47 अध्याय

प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें

स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति

शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन

सूत उवाच

जम्बूद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।

संवेष्टयित्वा क्षारोदं प्लक्षद्वीपो व्यवस्थितः॥ १ ॥

प्लक्षद्वीपे च विप्रेन्द्राः सप्तासन् कुलपर्वताः।

ऋज्वायताः सुपर्वाणः सिद्धसङ्घनिषेविताः ॥ २ ॥

गोमेदः प्रथमस्तेषां द्वितीयश्चन्द्र उच्यते।

नारदो दुन्दुभिश्चैव सोमश्च ऋषभस्तथा।

वैभ्राजः सप्तमः प्रोक्तो ब्रह्मणोऽत्यन्तवल्लभः॥ ३ ॥

तत्र देवर्षिगन्धर्वैः सिद्धैश्च भगवानजः।

उपास्यते स विश्वात्मा साक्षी सर्वस्य विश्वसृक्॥ ४ ॥

सूतजी बोले-जम्बूद्वीपके विस्तारसे दुगुने विस्तार में चारों ओरसे क्षार सागरको आवृतकर प्लक्षद्वीप स्थित है। श्रेष्ठ विप्रो! प्लक्षद्वीपमें सीधे विस्तारवाले, सुन्दर पर्वोवाले तथा सिद्धोंके समूहोंसे सेवित सात कुल पर्वत हैं। उनमें गोमेद पहला है, दूसरा चन्द्र पर्वत कहलाता है। इसी प्रकार नारद, दुन्दुभि, सोम, ऋषभ तथा सातवाँ वैभ्राज नामक पर्वत कहा गया है, जो ब्रह्माको अत्यन्त प्रिय है। वहाँ देवर्षियों, गन्धर्वो तथा सिद्धोंके द्वारा सबके साक्षी, विश्वकी सृष्टि करनेवाले विश्वात्मा भगवान् अज (ब्रह्मा)-की उपासना की जाती है॥१-४॥

तेषु पुण्या जनपदा नाधयो व्याधयो न च।

न तत्र पापकर्तारः पुरुषा वा कथञ्चन॥ ५ ॥

तेषां नद्यश्च सप्तैव वर्षाणां तु समुद्रगाः।

तासु ब्रह्मर्षयो नित्यं पितामहमुपासते॥ ६ ॥

अनुतप्ता शिखी चैव विपापा त्रिदिवा कृता।

अमृता सुकृता चैव नामतः परिकीर्तिताः॥ ७॥

उन (पर्वतों)-में पवित्र जनपद हैं। वहाँ न कोई आधि है, न कोई व्याधि। वहाँ रहनेवाले पुरुष किसी भी प्रकारका पाप नहीं करते हैं। समुद्रकी ओर जानेवाली उन वर्षपर्वतोंकी सात नदियाँ हैं, उनमें ब्रह्मर्षि नित्य पितामहकी उपासना करते हैं। (वे नदियाँ) अनुतप्ता, शिखी, विपापा, त्रिदिवा, कृता, अमृता और सुकृता नामवाली कही गयी हैं॥५-७॥

क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याता: सरांसि सुबहून्यपि।

न चैतेषु युगावस्था पुरुषा वै चिरायुषः॥ ८॥

आर्यकाः कुरवाश्चैव विदशा भाविनस्तथा।

ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रास्तस्मिन् द्वीपे प्रकीर्तिताः॥ ९ ॥

इनके अतिरिक्त असंख्य छोटी-छोटी नदियाँ तथा बहुतसे सरोवर भी वहाँपर हैं। यहाँ (सत्य, त्रेता आदि रूपमें)युगोंकी व्यवस्था नहीं है और सभी पुरुष दीर्घायु होते हैं। इस द्वीपमें आर्यक, कुरव, विदश तथा भावी नामक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र कहे गये हैं॥८-९॥

