38 अध्याय

भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके

वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके

नौ वर्षों में राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य

श्रीकूर्म उवाच

एवमुक्तास्तु मुनयो नैमिषीया महामतिम्।

पप्रच्छरुत्तरं सूतं पृथिव्यादिविनिर्णयम्॥ १ ॥

श्रीकूर्मने कहा-ऐसा कहे जानेपर नैमिषारण्य में निवास करनेवाले मुनियों ने महाबुद्धिमान् सूतजीसे पृथ्वी आदिके सम्बन्धमें निर्णय पूछा- ॥१॥

ऋषय ऊचुः

कथितो भवता सूत सर्गः स्वायम्भुवः शुभः।

इदानीं श्रोतुमिच्छामस्त्रिलोकस्यास्य मण्डलम्॥ २ ॥

यावन्तः सागरा द्वीपास्तथा वर्षाणि पर्वताः।

वनानि सरितः सूर्यग्रहाणां स्थितिरेव च॥ ३ ॥

यदाधारमिदं कृत्स्नं येषां पृथ्वी पुरा त्वियम्।

नृपाणां तत्समासेन सूत वक्तुमिहार्हसि॥ ४ ॥

ऋषियोंने कहा-हे सूतजी! आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी शुभ सृष्टिको बतलाया, अब इस समय हम लोग त्रैलोक्य-मण्डलका वर्णन सुनना चाहते हैं। जितने सागर, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन तथा नदियाँ हैं और सूर्य आदि ग्रहोंकी जो स्थिति है, इन सभीका वर्णन करें। हे सूतजी! यह सब कुछ जिसके आधारपर टिका है और प्राचीन कालमें यह पृथ्वी जिन राजाओंके अधिकारमें रही है, उन सभी विषयोंका संक्षेपमें आप वर्णन करें॥२-४॥

सूत उवाच

वक्ष्ये देवादिदेवाय विष्णवे प्रभविष्णवे।

नमस्कृत्वाप्रमेयाय यदुक्तं तेन धीमता॥ ५ ॥

सूतजीने कहा-देवोंके आदिदेव, अप्रमेय, प्रभविष्णु विष्णुको नमस्कार कर मैं उन धीमान्द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसे बताता हूँ- ॥५॥

स्वायम्भुवस्य तु मनोः प्रागुक्तो यः प्रियव्रतः।

पुत्रस्तस्याभवन् पुत्राः प्रजापतिसमा दश॥ ६ ॥

अग्नीधश्चाग्निबाहुश्च वपुष्मान् द्युतिमांस्तथा।

मेधा मेधातिथिहव्यः सवनः पुत्र एव च ॥ ७ ॥

ज्योतिष्मान् दशमस्तेषां महाबलपराक्रमः।

धार्मिको दाननिरतः सर्वभूतानुकम्पकः॥ ८ ॥

मेधाग्निबाहुपुत्रास्तु त्रयो योगपरायणाः।

जातिस्मरा महाभागा न राज्ये दधिरे मतिम्॥ ९ ॥

प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद् वै सप्तद्वीपेषु सप्त तान्।

जम्बूद्वीपेश्वरं पुत्रमग्नीध्रमकरोन्नृपः॥१०॥

प्लक्षद्वीपेश्वरश्चैव तेन मेधातिथिः कृतः।

शाल्मलेशं वपुष्मन्तं नरेन्द्रमभिषिक्तवान्॥११॥

पूर्वमें स्वायम्भुव मनुके जिस प्रियव्रत नामक पुत्रका वर्णन किया गया है उस (प्रियव्रत)-को प्रजापति के समान दस पुत्र हुए। अग्नीध्र, अग्निबाहु, वपुष्मान्,

द्युतिमान्, मेधा, मेधातिथि, हव्य, सवन और पुत्र तथा महान् बलशाली एवं पराक्रमी, धार्मिक, दानपरायण और सभी प्राणियोंपर दया करनेवाला ज्योतिष्मान् नामक दसवाँ पुत्र था। मेधा, अग्निबाहु तथा पुत्र-ये तीनों योगपरायण थे। पूर्वजन्मोंका स्मरण करनेवाले इन महाभाग्यशालियों (विरक्तों)-का मन राज्यकार्यमें नहीं लगा। (अतः) प्रियव्रतने (अपने अन्य) उन सात पुत्रों को सात द्वीपोंमें अभिषिक्त कर दिया। राजाने अग्नीध्र नामक

