9 अध्याय

शेषशायी नारायणकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति तथा उसी कमलसे ब्रह्माका

प्राकट्य, विष्णु-मायाद्वारा ब्रह्माका मोहित होकर विष्णुसे विवाद

करना, भगवान् शंकरका प्राकट्य, विष्णुद्वारा ब्रह्माको

शिवका माहात्म्य बताना, ब्रह्माद्वारा शिवकी स्तुति

तथा शिव और विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन

सूत उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं नारदाद्या महर्षयः।

प्रणम्य वरदं विष्णुं पप्रच्छुः संशयान्विताः॥१॥

ऋषय ऊचुः

कथितो भवता सर्गो मुख्यादीनां जनार्दन।

इदानीं संशयं चेममस्माकं छेत्तुमर्हसि॥२॥

कथं स भगवानीशः पूर्वजोऽपि पिनाकधृक् ।

पुत्रत्वमगमच्छाभुब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥३॥

कथं च भगवाञ्जज्ञे ब्रह्मा लोकपितामहः।

अण्डजो जगतामीशस्तन्नो वक्तुमिहार्हसि॥४॥

श्रीकूर्म उवाच

शृणुध्वमृषयः सर्वे शंकरस्यामितौजसः।

पुत्रत्वं ब्रह्मणस्तस्य पद्मयोनित्वमेव च॥५॥

अतीतकल्पावसाने तमोभूतं जगत् त्रयम्।

आसीदेकार्णवं सर्वं न देवाद्या न चर्षयः॥६॥

तत्र नारायणो देवो निर्जने निरुपप्लवे।

आश्रित्य शेषशयनं सुष्वाप पुरुषोत्तमः॥ ७ ॥

उस जनशून्य अत्यन्त शान्त (समुद्रमें) पुरुषोत्तम नारायण देव शेष नाग की शय्याका आश्रय लेकर सोये हुए थे॥७॥

सहस्रशीर्षा भूत्वा स सहस्राक्षः सहस्रपात्।

सहस्रबाहुः सर्वज्ञश्चिन्त्यमानो मनीषिभिः॥ ८ ॥

पीतवासा विशालाक्षो नीलजीमूतसन्निभः।

महाविभूतिर्योगात्मा योगिनां हृदयालयः॥ ९ ॥

कदाचित् तस्य सुप्तस्य लीलार्थं दिव्यमद्भुतम्।

त्रैलोक्यसारं विमलं नाभ्यां पङ्कजमुद्बभौ ॥१०॥

शतयोजनविस्तीर्णं तरुणादित्यसंनिभम्।

दिव्यगन्धमयं पुण्यं कर्णिकाकेसरान्वितम्॥११॥

हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण, हजारों बाहुवाले होकर वे विद्वानों के चिन्तनके विषयरूप, सर्वज्ञ, पीतवस्त्रधारी, विशाल नेत्रवाले, नीले बादल के समान वर्णवाले, महाविभूति स्वरूप, योगियों के हृदय में निवास करनेवाले योगात्मा (नारायण) जब किसी समय शेषशय्यापर शयन कर रहे थे, तब उनकी नाभिसे लीला करने के लिये दिव्य अद्भुत, तीनों लोकोंका सार रूप, एक स्वच्छ कमल प्रकट हुआ। (वह कमल) सौ योजन विस्तारवाला, तरुण आदित्यके समान प्रकाशमान, पुण्यमय दिव्य गन्धसे सम्पन्न और कर्णिकाएँ तथा केसरसे समन्वित था॥८-११॥

तस्यैवं सुचिरं कालं वर्तमानस्य शाङ्गिणः।

हिरण्यगर्भो भगवांस्तं देशमुपचक्रमे॥१२॥

सतं करेण विश्वात्मा समुत्थाप्य सनातनम्।

प्रोवाच मधुरं वाक्यं मायया तस्य मोहितः॥१३॥

शाङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले शार्ङ्गधन्वा (नारायण) इसी रूपमें बहुत समयसे निवास कर रहे थे तभी एक समय भगवान् हिरण्यगर्भ उस स्थान पर गये। उनकी मायासे मुग्ध उन विश्वात्माने उन (सुप्त) सनातन (पुरुष)-को हाथसे उठाकर यह मधुर वचन कहा-||१२-१३॥

