19 अध्याय

सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवनाश्वको गौतमका उपदेश,

महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा

देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका

हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति

सूत उवाच

अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपात् प्रभुम्।

तस्यादित्यस्य चैवासीभार्याणां तु चतुष्टयम्।

संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां निबोधत॥१॥

संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यान्मनुमनुत्तमम्।

यमं च यमुनां चैव राज्ञी रैवतमेव च॥२॥

प्रभा प्रभातमादित्याच्छाया सावर्णमात्मजम्।

शनिं च तपतीं चैव विष्टिं चैव यथाक्रमम्॥३॥

सूतजी बोले-अदितिने कश्यपसे शक्तिशाली 'आदित्य' नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्य की संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया नामवाली चार पनियाँ थीं। उनके पुत्रोंको सुनो- -त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री संज्ञा ने सूर्यसे श्रेष्ठ मनु, यम और यमुनाको उत्पन्न किया और

राज्ञीने रैवतको उत्पन्न किया। प्रभाने आदित्यसे प्रभातको उत्पन्न किया। छायाने क्रमशः सावर्ण, शनि, तपती और विष्टि नामक संतानोंको जन्म दिया॥१-३॥

मनोस्तु प्रथमस्यासन् नव पुत्रास्तु संयमाः।

इक्ष्वाकुर्नभगश्चैव धृष्टः शर्यातिरेव च॥४॥

नरिष्यन्तश्च नाभागो ह्यरिष्टः कारुषकस्तथा।

पृषधश्च महातेजा नवैते शक्रसंनिभाः॥

इला ज्येष्ठा वरिष्ठा च सोमवंशविवृद्धये।

प्रथम मनुके नौ पुत्र थे जो इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, कारुषक तथा पृषध्र नामवाले थे। ये नवों पुत्र इन्द्रियजयी, महान् तेज से सम्पन्न तथा इन्द्रके समान थे॥ ४-५॥

बुधस्य गत्वा भवनं सोमपुत्रेण संगता॥ ६ ॥

असूत सौम्यजं देवी पुरूरवसमुत्तमम्।

पितॄणां तृप्तिकर्तारं बुधादिति हि नः श्रुतम्॥ ७ ॥

सम्प्राप्य पुंस्त्वममलं सुद्युम्न इति विश्रुतः।

इला पुत्रत्रयं लेभे पुनः स्त्रीत्वमविन्दत॥ ८ ॥

उत्कलश्च गयश्चैव विनताश्वस्तथैव च।

सर्वे तेऽप्रतिमप्रख्याः प्रपन्नाः कमलोद्भवम्॥ ९॥

(मनुकी) ज्येष्ठ एवं वरिष्ठ (पुत्री) इलाने* सोमवंश की अभिवृद्धिके लिये बुधके भवनमें जाकर सोमपुत्र (बुध)-के साथ संगति की और हमने सुना है कि उस देवीने बुधसे श्रेष्ठ पुरूरवाको उत्पन्न किया। वह पितरोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला था। (पुत्र प्राप्त करने के उपरान्त इलाको) विशुद्ध पुरुषत्वकी प्राप्ति हुई जो सुद्युम्न नामसे विख्यात हुआ। (पुरुषरूपमें) इलाने उत्कल, गय तथा विनताश्व नामक तीन पुत्रोंको प्राप्त किया, तदनन्तर वह पुनः स्त्री हो गयी, वे सभी अतुलनीय कीर्तिमान् तथा ब्रह्मपरायण थे॥६-९॥

इक्ष्वाकोश्चाभवद्वीरो विकुक्षि म पार्थिवः।

ज्येष्ठः पुत्रशतस्यापि दश पञ्च च तत्सुताः॥१०॥

तेषांज्येष्ठःककुत्स्थोऽभूत् काकुत्स्थो हि सुयोधनः।

सुयोधनात् पृथुः श्रीमान् विश्वकश्च पृथोः सुतः॥११॥

विश्वकादाको धीमान् युवनाश्वस्तु तत्सुतः।

स गोकर्णमनुप्राप्य युवनाश्वः प्रतापवान्॥१२॥

मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकुसे विकुक्षि नामक वीर राजा हुए। विकुक्षि सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे। उनके पंद्रह पुत्र हुए। उनमें ककुत्स्थ सबसे बड़े थे। ककुत्स्थ का पुत्र सुयोधन था। सुयोधनसे श्रीमान् पृथु उत्पन्न हुए और विश्वक पृथुके पुत्र थे। विश्वकसे बुद्धिमान् आर्द्रक हुए और उनके पुत्र युवनाश्व हुए। प्रतापी वे युवनाश्व गोकर्ण तीर्थ में गये ॥१०-१२॥