पुत्रको जम्बूद्वीपका स्वामी बनाया। उन्होंने मेधातिथिको प्लक्षद्वीपका राजा बनाया और वपुष्मान्को शाल्मलि- द्वीपमें राजाके रूपमें अभिषिक्त किया ॥६-११॥

ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान् प्रभुः।

द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।। १२॥

शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः।

पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं च प्रजापतिः॥१३॥

प्रभु (प्रियव्रत)-ने ज्योतिष्मान्को कुशद्वीपका राजा बनाया और द्युतिमान्को क्रौञ्चद्वीपका राजा बननेका आदेश दिया। प्रजापति प्रियव्रतने हव्यको शाकद्वीपका स्वामी बनाया और सवनको पुष्करद्वीपका अधिपति बनाया ॥१२-१३॥

पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्।

धातकिश्चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ॥१४॥

महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः।

नाम्ना तु धातकेश्चापि धातकीखण्डमुच्यते॥१५॥

शाकद्वीपेश्वरस्याथ हव्यस्याप्यभवन् सुताः।

जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मणीचकः।

कुसुमोत्तरोऽथ मोदाकिः सप्तमः स्यान्महाद्रुमः॥१६॥

पुष्करमें सवनको भी महावीत तथा धातकि नामक दो पुत्र हुए। पुत्रवानोंके पुत्रोंमें ये दोनों ही पुत्र श्रेष्ठ थे। उन महात्मा (महावीत)-के नामसे उस वर्षको महावीतवर्ष कहा गया है और धातकिके भी नामसे धातकिखण्ड कहा जाता है। शाकद्वीपके राजा हव्यको जलद, कुमार, सुकुमार, मणीचक, कुसुमोत्तर तथा मोदाकि एवं सातवाँ महाद्रुम नामक पुत्र हुआ॥१४-१६॥

जलदं जलदस्याथ वर्षं प्रथममुच्यते।

कुमारस्य तु कौमारं तृतीयं सुकुमारकम्॥१७॥

मणीचकं चतुर्थं तु पञ्चमं कुसुमोत्तरम्।

मोदाकं षष्ठमित्युक्तं सप्तमं तु महाद्रुमम्॥१८॥

क्रौञ्चद्वीपेश्वरस्यापि सुता द्युतिमतोऽभवन्।

कुशलः प्रथमस्तेषां द्वितीयस्तु मनोहरः॥१९॥

उष्णस्तृतीयः सम्प्रोक्तश्चतुर्थः प्रवरः स्मृतः।

अन्धकारो मुनिश्चैव दुन्दुभिश्चैव सप्तमः।

तेषां स्वनामभिर्देशाः क्रौञ्चद्वीपाश्रयाः शुभाः॥२०॥

ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे सप्तैवासन् महौजसः।

उद्देदो वेणुमांश्चैवाश्वरथो लम्बनो धृतिः।

षष्ठः प्रभाकरश्चापि सप्तमः कपिलः स्मृतः॥२१॥

(इन सातों पुत्रोंके राज्यक्षेत्र इनके नामसे एक-एक वर्ष कहलाये-इसीलिये) जलदका जलद नामक प्रथम वर्ष कहा जाता है। कुमारका कौमार नामक वर्ष, इसी प्रकार तीसरा सुकुमारक (वर्ष), चौथा मणीचक, पाँचवाँ कुसुमोत्तर, छठा मोदाक और सातवाँ महाद्रुम नामक वर्ष है। क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान्को भी पुत्र हुए। उनमें कुशल पहला, मनोहर दूसरा, उष्ण तीसरा पुत्र कहा गया है और चौथा पुत्र प्रवर नामसे जाना जाता है। इसी प्रकार अन्धकार (पाँचवाँ), मुनि (छठा) तथा दुन्दुभि सातवाँ पुत्र था। उनके (अपने ही) नामसे प्रसिद्ध सुन्दर देश क्रौञ्चद्वीपमें स्थित हैं। कुशद्वीप में ज्योतिष्मान्को महान् ओजस्वी सात पुत्र हुए। उद्भेद, वेणुमान्, अश्वरथ, लम्बन, धृति तथा छठा प्रभाकर और सातवाँ कपिल कहा गया है॥ १७-२१ ।।