इज्यते भगवान् सोमो वर्णैस्तत्र निवासिभिः।

तेषां च सोमसायुज्यं सारूप्यं मुनिपुंगवाः॥१०॥

सर्वे धर्मपरा नित्यं नित्यं मुदितमानसाः।

पञ्चवर्षसहस्त्राणि जीवन्ति च निरामयाः॥११॥

प्लक्षद्वीपप्रमाणं तु द्विगुणेन समन्ततः।

संवेष्ट्येक्षुरसाम्भोधिं शाल्मलिः संव्यवस्थितः॥१२॥

सप्त वर्षाणि तत्रापि सप्तैव कुलपर्वताः।

ऋण्वायताः सुपर्वाणः सप्त नद्यश्च सुव्रताः॥१३॥

हे मुनिश्रेष्ठो! यहाँ रहनेवाले विभिन्न वर्णवालों के द्वारा भगवान् सोमकी पूजा की जाती है, उन्हें सोम का सायुज्य और सारूप्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है। वहाँके सभी लोग नित्य धर्मपरायण और नित्य प्रसन्नचित्त रहते हैं तथा रोगरहित होकर पाँच हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। प्लक्षद्वीपके दुगुने प्रमाण में चारों ओर इक्षुरसके समुद्रको आवेष्टितकर शाल्मलि

नामक द्वीप स्थित है। वहाँ भी सात वर्ष और सात ही कुलपर्वत हैं, (वे पर्वत) सीधे फैले हुए और सुन्दर पर्वोवाले हैं। हे सुव्रतो! (वहाँ) सात नदियाँ भी हैं॥१०-१३॥

कुमुदश्चोन्नतश्चैव तृतीयश्च बलाहकः।

द्रोण: कङ्कस्तु महिषः ककुद्वान् सप्त पर्वताः॥१४॥

योनी तोया वितृष्णा च चन्द्रा शुक्ला विमोचिनी।

निवृत्तिश्चेति ता नद्यः स्मृता पापहरा नृणाम्॥१५॥

न तेषु विद्यते लोभः क्रोधो वा द्विजसत्तमाः।

न चैवास्ति युगावस्था जना जीवन्त्यनामयाः॥१६॥

यजन्ति सततं तत्र वर्णा वायुं सनातनम्।

तेषां तस्याथ सायुज्यं सारूप्यं च सलोकता॥१७॥

कुमुद, उन्नत, तीसरा बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष तथा ककुद्वान्-ये सात (कुल) पर्वत हैं। योनी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचिनी तथा निवृत्ति-ये सात नदियाँ मनुष्योंका पाप हरण करनेवाली कही गयी हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! उनमें (यहाँके निवासियोंमें) न लोभ है, न क्रोध है और न (यहाँ) युगकी व्यवस्था ही है। यहाँके सभी लोग रोग रहित होकर जीवित रहते हैं। यहाँ के सभी वर्गों के लोग निरन्तर सनातन वायुदेव का यजन करते हैं, इन्हें उन (वायुदेव)-का सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (नामक मोक्ष) प्राप्त होता है।।१४–१७॥