दृष्ट्वा तु गौतमं विप्रं तपन्तमनलप्रभम्।

प्रणम्य दण्डवद् भूमौ पुत्रकामो महीपतिः।

अपृच्छत् कर्मणा केन धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥१३॥

वहाँ तप कर रहे अग्नि-सदृश विप्र गौतमका दर्शन-कर पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे युवनाश्वने भूमिमें दण्डवत् प्रणाम किया और उनसे (गौतमसे) पूछा-(भगवन्!) किस कर्मके द्वारा धर्मात्मा पुत्रको प्राप्त किया जा सकता है-॥१३॥

गौतम उवाच

आराध्य पूर्वपुरुषं नारायणमनामयम्।

अनादिनिधनं देवं धार्मिकं प्राप्नुयात् सुतम्॥१४॥

यस्य पुत्रः स्वयं ब्रह्मा पौत्रः स्यान्नीललोहितः।

तमादिकृष्णमीशानमाराध्याजोति सत्सुतम्॥१५॥

न यस्य भगवान् ब्रह्मा प्रभावं वेत्ति तत्त्वतः।

तमाराध्य हृषीकेशं प्राप्नुयाद्धार्मिकं सुतम्॥१६॥

गौतमने कहा-आदि और अन्तसे रहित, अनामय, पूर्वपुरुष नारायणदेवकी आराधनासे धर्मात्मा पुत्र की प्राप्ति होती है। जिनके पुत्र स्वयं ब्रह्मा हैं और (जिनके) पौत्र नीललोहित शंकर हैं, उन आदिकृष्ण ईशानकी आराधनासे (मनुष्य) सत्पुत्र प्राप्त करता है। भगवान् ब्रह्मा भी जिनके प्रभावको तत्त्वत: नहीं जानते हैं, उन हृषीकेशकी आराधनासे धार्मिक पुत्रको प्राप्त करना चाहिये ॥१४-१६॥

स गौतमवचः श्रुत्वा युवनाश्वो महीपतिः।

आराधयन्महायोगं सनातनम्॥१७॥

गौतमके वचनको सुनकर उस पृथ्वीपति युवनाश्चने महायोगी सनातन वासुदेवकी आराधना प्रारम्भ की॥१७॥

तस्य पुत्रोऽभवद् वीरः श्रावस्तिरिति विश्रुतः।

निर्मिता येन श्रावस्तिौडदेशे महापुरी॥१८॥

(आराधनाके फलस्वरूप) उसका वीर पुत्र हुआ जो 'श्रावस्ति' इस नामसे विख्यात हुआ। उसने गौडदेश में श्रावस्ति नामक महापुरीका निर्माण किया॥१८॥

तस्माच्च बृहदश्वोऽभूत् तस्मात् कुवलयाश्वकः।

धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुं हत्वा महासुरम्॥१९॥

धुन्धुमारस्य तनयास्त्रयः प्रोक्ता द्विजोत्तमाः।

दृढाश्वश्चैव दण्डाश्वः कपिलाश्वस्तथैव च ॥२०॥

दृढाश्वस्य प्रमोदस्तु हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।

हर्यश्वस्य निकुम्भस्तु निकुम्भात् संहताश्वकः॥२१॥

कृशाश्वश्च रणाश्वश्च संहताश्वस्य वै सुतौ।

युवनाश्वो रणाश्वस्य शक्रतुल्यबलो युधि॥२२॥

उससे (श्रावस्तिसे) बृहदश्व उत्पन्न हुए और उससे कुवलयाश्वक उत्पन्न हुए। धुन्धु नामक महान् असुर को मारनेके कारण वे धुन्धुमारके नामसे प्रसिद्ध हुए। श्रेष्ठ द्विजो! धुन्धुमारके तीन पुत्र कहे गये हैं-दृढाश्व, दण्डाश्व तथा कपिलाश्व। दृढाश्वका प्रमोद और प्रमोदका पुत्र हर्यश्व था। हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ था और निकुम्भ से संहताश्वक उत्पन्न हुआ। संहताश्वकके कृशाश्व तथा रणाश्व-ये दो पुत्र हुए। रणाश्वका युद्धमें इन्द्रके तुल्य बलशाली युवनाश्व नामक पुत्र हुआ॥ १९-२२॥

