। ब्राह्मणो! आपको अब पुलस्त्य ऋषिके वंशको बताता हूँ। विप्रो! तृणबिन्दुकी एक पुत्री थी जो इलविला नामसे प्रसिद्ध थी। उन राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको प्रदान की। उस इलविलासे विश्रवा ऋषि उत्पन्न हुए। उनकी पुष्पोत्कटा, कैकसी तथा देववर्णिनी नामकी चार पत्नियाँ थीं, जो पुलस्त्यके वंशको बढ़ानेवाली तथा रूप और लावण्य से सम्पन्न थीं। अब आप उनकी संतानोंको सुनें-॥७-१०॥
ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्य सुषुवे देवरूपिणी।
कैकसी जनयत् पुत्रं रावणं राक्षसाधिपम्॥११॥
कुम्भकर्णं शूर्पणखां तथैव च विभीषणम्।
पुष्पोत्कटा व्यजनयत् पुत्रान् विश्रवसःशुभान्॥१२॥
महोदरं प्रहस्तं च महापाश्र्वं खरं तथा।
कुम्भीनसीं तथा कन्यां राकायां शृणुत प्रजाः॥१३॥
उनकी देवरूपिणी (देववर्णिनी) (नामक पत्नी) ने ज्येष्ठ वैश्रवण (कुबेर)-को जन्म दिया। कैकसी ने राक्षसों के अधिपति रावण नामक पुत्र और इसी प्रकार कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषणको जन्म दिया। पुष्पोत्कयने भी महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व और खर नामक विश्रवाके शुभ पुत्रों और कुम्भीनसी नामक कन्याको जन्म दिया। अब आप राकाकी संतान सुनें-॥११-१३॥
त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युजिह्वो महाबलः।
इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा दश।
सर्वे तपोबलोत्कृष्टा रुद्रभक्ताः सुभीषणाः॥१४॥
पुलहस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्यालाश्च दंष्ट्रिणः।
भूताः पिशाचाः साश्च शूकरा हस्तिनस्तथा ॥१५॥
अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे।
मरीचेः कश्यपः पुत्रः स्वयमेव प्रजापतिः॥१६॥
भृगोरप्यभवच्छक्रो दैत्याचार्यों महातपाः।
स्वाध्याययोगनिरतो हरभक्तो महाद्युतिः॥१७॥
अत्रे: पल्योऽभवन् बयः सोदर्यास्ताः पतिव्रताः।
कृशाश्वस्य तु विप्रेन्द्रा घृताच्यामिति मे श्रुतम्॥१८॥
त्रिशिरा, दूषण तथा महाबली विद्युज्जिह्व-ये राकाके पुत्र थे। पुलस्त्यके ये सभी दस राक्षस-पुत्र क्रूर कर्म करनेवाले, अत्यन्त भयंकर, उत्कट तपोबलवाले और रुद्रके भक्त थे। मृग, व्याल, दाढ़ोंवाले (प्राणी), भूत, पिशाच, सर्प, शूकर तथा हाथी-ये सभी पुलह (ऋषि)-के पुत्र हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें (महर्षि) क्रतुको संतानहीन कहा गया है। प्रजापति कश्यप मरीचिके पुत्र थे। भृगुके भी शुक्र नामक पुत्र हुए जो दैत्योंके आचार्य, महान् तपस्वी, स्वाध्याय तथा योगपरायण, अत्यन्त तेजस्वी और शंकरके भक्त थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अत्रिकी बहुत-सी पत्नियाँ थीं। वे पतिव्रता तथा आपस में बहनें थीं। हमने सुना है कि वे घृताचीसे उत्पन्न कृशाश्वकी पुत्रियाँ थीं॥ १४-१८॥
स तासुजनयामास स्वस्त्यात्रेयान् महौजसः।
वेदवेदाङ्गनिरतांस्तपसा हतकिल्बिषान्॥१९॥
नारदस्तु वसिष्ठाय ददौ देवीमरुन्धतीम्।
ऊर्ध्वरेतास्तत्र मुनिः शापाद् दक्षस्य नारदः॥२०॥
उन्होंने उन पत्नियोंसे महान् ओजस्वी, वेद-वेदाङ्ग परायण और तपस्याद्वारा अपने पापोंको नष्ट करनेवाले कल्याणकारी आत्रेयों (स्वस्त्यात्रेयों)-को उत्पन्न किया। नारदने देवी अरुन्धतीको वसिष्ठके लिये प्रदान किया। दक्षके शापसे नारद मुनि ऊर्ध्वरेता हो गये ॥१९-२०॥