कपिला ब्राह्मणाः प्रोक्ता राजानश्चारुणास्तथा।

पीता वैश्याः स्मृताः कृष्णा द्वीपेऽस्मिन् वृषला द्विजाः॥१८॥

शाल्मलस्य तु विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।

संवेष्ट्य तु सुरोदाब्धिं कुशद्वीपो व्यवस्थितः॥१९॥

विद्रुमश्चैव हेमश्च द्युतिमान् पुष्पवांस्तथा।

कुशेशयो हरिश्चाथ मन्दरः सप्त पर्वताः॥२०॥

धुतपापा शिवा चैव पवित्रा सम्मता तथा।

विधुदम्भा मही चेति नद्यस्तत्र जलावहाः॥२१॥

हे द्विजो! इस (शाल्मलि) द्वीपमें ब्राह्मण कपिल वर्णके और क्षत्रिय अरुण वर्णके कहे गये हैं। वैश्य पीतवर्णके तथा वृषल (शूद्र) कृष्ण वर्णके बतलाये गये हैं। शाल्मलद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओरसे सुरोदसागर को आवेष्टित कर कुशद्वीप स्थित है। विद्रुम, हेम, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि तथा मन्दर-ये सात (कुल) पर्वत हैं। यहाँ धुतपापा, शिवा, पवित्रा, संमता, विद्युदम्भा और मही (नामक) जलसे पूर्ण नदियाँ हैं ॥१८-२१॥

अन्याश्च शतशो विप्रा नद्यो मणिजलाः शुभाः।

तासु ब्रह्माणमीशानं देवाद्याः पर्युपासते॥२२॥

ब्राह्मणा द्रविणो विप्राः क्षत्रियाः शुष्मिणस्तथा।

वैश्याः स्नेहास्तु मन्देहाः शूद्रास्तत्र प्रकीर्तिताः॥२३॥

सर्वे विज्ञानसम्पन्ना मैत्रादिगुणसंयुताः।

यथोक्तकारिणः सर्वे सर्वे भूतहिते रताः॥२४॥

यजन्ति विविधैर्यज्ञैर्ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।

तेषां च ब्रह्मसायुज्यं सारूप्यं च सलोकता॥२५॥

हे विप्रो! यहाँ मणिके समान स्वच्छ जलवाली अन्य भी सैकड़ों नदियाँ हैं। इनमें देवता आदि ईशान ब्रह्माकी उपासना करते हैं। विप्रो! वहाँके ब्राह्मण द्रविण, क्षत्रिय शुष्मिण, वैश्य स्नेह तथा शूद्र मन्देह कहे गये हैं। यहाँके सभी लोग विशिष्ट ज्ञानसे सम्पन्न, मैत्री आदि

गुणोंसे समन्वित, विहित कर्मो को करनेवाले तथा सभी प्राणियोंके हित-चिन्तनमें लगे रहते हैं। ये विविध यज्ञोंद्वारा परमेष्ठी ब्रह्माका यजन करते हैं और उन्हें ब्रह्माका सायुज्य, सारूप्य तथा सालोक्य (मोक्ष) प्राप्त होता है॥ २२-२५॥

कुशद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः।

क्रौञ्चद्वीपस्ततो विप्रा वेष्टयित्वा घृतोदधिम्॥२६॥

क्रौञ्चो वामनकश्चैव तृतीयश्चान्धकारकः।

देवावृच्च विविन्दश्च पुण्डरीकस्तथैव च।

नाम्ना च सप्तमः प्रोक्तः पर्वतो दुन्दुभिस्वनः॥२७॥

गौरी कुमुद्वती चैव संध्या रात्रिर्मनोजवा।

ख्यातिश्च पुण्डरीका च नद्यः प्राधान्यतः स्मृताः॥२८॥

पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्यास्तस्य क्रमेण वै।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव द्विजोत्तमाः॥२९॥

हे विप्रो! कुशद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर घृतसमुद्र को आवेष्टित करके क्रौञ्चद्वीप स्थित है। क्रौञ्च, वामनक, अन्धकारक, देवावृत्, विविन्द, पुण्डरीक तथा दुन्दुभिस्वन नामक सात पर्वत यहाँ कहे गये हैं। गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीक-ये प्रधान नदियाँ यहाँ कही गयी हैं। हे द्विजोत्तमो! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-ये क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य तथा तिष्य नामसे यहाँ कहे जाते हैं ॥ २६-२९।।

