20 अध्याय

श्राद्ध-प्रकरण-श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये

जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये

प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ

नैमित्तिकं तु कर्तव्यं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।

बान्धवानां च मरणे नारकी स्यादतोऽन्यथा॥ ६॥

काम्यानि चैव श्राद्धानि शस्यन्ते ग्रहणादिषु।

अयने विषुवे चैव व्यतीपातेऽप्यनन्तकम्॥ ७ ॥

संक्रान्त्यामक्षयं श्राद्धं तथा जन्मदिनेष्वपि।

नक्षत्रेषु च सर्वेषु कार्यं काम्यं विशेषतः॥ ८ ॥

चन्द्र और सूर्यके ग्रहणकाल तथा बान्धवों के मरनेपर नैमित्तिक श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा न करनेपर नारकीय गति प्राप्त होती है। ग्रहण आदिके समय किये गये काम्य श्राद्ध प्रशस्त माने गये हैं। उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुव तथा व्यतीपात योग में किया हुआ श्राद्ध भी अनन्त फल देनेवाला होता है। संक्रान्ति तथा जन्मके समय किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। सभी नक्षत्रोंमें विशेषरूपसे काम्य श्राद्ध करना चाहिये॥६-८॥

स्वर्गच लभते कृत्वा कृत्तिकासु द्विजोत्तमः।

अपत्यमथ रोहिण्यां सौम्ये तु ब्रह्मवर्चसम्॥ ९ ॥

रौद्राणां कर्मणां सिद्धिमार्द्रायां शौर्यमेव च।

पुनर्वसौ तथा भूमिं श्रियं पुष्ये तथैव च॥१०॥

सर्वान् कामांस्तथा सा पित्र्ये सौभाग्यमेव च।

अर्यम्णे तु धनं विन्द्यात् फाल्गुन्यां पापनाशनम्॥११॥

ज्ञातिश्रेष्ठ्यं तथा हस्ते चित्रायां च बहून् सुतान्।

वाणिज्यसिद्धिं स्वातौ तु विशाखासु सुवर्णकम्॥१२॥

मैत्रे बहूनि मित्राणि राज्यं शाक्रे तथैव च।

मूले कृषि लभेद् यानसिद्धिमाप्ये समुद्रतः ॥१३॥

सर्वान् कामान् वैश्वदेवे श्रेष्ठ्यं तु श्रवणे पुनः ।

श्रविष्ठायां तथा कामान् वारुणेच परं बलम्॥१४॥

अजैकपादे कुप्यं स्यादहिर्बुध्ये गृहं शुभम्।

रेवत्यां बहवो गावो ह्यश्विन्यां तुरगांस्तथा।

याम्येऽथ जीवनं तत् स्याद्यदि श्राद्धं प्रयच्छति॥१५॥

श्रेष्ठ द्विज कृत्तिका नक्षत्रमें श्राद्ध कर स्वर्ग प्राप्त करता है। रोहिणीमें श्राद्ध करनेसे संतान और मृगशिरा नक्षत्र में श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी प्राप्ति होती है। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे रौद्र कर्मोंकी सिद्धि तथा शौर्य की प्राप्ति होती है। पुनर्वसु नक्षत्रमें भूमि और पुष्य नक्षत्र में लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। आश्लेषा नक्षत्रमें (श्राद्ध करनेसे) सभी कामनाओं और मघा नक्षत्रमें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तराफाल्गुनीमें धन की प्राप्ति होती है और पूर्वाफाल्गुनीमें पापका नाश होता है। हस्त नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे अपनी जाति मेंश्रेष्ठता और चित्रामें बहुतसे पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। स्वातीमें व्यापारकी सिद्धि और विशाखामें सुवर्ण की प्राप्ति होती है। अनुराधामें श्राद्ध करनेसे बहुतसे मित्रोंकी तथा ज्येष्ठामें राज्यकी प्राप्ति होती है। मूल नक्षत्रमें कृषि तथा पूर्वाषाढ़ा समुद्रतककी सफल यात्रा होती है। उत्तराषाढ़ामें सभी कामनाओंकी सिद्धि और श्रवण नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठता प्राप्त होती है। धनिष्ठा में सभी कामनाओं और शतभिषामें परम बलकी प्राप्ति होती है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे कुप्य अर्थात् सोना-चाँदीसे भिन्न धातुएँ और उत्तराभाद्रपदमें शुभ गृह प्राप्त होता है। रेवती नक्षत्रमें किये गये श्राद्ध से बहुत-सी गौएँ और अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ों की प्राप्ति होती है। भरणी नक्षत्रमें यदि श्राद्ध किया जाय तो आयुकी प्राप्ति होती है॥९-१५॥