कृत्वा तु वारुणीमिष्टिमृषीणां वै प्रसादतः।

लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं विष्णुभक्तमनुत्तमम्।

मान्धातारं महाप्राज्ञं सर्वशस्त्रभृतां वरम्॥२३॥

मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूदम्बरीषश्च वीर्यवान्।

मुचुकुन्दश्च पुण्यात्मा सर्वे शक्रसमा युधि॥२४॥

अम्बरीषस्य दायादो युवनाश्वोऽपरः स्मृतः।

हरितो युवनाश्वस्य हारितस्तत्सुतोऽभवत्॥ २५॥

युवनाश्वने ऋषियोंकी कृपासे वारुणी नामक यागका (वारुणी नामको इष्टिका) अनुष्ठान करके अप्रतिम महान् बुद्धिमान्, शस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा उत्तम विष्णुभक्त मान्धाता नामक पुत्रको प्राप्त किया। मान्धाताके पुरुकुत्स, वीर्यवान् अम्बरीष तथा पुण्यात्मा मुचुकुन्द नामक पुत्र हुए। युद्धमें वे सभी इन्द्रके समान थे। अम्बरीषका पुत्र दूसरा युवनाश्व कहलाता है। युवनाश्वका पुत्र हरित और उसका पुत्र हारित हुआ॥ २३-२५॥

पुरुकुत्सस्य दायादस्त्रसदस्युर्महायशाः।

नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तत्सुतोऽभवत्॥२६॥

विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य त्वनरण्योऽभवत् परः।

बृहदश्वोऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तत्सुतोऽभवत्॥२७॥

सोऽतीव धार्मिको राजा कर्दमस्य प्रजापतेः।

प्रसादाद्धार्मिकं पुत्रं लेभे सूर्यपरायणम्॥ २८॥

स तु सूर्यं समभ्यर्च्य राजा वसुमनाः शुभम्।

लेभे त्वप्रतिमं पुत्रं त्रिधन्वानमरिंदमम्॥२९॥

अयजच्चाश्वमेधेन शत्रून् जित्वा द्विजोत्तमाः।

स्वाध्यायवान् दानशीलस्तितिक्षुर्धर्मतत्परः॥३०॥

पुरुकुत्सका नर्मदा (नामक पत्नी)-से महायशस्वी त्रसद्दस्यु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र सम्भूति हुआ। उसका (सम्भूतिका) विष्णुवृद्ध तथा दूसरा अनरण्य नामक पुत्र हुआ। अनरण्यका बृहदश्व और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ। यही हर्यश्व अत्यन्त धार्मिक राजारूपमें विख्यात हुआ। इसने कर्दम प्रजापतिकी कृपासे धार्मिक सूर्यभक्त (वसुमना नामक) पुत्रको प्राप्त किया। इस वसुमना नामक राजाने सूर्यकी आराधनासे शत्रुओंका दमन करनेवाले अप्रतिम कल्याणकारी त्रिधन्वा नामक पुत्रको प्राप्त किया। श्रेष्ठ द्विजो! स्वाध्यायनिरत, दानशील, सहिष्णु तथा धर्मपरायण (उस) राजाने शत्रुओंको जीतकर अश्वमेध नामक यज्ञ किया ॥ २६-३०॥

ऋषयस्तु समाजग्मुर्यज्ञवाटं महात्मनः ।

वसिष्ठकश्यपमुखा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥३१॥

तान् प्रणम्य महाराजः पप्रच्छ विनयान्वितः।

समाप्य विधिवद्यहं वसिष्ठादीन् द्विजोत्तमान्॥३२॥

उस महात्माके यज्ञस्थलमें वसिष्ठ तथा कश्यप आदि प्रमुख ऋषिगण तथा इन्द्र आदि देवता आये। विधिपूर्वक यज्ञ पूर्ण करके उन वसिष्ठ आदि द्विजोत्तमोंको प्रणामकर महाराज (वसुमना)-ने विनयपूर्वक उनसे पूछा-॥३१-३२॥