स्वनामचिह्नितान् यत्र तथा वर्षाणि सुव्रताः।

ज्ञेयानि सप्त तान्येषु द्वीपेष्वेवं नयो मतः॥२२॥

शाल्मलद्वीपनाथस्य सुताश्चासन् वपुष्मतः।

श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा।

वैद्युतो मानसश्चैव सप्तमः सुप्रभो मतः॥२३॥

प्लक्षद्वीपेश्वरस्यापि सप्त मेधातिथेः सुताः।

ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां शिशिरश्च सुखोदयः।

आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा॥२४॥

हे सुव्रतो! इस (कुशद्वीप)-में उनके नामसे युक्त वर्ष हैं। इसी प्रकार उन अन्य द्वीपोंमें भी स्थिति समझनी चाहिये। शाल्मलद्वीपके स्वामी वपुष्मान्के श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत और मानस तथा सातवें सुप्रभ नामक पुत्र थे। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके भी सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शान्तभय था। इसके अतिरिक्त शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव नामक पुत्र थे॥ २२-२४॥

प्लक्षद्वीपादिषु ज्ञेयः शाकद्वीपान्तिकेषु वै।

वर्णाश्रमविभागेन स्वधर्मो मुक्तये द्विजाः ॥२५॥

जम्बूद्वीपेश्वरस्यापि पुत्रास्त्वासन् महाबलाः।

अग्नीधस्य द्विजश्रेष्ठास्तन्नामानि निबोधत ॥२६॥

नाभिः किंपुरुषश्चैव तथा हरिरिलावृतः।

रम्यो हिरण्वांश्च कुरुर्भद्राश्वः केतुमालकः॥२७॥

द्विजो! प्लक्षद्वीप आदिसे लेकर शाकद्वीपतक वर्ण और आश्रमके भेदसे स्वधर्म (पालन)-को मुक्ति का साधन समझना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! जम्बूद्वीपके अधिपति अग्नीध्रके भी महान् बलशाली पुत्र थे, उनके नाम सुनो- नाभि, किंपुरुष, हरि, इलावृत, रम्य, हिरण्वान्, कुरु, भद्राश्व तथा केतुमालक नामक नौ पुत्र थे॥ २५-२७॥

जम्बूद्वीपेश्वरो राजा स चाग्नीधो महामतिः।

विभज्य नवधा तेभ्यो यथान्यायं ददौ पुनः॥२८॥

जम्बूद्वीपेश्वर महामति उन राजा अग्नीध्रने (जम्बूद्वीपको) नौ भागोंमें बाँटकर न्यायानुसार उन (पुत्रों)-को दे दिया ॥ २८॥

नाभेस्तु दक्षिणं वर्ष हिमाद्वं प्रददौ पुनः।

हेमकूटं ततो वर्षं ददौ किंपुरुषाय तु॥२९॥

तृतीयं नैषधं वर्ष हरये दत्तवान् पिता।

इलावृताय प्रददौ मेरुमध्यमिलावृतम्॥३०॥

नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता।

श्वेतं यदुत्तरं वर्षं पित्रा दत्तं हिरण्वते ॥ ३१ ।।

यदुत्तरं शृङ्गवतो वर्षं तत् कुरुवे ददौ।

मेरोः पूर्वेण यद् वर्ष भद्राश्वाय न्यवेदयत्।

गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ ३२॥

(अग्नीध्रने) नाभिको दक्षिण दिशामें स्थित हिम नामक वर्ष प्रदान किया। तदनन्तर किंपुरुषको हेमकूट नामक वर्ष दिया। पिता (अग्नीध्र)-ने हरिको तृतीय नैषध नामक वर्ष प्रदान किया और इलावृतको मेरु के मध्यमें स्थित इलावृत (नामक वर्ष) दिया। पिताने रम्य को नीलाचलयुक्त वर्ष प्रदान किया और जो उत्तरमें स्थित श्वेतवर्ष है, उसे हिरण्वान्को दिया। शृंगवान् पर्वतके उत्तर में स्थित (उत्तरकुरु नामक) वर्ष कुरुको दिया और मेरुके पूर्व में स्थित (भद्राश्व नामक) वर्ष भद्राश्वको दिया तथा गन्धमादन नामक वर्ष केतुमालको प्रदान किया ॥ २९-३२॥