आदित्यवारे त्वारोग्यं चन्द्रे सौभाग्यमेव च।

कौजे सर्वत्र विजयं सर्वान् कामान् बुधस्य तु॥१६॥

विद्यामभीष्टां जीवे तु धनं वै भार्गवे पुनः।

शनैश्चरे लभेदायुः प्रतिपत्सु सुतान् शुभान्॥१७॥

रविवारको (श्राद्ध करनेसे) आरोग्य, सोमवारको सौभाग्य, मंगलवारको सर्वत्र विजय और बुधवार को श्राद्धसे सभी कामनाओंकी सिद्धि होती है। बृहस्पतिवार के दिन श्राद्धसे अभीष्ट विद्या, शुक्रवारके दिन श्राद्ध से धन और शनैश्चरको (श्राद्ध करनेसे) आयु प्राप्त होती है।

कन्यकां वै द्वितीयायां तृतीयायां तु वन्दिनः।

पशून् क्षुद्रांश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यांशोभनान्सुतान्॥१८॥

षष्ठ्यां द्यूतं कृषिं चापि सप्तम्यां लभते नरः।

अष्टम्यामपि वाणिज्यं लभते श्राद्धदः सदा॥१९॥

स्यान्नवम्यामेकखुरं दशम्यां द्विखुरं बहु।

एकादश्यां तथा रूप्यं ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥२०॥

द्वादश्यां जातरूपं च रजतं कुप्यमेव च।

ज्ञातिश्रेष्ठ्यं त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः ।

पञ्चदश्यां सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा॥२१॥

प्रतिपदा तिथिको (श्राद्ध करनेसे) शुभ पुत्र प्राप्त होते हैं। द्वितीयामें श्राद्धसे कन्या, तृतीयामें वन्दीजनों, चतुर्थी में क्षुद्र पशु और पञ्चमीको श्राद्ध करनेसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। षष्ठीमें श्राद्ध करनेसे द्यूत (-में विजय) और सप्तमीमें श्राद्धसे कृषिकी प्राप्ति होती है। अष्टमीको श्राद्ध करनेवाला सदा वाणिज्य (-में लाभ) प्राप्त करता है। नवमीमें श्राद्धसे एक खुरवाले और दशमीमें श्राद्ध करनेसे दो खुरवाले बहुतसे पशु मिलते हैं। एकादशीको (श्राद्ध करनेसे) रौप्य (रजत) पदार्थ तथा ब्रह्मवर्चस्वी पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। द्वादशीको (श्राद्ध करनेसे) जातरूप (स्वर्ण), चाँदी तथा कुप्य, त्रयोदशीको जातिमें श्रेष्ठता और चतुर्दशीको श्राद्ध करने से कुप्रजाको प्राप्ति होती है। पञ्चदशी (पूर्णिमा एवं अमावास्या)-को श्राद्ध करनेवाला सदा सभी कामनाओं को प्राप्त करता है॥१६-२१॥

तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः।

शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत्॥२२॥

द्रव्यब्राह्मणसम्पत्तौ न कालनियमः कृतः।

तस्माद् भोगापवर्गार्थं श्राद्धं कुर्युर्द्विजातयः॥२३॥

इसलिये द्विजातियोंको चतुर्दशीके दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। शस्त्र (आदि)-द्वारा जो मरे हुए हों, उनका श्राद्ध (इस चतुर्दशी तिथिको) करना चाहिये। द्रव्य एवं ब्राह्मणके उपलब्ध रहनेपर कालसम्बन्धी कोई नियम नहीं बताया गया है (अर्थात् कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है)। इसलिये भोग और मोक्ष की प्राप्तिके लिये द्विजातियोंको श्राद्ध (अवश्य) करना चाहिये ॥२२-२३॥

