कूर्म महा पुराण
38 अध्याय
तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा
नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन
सूत उवाच
एषा पुण्यतमा देवी देवगन्धर्वसेविता।
नर्मदा लोकविख्याता तीर्थानामुत्तमा नदी॥१॥
तस्याः शृणुध्वं माहात्म्यं मार्कण्डेयेन भाषितम्।
युधिष्ठिराय तु शुभं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२॥
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतास्तु विविधा धर्मास्त्वत्प्रसादान्महामुने।
माहात्म्यं च प्रयागस्य तीर्थानि विविधानि च ॥३॥
नर्मदा सर्वतीर्थानां मुख्या हि भवतेरिता।
तस्यास्त्विदानी माहात्म्यं वक्तुमर्हसि सत्तम ॥ ४॥
मार्कण्डेय उवाच
नर्मदा सरितां श्रेष्ठा रुद्रदेहाद् विनिःसृता।
तारयेत् सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥५॥
नर्मदायास्तु माहात्म्यं पुराणे यन्मया श्रुतम् ।
इदानीं तत् प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः शुभम्॥६॥
पुण्या कनखले गङ्गा कुरुक्षेत्रे सरस्वती।
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥७॥
त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।
सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥८॥
कलिङ्गदेशपश्चार्धे पर्वतेऽमरकण्टके।
पुण्या च त्रिषु लोकेषु रमणीया मनोरमा॥ ९ ॥
सदेवसुरगन्धर्वा ऋषयश्च
तपोधनाः।
तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र सिद्धिं तु परमां गताः॥१०॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् नियमस्थो जितेन्द्रियः।
उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्॥११॥
कलिंग देशके पश्चार्धमें अमरकण्टक पर्वतपर तीनों लोकोंमें पवित्र, रमणीय, मनोरम नर्मदाका उद्गम स्थल है। राजेन्द्र ! वहाँ देवताओंसहित असुरों, गन्धों, ऋषियों तथा तपस्वियोंने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की है। राजन्! मनुष्य वहाँ (नर्मदामें) स्नान करके जितेन्द्रिय तथा नियम-परायण रहते हुए एक रात्रि उपवास करे तो अपने सौ पीढ़ियोंको तार देता है।९-११॥
योजनानां शतं साग्रं श्रूयते सरिदुत्तमा।
विस्तारेण तु राजेन्द्र योजनद्वयमायता॥१२॥
षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथैव च।
पर्वतस्य समन्तात् तु तिष्ठन्त्यमरकण्टके ॥१३॥
ब्रह्मचारी शुचिर्भूत्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।
सर्वहिंसानिवृत्तस्तु सर्वभूतहिते रतः॥१४॥
एवं सर्वसमाचारो यस्तु प्राणान् समुत्सृजेत्।
तस्य पुण्यफलं राजन् शृणुष्वावहितो नृप॥१५॥
राजेन्द्र ! सुना जाता है कि वह श्रेष्ठ नदी सौ योजनसे कुछ अधिक लम्बी तथा दो योजन चौड़े विस्तारमें फैली है। अमरकण्टक पर्वतमें चारों ओर साठ करोड़ साठ हजार तीर्थ स्थित हैं। राजन् ! जो ब्रह्मचर्यपरायण है, पवित्र है, क्रोध तथा इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किया है, सभी प्रकारकी हिंसाओंसे सर्वथा निवृत्त है, सभी प्राणियोंके हितमें परायण है तथा ऐसे ही सभी पवित्र आचारोंसे सम्पन्न है, वह मनुष्य यहाँ प्राणोंका परित्यागकर जिस पुण्य फलको प्राप्त करता है, उसे आप सावधान होकर सुनें- ॥ १२-१५ ॥
शतवर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति पाण्डव।
अप्सरोगणसंकीर्णो दिव्यस्त्रीपरिवारितः॥१६॥
दिव्यगन्धानुलिप्तश्च दिव्यपुष्पोपशोभितः।
क्रीडते देवलोके तु दैवतैः सह मोदते॥१७॥
ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः।
गृहं तु लभतेऽसौ वै नानारत्नसमन्वितम्॥१८॥
स्तम्भैर्मणिमयैर्दिव्यैर्वज्रवैदूर्यभूषितम्
आलेख्यवाहनैः शुभैर्दासीदाससमन्वितम्॥१९॥
