कूर्म महा पुराण
49 अध्याय
स्वारोचिषसे वैवस्वत मन्वन्तरतकके देवता, सप्तर्षि, इन्द्र आदिका वर्णन,
नारायणद्वारा ही विभिन्न मन्वन्तरोंमें सृष्टि आदिका प्रतिपादन, भगवान्
विष्णुकी चार मूर्तियोंका विवेचन, विष्णुका माहात्म्य
ऋषय ऊचुः
अतीतानागतानीह यानि मन्वन्तराणि तु।
तानि त्वं कथयास्माकं व्यासांश्च द्वापरे युगे॥ १॥
वेदशाखाप्रणयनं देवदेवस्य धीमतः।
तथावतारान् धर्मार्थमीशानस्य कलौ युगे॥ २ ॥
कियन्तो देवदेवस्य शिष्याः कलियुगेषु वै।
एतत् सर्वं समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि॥ ३ ॥
ऋषियोंने कहा-(सूतजी!) आप हमें बीते हुए तथा आनेवाले जो मन्वन्तर हैं, उन्हें (बतलाइये) और द्वापर युगके व्यासोंको भी बतलायें। सूतजी! वेद की शाखाओंका प्रणयन कैसे हुआ, धर्म (-की स्थापना) के लिये कलियुगमें हुए देवाधिदेव बुद्धिमान् ईशान (व्यास)-के कितने अवतार हुए और कलियुगों में देवाधिदेव (व्यास)-के कितने शिष्य हुए-यह सब भी आप संक्षेपमें बतलायें ॥ १-३॥
सूत उवाच
मनुः स्वायम्भुवः पूर्वं ततः स्वारोचिषो मनुः ।
उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥ ४ ॥
षडेते मनवोऽतीता साम्प्रतं तु रवेः सुतः।
वैवस्वतोऽयं यस्यैतत् सप्तमं वर्ततेऽन्तरम्॥ ५ ॥
स्वायम्भुवं तु कथितं कल्पादावन्तरं मया।
अत ऊर्ध्वं निबोधध्वं मनो: स्वारोचिषस्य तु॥ ६ ॥
सूतजी बोले-पहले स्वायम्भुव मनु थे। तदनन्तर स्वारोचिष मनु हुए। पुनः उत्तम, तामस, रैवत तथा चाक्षुष मनु हुए। ये छ: बीते हुए मनु हैं। इस समय सूर्यके पुत्र वैवस्वतका यह सातवाँ मन्वन्तर प्रवृत्त है। कल्पके आदिमें होनेवाले स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन मैंने किया। इसके अनन्तर स्वारोचिष मनुका वर्णन सुनो॥ ४-६॥
पारावताश्च तुषिता देवाः स्वारोचिषेऽन्तरे।
विपश्चिन्नाम देवेन्द्रो बभूवासुरसूदनः॥ ७ ॥
ऊर्जस्तम्भस्तथा प्राणो दान्तोऽथ वृषभस्तथा।
तिमिरश्चार्वरीवांश्च सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥ ८ ॥
स्वारोचिष मन्वन्तरमें पारावत तथा तुषित नाम के देवता और असुरोंका विनाश करनेवाले विपश्चित् नामके देवेन्द्र हुए। ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दान्त, वृषभ, तिमिर और अर्वरीवान्-ये सात सप्तर्षि हुए॥७-८॥
चैत्रकिंपुरुषाद्याश्च सुताः स्वारोचिषस्य तु।
द्वितीयमेतदाख्यातमन्तरं शृणु चोत्तरम्॥ ९ ॥
तृतीयेऽप्यन्तरे विप्रा उत्तमो नाम वै मनुः ।
सुशान्तिस्तत्र देवेन्द्रो बभूवामित्रकर्षणः॥१०॥
सुधामानस्तथा सत्याः शिवाश्चाथ प्रतर्दनाः।
वशवर्तिनश्च पञ्चैते गणा द्वादशकाः स्मृताः॥११॥
रजोर्ध्वश्चोर्ध्वबाहुश्च सबलश्चानयस्तथा।
सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥१२॥