वसुमना उवाच

किंस्विच्छ्रेयस्करतरं लोकेऽस्मिन् ब्राह्मणर्षभाः।

यज्ञस्तपो वा संन्यासो ब्रूत मे सर्ववेदिनः ॥३३॥

वसुमनाने कहा- श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप सब कुछ जाननेवाले हैं। मुझे यह बतलाइये कि इस संसारमें यज्ञ, तप अथवा संन्यासमें कौन अधिक श्रेयस्कर है? ॥३३॥

वसिष्ठ उवाच

अधीत्य वेदान् विधिवत् पुत्रानुत्पाद्य धर्मतः।

इष्ट्वा यज्ञेश्वरं यज्ञैर्गच्छेद् वनमथात्मवान्॥३४॥

वसिष्ठ बोले-आत्मवान्को चाहिये कि वह वेदोंका विधिवत् अध्ययन करके धर्मपूर्वक पुत्रोंको उत्पन्न करे और यज्ञोंद्वारा यज्ञेश्वरका यजनकर वनमें जाय ॥ ३४॥

पुलस्त्य उवाच

आराध्य तपसा देवं योगिनं परमेष्ठिनम्।

प्रव्रजेद् विधिवद् यज्ञैरिष्ट्वा पूर्वं सुरोत्तमान्॥३५॥

पुलस्त्यने कहा-सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवोंकी यज्ञद्वारा अर्चना करके और तपस्याद्वारा योगी देव परमेश्वर की आराधना करके विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण करना चाहिये ॥ ३५॥

पुलह उवाच

यमाहुरेकं पुरुषं पुराणं परमेश्वरम्।

तमाराध्य सहस्रांशुं तपसा मोक्षमाप्नुयात्॥३६॥

पुलह बोले-जिन्हें अद्वितीय, पुराणपुरुष तथा परमेश्वर कहा गया है, उन सहस्रकिरण (सूर्य)-की तपस्याद्वारा आराधना करके मोक्ष प्राप्त करना चाहिये॥३६॥

जमदग्निरुवाच

अजस्य नाभावध्येकमीश्वरेण समर्पितम्।

बीजं भगवता येन स देवस्तपसेज्यते॥३७॥

जमदग्निने कहा-जिन भगवान् ईश्वरने अजन्मा (ब्रह्म)-की नाभिमें अद्वितीय बीज (जगत्कारण ब्रह्मा) को स्थापित किया, उन देवकी तपस्याद्वारा आराधना की जानी चाहिये ॥ ३७॥

विश्वामित्र उवाच

योऽग्निः सर्वात्मकोऽनन्तः स्वयम्भूर्विश्वतोमुखः।

स रुद्रस्तपसोगेण पूज्यते नेतरैर्मखैः॥३८॥

विश्वामित्रने कहा-जो अग्निस्वरूप, सर्वात्मक, अनन्त, स्वयम्भू तथा सर्वतोमुख हैं, वे रुद्र उग्र तपस्याद्वारा पूजनीय हैं न कि अन्य किसी दूसरे यज्ञ आदि साधनोंद्वारा ॥ ३८॥

भरद्वाज उवाच

यो यज्ञैरिज्यते देवो जातवेदाः सनातनः।

स सर्वदैवततनुः पूज्यते तपसेश्वरः॥३९॥

भरद्वाज बोले-यज्ञोंद्वारा जिन सनातन अग्निदेव की पूजा की जाती है, वे सभी देवताओंके विग्रहरूप परमेश्वर ही तपके द्वारा पूजित होते हैं ॥ ३९॥

अत्रिरुवाच

यतः सर्वमिदं जातं यस्यापत्यं प्रजापतिः।

तपः सुमहदास्थाय पूज्यते स महेश्वरः॥४०॥

अत्रि बोले-वे महेश्वर अत्यन्त महान् तप के द्वारा पूजे जाते हैं, जिनसे यह सब उत्पन्न हुआ है और प्रजापति जिनकी संतान हैं॥ ४० ॥

गौतम उवाच

यतः प्रधानपुरुषौ यस्य शक्तिमयं जगत्।

स देवदेवस्तपसा पूजनीयः सनातनः॥४१॥

गौतमने कहा-जिससे प्रधान अर्थात् पुरुष और प्रकृति उत्पन्न हुए हैं और जिनकी शक्तिसे यह जगत् (उत्पन्न) हुआ है, वे सनातन देवाधिदेव तपस्याद्वारा पूजनीय हैं ॥४१॥

