35 अध्याय

प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा

गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल

मार्कण्डेय उवाच

कथयिष्यामि ते वत्स तीर्थयात्राविधिक्रमम्।

आर्षेण तु विधानेन यथा दृष्टं यथा श्रुतम्॥ १ ॥

मार्कण्डेयने कहा-वत्स! ऋषियोंके द्वारा प्रतिपादित विधान के अनुसार तीर्थयात्राकी विधिके क्रमको मैंने जैसे देखा और सुना, वह तुमसे कहता हूँ॥१॥

प्रयागतीर्थयात्रार्थी यः प्रयाति नरः क्वचित्।

बलीव समारूढः शृणु तस्यापि यत्फलम्॥ २ ॥

नरके वसते घोरे समाः कल्पशतायुतम्।

ततो निवर्तते घोरो गवां क्रोधो हि दारुणः।

सलिलं च न गृह्णन्ति पितरस्तस्य देहिनः॥ ३ ॥

यस्तु पुत्रांस्तथा बालान् स्नापयेत् पाययेत् तथा।

यथात्मना तथा सर्वान् दानं विप्रेषु दापयेत्॥ ४ ॥

ऐश्वर्याल्लोभमोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः।

निष्फलं तस्य तत् तीर्थं तस्माद्यानं विवर्जयेत्॥ ५ ॥

प्रयागतीर्थकी यात्रा करनेवाला कोई मनुष्य यदि कहीं बैलपर आरूढ़ होकर गमन करता है तो उसका भी फल सुनो- वह व्यक्ति दस हजार कल्पोंतक घोर नरक में वास करता है, क्योंकि गौका भयंकर दारुण क्रोध इसके बाद ही दूर होता है। बैलको सवारी बनानेवाले मनुष्यके पितर उसका (तर्पण आदि में

दिया) जल ग्रहण नहीं करते हैं। जो अपने सभी पुत्रों एवं बालकोंको अपने ही समान यहाँ (प्रयागमें) स्नान कराता है तथा उन्हें (गङ्गा-यमुनाका) जल पिलाता है और उनके हाथों ब्राह्मणोंको दान कराता है (उसे उत्तम गति प्राप्त होती है)। जो मनुष्य ऐश्वर्य, लोभ या मोहवश यानद्वारा (तीर्थमें) जाता है, उसकी वह तीर्थयात्रा निष्फल होती है, इसलिये (तीर्थयात्रामें) यानका परित्याग करना चाहिये ॥२-५॥

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यस्तु कन्यां प्रयच्छति।

आर्षेण तु विवाहेन यथाविभवविस्तरम्॥ ६ ॥

न स पश्यति तं घोरं नरकं तेन कर्मणा।

उत्तरान् स कुरून् गत्वा मोदते कालमक्षयम्॥ ७॥

जो व्यक्ति गङ्गा-यमुनाके मध्य आर्ष विवाहपद्धति से अपने ऐश्वर्यके अनुकूल धनका व्ययकर कन्याका दान करता है, वह उस कर्मके कारण घोर नरकका दर्शन नहीं करता और उत्तर कुरुमें जाकर अनन्त कालतक आनन्दोपभोग करता है॥६-७॥

वटमूलं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।

सर्वलोकानतिक्रम्य रुद्रलोकं स गच्छति॥ ८ ॥

तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः।

लोकपालाश्च सिद्धाश्च पितरो लोकसम्मताः॥ ९॥

सनत्कुमारप्रमुखास्तथा ब्रह्मर्षयोऽपरे।

नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च तथा नित्यं समासते।

हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः॥१०॥

(प्रयागमें अक्षय) वटवृक्षके नीचे जाकर जो प्राणों का परित्याग करता है, वह सभी लोकोंका अतिक्रमण कर रुद्रलोक को जाता है। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, लोकपाल, सिद्ध, लोकमें मान्य पितर, सनत्कुमार आदि प्रमुख तथा दूसरे ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण एवं सिद्धगण तथा भगवान् हरि और प्रजापति प्रभृति नित्य निवास करते हैं ॥८-१०॥

गङ्गायमुनयोर्मध्ये पृथिव्या जघनं स्मृतम्।

प्रयागं राजशार्दूल त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥११॥

गङ्गा-यमुनाके मध्यको पृथ्वीका जघन* कहा गया है। हे राजशार्दूल! प्रयाग तीनों लोकोंमें विख्यात है॥११॥

तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे संशितव्रतः।

तुल्यं फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥१२॥

वहाँ (गङ्गा-यमुनाके) संगमपर जो कठोर व्रत धारणकर अभिषेक-स्नान करता है, वह अश्वमेध तथा राजसूय यज्ञोंके समान फल प्राप्त करता है॥१२॥

न मातृवचनात् तात न लोकवचनादपि।

मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागगमनं प्रति॥१३॥

दश तीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथापरे।

तेषां सांनिध्यमत्रैव तीर्थानां कुरुनन्दन॥१४॥

या गतिर्योगयुक्तस्य सत्त्वस्थस्य मनीषिणः।

सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गङ्गायमुनसंगमे॥१५॥

नते जीवन्ति लोकेऽस्मिन् यत्र तत्र युधिष्ठिर।

ये प्रयागं न सम्प्राप्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥१६॥

हे तात! माताके कहने अथवा अन्य लोगों के कहनेपर भी प्रयाग जानेकी बुद्धिका उत्क्रमण (परित्याग) नहीं करना चाहिये । हे कुरुनन्दन! यहाँपर प्रमुख दस हजार तीर्थ तथा साठ करोड़ दूसरे तीर्थों का सांनिध्य है। योगयुक्त सत्त्वगुणी मनीषीकी जो गति होती है, वही गति गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण त्याग करनेवालेकी होती है। हे युधिष्ठिर! तीनों लोकों में विख्यात प्रयागमें जो नहीं पहुँचते, जहाँ-कहीं भी निवास करनेवाले वे लोग इस संसारमें जीवित रहते हुए भी मृतकके तुल्य हैं ॥१३-१६॥

एवं दृष्ट्वा तु तत् तीर्थं प्रयागं परमं पदम्।

मुच्यते सर्वपापेभ्यः शशाङ्क इव राहुणा ॥१७॥

कम्बलाश्वतरौ नागौ यमुनादक्षिणे तटे।

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च मुच्यते सर्वपातकैः॥१८॥

इस प्रकार परम पदरूप इस प्रयागतीर्थ का दर्शनकर मनुष्य सभी पापोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुसे मुक्त हो जाता है। यमुना के दक्षिण किनारेपर कम्बल और अश्वतर नामक दो नाग स्थित हैं। वहाँ स्नान करने और जल पीनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। १७-१८॥

तत्र गत्वा नरः स्थानं महादेवस्य धीमतः।

आत्मानं तारयेत् पूर्वं दशातीतान् दशापरान्॥१९॥

कृत्वाभिषेकं तु नरः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।

स्वर्गलोकमवाप्नोति यावदाहूतसम्प्लवम्॥२०॥

धीमान् महादेवके उस स्थानपर जाकर मनुष्य अपने को तथा दस पूर्वकी और दस बादकी सभी पीढ़ियोंको तार देता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधका फल प्राप्त करता है तथा महाप्रलयपर्यन्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।। १९-२०॥

पूर्वपार्श्वे तु गङ्गायास्त्रैलोक्ये ख्यातिमान् नृप।

अवटः सर्वसामुद्रः प्रतिष्ठानं च विश्रुतम्॥२१॥

ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिरात्रं यदि तिष्ठति।

सर्वपापविशुद्धात्मा सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ २२॥

उत्तरेण प्रतिष्ठानं भागीरथ्यास्तु सव्यतः।

हंसप्रपतनं नाम तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥२३॥

अश्वमेधफलं तत्र स्मृतमात्रात् तु जायते।

यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च तावत् स्वर्गे महीयते॥२४॥

हे राजन्! गङ्गाके पूर्वी तटपर तीनों लोकों में विख्यात सर्वसामुद्र नामक गह्वर तथा प्रतिष्ठान प्रसिद्ध है। वहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक तथा क्रोधजयी होकर तीन रात्रि निवास करनेवाला (मनुष्य) सभी पापोंसे निर्मुक्त होकर अश्वमेध का फल प्राप्त करता है। प्रतिष्ठान नामक स्थान के उत्तर तथा भागीरथीकी बायीं ओर तीनों लोकों में विख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है। उसके स्मरणमात्र से अश्वमेधका फल प्राप्त होता है और (वहाँ जानेवाला व्यक्ति) जबतक सूर्य एवं चन्द्रमा हैं, तबतक स्वर्ग में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥२१-२४॥