स्वारोचिषके चैत्र और किंपुरुष आदि पुत्र थे। इस प्रकार दूसरे मन्वन्तरको मैंने बतलाया, अब इसके परवर्ती (मन्वन्तर)-का वर्णन सुनिये। हे विप्रो! तीसरे मन्वन्तरमें उत्तम नामके मनु और शत्रुनाशक सुशान्ति नामवाले देवेन्द्र हुए। सुधामा, सत्य, शिव, प्रतर्दन और वशवर्ती-बारह-बारह देवताओंवाले-ये पाँच गण कहे गये हैं। रज, ऊर्ध्व, ऊर्ध्वबाहु, सबल, अनय, सुतपा और शुक्र-ये सात सप्तर्षि हुए॥९-१२॥
तामसस्यान्तरे देवाः सुरा वाहरयस्तथा।
सत्याश्च सुधियश्चैव सप्तविंशतिका गणाः॥१३॥
शिबिरिन्द्रस्तथैवासीच्छतयज्ञोपलक्षण:
बभूव शंकरे भक्तो महादेवार्चने रतः॥१४॥
तामस मन्वन्तरमें सुर, वाहरि, सत्य तथा सुधी-ये सत्ताईस-सत्ताईसकी संख्यावाले गणदेवता थे। इसी प्रकार सौ यज्ञोंको करनेवाले शिबि नामक इन्द्र थे।वेशंकरके भक्त और महादेवकी आराधनामें रत रहते थे॥१३-१४॥
ज्योतिर्धर्मा पृथुः काव्यश्चैत्रोऽग्निर्वनकस्तथा।
पीवरस्त्वृषयो ह्येते सप्त तत्रापि चान्तरे॥१५॥
पञ्चमे चापि विप्रेन्द्रा रैवतो नाम नामतः।
मनुर्वसुश्च तत्रेन्द्रो बभूवासुरमर्दनः॥१६॥
अमिताभा भूतरया वैकुण्ठाः स्वच्छमेधसः।
एते देवगणास्तत्र चतुर्दश चतुर्दश॥१७॥
हिरण्यरोमा वेदश्रीरूव॑बाहुस्तथैव च।
वेदबाहुः सुधामा च पर्जन्यश्च महामुनिः।
एते सप्तर्षयो विप्रास्तत्रासन् रैवतेऽन्तरे॥१८॥
स्वारोचिषश्चोत्तमश्च तामसो रैवतस्तथा।
प्रियव्रतान्वया ह्येते चत्वारो मनवः स्मृताः॥१९॥
उस मन्वन्तरमें भी ज्योतिर्धर्मा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर नामक-ये सात ऋषि हुए। विप्रेन्द्रो! पाँचवें मन्वन्तरमें रैवत नामवाले मनु और असुरों का मर्दन करनेवाले वसु नामवाले इन्द्र हुए। अमिताभ, भूतरय, वैकुण्ठ और स्वच्छमेधा-ये चौदह-चौदहकी
संख्यावाले (चार) गणदेवता थे। हे विप्रो ! रैवत मन्वन्तर में हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि-ये सप्तर्षि हुए। स्वारोचिष, उत्तम, तामस तथा रैवत-ये चार मनु प्रियव्रतके वंशज कहे जाते हैं । १५-१९॥
षष्ठे मन्वन्तरे चासीच्चाक्षुषस्तु मनुर्द्विजाः।
मनोजवस्तथैवेन्द्रो देवानपि निबोधत ॥२०॥
आद्याः प्रसूता भाव्याश्च पृथुगाश्च दिवौकसः।
महानुभावा लेख्याश्च पञ्चैते ह्यष्टका गणाः ॥२१॥
सुमेधा विरजाश्चैव हविष्मानुत्तमो मधुः।
अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तासन्नृषयः शुभाः॥२२॥
हे द्विजो! छठे मन्वन्तरके मनु चाक्षुष हैं। इस मन्वन्तर के इन्द्रका नाम मनोजव है। (अब) देवताओंको सुनो-आद्य, प्रसूत, भाव्य, पृथुग और लेख्य-ये पाँच महानुभाव आठ-आठकी संख्यावाले देवताओंके गण हैं। सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उत्तम, मधु, अतिनाम और सहिष्णु-ये सात कल्याणकारी ऋषि हैं ॥ २०-२२॥
विवस्वतः सुतो विप्राः श्राद्धदेवो महाद्युतिः ।