कश्यप उवाच

सहस्त्रनयनो देवः साक्षी स तु प्रजापतिः।

प्रसीदति महायोगी पूजितस्तपसा परः॥४२॥

कश्यपने कहा-तपद्वारा आराधना करनेसे वे हजारों नेत्रवाले, साक्षी, महायोगी, प्रजापति प्रभु प्रसन्न होते हैं॥४२॥

क्रतुरुवाच

प्राप्ताध्ययनयज्ञस्य लब्धपुत्रस्य चैव हि।

नान्तरेण तपः कश्चिद्धर्मः शास्त्रेषु दृश्यते॥४३॥

क्रतु बोले-अध्ययनरूपी यज्ञ पूर्ण कर पुत्र प्राप्त कर लेनेवाले पुरुषके लिये तपस्याके अतिरिक्त कोई और दूसरा धर्म शास्त्रोंमें दिखायी नहीं देता॥४३॥

इत्याकर्ण्य स राजर्षिस्तान् प्रणम्यातिहष्टधीः।

विसर्जयित्वा सम्पूज्य त्रिधन्वानमथाब्रवीत्॥४४॥

आराधयिष्ये तपसा देवमेकाक्षराह्वयम्।

प्राणं बृहन्तं पुरुषमादित्यान्तरसंस्थितम्॥४५॥

त्वं तु धर्मरतो नित्यं पालयैतदतन्द्रितः।

चातुर्वर्ण्यसमायुक्तमशेषं क्षितिमण्डलम्॥४६॥

ऐसा सुनकर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले उस वसुमना राजर्षिने उन द्विजश्रेष्ठोंको प्रणाम किया और पूजनकर उन्हें बिदा किया। तदनन्तर (उसने अपने पुत्र) त्रिधन्वासे (इस प्रकार) कहा-तपद्वारा मैं सूर्यमण्डल के मध्यमें स्थित, प्राणरूप अद्वितीय अक्षर नामक ब्रह्म पुरुषकी आराधना करूँगा। तुम धर्ममें निरत होकर चातुर्वर्ण्यसे समन्वित इस सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका

आलस्यरहित होकर पालन करो॥ ४४-४६॥

एवमुक्त्वा स तद्राज्यं निधायात्मभवे नृपः।

जगामारण्यमनघस्तपश्चर्तुमनुत्तमम् ॥४७॥

हिमवच्छिखरे रम्ये देवदारुवने शुभे।

कन्दमूलफलाहारो मुन्यन्नैरयजत् सुरान्॥४८॥

संवत्सरशतं साग्रं तपोनिधूतकल्मषः।

जजाप मनसा देवीं सावित्री वेदमातरम्॥४९॥

तस्यैवं जपतो देवः स्वयम्भूः परमेश्वरः।

हिरण्यगर्भो विश्वात्मा तं देशमगमत् स्वयम्॥५०॥

दृष्ट्वा देवं समायान्तं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।

ननाम शिरसा तस्य पादयो म कीर्तयन्॥५१॥

ऐसा कहकर वह अनघ राजा वसुमना अपने पुत्र (त्रिधन्वा)-को राज्य सौंपकर सर्वोत्तम तपस्या करने के लिये वनमें चला गया। ये वसुमना राजा हिमालय के शिखरपर स्थित रमणीय शुभ देवदारु वनमें रहते हुए कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए मुनियोंके अन्न

(नीवार आदि)-से देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यज्ञ (आराधना) करने लगे। तपस्याद्वारा नष्ट हुए पापोंवाले उन्होंने सौ वर्षों से भी अधिक समयतक वेदमाता देवी सावित्रीका मानसिक जप किया। उनके इस प्रकार जप करते रहनेपर ही स्वयम्भू देव परमेश्वर हिरण्यगर्भ

विश्वात्मा स्वयं उस स्थानपर गये। विश्वतोमुख ब्रह्मदेव को आते हुए देखकर उन्होंने अपना नाम बोलते हुए उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और इस प्रकार कहा-॥४७-५१॥