अस्मिन्नेकार्णवे घोरे निर्जने तमसावृते।

एकाकी को भवाञ्छेते ब्रूहि मे पुरुषर्षभ॥१४॥

हे पुरुषश्रेष्ठ! अन्धकारसे आवृत इस घोर, निर्जन एकार्णव में अकेले सोनेवाले आप कौन हैं? मुझे बतलायें ॥१४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विहस्य गरुडध्वजः।

उवाच देवं ब्रह्माणं मेघगम्भीरनिःस्वनः॥१५॥

उनके इस वचनको सुनकर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले गरुडध्वजने हँसकर ब्रह्मदेवसे कहा-॥१५॥

भो भो नारायणं देवं लोकानां प्रभवाप्ययम्।

महायोगेश्वरं मां त्वं जानीहि पुरुषोत्तमम्॥१६॥

मयि पश्य जगत् कृत्स्नं त्वां च लोकपितामहम्।

सपर्वतमहाद्वीपं समुद्रैः सप्तभिर्वृतम्॥१७॥

एवमाभाष्य विश्वात्मा प्रोवाच पुरुषं हरिः।

जानन्नपि महायोगी को भवानिति वेधसम्॥१८॥

(ब्रह्माजी आप) मुझे ही समस्त लोकोंकी उत्पत्ति एवं संहार करनेवाला महायोगेश्वर एवं पुरुषोत्तम नारायण-देव जानें। पर्वत और महान् द्वीपोंसे युक्त सात समुद्रों से घिरे हुए इस सम्पूर्ण जगत्के साथ ही समस्त लोकों के पितामह (ब्रह्माजी) आप अपनेको भी मुझमें ही देखें। ऐसा कहकर विश्वात्मा महायोगी हरिने (सब कुछ)जानते हुए भी ब्रह्मारूपी पुरुषसे कहा-आप कौन हैं? ॥१६-१८॥

ततः प्रहस्य भगवान् ब्रह्मा वेदनिधिः प्रभुः।

प्रत्युवाचाम्बुजाभाक्षं सस्मितं श्लक्ष्णया गिरा॥१९॥

तदनन्तर वेदनिधि प्रभु भगवान् ब्रह्माने हँसकर कमलकी आभाके समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मुसकानवाले (भगवान् विष्णुको इस प्रकार) मधुर वाणीमें उत्तर दिया- ॥१९॥

अहं धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः ।

मय्येव संस्थितं विश्वं ब्रह्माहं विश्वतोमुखः॥२०॥

मैं ही धाता (धारण करनेवाला), विधाता (विधान बनानेवाला), स्वयम्भू (स्वयं ही उत्पन्न होनेवाला) और प्रपितामह हूँ। मुझमें ही (सम्पूर्ण) विश्व स्थित है। मैं सभी ओर मुखवाला ब्रह्मा हूँ॥ २० ॥

श्रुत्वा वाचं स भगवान् विष्णुः सत्यपराक्रमः।

अनुज्ञाप्याथ योगेन प्रविष्टो ब्रह्मणस्तनुम् ॥२१॥

त्रैलोक्यमेतत् सकलं सदेवासुरमानुषम्।

उदरे तस्य देवस्य दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥ २२॥

तदास्य वक्त्रानिष्क्रम्य पन्नगेन्द्रनिकेतनः।

अजातशत्रुर्भगवान् पितामहमथाब्रवीत्॥२३॥

सत्यपराक्रम वे भगवान् विष्णु (ब्रह्मा)-का वचन सुनकर (उनकी) आज्ञा लेकर योगबलसे ब्रह्मा के शरीरमें प्रविष्ट हुए। उन देव (ब्रह्मा)-के उदरमें देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको देखकर श्रीविष्णुको (अत्यन्त) आश्चर्य हुआ। तदनन्तर नागराज की शय्यापर निवास करनेवाले अजातशत्रु वे भगवान् (विष्णु)उनके (ब्रह्माके) मुखसे बाहर निकलकर पितामह (ब्रह्मा)-से बोले- ॥ २१-२३ ॥

भवानप्येवमेवाद्य शाश्वतं हि ममोदरम्।

प्रविश्य लोकान् पश्यैतान् विचित्रान् पुरुषर्षभ ।। २४॥

पुरुषश्रेष्ठ! आप भी अब इसी प्रकार मेरे उदर में प्रविष्ट होकर सदा इन विचित्र लोकोंको देखें ॥२४॥