मनुः स वर्तते धीमान् साम्प्रतं सप्तमेऽन्तरे॥२३॥
आदित्या वसवो रुद्रा देवास्तत्र मरुद्गणाः।
पुरंदरस्तथैवेन्द्रो बभूव परवीरहा॥२४॥
वसिष्ठः कश्यपश्चात्रिर्जमदग्निश्च गौतमः।
विश्वामित्रो भरद्वाजः सप्त सप्तर्षयोऽभवन्॥२५॥
विष्णुशक्तिरनौपम्या सत्त्वोद्रिक्ता स्थिता स्थितौ।
तदंशभूता राजानः सर्वे च त्रिदिवौकसः॥२६॥
स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमाकूत्यां मानसः सुतः।
रुचेः प्रजापतेर्यज्ञस्तदंशेनाभवद् द्विजाः ॥२७॥
ततः पुनरसौ देवः प्राप्ते स्वारोचिषेऽन्तरे।
तुषितायां समुत्पन्नस्तुषितैः सह दैवतैः ॥२८॥
विप्रो! विवस्वान्के पुत्र बुद्धिमान् एवं महान् तेजस्वी श्राद्धदेव इस समय सातवें मन्वन्तरके मनु हैं। आदित्य, वसुगण, रुद्र तथा मरुद्गण इसमें देवता हैं। इसी प्रकार वीर शत्रुओं का नाश करनेवाले पुरन्दर नामवाले (इस मन्वन्तरके) इन्द्र हैं। वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा भरद्वाज-ये सात सप्तर्षि हैं। (इस मन्वन्तरमें) विष्णुकी अनुपम सत्त्वगुणमयी शक्ति (सृष्टि)-की रक्षाके लिये स्थित है। सभी राजा और सभी देवगण इसी (विष्णुशक्ति)-के अंशसे उत्पन्न हैं। द्विजो! स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सर्वप्रथम प्रजापति रुचिका आकूति (नामक पत्नी)-से यज्ञ नामक मानस पुत्र हुआ, यह विष्णु का अंश था। तदनन्तर पुनः वे ही देव (विष्णु) स्वारोचिष मन्वन्तरके आनेपर तुषितासे तुषित नामके देवताओं के साथ उत्पन्न हुए॥ २३-२८॥
औत्तमेऽप्यन्तरे विष्णुः सत्यैः सह सुरोत्तमैः ।
सत्यायामभवत् सत्यः सत्यरूपो जनार्दनः॥२९॥
तामसस्यान्तरे चैव सम्प्राप्ते पुनरेव हि।
हर्यायां हरिभिर्देवैर्हरिरेवाभवद्धरिः॥३०॥
औत्तम मन्वन्तरमें सत्यरूप जनार्दन विष्णु सत्य नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ सत्य नामधारी सत्या से उत्पन्न हुए और तामस नामक मन्वन्तर आने पर साक्षात् ये हरि ही हरि नामक देवताओंके साथ हर्यासे हरि इस नामसे उत्पन्न हुए॥ २९-३०॥
रैवतेऽप्यन्तरे चैव सम्भूत्यां मानसोऽभवत्।
सम्भूतो मानसैः सार्धं देवैः सह महाद्युतिः॥३१॥
चाक्षुषेऽप्यन्तरे चैव वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः ।
विकुण्ठायामसौ जज्ञे वैकुण्ठैर्दैवतैः सह ॥ ३२॥
मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेऽन्तरे।
वामनः कश्यपाद् विष्णुरदित्यां सम्बभूव ह॥३३॥
त्रिभिः क्रमैरिमाल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।
पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम् ॥ ३४॥