नमो देवाधिदेवाय ब्रह्मणे परमात्मने।

हिरण्यमूर्तये तुभ्यं सहस्त्राक्षाय वेधसे॥५२॥

नमो धात्रे विधात्रे च नमो वेदात्ममूर्तये।

सांख्ययोगाधिगम्याय नमस्ते ज्ञानमूर्तये॥५३॥

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं स्रष्ट्र सर्वार्थवेदिने।

पुरुषाय पुराणाय योगिनां गुरवे नमः॥५४॥

देवाधिदेव परमात्मा ब्रह्मको नमस्कार है। सहस्र नेत्रोंवाले हिरण्यमूर्ति आप वेधाको नमस्कार है। धाता और विधाताको नमस्कार है, वेदात्ममूर्तिको नमस्कार है। सांख्य तथा योगद्वारा ज्ञात होनेवाले ज्ञान-न-मूर्ति को नमस्कार है। सभी अर्थों के ज्ञाता, सृष्टिकर्ता, त्रिमूर्तिरूप आपको नमस्कार है। योगियोंके गुरु पुराणपुरुषको नमस्कार है॥५२-५४॥

ततः प्रसन्नो भगवान् विरिञ्चो विश्वभावनः।

वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीत्यभाषत॥५५॥

तब प्रसन्न होकर विश्वभावन भगवान् ब्रह्माने कहा-'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें वर दूंगा' ॥५५॥

राजोवाच

जपेयं देवदेवेश गायत्रीं वेदमातरम्।

भूयो वर्षशतं साग्रं तावदायुर्भवेन्मम॥५६॥

बाढमित्याह विश्वात्मा समालोक्य नराधिपम्।

स्पृष्ट्वा कराभ्यां सुप्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत॥५७॥

राजाने कहा-देवदेवेश! मैं पुनः सौ वर्ष से अधिक समयतक इस वेदमाता गायत्रीका जप कर सकूँ, इसके लिये उतनी ही मेरी आयु हो। राजा को देखकर विश्वात्माने 'बहुत अच्छा ऐसा कहा और प्रसन्न होकर हाथोंसे (राजाका) स्पर्शकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥५६-५७॥

सोऽपिलब्धवरः श्रीमान् जजापातिप्रसन्नधीः ।

शान्तस्त्रिषवणस्नायी कन्दमूलफलाशनः॥५८॥

तस्य पूर्णे वर्षशते भगवानुग्रदीधितिः।

प्रादुरासीन्महायोगी भानोर्मण्डलमध्यतः॥५९॥

तं दृष्ट्वा वेदविदुषं मण्डलस्थं सनातनम्।

स्वयम्भुवमनाद्यन्तं ब्रह्माणं विस्मयं गतः॥६०॥

तुष्टाव वैदिकैर्मन्त्रैः सावित्र्या च विशेषतः।

क्षणादपश्यत् पुरुषं तमेव परमेश्वरम्॥ ६१॥

चतुर्मुखं जटामौलिमष्टहस्तं त्रिलोचनम्।

चन्द्रावयवलक्ष्माणं नरनारीतनुं हरम्॥६२॥

भासयन्तं जगत् कृत्स्नं नीलकण्ठं स्वरश्मिभिः ।

रक्ताम्बरधरं रक्तं रक्तमाल्यानुलेपनम्॥६३॥

वर-प्राप्त वह श्रीमान् (राजा) भी तीनों समयों में स्नान करते हुए तथा कन्दमूल एवं फलोंका आहार करते हुए अत्यन्त प्रसन्न-मनसे शान्तिपूर्वक जप करने लगे। उनके (जप करते हुए) सौ वर्ष पूरा होनेपर सूर्यमण्डल के मध्यसे प्रज्वलित किरणोंवाले महायोगी भगवान् प्रकट

हुए। मण्डलमें स्थित उन सनातन, स्वयम्भू, अनादि, अनन्त तथा वेदज्ञ ब्रह्माको देखकर वे राजा आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने वैदिक मन्त्रों तथा विशेषरूपसे गायत्री (मन्त्र)-द्वारा उनकी स्तुति की। क्षणभरमें ही उन्होंने उन परमेश्वर पुरुषको चार मुखवाले, जटा तथा मुकुटधारी,

आठ हाथ तथा तीन नेत्रवाले, चन्द्रकलाओं से चिह्नित अर्धनारीश्वर शरीरवाले, अपनी किरणोंद्वारा सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते हुए, रक्तवस्त्र धारण किये, रक्तवर्णवाले तथा रक्तमाला और रक्त अनुलेपन धारण किये नीलकण्ठ हरके रूपमें देखा ॥५८-६३ ॥