ततः प्रह्लादिनी वाणी श्रुत्वा तस्याभिनन्द्य च।

श्रीपतेरुदरं भूयः प्रविवेश कुशध्वजः॥२५॥

तानेव लोकान् गर्भस्थानपश्यत् सत्यविक्रमः ।

पर्यटित्वा तु देवस्य ददृशेऽन्तं न वै हरेः ॥ २६ ॥

तब भगवान् विष्णुकी यह आह्लाद प्रदान करनेवाली वाणी सुनकर और पुनः उनका (श्रीविष्णुका) अभिनन्दन कर कुशध्वज (ब्रह्मा)-ने लक्ष्मीपति (भगवान् विष्णु)के उदर में प्रवेश किया। सत्यविक्रम (ब्रह्मा)-ने उन्हीं लोकों को (भगवान् विष्णुके) उदरमें स्थित देखा (जिन्हें श्री विष्णु ने ब्रह्माके उदरमें देखा था)। देवके (उदरमें) भ्रमण करते हुए उन्हें हरि (विष्णु)-का कोई अन्त न दिखायी दिया ॥ २५-२६ ॥

ततो द्वाराणि सर्वाणि पिहितानि महात्मना।

जनार्दनेन ब्रह्मासौ नाभ्यां द्वारमविन्दत ॥२७॥

तत्र योगबलेनासौ प्रविश्य कनकाण्डजः।

उजहारात्मनो रूपं पुष्कराच्चतुराननः ॥२८॥

तदनन्तर महात्मा जनार्दनने (अपनी इन्द्रियोंके) सभी द्वारोंको बंद कर दिया, तब ब्रह्माने उनकी नाभि में द्वार प्राप्त किया। सुवर्णमय अण्डसे उत्पन्न चतुर्मुख (ब्रह्मा)-ने योगबलसे उसमें (नाभिमें) प्रवेश कर (नाभि से उत्पन्न) कमलसे अपने रूपको बाहर निकाला ॥ २७-२८॥

विरराजारविन्दस्थः पद्मगर्भसमद्युतिः।

ब्रह्मा स्वयम्भूर्भगवान् जगद्योनिः पितामहः॥२९॥

स मन्यमानो विश्वेशमात्मानं परमं पदम्।

प्रोवाच पुरुषं विष्णुं मेघगम्भीरया गिरा॥३०॥

पद्मगर्भके समान* शोभावाले स्वयम्भू, जगद्योनि, पितामह भगवान् ब्रह्मा अरविन्द (रक्त कमल)पर बैठे हुए शोभित होने लगे। अपनेको सम्पूर्ण विश्व का स्वामी तथा परम पद (आश्रय) मानते हुए उन्होंने (ब्रह्माने) मेघके समान गम्भीर वाणीमें पुरुषोत्तम विष्णुसे कहा ॥ २९-३०॥

किं कृतं भवतेदानीमात्मनो जयकाङ्क्षया।

एकोऽहं प्रबलो नान्यो मां वै कोऽभिभविष्यति॥३१॥

आपने अपनी विजयकी आकांक्षासे इस समय यह क्या किया (अपनी सभी इन्द्रियोंके द्वारोंको क्यों बंद कर दिया । एकमात्र मैं ही सबसे बड़ा बलशाली हूँ और कोई नहीं है, मुझे कौन पराजित कर पायेगा? ॥ ३१॥

श्रुत्वा नारायणो वाक्यं ब्रह्मणो लोकतन्त्रिणः ।

सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं बभाषे मधुरं हरिः॥३२॥

लोकनियामक ब्रह्माका वचन सुनकर नारायण हरि ने सान्त्वनापूर्वक यह मधुर वाक्य कहा- ॥ ३२॥