राजराजेश्वरः श्रीमान् सर्वस्त्रीजनवल्लभः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रं तत्र भोगसमन्वितः ॥२०॥
पाण्डव! वह पुरुष अप्सराओंके समूहोंसे व्याप्त अर्थात् सेवित तथा चारों ओर दिव्य स्त्रियोंसे आवृत रहकर स्वर्गमें सौ हजार वर्षांतक आनन्द प्राप्त करता है। दिव्य गन्ध (चन्दन)-से अनुलिप्त होकर तथा दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित होकर देवलोकमें क्रीडा करता है और देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है। स्वर्गमें सुख भोगने योग्य पुण्योंके नि:शेष होनेपर वह धार्मिक राजा होता है और नाना प्रकारके रत्नोंसे समन्वित दिव्य मणिमय स्तम्भों, हीरे एवं वैदूर्यमणिसे विभूषित, उत्तम चित्रों तथा वाहनोंसे अलंकृत और दासी-दाससे समन्वित भवन प्राप्त करता है। वह राजराजेश्वर श्रीसम्पन्न, सभी स्त्रियोंका प्रियकर तथा भोगोंसे युक्त होकर वहाँ (पृथ्वीपर) सौ वर्षसे भी अधिक समयतक जीवित रहता है॥१६-२०॥
अग्निप्रवेशेऽथ जले नशने कृते।
अनिवर्तिका गतिस्तस्य पवनस्याम्बरे यथा॥२१॥
(इस तीर्थमें) अग्नि अथवा जलमें प्रवेश करने अथवा अनशन-व्रत करनेसे वैसी ही पुनरागमनरहित गति होती है, जैसी कि आकाशमें पवनकी होती है (इसका आशय यह है कि शास्त्रविहित तपके रूप में अग्निप्रवेश आदि तप इस तीर्थमें अक्षय पुण्य देनेवाले होते हैं)॥२१॥
पश्चिमे पर्वततटे सर्वपापविनाशनः।
हृदो जलेश्वरो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥२२॥
तत्र पिण्डप्रदानेन संध्योपासनकर्मणा।
दशवर्षाणि पितरस्तर्पिताः स्युर्न संशयः ॥२३॥
(अमरकण्टक) पर्वतके पश्चिमी किनारेपर सभी पापोंका नाश करनेवाला और तीनों लोकोंमें विख्यात जलेश्वर नामका एक हृद (तालाब) है। वहाँ पिण्डदान करने तथा संध्योपासन कर्म करनेसे दस (हजार) वर्षतक पितर तृप्त रहते हैं, इसमें संदेह नहीं ॥ २२-२३ ॥
दक्षिणे नर्मदाकूले कपिलाख्या महानदी।
सरलार्जुनसंच्छन्ना नातिदूरे व्यवस्थिता॥ २४॥
सा तु पुण्या महाभागा त्रिषु लोकेषु विश्रुता।
तत्र कोटिशतं साग्रं तीर्थानां तु युधिष्ठिर ॥ २५॥
तस्मिंस्तीर्थे तु ये वृक्षाः पतिताः कालपर्ययात्।
नर्मदातोयसंस्पृष्टास्ते यान्ति परमां गतिम्॥२६॥
द्वितीया तु महाभागा विशल्यकरणी शुभा।
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा विशल्यो भवति क्षणात्॥ २७॥
कपिला च विशल्या च श्रूयते राजसत्तम।
ईश्वरेण पुरा प्रोक्ता लोकानां हितकाम्यया॥२८॥
अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे नराधिप।
सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥२९॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नश्वमेधफलं लभेत्।
ये वसन्त्युत्तरे कूले रुद्रलोके वसन्ति ते॥३०॥
नर्मदाके दक्षिण तटके समीपमें ही कपिला नामवाली महानदी स्थित है, जो साल तथा अर्जुनके वृक्षोंसे घिरी हुई है। वह महाभागा (नदी) पवित्र तथा तीनों लोकों में विख्यात है। युधिष्ठिर! वहाँ सौ करोड़से भी अधिक तीर्थ हैं। कालक्रमसे जो वृक्ष उस तीर्थमें गिरते हैं, वे नर्मदा के जलका स्पर्श प्राप्त हो जानेके कारण परम गति को प्राप्त होते हैं। दूसरी महाभागा शुभ नदी विशल्यकरणी है, उस तीर्थमें स्नानकर मनुष्य तत्क्षण ही शल्यसे (सभी प्रकारके पापरूपी काँटोंसे) रहित हो जाता है। राजश्रेष्ठ ! यह आप्त श्रुति है कि ईश्वरने इन कपिला तथा विशल्या नामकी दोनों नदियोंको प्राणिमात्रके कल्याण करनेका आदेश पहलेसे ही दे रखा है। नराधिपति! उस तीर्थमें जो (शास्त्रीय विधिसे) अनशनव्रत करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर रुद्रलोकमें जाता है। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है और जो लोग उत्तरी तटपर निवास करते हैं, वे रुद्रलोकमें निवास करते हैं ॥ २४-३० ॥