रैवत मन्वन्तरमें भी मानस नामक देवताओंके साथ महान् द्युतिमान् हरि सम्भूतिसे मानस नामसे उत्पन्न हुए। चाक्षुष मन्वन्तरमें भी वे पुरुषोत्तम वैकुण्ठ नामक देवताओं के साथ विकुण्ठासे वैकुण्ठ नामसे उत्पन्न हुए और वैवस्वत नामक मन्वन्तर आनेपर वे विष्णु कश्यप और अदिति से वामन नामसे उत्पन्न हुए। इन्हीं महात्माने अपने तीन पगोंसे समस्त लोकोंको जीतकर पुरन्दर इन्द्रको निष्कण्टक त्रैलोक्य (-का राज्य) प्रदान किया ॥३१-३४॥
इत्येतास्तनवस्तस्य सप्त मन्वन्तरेषु वै।
सप्त चैवाभवन् विप्रा याभिः संरक्षिताः प्रजाः॥३५॥
यस्माद् विष्टमिदं कृत्स्नं वामनेन महात्मना।
तस्मात्स वैस्मृतो विष्णुर्विशेर्धातोः प्रवेशनात्॥३६॥
एष सर्वं सृजत्यादौ पाति हन्ति च केशवः।
भूतान्तरात्मा भगवान् नारायण इति श्रुतिः॥३७॥
हे विप्रो! सात मन्वन्तरोंमें ये ही सात उन (विष्णु) के विग्रह हुए, जिनसे प्रजाओंकी रक्षा हुई। महात्मा वामनने इस सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त किया था, इसीलिये 'विश्' धातुका प्रवेश अर्थ होनेके कारण वे (वामन) विष्णु कहलाये। ये केशव प्रारम्भमें समस्त प्रपञ्च की सृष्टि करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और (अन्तमें) उसका संहार करते हैं। भगवान् नारायण सभी प्राणियों की अन्तरात्मा हैं-ऐसा वेदका कथन है॥ ३५-३७॥
एकांशेन जगत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः।
चतुर्धा संस्थितो व्यापी सगुणो निर्गुणोऽपि च॥३८॥
एका भगवतो मूर्तिर्ज्ञानरूपा शिवामला।
वासुदेवाभिधाना सा गुणातीता सुनिष्कला॥३९॥
द्वितीया कालसंज्ञान्या तामसी शेषसंज्ञिता।
निहन्ति सकलं चान्ते वैष्णवी परमा तनुः॥४०॥
सत्त्वोद्रिक्ता तथैवान्या प्रद्युम्नेति च संज्ञिता।
जगत् स्थापयते सर्वं स विष्णुः प्रकृतिधुंवा ॥४१॥
चतुर्थी वासुदेवस्य मूर्तिर्ब्राह्मीति संज्ञिता।
राजसी चानिरुद्धाख्या प्रद्युम्नः सृष्टिकारिका॥४२॥
ये नारायण अपने एक अंशसे सम्पूर्ण संसार को व्याप्तकर प्रतिष्ठित रहते हैं। ये निर्गुण होते हुए भी सगुण रूपसे चार भागोंमें विभक्त होकर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। (ये ही चार भाग भगवान् नारायणकी चार मूर्तियाँ हैं। इनमें) भगवान्की वासुदेव नामवाली पहली मूर्ति ज्ञानरूप, कल्याणकारिणी, निर्मल, गुणातीत और कलारहित है। दूसरी काल और शेष नामवाली वह तामसी मूर्ति विष्णुको परम विग्रहरूपा मूर्ति है। यही अन्तमें सबका संहार करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणमयी प्रद्युम्न नामवाली अन्य (तीसरी) मूर्ति सम्पूर्ण जगत्की स्थापना (पालन) करती है, यही विष्णुको ध्रुवा प्रकृति है। इन तीनों मूर्तियोंके अतिरिक्त वासुदेवकी ब्राह्मी तथा अनिरुद्ध नामवाली चौथी राजसी मूर्ति है, यह प्रद्युम्न नामक मूर्ति
सृष्टि करनेवाली है॥ ३८-४२॥
यः स्वपित्यखिलं भूत्वा प्रद्युम्नेन सह प्रभुः।
नारायणाख्यो ब्रह्माऽसौ प्रजासर्ग करोति सः॥४३॥