अर्चयन्ति महादेवं यज्ञदानसमाधिभिः।

व्रतोपवासैर्विविधैोमैः स्वाध्यायतर्पणैः॥३०॥

तेषां वै रुद्रसायुज्यं सारूप्यं चातिदुर्लभम्।

सलोकता च सामीप्यं जायते तत्प्रसादतः ।। ३१॥

ये यज्ञ, दान, समाधि, व्रत, उपवास, विविध होम, स्वाध्याय एवं तर्पणद्वारा महादेवकी अर्चना करते हैं। इन्हें महादेवकी कृपासे उनका (रुद्रका) अति दुर्लभ सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य तथा सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त होता है ।। ३०-३१॥

क्रौञ्चद्वीपस्य विस्ताराद् द्विगुणेन समन्ततः ।

शाकद्वीपः स्थितो विप्रा आवेष्ट्य दधिसागरम्॥३२॥

उदयो रैवतश्चैव श्यामाकोऽस्तगिरिस्तथा।

आम्बिकेयस्तथा रम्यः केशरी चेति पर्वताः ॥३३॥

सुकुमारी कुमारी च नलिनी रेणुका तथा।

इक्षुका धेनुका चैव गभस्तिश्चेति निम्नगाः॥३४॥

आसां पिबन्तः सलिलं जीवन्ते तत्र मानवाः।

अनामया ह्यशोकाश्च रागद्वेषविवर्जिताः॥ ३५॥

हे विप्रो ! क्रौञ्चद्वीपके दुगुने विस्तारमें चारों ओर से दधिसमुद्रको आवृतकर शाकद्वीप स्थित है। (यहाँ) उदय, रैवत, श्यामाक, अस्तगिरि, आम्बिकेय, रम्य तथा केशरी-ये पर्वत हैं। यहाँ सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षुका, धेनुका और गभस्ति-ये नदियाँ हैं। इनका जल पीकर यहाँके मनुष्य (सुखमय) जीवन व्यतीत करते हैं। ये रोगरहित, शोकविहीन और राग-द्वेष से मुक्त रहते हैं ॥ ३२-३५॥

मगाश्च मगधाश्चैव मानवा मन्दगास्तथा।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या: शूद्राश्चात्र क्रमेण तु॥३६॥

यजन्ति सततं देवं सर्वलोकैकसाक्षिणम्।

व्रतोपवासैर्विविधैर्देवदेवं दिवाकरम्॥३७॥

तेषां सूर्येण सायुज्यं सामीप्यं च सरूपता।

सलोकता च विप्रेन्द्रा जायते तत्प्रसादतः ॥ ३८॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-ये क्रमशः मग, मगध, मानव तथा मन्दग कहलाते हैं। ये सभी लोकों के एकमात्र साक्षी देवाधिदेव सूर्यदेवका विविध व्रत एवं उपवासोंद्वारा निरन्तर यजन करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! सूर्य के अनुग्रहसे इन्हें उनकी सायुज्यता, सामीप्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है॥३६-३८॥

शाकद्वीपं समावृत्य क्षीरोदः सागरः स्थितः।

श्वेतद्वीपश्च तन्मध्ये नारायणपरायणाः ॥३९॥

तत्र पुण्या जनपदा नानाश्चर्यसमन्विताः।

श्वेतास्तत्र नरा नित्यं जायन्ते विष्णुतत्पराः॥४०॥

शाकद्वीपको आवृत करके क्षीरोद सागर स्थित है, उसके मध्यमें श्वेतद्वीप है। वहाँ नारायण-परायण लोग रहते हैं। वहाँ नाना आश्चर्योंसे समन्वित अनेक पवित्र जनपद हैं। वहाँके मनुष्य श्वेतवर्णके और नित्य विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं। ३९-४० ।।

