कूर्म महा पुराण
26 अध्याय
श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु
आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी
बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा
शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर
स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार
सूत उवाच
ततो लब्धवरः कृष्णो जाम्बवत्यां महेश्वरात्।
अजीजनन्महात्मानं साम्बमात्मजमुत्तमम्॥ १॥
प्रद्युम्नस्याप्यभूत् पुत्रो ह्यनिरुद्धो महाबलः।
तावुभौ गुणसम्पन्नौ कृष्णस्यैवापरे तनू॥ २ ॥
हत्वा च कंसं नरकमन्यांश्च शतशोऽसुरान्।
विजित्य लीलया शक्रं जित्वा बाणं महासुरम्॥ ३ ॥
स्थापयित्वा जगत् कृत्स्नं लोके धर्मांश्च शाश्वतान्।
चक्रे नारायणो गन्तुं स्वस्थानं बुद्धिमुत्तमाम्॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे विप्रा भृग्वाद्याः कृष्णमीश्वरम्।
आजग्मुरका द्रष्टुं कृतकार्यं सनातनम्॥ ५ ॥
सूतजी बोले-तदनन्तर महेश्वरसे वर प्राप्त किये हुए कृष्णने जाम्बवतीसे महात्मा साम्ब नामक श्रेष्ठ पुत्रको उत्पन्न किया। प्रद्युम्नको भी महाबलवान् अनिरुद्ध नामक पुत्र हुआ। गुणोंसे सम्पन्न वे दोनों कृष्णके ही दूसरे शरीर (-रूप) थे। कंस, नरक तथा अन्य सैकड़ों असुरों को मारकर लीलापूर्वक इन्द्रको जीतकर तथा महान् असुर बाणको पराजितकर, सम्पूर्ण संसार को प्रतिष्ठितकर और लोकमें शाश्वत धर्मोंकी स्थापनाकर नारायणने अपने धाममें जानेका श्रेष्ठ विचार किया। ब्राह्मणो! इसी बीच भृगु आदि (महर्षि) अवतार के समस्त प्रयोजनोंसे निवृत्त सनातन ईश्वर कृष्णका दर्शन करनेके लिये द्वारकामें आये॥१-५॥
स तानुवाच विश्वात्मा प्रणिपत्याभिपूज्य च।
आसनेषूपविष्टान् वै सह रामेण धीमता॥ ६ ॥
गमिष्ये तत् परं स्थानं स्वकीयं विष्णुसंज्ञितम्।
कृतानि सर्वकार्याणि प्रसीदध्वं मुनीश्वराः॥ ७ ॥
इदं कलियुगं घोरं सम्प्राप्तमधुनाशुभम्।
भविष्यन्ति जनाः सर्वे ह्यस्मिन् पापानुवर्तिनः॥ ८॥
प्रवर्तयध्वं मज्ज्ञानं ब्राह्मणानां हितावहम्।
येनेमे कलिजैः पापैर्मुच्यन्ते हि द्विजोत्तमाः॥ ९॥
विश्वात्मा (कृष्ण)-ने बुद्धिमान् बलराम के साथ आसनोंपर विराजमान भृगु आदि महर्षियोंको प्रणाम कर और पूजनकर उनसे कहा-मुनीश्वरो! सभी कार्य किये जा चुके हैं। अब मैं विष्णुसंज्ञक अपने उस परमधाम को जाऊँगा, आप लोग प्रसन्न हों। इस समय अशुभ घोर कलियुग आ गया है। इसमें सभी लोग पापाचरण करनेवाले हो जायेंगे। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आप लोग ब्राह्मणों के लिये कल्याणकारी मेरा ज्ञान प्रवर्तित करें, जिससे ये लोग कलिद्वारा उत्पन्न पापोंसे मुक्त हो सकें ॥६-९॥
ये मांजनाः संस्मरन्ति कलौ सकृदपि प्रभुम्।
तेषां नश्यतु तत् पापं भक्तानां पुरुषोत्तमे॥१०॥
येऽर्चयिष्यन्ति मां भक्त्या नित्यं कलियुगे द्विजाः।
विधिना वेददृष्टेन ते गमिष्यन्ति तत् पदम्॥११॥