या सा नारायणतनुः प्रद्युम्नाख्या मुनीश्वराः।
तया सम्मोहयेद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्॥४४॥
जो प्रभु सम्पूर्ण (सृष्टि)-के रूपमें होकर प्रद्युम्न के साथ शयन करते हैं, नारायण नामवाले वे ही ब्रह्मा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। मुनीश्वरो! वह जो प्रद्युम्न नामवाली नारायणकी मूर्ति है, उसके द्वारा वे (नारायण) देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त विश्वको मोहित करते हैं ॥४३-४४॥
सैव सर्वजगत्सूतिः प्रकृतिः परिकीर्तिता।
वासुदेवो हनन्तात्मा केवलो निर्गुणो हरिः॥ ४५॥
प्रधानं पुरुषं कालस्तत्त्वत्रयमनुत्तमम्।
वासुदेवात्मकं नित्यमेतद् विज्ञाय मुच्यते॥४६॥
वही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न करनेवाली प्रकृति कहे गये हैं। अनन्तात्मा वासुदेव हरि अद्वितीय एवं निर्गुण हैं। प्रधान, पुरुष और काल-ये श्रेष्ठ तीन तत्त्व नित्य वासुदेवमय हैं। इनको जान लेनेपर मुक्ति हो जाती है॥ ४५-४६ ।।
एकं वेदं चतुष्पादं चतुर्धा पुनरच्युतः।
बिभेद वासुदेवोऽसौ प्रद्युम्नो हरिरव्ययः॥४७॥
कृष्णद्वैपायनो व्यासो विष्णुर्नारायणः स्वयम्।
अपान्तरतमाः पूर्वं स्वेच्छया ह्यभवद्धरिः॥४८॥
अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः।
एकोऽयं वेद भगवान् व्यासो नारायणः प्रभुः॥४९॥
उन अच्युत वासुदेव नामक प्रद्युम्न अव्यय हरिने चतुष्पादात्मक एक वेदको चार भागोंमें विभक्त किया। पूर्वकालमें स्वयं अपान्तरतमा* नारायण हरि विष्णु ही स्वेच्छासे कृष्णद्वैपायन व्यास हुए। आदि और अन्तरहित परम ब्रह्मको न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही, एकमात्र प्रभु नारायणरूप ये भगवान् व्यास ही उन्हें जानते हैं ॥ ४७-४९॥
इत्येतद् विष्णुमाहात्म्यमुक्तं वो मुनिपुंगवाः।
एतत् सत्यं पुनः सत्यमेवं ज्ञात्वा न मुह्यति॥५०॥
हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने आप यह विष्णुका माहात्म्य बतलाया, यह सत्य है, पुनः सत्य है, ऐसा
जाननेसे मोह नहीं होता॥ ५० ॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे एकोनपञ्चाशोऽध्यायः॥ ४९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४९॥
Summary of chapter 47 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta describes the nine Varshas of Jambūdvīpa: Bhāratavarsha, Kimpurushavarsha, Harivarsha, Ilāvṛtavarsha, Ramyakavarsha, Hiraṇmayavarsha, Uttarakuru, Bhadrāshvavarsha, and Ketumālavarsha. Among these, Bhāratavarsha is praised as the sacred Karma-bhūmi, the unique realm where spiritual actions, Yajñas, and Tapas yield direct karmic results and spiritual liberation.