भवान्धाता विधाता च स्वयम्भूः प्रपितामहः ।

न मात्सर्याभियोगेन द्वाराणि पिहितानि मे॥३३॥

किन्तु लीलार्थमेवैतन्न त्वां बाधितुमिच्छया।

को हि बाधितुमन्विच्छेद् देवदेवं पितामहम्॥३४॥

नतेऽन्यथावगन्तव्यं मान्यो मे सर्वथा भवान्।

सर्वमन्वय कल्याणं यन्मयापहृतं तव॥३५॥

अस्माच्च कारणाद् ब्रह्मन् पुत्रो भवतु मे भवान्।

पद्मयोनिरिति ख्यातो मत्प्रियार्थं जगन्मय ॥३६॥

आप ही धाता, विधाता और स्वयम्भू पितामह हैं। (मैंने) ईर्ष्या-द्वेषके कारण अपने (शरीरके) द्वारों को बंद नहीं किया, अपितु लीला करनेकी इच्छासे ही मैंने ऐसा किया न कि आपको बाधा पहुँचानेकी दृष्टिसे। देवाधिदेव पितामह आपको भला कौन बाधा पहुँचाना चाहेगा। आपको कुछ अन्यथा नहीं समझना चाहिये। आप मेरे लिये सभी प्रकारसे मान्य हैं। मेरे द्वारा जो आपका अपहरण हुआ है, उसमें आप सभी प्रकार से अपना कल्याण ही समझें। इसी कारण ब्रह्मन्! मेरी प्रीति के लिये आप मेरे पुत्र बनें। जगन्मूर्ति! आप 'पद्मयोनि' इस नामसे विख्यात हों ।। ३३-३६॥

ततः स भगवान् देवो वरं दत्त्वा किरीटिने।

प्रहर्षमतुलं पुनर्विष्णुमभाषत॥३७॥

तदनन्तर भगवान् देव (ब्रह्मा)-ने किरीटी (विष्णु)को वर देकर अत्यन्त प्रसन्न होकर पुनः विष्णु से कहा-॥३७॥

भवान् सर्वात्मकोऽनन्तः सर्वेषां परमेश्वरः।

सर्वभूतान्तरात्मा वै परं ब्रह्म सनातनम् ॥ ३८॥

गत्वा

अहं वै सर्वलोकानामात्मा लोकमहेश्वरः।

मन्मयं सर्वमेवेदं ब्रह्माहं पुरुषः परः॥ ३९॥

नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः।

एका मूर्तिर्द्विधा भिन्ना नारायणपितामहौ ॥ ४०॥

आप सभीके आत्मरूप हैं, अनन्त हैं और सभी के परम ईश्वर हैं। आप सभी प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं तथा आप ही सनातन परब्रह्म हैं। मैं ही सभी लोकों की आत्मा एवं लोकमहेश्वर हूँ। यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है। मैं परम पुरुष ब्रह्मा हूँ। हम दोनों के अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर दूसरा अन्य कोई नहीं है, नारायण और पितामहके रूपमें एक मूर्ति ही दो भागों में विभक्त हुई है। ३८-४०॥

तेनैवमुक्तो ब्रह्माणं वासुदेवोऽब्रवीदिदम्।

इयं प्रतिज्ञा भवतो विनाशाय भविष्यति॥४१॥

किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।

प्रधानपुरुषेशानं वेदाहं परमेश्वरम्॥४२॥

यंन पश्यन्ति योगीन्द्राः सांख्या अपि महेश्वरम्।

अनादिनिधनं ब्रह्म तमेव शरणं व्रज॥४३॥

उनके (ब्रह्माके) द्वारा ऐसा कहे जानेपर वासुदेव ब्रह्मा से इस प्रकार बोले-यह प्रतिज्ञा* आपके विनाश का कारण बनेगी। क्या आप ब्रह्माधिपति योगेश्वर, अव्यय एवं प्रधान पुरुष ईशान (शंकर)-को नहीं देख रहे हैं? मैं उन परमेश्वरको जानता हूँ। योगीन्द्र तथा सांख्यशास्त्र के ज्ञाता भी जिन महेश्वरका दर्शन नहीं कर पाते, आप उन्हीं अनादिनिधन ब्रह्मकी शरण ग्रहण करें॥ ४१-४३॥