कर्मारम्भेषु सर्वेषु कुर्यादाभ्युदयं पुनः।

पुत्रजन्मादिषु श्राद्धं पार्वणं पर्वणि स्मृतम्॥२४॥

अहन्यहनि नित्यं स्यात् काम्यं नैमित्तिकं पुनः।

एकोद्दिष्टादि विज्ञेयं वृद्धिश्राद्धं तु पार्वणम्॥२५॥

एतत् पञ्चविधं श्राद्धं मनुना परिकीर्तितम्।

यात्रायां षष्ठमाख्यातं तत्प्रयत्नेन पालयेत्॥२६॥

शुद्धये सप्तमं श्राद्धं ब्रह्मणा परिभाषितम्।

दैविकं चाष्टमं श्राद्धं यत्कृत्वा मुच्यते भयात्॥२७॥

संध्यारात्र्योर्न कर्तव्यं राहोरन्यत्र दर्शनात्।

देशानां च विशेषेण भवेत् पुण्यमनन्तकम्॥२८॥

सभी (शुभ) कर्मोंके प्रारम्भमें तथा पुत्रजन्म आदि समयों में आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। पर्वके दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। मनुने प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध, काम्य-श्राद्ध (कामनाविशेष की सिद्धि के लिये किया जानेवाला श्राद्ध), एकोद्दिष्टादि नैमित्तिक श्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध और पार्वण श्राद्ध-इन पाँच प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन किया है। यात्राके समय (किया जानेवाला) छठा श्राद्ध कहा गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ब्रह्माने शुद्धिके लिये सातवें श्राद्धका वर्णन किया है। आठवाँ दैविक नामक श्राद्ध है, जिसे करनेसे भयसे मुक्ति हो जाती है। संध्या और रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। किंतु राहु और केतुद्वारा सूर्य चन्द्र के ग्रस्त किये जानेपर रात्रिमें भी श्राद्ध किया जा

सकता है। देशविशेषके कारण श्राद्ध अनन्त पुण्य फल देनेवाला होता है ॥२४-२८॥

गङ्गायामक्षयं श्राद्धं प्रयागेऽमरकण्टके।

गायन्ति पितरो गाथां कीर्तयन्ति मनीषिणः॥२९॥

एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः।

तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥३०॥

गयां प्राप्यानुषङ्गेण यदि श्राद्धं समाचरेत्।

तारिताः पितरस्तेन स याति परमां गतिम्॥३१॥

गङ्गा, प्रयाग तथा अमरकण्टकमें किया गया श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करता है। पितर इस गाथाका गान करते हैं और मनीषी ऐसा कीर्तन करते रहते हैं कि 'शीलवान् तथा गुणवान् बहुतसे पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे कोई एक भी किसी प्रसंगवश गया चला जाय और गया पहुँचकर यदि श्राद्ध कर दे तो उसके द्वारा पितर तार दिये जाते हैं (अर्थात् पितरोंको उत्तमोत्तम गति प्राप्त होती है) और वह (श्राद्धकर्ता) परमगतिको प्राप्त करता है' ॥ २९-३१॥