तद्भावभावितो दृष्ट्वा सद्भावेन परेण हि।

ननाम शिरसा रुद्रं सावित्र्यानेन चैव हि ॥१४॥

नमस्ते नीलकण्ठाय भास्वते परमेष्ठिने।

त्रयीमयाय रुद्राय कालरूपाय हेतवे॥६५॥

उन्हें देखकर उन्हींके भावसे भावित होकर परम सद्भावसे राजाने सिरसे रुद्रको प्रणाम किया और सावित्री-मन्त्र तथा इस स्तोत्रसे स्तुति की। वेदत्रयीरूप, रुद्र, कालरूप, कारणस्वरूप भासमान परमेष्ठी नीलकण्ठ को नमस्कार है॥६४-६५॥

तदा प्राह महादेवो राजानं प्रीतमानसः।

इमानि मे रहस्यानि नामानि शृणु चानघ॥६६॥

सर्ववेदेषु गीतानि संसारशमनानि तु।

नमस्कुरुष्व नृपते एभिर्मां सततं शुचिः॥६७॥

अध्यायं शतरुद्रीयं यजुषां सारमुद्धृतम्।

जपस्वानन्यचेतस्को मय्यासक्तमना नृप॥६८॥

ब्रह्मचारी मिताहारो भस्मनिष्ठः समाहितः।

जपेदामरणाद् रुद्रं स याति परमं पदम्॥६९॥

इत्युक्त्वा भगवान् रुद्रो भक्तानुग्रहकाम्यया।

पुनः संवत्सरशतं राज्ञे ह्यायुरकल्पयत्॥७०॥

तब प्रसन्न मनवाले महादेवने राजासे कहा-हे निष्पाप! मेरे इन गोपनीय नामोंको सुनो। ये सभी वेदों में वर्णित हैं तथा संसार (सागर)-का नाश करनेवाले हैं। राजन्! पवित्र होकर इन नामोंसे मुझे निरन्तर नमस्कार करो। राजन्! यजुर्वेदसे साररूपमें उद्धृत शतरुद्रीका अनन्यमन होकर मुझमें मन लगाकर जप करो। जो ब्रह्मचर्य धारणकर, संयमित आहार ग्रहणकर, भस्म का लेपकर एकाग्रतापूर्वक मरणपर्यन्त रुद्रका जप करता है, वह परम पद प्राप्त करता है। ऐसा कहकर भक्त पर अनुग्रह करनेकी इच्छासे भगवान् रुद्रने राजाकी आयु

पुनः सौ वर्षोंतक कर दी॥६६-७०॥

दत्त्वास्मै तत् परं ज्ञानं वैराग्यं परमेश्वरः।

क्षणादन्तर्दधे रुद्रस्तदद्भुतमिवाभवत्।। ७१॥

राजापि तपसा रुद्रं जजापानन्यमानसः।

भस्मच्छन्नस्त्रिषवणं स्नात्वा शान्तः समाहितः॥७२॥

जपतस्तस्य नृपतेः पूर्णे वर्षशते पुनः।

योगप्रवृत्तिरभवत् कालात् कालात्मकं परम्॥७३॥

विवेश तद् वेदसारं स्थानं वै परमेष्ठिनः।

भानोः स मण्डलं शुभ्रं ततो यातो महेश्वरम्॥७४॥

राजा वसुमनाको परम ज्ञान और वैराग्य प्रदानकर परमेश्वर रुद्र क्षणभरमें ही अन्तर्धान हो गये। यह एक आश्चर्य ही हुआ। राजाने भी तीनों कालों में स्नानकर, भस्म धारणकर, शान्त और एकाग्रतापूर्वक अनन्य-मनसे तपस्याद्वारा रुद्रका जप किया। जप करते हुए उन राजाके पुनः सौ वर्ष पूरे हो जाने पर उसमें योगकी प्रवृत्ति हुई और यथासमय उन्होंने श्रेष्ठ कालात्मक परमेष्ठीके उस वेदसार नामक स्थानको प्राप्त किया जो सूर्यका शुभ्र मण्डल है। तदनन्तर वे महेश्वरको प्राप्त हुए॥७१-७४॥

यः पठेच्छृणुयाद् वापि राज्ञश्चरितमुत्तमम्।

सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥७५ ।।

राजाके इस उत्तम चरितको जो पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥७५ ॥