ततः क्रुद्धोऽम्बुजाभाक्षं ब्रह्मा प्रोवाच केशवम्।

भवान् न नूनमात्मानं वेत्ति तत् परमक्षरम्॥४४॥

ब्रह्माणं जगतामेकमात्मानं परमं पदम्।

नावाभ्यां विद्यते ह्यन्यो लोकानां परमेश्वरः॥४५॥

संत्यज्य निद्रां विपुलां स्वमात्मानं विलोकय।

तस्य तत् क्रोधजं वाक्यं श्रुत्वा विष्णुरभाषत॥४६॥

मा मैवं वद कल्याण परिवादं महात्मनः।

न मेऽस्त्यविदितं ब्रह्मन् नान्यथाहं वदामि ते॥४७॥

किन्तु मोहयति ब्रह्मन् भवन्तं पारमेश्वरी।

मायाशेषविशेषाणां हेतुरात्मसमुद्भवा॥४८॥

तदनन्तर क्रुद्ध ब्रह्माने कमलकी आभाके समान नेत्र वाले केशवसे कहा-निश्चित ही आप अपने-आपको वह परम अक्षर, जगत्का एकमात्र आत्मरूप, ब्रह्मरूप, परम पद (शरण) नहीं जान रहे हैं। हम दोनों के अतिरिक्त लोकोंका परमेश्वर और दूसरा कोई विद्यमान नहीं है। आप दीर्घ निद्राका परित्याग कर अपने-आपको देखें (पहचानें)। उनके (ब्रह्माके) इस क्रोधयुक्त

वचनको सुनकर विष्णुने कहा-हे कल्याण! इस प्रकार न कहें, इस प्रकार न कहें, (यह उन) महात्माकी निन्दा है। ब्रह्मन्! मेरे लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है, मैं आपसे असत्य नहीं कह रहा हूँ। किंतु ब्रह्मन्! आत्मासे समुद्भूत समस्त विशेषोंकी हेतुभूत परमेश्वरकी माया ही आपको मोहित कर रही है ॥ ४४-४८॥

एतावदुक्त्वा भगवान् विष्णुस्तूष्णीं बभूव ह।

ज्ञात्वा तत् परमं तत्त्वं स्वमात्मानं महेश्वरम्॥४९॥

इतना कहकर भगवान् विष्णु अपने आत्मरूप महेश्वर को उस सर्वोत्कृष्ट परम तत्त्वके रूपमें जानकर चुप हो गये॥४९॥

कुतोऽप्यपरिमेयात्मा भूतानां परमेश्वरः ।

प्रसादं ब्रह्मणे कर्तुं प्रादुरासीत् ततो हरः॥५०॥

ललाटनयनोऽनन्तो जटामण्डलमण्डितः।

त्रिशूलपाणिभंगवांस्तेजसा परमो निधिः ॥५१॥

दिव्यां विशालां ग्रथितां ग्रहैः सार्केन्दुतारकैः।

मालामत्यद्भुताकारां धारयन् पादलम्बिनीम्॥५२॥

तदनन्तर ब्रह्माके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये प्राणियोंके परम ईश्वर अपरिमेयात्मा (असीम सामर्थ्यसम्पन्न) हर (भगवान् शंकर) वहाँ प्रादुर्भूत हो गये। उन अनन्त (भगवान् शंकर)-के ललाटमें नेत्र था। वे जटामण्डल से सुशोभित थे। तेजके परम निधि वे भगवान् हाथ में त्रिशूल लिये थे। उन्होंने सूर्य, चन्द्रमा, ग्रहों तथा नक्षत्रोंसे गुंथी हुई अद्भुत आकारवाली चरणोंतक लटकती हुई लम्बी दिव्य विशाल मालाको धारण कर रखा था। ५०-५२॥

तं दृष्ट्वा देवमीशानं ब्रह्मा लोकपितामहः।

मोहितो माययात्यर्थं पीतवाससमब्रवीत्॥५३॥

क एष पुरुषोऽनन्तः शूलपाणिस्त्रिलोचनः।

तेजोराशिरमेयात्मा समायाति जनार्दन॥५४॥

उन ईशानदेवको देखकर मायासे अत्यन्त मोहित लोकपितामह ब्रह्माने (अपनी रक्षाके लिये) पीताम्बरधारी (विष्णु)-से कहा-हे जनार्दन! हाथमें त्रिशूल धारण किये, त्रिनेत्रधारी, तेजकी राशिरूप, अमेयात्मा यह कौन अनन्त पुरुष (यहाँ) चला आ रहा है॥५३-५४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विष्णु नवमर्दनः।