उर्वशीपुलिने रम्ये विपुले हंसपाण्डुरे।

परित्यजति यः प्राणान् शृणु तस्यापि यत् फलम्॥२५॥

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।

आस्ते स पितृभिः सार्धं स्वर्गलोके नराधिप ॥२६॥

अथ संध्यावटे रम्ये ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः।

नरः शुचिरुपासीत ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्॥२७॥

कोटितीर्थं समाश्रित्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्।

कोटिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥२८॥

यत्र गङ्गा महाभागा बहुतीर्थतपोवना।

सिद्धक्षेत्रं हि तज्ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा॥२९॥

क्षितौ तारयते मान् नागांस्तारयतेऽप्यधः।

दिवि तारयते देवांस्तेन त्रिपथगा स्मृता॥३०॥

जो व्यक्ति उर्वशीके* हंसके समान अति धवल रम्य, विस्तृत तटपर प्राणोंका परित्याग करता है, उसका भी जो फल है, वह सुनो-हे नराधिप! वह व्यक्ति साठ हजार साठ सौ वर्षोंतक पितरोंके साथ स्वर्गलोक में निवास करता है। रमणीय संध्यावट (प्रयागके वट-विशेष) के नीचे जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक पवित्रतासे उपासना करता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। जो कोटितीर्थ (प्रयागमें स्थित तीर्थ)-में पहुंचकर प्राणों का परित्याग करता है, वह हजार करोड़ वर्षों तक स्वर्गलोक में पूजित होता है। जहाँ बहुतसे तीर्थों एवं तपोवनोंसे युक्त महाभागा गङ्गा विद्यमान हैं, उस क्षेत्र को सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये, इसमें किसी भी प्रकार का विचार (संशय) करना उचित नहीं है। गङ्गा पृथ्वी पर मनुष्यों को तारती है, नीचे पाताल लोकमें नागोंको तारती

है और धुलोकमें देवताओंको तारती है, इसलिये यह त्रिपथगा कही जाती है ॥ २५-३०॥

यावदस्थीनि गङ्गायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य तु।

तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते॥३१॥

तीर्थानां परमं तीर्थं नदीनां परमा नदी।

मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकिनामपि ॥३२॥

सर्वत्र सुलभा गङ्गा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।

गङ्गाद्वारे प्रयागे च गङ्गासागरसंगमे॥३३॥

सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम्।

गतिमन्वेषमाणानां नास्ति गङ्गासमा गतिः॥३४॥

जितने वर्षतक पुरुषकी अस्थियाँ गङ्गामें रहती हैं, उतने हजार वर्षांतक वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है। (गङ्गा) सभी तीर्थोंमें परम तीर्थ और नदियों में

श्रेष्ठ नदी है, वह सभी प्राणियों, यहाँतक कि महापातकियों को भी मोक्ष प्रदान करनेवाली है। गङ्गा (स्नान) सर्वत्र सुलभ होनेपर भी गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रयाग एवं गङ्गासागर-इन तीन स्थानोंमें दुर्लभ होती है। (उत्तम) गति की इच्छा करनेवाले तथा पापसे उपहत चित्तवाले सभी प्राणियोंके लिये गङ्गाके समान और कोई दूसरी गति नहीं है ॥३१-३४॥

पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।

माहेश्वरात् परिभ्रष्टा सर्वपापहरा शुभा॥ ३५॥

कृते युगे तु तीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्।

द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते॥३६॥

गङ्गामेव निषेवेत प्रयागे तु विशेषतः ।

नान्यत् कलियुगोद्भूतं मलं हन्तुं सुदुष्कृतम्॥३७॥

यह सभी पवित्र वस्तुओंसे अधिक पवित्र और सभी मङ्गलकारी पदार्थोंसे अधिक माङ्गलिक है। महेश्वर (-के मस्तक)-से होकर इस लोकमें आने के कारण यह सभी पापोंका हरण करनेवाली और शुभ है। सत्ययुग में अनेक तीर्थ होते हैं, त्रेताका श्रेष्ठ तीर्थ पुष्कर है, द्वापर का कुरुक्षेत्र है और कलियुगमें गङ्गाकी ही विशेषता है। गङ्गाकी ही सेवा करनी चाहिये, विशेष रूप से प्रयागमें गङ्गाकी सेवा करनी चाहिये। कलियुग में उत्पन्न अत्यन्त कठिन पापको दूर करनेमें कोई अन्य तीर्थ समर्थ नहीं है। ३५-३७॥

अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो विपद्यते।

स मृतो जायते स्वर्गे नरकं च न पश्यति॥३८॥

इच्छा अथवा अनिच्छापूर्वक जो गङ्गामें मृत्यु प्राप्त करता है, वह मृत व्यक्ति स्वर्ग जाता है और नरक का दर्शन नहीं करता ॥ ३८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥३५॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ३५ ॥