नाधयो व्याधयस्तत्र जरामृत्युभयं न च।

क्रोधलोभविनिर्मुक्ता मायामात्सर्यवर्जिताः॥४१॥

नित्यपुष्टा निरातङ्का नित्यानन्दाश्च भोगिनः।

नारायणपराः सर्वे नारायणपरायणाः॥४२॥

केचिद् ध्यानपरा नित्यं योगिनः संयतेन्द्रियाः।

केचिजपन्ति तप्यन्ति केचिद् विज्ञानिनोऽपरे॥४३॥

अन्ये निर्बीजयोगेन ब्रह्मभावेन भाविताः।

ध्यायन्ति तत् परं व्योम वासुदेवं परं पदम्॥४४॥

एकान्तिनो निरालम्बा महाभागवताः परे।

पश्यन्ति परमं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तमसः परम्॥४५॥

वहाँ न कोई आधि-व्याधि है, न वृद्धावस्था है तथा न मृत्युका भय ही है। सभी लोग नारायण के भक्त तथा क्रोध-लोभसे रहित, माया एवं मात्सर्य से मुक्त, नित्य पुष्ट, आतङ्करहित, नित्य आनन्दयुक्त, भोग करनेवाले तथा नारायण-परायण रहते हैं। वहाँ के

कुछ निवासी जितेन्द्रिय एवं नित्य ध्यानपरायण योगी हैं, कोई जप करते हैं, कोई तप करते हैं और कुछ लोग विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न हैं। दूसरे निर्बीज योगके द्वारा ब्रह्मभावसे भावित होकर उन परम व्योमरूप, परमपद वासुदेवका ध्यान करते हैं। कुछ दूसरे अनन्यचेता, अन्य आश्रयरहित महाभागवत लोग तम (अज्ञान)-से परे विष्णु नामक परम ब्रह्म का दर्शन करते हैं ॥ ४१-४५ ॥

सर्वे चतुर्भुजाकाराः शङ्खचक्रगदाधराः।

सुपीतवाससः सर्वे श्रीवत्साङ्कितवक्षसः॥ ४६॥

ये सभी चार भुजाओंवाले, शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले, सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले एवं श्रीवत्ससे अङ्कित वक्षःस्थलवाले हैं। ४६ ॥

अन्ये महेश्वरपरास्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः।

स्वयोगोद्भूतकिरणा महागरुडवाहनाः॥४७॥

सर्वशक्तिसमायुक्ता नित्यानन्दाश्च निर्मलाः।

वसन्ति तत्र पुरुषा विष्णोरन्तरचारिणः॥४८॥

अन्य (कुछ) लोग महेश्वरके भक्त हैं। वे मस्तक पर त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं। वे अपने योगसे उत्पन्न रश्मियोंसे लोकको प्रकाशित करते हैं और महागरुड उनके वाहन हैं। सभी शक्तियोंसे सम्पन्न, नित्य आनन्द से पूर्ण, शुद्धान्तःकरण तथा विष्णुके अन्तरमें विचरण करनेवाले पुरुष वहाँ रहते हैं ।। ४७-४८॥

