कूर्म महा पुराण
17 अध्याय
बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि
कन्याओंकी संतानोंका वर्णन
सूत उवाच
बलेः पुत्रशतं त्वासीन्महाबलपराक्रमम्।
तेषां प्रधानो द्युतिमान् बाणो नाम महाबलः॥ १॥
सोऽतीव शंकरे भक्तो राजा राज्यमपालयत्।
त्रैलोक्यं वशमानीय बाधयामास वासवम्॥ २ ॥
ततः शक्रादयो देवा गत्वोचुः कृत्तिवाससम्।
त्वदीयो बाधते ह्यस्मान् बाणो नाम महासुरः॥ ३ ॥
सूतजी बोले-बलिके महान् बल और पराक्रमवाले सौ पुत्र थे, उनमें प्रधान पुत्रका नाम 'बाण' था, जो द्युतिमान् और अत्यन्त बलवान् था। भगवान् शंकरमें अत्यन्त भक्तिवाले उस राजा (बाण)-ने राज्यका पालन करते हुए त्रिलोकीको अपने वशमें करके इन्द्रको पीड़ित किया। तब इन्द्रादि देवता कृत्तिवासा' (शंकर) के पास जाकर कहने लगे-(भगवन्!) आपका भक्त 'बाण' नामक महान् असुर हमें पीड़ित कर रहा है॥१-३॥
व्याहृतो दैवतैः सर्वैर्देवदेवो महेश्वरः।
ददाह बाणस्य पुरं शरेणैकेन लीलया॥ ४ ॥
दह्यमाने पुरे तस्मिन् बाणो रुद्रं त्रिशूलिनम्।
ययौ शरणमीशानं गोपतिं नीललोहितम्॥ ५ ॥
सभी देवताओंके द्वारा ऐसा कहे जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने एक बाणसे लीलापूर्वक 'बाण' के नगरको दग्ध कर दिया। उस नगरके जलनेपर बाण त्रिशूलधारी, गोपति (वृषवाहन) नीललोहित ईशान रुद्रकी शरणमें गया॥४-५॥
मूर्धन्याधाय तल्लिङ्गं शाम्भवं भीतिवर्जितः।
निर्गत्य तु पुरात् तस्मात् तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ६ ॥
संस्तुतो भगवानीशः शंकरो नीललोहितः।
गाणपत्येन बाणं तं योजयामास भावतः॥ ७॥
शम्भुके लिंगको सिरपर धारणकर वह निर्भयतापूर्वक अपने नगरसे बाहर निकल गया और परमेश्वर (शंकर) की स्तुति करने लगा। स्तुति करनेपर नीललोहित, शंकर भगवान् ईशने स्नेहवश उस बाणासुरको गणपतिका पद प्रदान किया॥६-७॥
अथाभवन्दनोः पुत्रास्ताराद्या ह्यतिभीषणाः।
तारस्तथा शम्बरश्च कपिलः शंकरस्तथा।
स्वर्भानुर्वृषपर्वा च प्राधान्येन प्रकीर्तिताः॥ ८॥
सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवद् द्विजाः।
अनेकशिरसां तद्वत् खेचराणां महात्मनाम्॥ ९ ॥
अरिष्टा जनयामास गन्धर्वाणां सहस्रकम्।
अनन्ताद्या महानागाः काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः॥१०॥
दनुके तार आदि अत्यन्त भीषण पुत्र हुए। उनमें तार, शम्बर, कपिल, शंकर, स्वर्भानु तथा वृषपर्वा प्रधान कहे गये हैं। द्विजो! दक्षप्रजापतिकी कन्या सुरसाके अनेक फणोंवाले हजार सर्प पुत्ररूप में हुए। इसी प्रकार अरिष्टाने हजारों आकाशचारी महात्मा गन्धर्वो को उत्पन्न किया। अनन्त आदि महानाग कद्रूके पुत्र कहे गये हैं॥८-१०॥
ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुंगवाः।
शुकीं श्येनी च भासीं च सुग्रीवां गृधिकांशुचिम्॥११॥
गास्तथा जनयामास सुरभिर्महिषीस्तथा।
इरा वृक्षलतावल्लीस्तृणजातीश्च सर्वशः॥१२॥
खसा वै यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा।
रक्षोगणं क्रोधवशा जनयामास सत्तमाः॥१३॥
द्विजश्रेष्ठो! ताम्राने छः कन्याओंको जन्म दिया, जो शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवा, गृध्रिका तथा शुचि नामवाली हैं। सुरभिने गौओं तथा महिषियों (भैंसों) को उत्पन्न किया। इराने सभी प्रकारके वृक्ष, लता, वल्ली तथा तृण-जातिवालोंको जन्म दिया। द्विजसत्तमो! खसाने यक्षों तथा राक्षसोंको, मुनिने अप्सराओंको और क्रोधवशा ने राक्षसों को उत्पन्न किया ॥११-१३॥