अपश्यदीश्वरं देवं ज्वलन्तं विमलेऽम्भसि॥५५॥

ज्ञात्वा तत्परमं भावमैश्वरं ब्रह्मभावनम्।

प्रोवाचोत्थाय भगवान् देवदेवं पितामहम्॥५६॥

उनके (ब्रह्माके) इस वचनको सुनकर दानवों का मर्दन करनेवाले विष्णुने निर्मल जलमें देदीप्यमान देव ईश्वरको देखा। ईश्वर-सम्बन्धी उस परम भावरूप ब्रह्मभाव को जानकर (महेश्वरमें परम तत्त्वका दर्शनकर)भगवान् (विष्णु) उठकर गये और देवदेव पितामह से कहने लगे-॥५५-५६॥

अयं देवो महादेवः स्वयंज्योतिः सनातनः।

अनादिनिधनोऽचिन्त्यो लोकानामीश्वरो महान्॥५७॥

ये देव स्वयं प्रकाशित होनेवाले, सनातन, आदि और अन्तसे रहित, अचिन्त्य, महान्, समस्त लोकों के ईश्वर महादेव हैं ॥५७॥

शंकरः शम्भुरीशानः सर्वात्मा परमेश्वरः।

भूतानामधिपो योगी महेशो विमलः शिवः॥५८॥

एष धाता विधाता च प्रधानपुरुषेश्वरः।

यं प्रपश्यन्ति यतयो ब्रह्मभावेन भाविताः॥५९॥

सृजत्येष जगत् कृत्स्नं पाति संहरते तथा।

कालो भूत्वा महादेवः केवलो निष्कलः शिवः॥६०॥

ये शंकर, शम्भु, ईशान, सर्वात्मा, परमेश्वर, समस्त प्राणियों के एकमात्र स्वामी, योगी, महेश, विमल एवं शिवरूप (कल्याणरूप) हैं। ये ही धाता, विधाता, प्रधान पुरुष और ईश्वर हैं। यतिजन (संन्यासी लोग) ब्रह्मकी भावनासे भावित होकर जिनका दर्शन करते हैं वे ही केवल, निष्कल, महादेव शिव काल बनकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं, रक्षा करते हैं और संहार करते हैं ॥५८-६०॥

ब्रह्माणं विदधे पूर्वं भवन्तं यः सनातनः।

वेदांश्च प्रददौ तुभ्यं सोऽयमायाति शंकरः॥६१॥

अस्यैव चापरां मूर्ति विश्वयोनिं सनातनीम्।

वासुदेवाभिधानां मामवेहि प्रपितामह ॥६२॥

किं न पश्यसि योगेशं ब्रह्माधिपतिमव्ययम्।

दिव्यं भवतु ते चक्षुर्येन द्रक्ष्यसि तत्परम्।। ६३॥

ये वे ही शंकर आ रहे हैं, जिन सनातन (देव) ने पूर्वकालमें आप ब्रह्माको बनाया और आपको वेद प्रदान किया। प्रपितामह ! मुझे इनकी ही विश्वयोनि, सनातन एवं वासुदेव नामवाली दूसरी मूर्ति समझो। क्या आप ब्रह्माके भी अधिपति, अव्यय योगेश्वरको नहीं देख रहे हैं? आपकी दिव्य दृष्टि हो जाय, जिससे आप उस परम (तत्त्व)-को देख सकें॥ ६१-६३ ॥

लब्ध्वा शैवं तदा चक्षुर्विष्णोर्लोकपितामहः ।

बुबुधे परमेशानं पुरतः समवस्थितम्॥६४॥

स लब्ध्वा परमं ज्ञानमैश्वरं प्रपितामहः।

प्रपेदे शरणं देवं तमेव पितरं शिवम्॥६५॥

ओंकारं समनुस्मृत्य संस्तभ्यात्मानमात्मना।

अथर्वशिरसा देवं तुष्टाव च कृताञ्जलिः॥६६॥

विष्णुसे इस प्रकार शैव-नेत्र (शिव-सम्बन्धी ज्ञान) प्राप्त कर लोक-पितामह (ब्रह्मा)-ने सामने अवस्थित परम ईशान को जाना। उन प्रपितामह (ब्रह्मा)-ने ईश्वर-सम्बन्धी परम ज्ञान प्राप्तकर उन्हीं पितृरूप देव शिवकी शरण ग्रहण की। ओंकार (तत्त्व)-का अनुस्मरणकर और आत्माद्वारा मनका निरोधकर उन्होंने अथर्ववेदके मन्त्रों से हाथ जोड़ते हुए (उन) देवकी प्रार्थना की॥ ६४-६६॥