हर्यश्वेषु तु नष्टेषु मायया नारदस्य तु।
शशाप नारदं दक्षः क्रोधसंरक्तलोचनः॥२१॥
नारदकी माया से हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर क्रोध से लाल आँखोंवाले दक्षने नारदको (इस प्रकार) शाप दिया-॥२१॥
यस्मान्मम सुताः सर्वे भवतो मायया द्विज।
क्षयं नीतास्त्वशेषेण निरपत्यो भविष्यति॥२२॥
अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु शक्तिमुत्पादयत् सुतम्।
शक्तेः पराशरः श्रीमान् सर्वज्ञस्तपतां वरः॥२३॥
आराध्य देवदेवेशमीशानं त्रिपुरान्तकम्।
लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्॥२४॥
'द्विज! चूँकि आपकी मायासे मेरे सभी पुत्र सभी प्रकारसे विनाश को प्राप्त हो गये, अतः आप भी संतानरहित होंगे।' वसिष्ठने अरुन्धतीसे शक्ति नामक पुत्र उत्पन्न किया। शक्तिके पराशर हुए जो श्रीसम्पन्न, सर्वज्ञ तथा तपस्वियोंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने त्रिपुरका नाश करनेवाले
देवाधिदेव शंकरकी आराधनाकर कृष्णद्वैपायन नामवाले अप्रतिम एवं शक्तिसम्पन्न पुत्रको प्राप्त किया॥ २२-२४॥
द्वैपायनाच्छुको जज्ञे भगवानेव शंकरः ।
अंशांशेनावतीर्योा स्वं प्राप परमं पदम्॥२५॥
शुकस्याप्यभवन् पुत्राः पञ्चात्यन्ततपस्विनः ।
भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरश्च पञ्चमः ।
कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता॥२६॥
भगवान् शंकर ही शुक नामसे द्वैपायनके पुत्र हुए। पृथ्वीपर अपने अंशांशरूपसे उत्पन्न होकर (पुनः) अपने परम पदको प्राप्त हुए। शुकके महान् तपस्वी पाँच पुत्र हुए, वे भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवें गौर नामवाले थे। साथ ही कीर्तिमती नामकी एक कन्या भी हुई, जो योगमाता और व्रतपरायणा थी॥ २५-२६ ॥
एतेऽत्र वंश्याः कथिता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनाम्।
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं कश्यपाद्राजसंततिम्॥२७॥
इन ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंके वंशजोंका यह वर्णन किया गया, अब आगे कश्यपसे उत्पन्न क्षत्रिय संतानोंका वर्णन सुनो-॥२७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥१८॥
इस प्रकार छ: हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥१८॥
Summary of chapter 18 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta elaborates on the vast dynasty of Sage Kashyapa, detailing how his descendants expanded across heaven, earth, and the netherworlds. The chapter lists the genealogies of various Asuras, Gandharvas, Apsarases, Kinnaras, and divine serpents born from Kadrū and Vinatā. It highlights the exploits of Garuḍa, the divine carrier of Bhagavān Vishṇu, and describes the celestial positions assigned to Kashyapa's progeny. The narration emphasizes that Kashyapa's lineage forms the primary biological framework of the cosmic order during the present Vaivasvata Manvantara.