वर्षेष्वेतेषु तान् पुत्रानभिषिच्य नराधिपः।

संसारकष्टतां ज्ञात्वा तपस्तेपे वनं गतः ॥३३॥

हिमाह्वयं तु यस्यैतन्नाभेरासीन्महात्मनः ।

तस्यर्षभोऽभवत् पुत्रो मरुदेव्यां महाद्युतिः ॥ ३४॥

ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताग्रजः।

सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं भरतं पृथिवीपतिः ।

वानप्रस्थाश्रमं गत्वा तपस्तेपे यथाविधि ॥३५॥

तपसा कर्षितोऽत्यर्थं कृशो धमनिसंततः।

ज्ञानयोगरतो भूत्वा महापाशुपतोऽभवत्॥ ३६॥

इन वर्षों में अपने पुत्रोंको अभिषिक्त कर राजा (अग्नीध्र) संसारके कष्टको जानकर तपस्या करनेके लिये वन में चले गये। जिन महात्मा नाभिके पास हिम नामक वर्ष था, उन्हें मरुदेवीसे महान् द्युतिमान् ऋषभ नामक पुत्र हुआ। ऋषभको सौ पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ भरत नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। भरत नामक पुत्रको पृथ्वीके अधिपति के रूप में अभिषिक्त कर राजा ऋषभ वानप्रस्थाश्रमका आश्रय लेकर यथाविधि तप करने लगे। तपस्यासे अत्यन्त क्षीण होनेके कारण वे इतने कृश हो गये कि उनके शरीर की नाड़ियाँ दीखती थीं। (तपःपूत वे) ज्ञानयोगपरायण होकर महापाशुपत* हो गये॥ ३३-३६॥

सुमतिर्भरतस्याभूत् पुत्रः परमधार्मिकः ।

सुमतेस्तैजसस्तस्मादिन्द्रद्युम्नो व्यजायत॥ ३७॥

परमेष्ठी सुतस्तस्मात् प्रतीहारस्तदन्वयः।

प्रतिहर्तेति विख्यात उत्पन्नस्तस्य चात्मजः॥३८॥

भवस्तस्मादथोद्गीथः प्रस्तावस्तत्सुतोऽभवत्।

पृथुस्ततस्ततो रक्तो रक्तस्यापि गयः सुतः॥३९॥

नरो गयस्य तनयस्तस्य पुत्रो विराडभूत्।

तस्य पुत्रो महावीर्यो धीमांस्तस्मादजायत॥४०॥

(उन) भरतको भी सुमति नामक परम धार्मिक पुत्र हुआ। सुमतिका पुत्र तैजस और उस (तैजस)-से इन्द्रद्युम्न उत्पन्न हुआ। उस इन्द्रद्युम्नका पुत्र परमेष्ठी हुआ और उस (परमेष्ठी)-का पुत्र प्रतीहार हुआ। उस प्रतीहारका जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह प्रतिहर्ताके नामसे विख्यात हुआ। उससे भव, भवसे उद्गीथ तथा उस (उद्गीथ)-से प्रस्ताव नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस (प्रस्ताव)-से पृथु एवं पृथु से रक्त उत्पन्न हुआ और रक्तको भी गय नामक पुत्र हुआ। गयका पुत्र नर और उसका पुत्र विराट् हुआ। उस (विराट्)- -का पुत्र महावीर्य और उससे धीमान् (नामक पुत्र) उत्पन्न हुआ॥ ३७-४० ॥

महान्तोऽपि ततश्चाभूद् भौवनस्तत्सुतोऽभवत्।

त्वष्टा त्वष्टुश्च विरजो रजस्तस्याप्यभूत् सुतः ।। ४१॥

उस (धीमान्)-से महान्त नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र भौवन हुआ। उस (भौवन)-का त्वष्टा हुआ। उस (त्वष्टा)-से विरज तथा विरजसे रज नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥४१॥