सरस्वत्यां च गङ्गायां नर्मदायां युधिष्ठिर।
समं स्नानं च दानं च यथा मे शंकरोऽब्रवीत्॥३१॥
परित्यजति यः प्राणान् पर्वतेऽमरकण्टके।
वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते॥३२॥
नर्मदायां जलं पुण्यं फेनोर्मिसमलंकृतम्।
पवित्रं शिरसावन्द्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३३॥
नर्मदा सर्वतः पुण्या ब्रह्महत्यापहारिणी।
अहोरात्रोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया॥३४॥
जालेश्वरं तीर्थवरं सर्वपापविनाशनम्।
तत्र गत्वा नियमवान् सर्वकामाँल्लभेन्नरः ॥ ३५॥
चन्द्रसूर्योपरागे तु ह्यमरकण्टकम्।
अश्वमेधाद् दशगुणं पुण्यमाप्नोति मानवः॥३६॥
युधिष्ठिर! शंकरने मुझे जैसा बतलाया था, उसके अनुसार गङ्गा, सरस्वती एवं नर्मदामें किया गया स्नान और दान समान फलदायक होता है। जो अमरकण्टक पर्वतपर प्राणोंका परित्याग करता है, वह सौ करोड़ वर्षों से भी अधिक समयतक रुद्रलोकमें पूजित होता है। फेन और उर्मियों (तरङ्गों)-से अलंकृत नर्मदा के पवित्र जलको पवित्रतापूर्वक सिरसे वन्दित करने पर अर्थात् सिरपर धारण करनेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। नर्मदा सभी प्रकारसे पवित्र और ब्रह्महत्या को दूर करनेवाली है। वहाँ एक अहोरात्र उपवास करने से ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है। जालेश्वर नामका श्रेष्ठ तीर्थ सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। वहाँ जाकर नियमसे रहनेवाला मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। चन्द्र तथा सूर्यग्रहणमें अमरकण्टक की यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञसे दस गुना अधिक पुण्य प्राप्त करता है॥३१-३६॥
एष पुण्यो गिरिवरो देवगन्धर्वसेवितः।
नानाद्रुमलताकीर्णो नानापुष्पोपशोभितः ॥ ३७॥
तत्र संनिहितो राजन् देव्या सह महेश्वरः।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा चेन्द्रो विद्याधरगणैः सह ॥३८॥
प्रदक्षिणं तु यः कुर्यात् पर्वतं ह्यमरकण्टकम्।
पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥३९॥
कावेरी नाम विपुला नदी कल्मषनाशिनी।
तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयेद् वृषभध्वजम्।
संगमे नर्मदायास्तु रुद्रलोके महीयते॥४०॥
यह पुण्यप्रद श्रेष्ठ पर्वत (अमरकण्टक) देवताओं तथा गन्धर्वोद्वारा सेवित, नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे परिपूर्ण एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे सुशोभित है। राजन्! यहाँ देवी (पार्वती)-के साथ महेश्वर और विद्याधरगणोंके साथ ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र भी स्थित रहते हैं। जो मानव अमरकण्टक पर्वतकी परिक्रमा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञका फल प्राप्त करता है। ऐसे ही कावेरी नामकी एक प्रसिद्ध नदी है। यह विशाल है तथा कल्मषोंका नाश करनेवाली है। उसमें स्नानकर तथा नर्मदाके संगममें स्नान करके वृषभध्वज महादेवकी आराधना करनेसे रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥ ३७-४०॥
Summary of chapter 87 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa details the precise procedures for performing renowned ascetic vows such as Prājāpatya Kṛchchhra, Sāntapana, Parāka, and Chāndrāyaṇa Vrata. He describes how regulating food intake according to the waxing and waning moon during Chāndrāyaṇa purifies all subtle channels of the body and burns away accumulated sins of past lifetimes.