संस्तुतस्तेन भगवान् ब्रह्मणा परमेश्वरः।

अवाप परमां प्रीतिं व्याजहार स्मयन्निव॥६७॥

उन ब्रह्माके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् परमेश्वर (शिव)-को परम प्रीति प्राप्त हुई और वे | मुसकराते हुए (इस प्रकार) बोले- ॥६७॥

मत्समस्त्वं न संदेहो मद्भक्तश्च यतो भवान्।

मयैवोत्पादितः पूर्वं लोकसृष्ट्यर्थमव्ययम्॥६८॥

त्वमात्मा ह्यादिपुरुषो मम देहसमुद्भवः ।

वरं वरय विश्वात्मन् वरदोऽहं तवानघ॥६९॥

तुम मेरे भक्त हो, इसलिये निःसंदेह तुम मेरे ही समान हो। मेरे द्वारा ही पहले संसारकी सृष्टि करने के लिये तुम अव्ययको उत्पन्न किया गया था। मेरी देह से उत्पन्न तुम (मेरी ही) आत्मा और आदि पुरुष हो। हे अनघ! विश्वात्मन्! वर माँगो। मैं तुम्हें वर प्रदान करूँगा॥६८-६९॥

स देवदेववचनं निशम्य कमलोद्भवः।

निरीक्ष्य विष्णुं पुरुषं प्रणम्याह वृषध्वजम्॥७०॥

कमलसे उत्पन्न उन ब्रह्माने देवाधिदेव (शंकर) के इस वचनको सुनकर विष्णुकी ओर देखा और उन (परम) पुरुष वृषध्वज (शंकर)-को प्रणामकर उनसे कहा-॥७०॥

भगवन् भूतभव्येश महादेवाम्बिकापते।

त्वामेव पुत्रमिच्छामि त्वया वा सदृशं सुतम्॥७१॥

हे भगवन्! भूत एवं भविष्यके स्वामी! महादेव! अम्बिकाके पति! मैं आपको ही पुत्र-रूपमें अथवा आपके ही समान पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छा करता हूँ॥७१॥

मोहितोऽस्मि महादेव मायया सूक्ष्मया त्वया।

न जाने परमं भावं याथातथ्येन ते शिव॥७२॥

त्वमेव देव भक्तानां भ्राता माता पिता सुहृत्।

प्रसीद तव पादाब्जं नमामि शरणं गतः॥७३॥

महादेव! मैं आपकी सूक्ष्म मायाद्वारा मोहित कर लिया गया हूँ। शिव! मैं आपके परम भावको यथार्थ-रूप में नहीं जानता हूँ। देव! आप ही भक्तोंके माता-पिता, भाई तथा मित्र हैं। आप प्रसन्न हों। मैं आपके चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ और आपकी शरण ग्रहण करता हूँ॥७२-७३॥

स तस्य वचनं श्रुत्वा जगन्नाथो वृषध्वजः ।

व्याजहार तदा पुत्रं समालोक्य जनार्दनम् ॥ ७४॥

तदनन्तर जगत्के स्वामी वृषध्वज (शंकर)ने उनके वचन सुनकर पुत्र (रूप) जनार्दन (विष्णु)की ओर देखकर (ब्रह्मासे) कहा- ॥७४॥

यदर्थितं भगवता तत् करिष्यामि पुत्रक।

विज्ञानमैश्वरं दिव्यमुत्पत्स्यति तवानघ । ७५॥

त्वमेव सर्वभूतानामादिकर्ता नियोजितः ।

तथा कुरुष्व देवेश मया लोकपितामह ॥७६॥

एष नारायणोऽनन्तो ममैव परमा तनुः।

भविष्यति तवेशानो योगक्षेमवहो हरिः॥७७॥

हे पुत्रक! तुमने जैसी इच्छा की है मैं वैसा ही करूँगा। अनघ! तुम्हें ईश्वर-सम्बन्धी दिव्य ज्ञान प्राप्त होगा। मेरे द्वारा तुम्हीं सभी प्राणियोंके प्रथम स्रष्टा के रूपमें नियुक्त किये गये हो। अतः देवेश! लोकपितामह ! तुम वैसा ही करो। ये नारायण एवं अनन्त (भगवान् विष्णु) मेरी ही श्रेष्ठ मूर्ति हैं। ये ईशान हरि तुम्हारे योग-क्षेमका वहन करनेवाले होंगे॥७५-७७॥