शतजिद् रजसस्तस्य जज्ञे पुत्रशतं द्विजाः ।

तेषां प्रधानो बलवान् विश्वज्योतिरिति स्मृतः॥४२॥

आराध्य देवं ब्रह्माणं क्षेमकं नाम पार्थिवम्।

असूत पुत्रं धर्मज्ञं महाबाहुमरिंदमम्॥४३॥

द्विजो! उस रजस्को शतजित् नामक पुत्र हुआ और उसके सौ पुत्र हुए। उनमें जो प्रधान और बलवान् था, वह विश्वज्योति नामसे प्रसिद्ध हुआ। देव ब्रह्माकी

आराधना कर (विश्वज्योतिने) क्षेमक नामके महाबाहु और शत्रुमर्दन तथा धर्मज्ञ राजाको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ४२-४३॥

एते पुरस्ताद् राजानो महासत्त्वा महौजसः।

एषां वंशप्रसूतैश्च भुक्तेयं पृथिवी पुरा॥४४॥

पूर्वकालमें ये महासत्त्वसम्पन्न और महान् ओजस्वी राजा थे। इनके वंशमें उत्पन्न लोगोंने प्राचीन कालमें इस पृथ्वीका उपभोग किया॥ ४४ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें अड़तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३८॥

उनतालीसवाँ अध्याय

'भू' आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका

परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी

अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा

सूत उवाच

अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः।

त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु॥१॥

भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महस्ततः।

जनस्तपश्च सत्यं च लोकास्त्वण्डोद्भवा मताः॥२॥

सूतजीने कहा-हे द्विजोत्तमो! अब मैं आप लोगोंसे संक्षेपमें इस त्रैलोक्यके परिमाणका वर्णन करूँगा, क्योंकि इसका विस्तारसे वर्णन नहीं किया जा सकता। (सृष्टिके आदिमें) भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक-ये (सातों) लोक अण्डसे उत्पन्न बताये गये हैं ॥१-२॥

सूर्याचन्द्रमसोर्यावत् किरणैरवभासते।

तावद् भूर्लोक आख्यातः पुराणे द्विजपुंगवाः॥३॥

यावत्प्रमाणो भूलॊको विस्तरात् परिमण्डलात्।

भुवर्लोकोऽपि तावान् स्यान्मण्डला भास्करस्य तु॥४॥

ऊर्ध्वयन्मण्डलाद्व्योम ध्रुवो यावद्व्यवस्थितः।

स्वर्लोकः स समाख्यातस्तत्र वायोस्तु नेमयः॥५॥

आवहः प्रवहश्चैव तथैवानुवहः परः।

संवहो विवहश्चाथ तदूर्ध्वं स्यात् परावहः॥६॥

तथा परिवहश्चोर्ध्वं वायोः सप्त नेमयः।

भूमेर्योजनलक्षे तु भानोर्वै मण्डलं स्थितम्॥७॥

द्विजश्रेष्ठो! सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे जहाँतक का भाग प्रकाशित होता है, उतने भागको पुराणमें भूलोक कहा गया है। सूर्यके परिमण्डलसे भूलोकका जितना परिमाण है, उतना ही विस्तार भुवर्लोकका भी सूर्य के मण्डलसे है। आकाशमें ऊपरकी ओर जहाँ ध्रुव (तारा) स्थित है, वहाँतकके मण्डलको स्वर्लोक कहा जाता है। वहाँ वायुकी नेमियाँ हैं। आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह तथा उसके ऊपर परावह और उसके ऊपर परिवह नामक वायुकी सात नेमियाँ हैं। भूमिसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यका मण्डल स्थित है॥३-७॥

लक्षे दिवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्मृतम्।

नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं तल्लक्षण प्रकाशते॥ ८ ॥

सूर्यसे भी एक लाख (योजन) ऊपरके भागमें चन्द्रमा का मण्डल कहा गया है। उससे एक लाख योजनपर स्थित सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल प्रकाशित होता है ॥८॥