वराहपर्वते चैव गङ्गायां वै विशेषतः।

वाराणस्यां विशेषेण यत्र देवः स्वयं हरः ।। ३२॥

गङ्गाद्वारे प्रभासे च बिल्वके नीलपर्वते।

कुरुक्षेत्रे च कुब्जाने भृगुतुङ्गे महालये॥३३॥

केदारे फल्गुतीर्थे च नैमिषारण्य एव च।

सरस्वत्यां विशेषेण पुष्करेषु विशेषतः॥३४॥

नर्मदायां कुशावर्ते श्रीशैले भद्रकर्णके।

वेत्रवत्यां विपाशायां गोदावर्यां विशेषतः॥ ३५॥

एवमादिषु चान्येषु तीर्थेषु पुलिनेषु च।

नदीनां चैव तीरेषु तुष्यन्ति पितरः सदा ॥ ३६॥

वराह पर्वत, विशेषरूपसे गङ्गा तथा जहाँ स्वयं भगवान् हर निवास करते हैं विशेषतया उस वाराणसी, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रभास, बिल्वकतीर्थ, नीलपर्वत, कुरुक्षेत्र, कुब्जाम्रतीर्थ, भृगुतुङ्ग, महालय, केदारपर्वत, फल्गुतीर्थ, नैमिषारण्य, विशेषरूपसे सरस्वती नदी तथा पुष्कर, नर्मदा, कुशावर्त, श्रीशैल, भद्रकर्णक, वेत्रवती, विपाशा तथा विशेषरूपसे गोदावरी नदी आदि स्थानों तथा अन्य तीर्थों, पुलिनों और नदियों के तटोंपर किये गये श्राद्धसे पितर सदा संतुष्ट होते हैं ॥ ३२-३६॥

व्रीहिभिश्च यवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा।

श्यामाकैश्च यवैः शाकैर्नीवारैश्च प्रियङ्गुभिः ।

गोधूमैश्च तिलैर्मुद्गर्मासं प्रीणयते पितॄन्॥३७॥

आम्रान् पानेरतानिक्षून् मृद्वीकांश्च सदाडिमान्।

विदार्याश्च भरण्डाश्च श्राद्धकाले प्रदापयेत्॥ ३८॥

लाजान् मधुयुतान् दद्यात् सक्तून् शर्करया सह।

दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन शृङ्गाटककशेरुकान्॥३९॥

द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।

औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पञ्च तु॥४०॥

षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेनाथ सप्त वै।

अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु॥४१॥

दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।

शशकूर्मयोर्मासेन मासानेकादशैव तु॥४२॥

संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन तु।

वाणसस्य मांसेन तृप्तिादशवार्षिकी ॥४३॥

व्रीहि, जौ, उड़द, जल, मूल, फल, श्यामाक (सावाँ), यव, शाक, नीवार, प्रियङ्गु, गोधूम, तिल तथा मुद्गद्वारा किये गये श्राद्धसे पितर एक महीनेतक प्रसन्न रहते हैं। आम, पानेरत (पानेण, करमईद अर्थात् करौंदा या करमर्द), ईख, द्राक्षा (अंगूर), दाडिम, विदारी (भूमिकुष्माण्ड) तथा भरण्ड- इन्हें श्राद्धके समय प्रदान करना चाहिये। मधुयुक्त लाजा, शर्कराके साथ सत्तू, सिंघाड़ा तथा कसेरू-इन्हें श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक देना चाहिये। ३७-४३॥

कालशाकं महाशल्कं खड्गलोहामिषं मधु।

आनन्त्यायैव कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः।। ४४॥

क्रीत्वा लब्ध्वा स्वयं वाथ मृतानाहृत्य वा द्विजः।

दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन तदस्याक्षयमुच्यते॥ ४५ ॥

पिप्पली क्रमुकं चैव तथा चैव मसूरकम्।

कूष्माण्डालाबुवार्ताकान् भूस्तृणं सुरसं तथा॥४६॥

कुसुम्भपिण्डमूलं वै तन्दुलीयकमेव च।

राजमाषांस्तथा क्षीरं माहिषं च विवर्जयेत्॥४७॥

कोद्रवान् कोविदारांश्च पालक्यान् मरिचांस्तथा।

वर्जयेत् सर्वयत्नेन श्राद्धकाले द्विजोत्तमः॥४८॥

राजमाष श्राद्धमें पिप्पली, सुपारी, मसूर, कूष्माण्ड, (वर्तुलाकार- गोल) लौकी, बैगन, रसयुक्त भूस्तृण, कुसुम्भ, पिण्डमूल (रार्जर), तन्दुलीयक, (चौंराई शाकविशेष) (वर्वट, वर्वटी, कड़ाई लोकभाषामें) और भैंसके दूधका प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ द्विजको श्राद्धमें कोदो, कोविदार (कचनार), पालक तथा मरिचका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये॥ ४४-४८॥