एवं व्याहृत्य हस्ताभ्यां प्रीतात्मा परमेश्वरः।

संस्पृश्य देवं ब्रह्माणं हरिं वचनमब्रवीत्॥७८॥

तुष्टोऽस्मि सर्वथाहं ते भक्त्या तव जगन्मय।

वरं वृणीष्व नह्यावां विभिन्नौ परमार्थतः ॥७९॥

ऐसा कहकर प्रसन्नचित्त परमेश्वर (शिव)-ने हाथों से देव ब्रह्माका स्पर्शकर हरि (विष्णु)-से कहा-हे जगन्मूर्ति! तुम्हारी भक्तिसे मैं तुमपर सर्वथा प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तत्त्वतः हम दोनों भिन्न नहीं हैं ॥७८-७९॥

श्रुत्वाथ देववचनं विष्णुर्विश्वजगन्मयः।

प्राह प्रसन्नया वाचा समालोक्य चतुर्मुखम्॥८॥

एष एव वरः श्लाघ्यो यदहं परमेश्वरम्।

पश्यामि परमात्मानं भक्तिर्भवतु मे त्वयि॥८१॥

इसके बाद महादेवका वचन सुनकर विश्वमय, जगन्मय विष्णुने चतुर्मुख ब्रह्माकी ओर देखकर प्रीतियुक्त वाणीमें (महादेवसे) कहा-मेरे लिये यही श्लाघनीय वर है कि मैं आप परमेश्वर परमात्माका दर्शन कर रहा हूँ। मेरी आपमें भक्ति हो ॥ ८०-८१ ॥

तथेत्युक्त्वा महादेवः पुनर्विष्णुमभाषत।

भवान् सर्वस्य कार्यस्य कर्ताहमधिदैवतम्॥८२॥

मन्मयं त्वन्मयं चैव सर्वमेतन्न संशयः।

भवान् सोमस्त्वहं सूर्यो भवान् रात्रिरहं दिनम्॥८३॥

भवान् प्रकृतिरव्यक्तमहं पुरुष एव च।

भवान् ज्ञानमहं ज्ञाता भवान् मायाहमीश्वरः॥८४॥

भवान् विद्यात्मिका शक्तिः शक्तिमानहमीश्वरः।

योऽहं सुनिष्कलो देवः सोऽपि नारायणः परः॥८५॥

'ऐसा ही हो', यह कहकर महादेवने पुनः विष्णु से कहा-आप सभी कार्योंके कर्ता हैं और मैं अधिदेवता हूँ। यह सब कुछ मेरा और आपका ही रूप है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप चन्द्रमा हैं, मैं सूर्य हूँ। आप रात्रि हैं, मैं दिन हूँ। आप प्रकृति हैं और मैं ही अव्यक्त पुरुष हूँ। आप ज्ञानरूप हैं और मैं ज्ञाता हूँ,आप मायारूप हैं और मैं ईश्वर हूँ। आप विद्यात्मिका शक्ति हैं, मैं शक्तिमान् ईश्वर हूँ और निष्कल देव परस्वरूप नारायण भी मैं ही हूँ। ८२-८५ ॥

एकीभावेन पश्यन्ति योगिनो ब्रह्मवादिनः।

त्वामनाश्रित्य विश्वात्मन् न योगी मामुपैष्यति।

पालयतजगत् कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्॥८६॥

ब्रह्मवादी योगी (हम दोनोंको) एक भावसे ही देखते हैं। हे विश्वात्मन् ! बिना आपका आश्रय ग्रहण किये योगी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। आप देवता, असुर तथा मनुष्यों से युक्त इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करें॥ ८६ ॥

इतीदमुक्त्वा भगवाननादिः

स्वमायया मोहितभूतभेदः।

जगाम जन्मर्धिविनाशहीनं

धामैकमव्यक्तमनन्तशक्तिः ॥८७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्रयां संहितायां पूर्वविभागे नवमोऽध्यायः॥९॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें नवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥९॥