द्वे लक्षे ह्युत्तरे विप्रा बुधो नक्षत्रमण्डलात्।

तावत्प्रमाणभागे तु बुधस्याप्युशना स्थितः॥ ९ ॥

अङ्गारकोऽपि शुक्रस्य तत्प्रमाणो व्यवस्थितः।

लक्षद्वयेन भौमस्य स्थितो देवपुरोहितः॥१०॥

सौरिद्धिलक्षेण गुरोर्ग्रहाणामथ मण्डलम्।

सप्तर्षिमण्डलं तस्माल्लक्षमात्रे प्रकाशते॥११॥

ऋषीणां मण्डलादूर्ध्वं लक्षमात्रे स्थितो ध्रुवः।

मेढीभूतः समस्तस्य ज्योतिश्चक्रस्य वै ध्रुवः।

तत्र धर्मः स भगवान् विष्णुर्नारायणः स्थितः॥१२॥

हे विप्रो! नक्षत्रमण्डलसे उत्तर दो लाख योजनकी दूरीपर बुध है। बुधसे उतने प्रमाणकी दूरीपर शुक्र स्थित है। शुक्रसे उतने ही प्रमाणपर मंगलकी स्थिति है।

मंगलसे दो लाख योजनकी दूरीपर देवताओंके पुरोहित बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन दूर सूर्यपुत्र शनैश्चर स्थित है। यह ग्रहोंका मण्डल है। ग्रहों के उस मण्डलसे लाख योजनकी दूरीपर सप्तर्षि- मण्डल प्रकाशित होता है। ऋषियोंके मण्डल (सप्तर्षि-मण्डल)-से एक लाख योजन ऊपर ध्रुव स्थित है। ध्रुव सम्पूर्ण ज्योतिश्चक्रका केन्द्र-रूप है। वहाँ धर्मरूप नारायण भगवान् विष्णु स्थित हैं ॥९-१२॥

नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।

त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥१३॥

द्विगुणस्तस्य विस्ताराद् विस्तारः शशिनः स्मृतः।

तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाऽधस्तात् प्रसर्पति॥१४॥

उद्धृत्य पृथिवीच्छायां निर्मितो मण्डलाकृतिः।

स्वर्भानोस्तु बृहत् स्थानं तृतीयं यत् तमोमयम्॥१५॥

चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।

भार्गवात् पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥१६॥

बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरावुभौ स्मृतौ।

विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः ॥१७॥

तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।

बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलात् तथा॥१८॥

सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया है। उसका तीन गुना सूर्यमण्डलका विस्तार है। सूर्यके विस्तार का दो गुना चन्द्रमाका विस्तार कहा गया है। उन दोनों के तुल्य राहु उन दोनोंके नीचे भ्रमण करता है। पृथ्वी की छाया को लेकर मण्डलाकारनिर्मित राहुका जो तीसरा बृहत् स्थान है, वह तमोमय है। चन्द्रमाका सोलहवाँ भाग शुक्रका है। शुक्रसे चतुर्थांश कम बृहस्पति (-का विस्तार) जानना चाहिये। बृहस्पतिसे चतुर्थांश कम मंगल एवं शनि-इन दोनोंका मण्डल कहा गया है। इन दोनों के मण्डल तथा विस्तारसे चतुर्थांश कम बुध का मण्डल है। तारा और नक्षत्ररूपी* जो शरीरधारी हैं, वे सभी मण्डल एवं विस्तारसे बुधके तुल्य हैं॥१३-१८॥

तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परात्।

शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥१९॥

सर्वावरनिकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।

योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥२०॥

उपरिष्टात् त्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।

सौरोऽङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः ॥२१॥

तेभ्योऽधस्ताच्च चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।

सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥२२॥

जो तारा एवं नक्षत्र-रूप हैं, वे एक-दूसरेसे पाँच, चार, तीन या दो सौ योजन कम विस्तारवाले हैं। सभी छोटे-बड़े ताराओंका मण्डल (ग्रह-पिण्डोंसे छोटे और

एक) योजन या आधे योजन परिमाणवाले हैं, उनसे छोटा कोई विद्यमान नहीं है। उनसे ऊपर दूरगामी जो शनि, बृहस्पति तथा मंगल हैं, उन्हें मन्दगतिसे विचरण करनेवाला समझना चाहिये। उनसे नीचे जो दूसरे सूर्य, चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र-चार महाग्रह हैं, ये शीघ्र गतिवाले हैं॥१९-२२॥