विनतायाश्च पुत्रौ द्वौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ।
तयोश्च गरुडो धीमान् तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
प्रसादाच्छूलिनः प्राप्तो वाहनत्वं हरेः स्वयम्॥१४॥
आराध्य तपसा रुद्रं महादेवं तथारुणः।
सारथ्ये कल्पितः पूर्वं प्रीतेनार्कस्य शम्भुना॥१५॥
विनताके दो विख्यात पुत्र हुए-गरुड तथा अरुण। उनमेंसे बुद्धिमान् गरुडने दुस्तर तप करके भगवान् शंकरकी कृपासे साक्षात् हरिके वाहन होनेका सौभाग्य प्राप्त किया। इसी प्रकार पूर्वकालमें अरुणने महादेव रुद्रकी तपस्याद्वारा आराधना की, इससे महादेवने प्रसन्न
होकर उसे सूर्यका सारथी बना दिया ।। १४-१५ ॥
एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजङ्गमाः।
वैवस्वतेऽन्तरे ह्यस्मिञ्छृण्वतां पापनाशनाः॥१६॥
इस वैवस्वत मन्वन्तरमें स्थावर तथा जंगम-रूप ये (महर्षि) कश्यपके वंशज कहे गये हैं। इनका वर्णन सुननेवालोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १६ ॥
सप्तविंशत् सुताः प्रोक्ताः सोमपल्यश्च सुव्रताः।
अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश॥१७॥
बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः।
तद्वदङ्गिरसः पुत्रा ऋषयो ब्रह्मसत्कृताः॥१८॥
कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्दैवप्रहरणाः सुताः।
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि।
मन्वन्तरेषु नियतं तुल्यैः कार्यैः स्वनामभिः॥१९॥
शोभन व्रतवाले द्विजो! (दक्षकी) सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाकी पत्नियाँ कही गयी हैं। अरिष्टनेमिकी पत्नियों की सोलह संतानें हुईं। विद्वान् बहुपुत्रके चार विद्युत् नाम वाले पुत्र कहे गये हैं। इसी प्रकार अङ्गिराके पुत्र ब्रह्मा द्वारा सम्मान प्राप्त श्रेष्ठ ऋषि थे। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण अर्थात् देवोंके शस्त्र थे। हजार युगोंका अन्त होनेपर विभिन्न मन्वन्तरोंमें ये अपने नामोंके समान कार्यों के साथ निश्चितरूपसे पुन: उत्पन्न होते हैं ।।१७-१९॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षद्साहसयां संहितायां पूर्वविभागे सप्तदशोऽध्यायः॥१७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥१७॥
Summary of chapter 17 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
This chapter delves into the specific lineage of Diti and the birth of the Maruts. Following the death of Her sons Hiranyāksha and Hiranyakashipu, Diti performed arduous Tapas to obtain a son capable of defeating Indra. Observing Her strict vows, Indra waited for a lapse in Her ritual purity, and when Diti inadvertently slept with Her feet facing North, Indra entered Her womb with his thunderbolt and severed the fetus into seven parts. As the unborn children wept, Indra further severed each part into seven, yielding forty-nine divine children. Moved by Diti's intense grief and the children's cries, Indra spared them and named them the Maruts. By the divine will of Nārāyaṇa and Mahādeva, the Maruts were elevated to heavenly status as storm deities and companions of Indra.