तत्र नारायणस्यान्यद् दुर्गमं दुरतिक्रमम्।

नारायणं नाम पुरं व्यासाद्यैरुपशोभितम्॥४९॥

हेमप्राकारसंयुक्तं स्फाटिकैर्मण्डपैर्युतम् ।

प्रभासहस्रकलिलं दुराधर्षं सुशोभनम् ।

हर्म्यप्राकारसंयुक्तमट्टालकसमाकुलम् ॥५०॥

हेमगोपुरसाहस्रैर्नानारत्नोपशोभितैः

शुभ्रास्तरणसंयुक्तं विचित्रैः समलंकृतम् ॥५१॥

नन्दनैर्विविधाकारैः स्रवन्तीभिश्च शोभितम्।

सरोभिः सर्वतो युक्तं वीणावेणुनिनादितम्॥५२॥

पताकाभिर्विचित्राभिरनेकाभिश्च शोभितम्।

वीथीभिः सर्वतो युक्तं सोपानै रत्नभूषितैः॥५३॥

वहाँ व्यास आदिसे सुशोभित नारायणका दूसरा दुर्गम तथा दुर्लक्य नारायण नामक एक पुर है। वह पुर सोनेके परकोटेसे युक्त, स्फटिकके मण्डपों से समन्वित, हजारों प्रकारकी प्रभाओंसे अलंकृत, अत्यन्त सुन्दर और दुराधर्ष है तथा सोनेके प्रासादोंसे युक्त एवं अनेक बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे व्याप्त है। वह पुर स्वर्णसे बने हजारों विचित्र गोपुरों* और नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है, साथ ही वह स्वच्छ आसनोंसे युक्त एवं विविध प्रकारसे अलंकृत है। वह पुर विविध प्रकारके उद्यानों और नदियोंसे शोभित है। सब ओरसे सरोवरोंसे युक्त और वीणा तथा वेणु की ध्वनिसे निनादित है। विचित्र प्रकारकी अनेक पताकाओं से शोभित है। सब ओरसे वीथियों और रत्नसे विभूषित सीढ़ियों से युक्त है॥ ४९-५३॥

नारीशतसहस्त्रा दिव्यगेयसमन्वितम्।

हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्।

चतुर्दारमनौपम्यमगम्यं देवविद्विषाम्॥५४॥

तत्र तत्राप्सरःसङ्घनृत्यद्भिपशोभितम्।

नानागीतविधानज्ञैर्देवानामपि दुर्लभैः॥५५॥

नानाविलाससम्पन्नः कामुकैरतिकोमलैः।

प्रभूतचन्द्रवदनैर्नूपुरारावसंयुतैः ॥५६॥

ईषत्स्मितैः सुबिम्बोष्टर्बालमुग्धमृगेक्षणैः।

अशेषविभवोपेतैर्भूषितैस्तनुमध्यमैः ॥५७॥

सुराजहंसचलनैः सुवेषैर्मधुरस्वनैः।

संलापालापकुशलैर्दिव्याभरणभूषितैः ॥५८॥

स्तनभारविननैश्च मदघूर्णितलोचनैः।

नानावर्णविचित्राङ्गैर्नानाभोगरतिप्रियैः ॥५९॥

सैकड़ों, हजारों स्त्रियोंसे सम्पन्न तथा दिव्य गान से समन्वित है। हंस एवं सारस पक्षियोंसे व्याप्त है, चक्रवाकोंसे सुशोभित है। उसमें अनुपमेय चार द्वार हैं तथा वह सुरद्वेषी असुरोंके लिये अगम्य है। (वह पुर) विविध प्रकारके गीतोंको जाननेवाले देवताओं के लिये भी दुर्लभ, नाना विलासोंसे सम्पन्न, काम के अभिलाषी, अतिकोमल, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाले, नूपुरकी ध्वनिसे युक्त, मन्द मुसकानवाले, सुन्दर बिम्ब के समान ओठवाले, मुग्ध मृगशावकके समान नेत्रवाले, सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न, अलंकृत, क्षीण कटिभागवाले, राजहंसके समान सुन्दर चालवाले, अच्छे वेषवाले, मधुर स्वरवाले, बोल-चालमें प्रवीण, दिव्य अलङ्कारों से  विभूषित, स्तनके भारसे कुछ झुके हुए, मदके कारण चञ्चल नेत्रोंवाले, अनेक वर्षों के अङ्गरागसे सुशोभित अङ्गोंवाले, नाना प्रकारके भोग और रतिमें अनुराग