दक्षिणायनमार्गस्थो यदा चरति रश्मिमान्।

तदा सर्वग्रहाणां स सूर्योऽधस्तात् प्रसर्पति॥२३॥

विस्तीर्ण मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।

नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति ॥२४॥

जब सूर्य दक्षिणायनके मार्गमें विचरण करता है, तब वह (सूर्य) सभी ग्रहोंके निम्न भागोंमें भ्रमण करता है। उसके ऊपर विस्तृत मण्डल बनाकर चन्द्रमा विचरण करता है। सम्पूर्ण नक्षत्र-मण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है ।। २३-२४॥

नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।

वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥२५॥

तस्माच्छनैश्चरोऽप्यूर्वं तस्मात् सप्तर्षिमण्डलम्।

ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवश्चोर्ध्वं व्यवस्थितः॥२६॥

नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल और मंगलसे ऊपर बृहस्पति है। उस बृहस्पति से भी ऊपर शनैश्चर, उससे ऊपर सप्तर्षि-मण्डल तथा सप्तर्षि-मण्डलके ऊपर ध्रुव स्थित है ॥ २५-२६ ॥

योजनानां सहस्राणि भास्करस्य रथो नव।

ईषादण्डस्तथैव स्याद् द्विगुणो द्विजसत्तमाः॥२७॥

सार्धकोटिस्तथा सप्त नियुतान्यधिकानि तु।

योजनानां तु तस्याक्षस्तत्र चक्रं प्रतिष्ठितम् ॥२८॥

त्रिनाभिमति पञ्चारे षण्णेमिन्यक्षयात्मके।

संवत्सरमये कृत्स्नं कालचक्रं प्रतिष्ठितम्॥२९॥

चत्वारिंशत् सहस्राणि द्वितीयोऽक्षो विवस्वतः।

पञ्चान्यानि तु सार्धानि स्यन्दनस्य द्विजोत्तमाः॥३०॥

हे श्रेष्ठ द्विजो! भास्करका रथ नौ हजार योजन का है। उसका ईषादण्ड उसी प्रकार दो गुना (अर्थात् अठारह हजार योजनका) है। उसका धुरा डेढ़ करोड़ सत्तर लाख योजनका है और उसीमें चक्र (रथ का पहिया) प्रतिष्ठित है। तीन नाभि, पाँच अरे और छः नेमियोंवाले संवत्सरमय उस अक्षय चक्रमें यह सम्पूर्ण कालचक्र प्रतिष्ठित है। द्विजोत्तमो! सूर्यके रथका दूसरा अक्ष (चक्र या धुरा) चालीस तथा साढ़े पाँच हजार योजनका है॥ २७-३०॥

अक्षप्रमाणमुभयोः प्रमाणं तद् युगार्धयोः।

ह्रस्वोऽक्षस्तधुगार्धेन धुवाधारे रथस्य तु॥३१॥

द्वितीयेऽक्षे तु तच्चक्रं संस्थितं मानसाचले।

हयाश्च सप्त छन्दांसि तन्नामानि निबोधत॥३२॥

दोनों ओरके युगार्ध (जूआ)-का प्रमाण उस अक्ष (धुरे)-के परिमाणके बराबर है। धुरेके आधार में स्थित ह्रस्व अक्ष उस युगार्ध (जूआ)-के बराबर है। द्वितीय अक्षमें स्थित उस (रथ)- -का चक्र मानसाचलपर स्थित है। सात छन्द (उस रथके) अश्व हैं। उनके नाम सुनो-॥३१-३२॥

गायत्री च बृहत्युष्णिक जगती षक्तिरेव च।

अनुष्टुप् त्रिष्टुबित्युक्ताश्छन्दांसि हरयो हरेः॥३३॥

मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां दिशि महापुरी।

दक्षिणेन यमस्याथ वरुणस्य तु पश्चिमे॥३४॥

उत्तरेण तु सोमस्य तन्नामानि निबोधत।

अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात्॥ ३५॥

काष्ठां गतो दक्षिणतः क्षितेषुरिव सर्पति।

ज्योतिषां चक्रमादाय देवदेवः प्रजापतिः॥३६॥

गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, पंक्ति, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप्-ये (सात) छन्द सूर्यके (सात) अश्व कहे गये हैं। मानसाचलपर पूर्व दिशामें महेन्द्रकी महापुरी है। दक्षिणमें यमकी, पश्चिममें वरुणकी, उत्तरमें सोम की नगरी है, उनके (भी)नाम सुनो-अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा-ये क्रमसे इन्द्रादिकी महापुरियाँ हैं। दक्षिण दिशामें स्थित देवोंके भी देव प्रजापति (सूर्य) ज्योतिश्चक्रको ग्रहणकर प्रक्षिप्त बाणके समान भ्रमण करते हैं॥३३-३६॥

दिवसस्य रविर्मध्ये सर्वकालं व्यवस्थितः।

सप्तद्वीपेषु विप्रेन्द्रा निशामध्यस्य सम्मुखम्॥ ३७॥

उदयास्तमने चैव सर्वकालं तु सम्मुखे।

अशेषासु दिशास्वेव तथैव विदिशासु च॥३८॥

कुलालचक्रपर्यन्तो भ्रमन्नेष यथेश्वरः ।

करोत्यहस्तथा रात्रिं विमुञ्चन् मेदिनीं द्विजाः ॥३९॥

दिवाकरकरैरेतत् पूरितं भुवनत्रयम्।

त्रैलोक्यं कथितं सद्भिर्लोकानां मुनिपुंगवाः॥४०॥

विप्रेन्द्रो! सात द्वीपोंमें दिनके मध्य एवं रात्रि के अर्धभागमें सूर्य सदा सम्मुख रहता है, उदय और अस्तके समय भी सदा सम्मुख रहता है। ये ईश्वर (सूर्य) कुम्हारके चक्रके समान सभी दिशाओं तथा विदिशाओंमें भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! पृथ्वीका त्याग करते हुए ये दिन और रात्रिका निर्माण करते हैं। ये तीनों भुवन सूर्यको किरणोंसे व्याप्त हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! विद्वानोंने (समस्त) लोकोंको त्रैलोक्यके नामसे कहा है॥३७-४०॥

आदित्यमूलमखिलं त्रिलोकं नात्र संशयः।

भवत्यस्मात् जगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥४१॥

रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राणां दिवौकसाम्।

द्युतिर्युतिमतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्॥४२॥

सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः।

सूर्य एव त्रिलोकस्य मूलं परमदैवतम्॥४३॥

द्वादशान्ये तथादित्या देवास्ते येऽधिकारिणः।

निर्वहन्ति पदं तस्य तदंशा विष्णुमूर्तयः॥४४॥

सम्पूर्ण त्रिलोकीके मूल सूर्य ही हैं, इसमें संशय नहीं। देवता, असुर तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण जगत् इन्हींसे उत्पन्न होता है। रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा एवं श्रेष्ठ विप्रों तथा समस्त देवताओंका जो तेज है, द्युतिमानोंका जो प्रकाश है और समस्त लोकोंका जो सम्पूर्ण तेज है, (वह सूर्यका ही तेज है)। सूर्य ही सभी लोकोंके स्वामी, सर्वात्मा, प्रजापति, महान् देव, तीनों लोकोंके मूल और परम देवता हैं। इसी प्रकार अधिकारी-रूपमें जो अन्य बारह आदित्य देवता हैं, वे उन्हीं सूर्यके अंश हैं और विष्णुके मूर्तिरूप हैं। वे उन्हींके पद (कार्य)-को सम्पन्न करते हैं ॥ ४१-४४॥

सर्वे नमस्यन्ति सहस्रभानुं

गन्धर्वदेवोरगकिन्नराद्याः

यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्द्विजेन्द्रा-

श्छन्दोमयं ब्रह्ममयं पुराणम्॥४५॥

गन्धर्व, देवता, नाग तथा किन्नर आदि सभी हजारों किरणोंवाले सूर्यको नमस्कार करते हैं। श्रेष्ठ द्विज विविध यज्ञोंके द्वारा छन्दोमय एवं ब्रह्मस्वरूप पुरातन सूर्यदेवका यजन करते हैं ॥ ४५ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥३९॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें उनतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३९ ॥