रखनेवालों और जहाँ-तहाँ नृत्य करते हुए अप्सरा- समूहोंसे सुशोभित हैं ॥ ५४-५९॥

प्रफुल्लकुसुमोद्यानैरितश्चेतश्च शोभितम्।

असंख्येयगुणं शुद्धमगम्यं त्रिदशैरपि॥६०॥

श्रीमत्पवित्रं देवस्य श्रीपतेरमितौजसः।

तस्य मध्येऽतितेजस्कमुच्चप्राकारतोरणम्॥६१॥

स्थानं तद् वैष्णवं दिव्यं योगिनामपि दुर्लभम्।

तन्मध्ये भगवानेकः पुण्डरीकदलद्युतिः ।

शेतेऽशेषजगत्सूतिः शेषाहिशयने हरिः॥६२॥

प्रफुल्लित फूलोंवाले इधर-उधर विद्यमान सुन्दर उद्यानों से सुशोभित असंख्य गुणोंवाला वह पवित्र पुर देवताओंके लिये भी अगम्य है। अमित तेजस्वी लक्ष्मीपति (विष्णु) देवका वह पुर श्रीसे सम्पन्न और पवित्र है। उसके मध्यमें अत्यन्त तेजसे सम्पन्न, ऊँचे प्राकार तथा तोरणोंसे युक्त और योगियोंके लिये भी दुर्लभ विष्णुका दिव्य स्थान है। उसके मध्यमें कमलदल के समान द्युतिवाले, सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक, भगवान् हरि शेषनागकी शय्यापर शयन करते हैं॥६०-६२ ॥

विचिन्त्यमानो योगीन्द्रैः सनन्दनपुरोगमैः।

स्वात्मानन्दामृतं पीत्वा परं तत् तमसः परम्॥६३॥

सुपीतवसनोऽनन्तो महामायो महाभुजः।

क्षीरोदकन्यया नित्यं गृहीतचरणद्वयः॥६४॥

सा च देवी जगद्वन्द्या पादमूले हरिप्रिया।

समास्ते तन्मना नित्यं पीत्वा नारायणामृतम्॥६५॥

स्वात्मानन्दरूपी अमृतका पान करते हुए सनन्दन आदि योगीन्द्रोंद्वारा तमोगुणसे अतीत श्रेष्ठ उन (श्रीहरि)-का चिन्तन किया जाता है। क्षीरसागरकी कन्या लक्ष्मी सुन्दर पीताम्बर धारण करनेवाले, अनन्त, महामाया के अधिपति तथा महान् भुजाओंवाले विष्णुके दोनों चरण नित्य पकड़े रहती हैं। जगत्की वन्दनीया हरिप्रिया वे देवी नारायणामृतका पानकर उन्हींमें मन लगाकर उनके चरणमूलमें नित्य विराजमान रहती हैं ।। ६३-६५॥

न तत्राधार्मिका यान्ति न च देवान्तराश्रयाः।

वैकुण्ठं नाम तत् स्थानं त्रिदशैरपि वन्दितम्॥६६॥

न मेऽत्र भवति प्रज्ञा कृत्स्नशस्तन्निरूपणे।

एतावच्छक्यते वक्तुं नारायणपुरं हि तत्।। ६७॥

स एव परमं ब्रह्म वासुदेवः सनातनः।

शेते नारायणः श्रीमान् मायया मोहयञ्जगत्॥१८॥

नारायणादिदं जातं तस्मिन्नेव व्यवस्थितम्।

तमेवाभ्येति कल्पान्ते स एव परमा गतिः॥६९॥

वहाँ (श्वेतद्वीपके नारायणपुरमें) न अधार्मिक जा पाते हैं और न दूसरे देवका आश्रय ग्रहण करनेवाले। देवताओंसे भी वन्दित वह स्थान वैकुण्ठ नामसे प्रसिद्ध है। उसका सम्पूर्ण रूपसे वर्णन करनेमें मेरी बुद्धि समर्थ नहीं है। उस नारायणपुरका मैं इतना ही वर्णन कर

सकता हूँ। परम ब्रह्म सनातन वासुदेव श्रीमान् नारायण अपनी मायाद्वारा संसारको मोहित करते हुए वहाँ शयन करते हैं। यह सब कुछ नारायणसे ही उत्पन्न है, उन्हीं में स्थित है और कल्पान्तमें उन्हींको प्राप्त होता है। वे ही परम गति हैं।६६-६९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे पद्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥४७॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें सैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥४७॥