कलियुगमें जो लोग एक बार भी मुझ प्रभु का स्मरण करेंगे, उन पुरुषोत्तमके भक्तोंका पाप नष्ट हो जायगा। द्विजो! जो कलियुगमें भक्तिपूर्वक वैदिक विधि-विधानसे नित्य मेरा पूजन करेंगे, वे मेरे पदको प्राप्त करेंगे॥१०-११॥
ये ब्राह्मणा वंशजाता युष्माकं वै सहस्रशः।
तेषां नारायणे भक्तिर्भविष्यति कलौ युगे॥१२॥
परात् परतरं यान्ति नारायणपरायणाः।
न ते तत्र गमिष्यन्ति ये द्विषन्ति महेश्वरम्॥१३॥
आप लोगोंके वंशमें जो हजारों ब्राह्मण उत्पन्न होंगे, उनकी कलियुगमें नारायणमें भक्ति होगी। नारायण के भक्तजन परसे परतर स्थानको प्राप्त करते हैं, किंतु जो महेश्वरसे द्वेष रखते हैं, वे वहाँ नहीं जाते॥१२-१३॥
ध्यानं होमं तपस्तप्तं ज्ञानं यज्ञादिको विधिः।
तेषां विनश्यति क्षिप्रं ये निन्दन्ति पिनाकिनम्॥१४॥
जो पिनाक धारण करनेवाले शिवकी निन्दा करते हैं, उनका ध्यान, होम, किया गया तप, ज्ञान तथा यज्ञादि सभी विधान शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥१४॥
यो मां समाश्रयेन्नित्यमेकान्तं भावमाश्रितः।
विनिन्द्य देवमीशानं स याति नरकायुतम्॥१५॥
तस्मात् सा परिहर्तव्या निन्दा पशुपतौ द्विजाः।
कर्मणा मनसा वाचा तद्भक्तेष्वपि यत्नतः॥१६॥
ये तु दक्षाध्वरे शप्ता दधीचेन द्विजोत्तमाः।
भविष्यन्ति कलौ भक्तैः परिहार्याः प्रयत्नतः॥१७॥
द्विषन्तो देवमीशानं युष्माकं वंशसम्भवाः।
शप्ताश्च गौतमेनोक्न सम्भाष्या द्विजोत्तमैः॥१८॥
जो ईशान (शंकर) देवकी निन्दा कर नित्य अनन्य भाव से मेरा आश्रय ग्रहण करता है, वह दस हजार वर्षोंतक नरकमें रहता है। इसलिये द्विजो! मन, वाणी तथा कर्मसे पशुपति तथा उनके भक्तोंकी भी निन्दा का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये। द्विजोत्तमो! दक्ष प्रजापति के यज्ञमें दधीचने आपके वंशमें उत्पन्न जिन ब्राह्मणों को देव ईशानसे द्वेष करनेके कारण शाप दिया था, वे सभी कलियुगमें पृथ्वीपर उत्पन्न होंगे। भक्तोंद्वारा प्रयत्नपूर्वक उनका परित्याग करना चाहिये। महर्षि गौतमद्वारा शापप्राप्त लोगोंसे भी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बात नहीं करनी चाहिये ॥१५-१८॥
इत्येवमुक्ताः कृष्णेन सर्व एव महर्षयः।
ओमित्युक्त्वा ययुस्तूर्णं स्वानि स्थानानि सत्तमाः॥१९॥
ततो नारायणः कृष्णो लीलयैव जगन्मयः।
संहृत्य स्वकुलं सर्वं ययौ तत् परमं पदम्॥२०॥
कृष्णद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे सभी श्रेष्ठ महर्षि 'ठीक है' ऐसा कहकर शीघ्र ही अपने स्थानों को चले गये। तदनन्तर जगन्मय नारायण कृष्ण लीलापूर्वक अपने सारे कुलका संहारकर अपने परमधामको पधार गये॥१९-२०॥
इत्येष वः समासेन राज्ञां वंशोऽनुकीर्तितः।
नशक्यो विस्तराद्वक्तुं किंभूयः श्रोतुमिच्छथ॥२१॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि वंशानां कथनं शुभम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तः स्वर्गलोके महीयते॥२२॥
(सूतजीने ऋषियोंसे कहा-) संक्षेपमें यह राजवंश आप लोगोंको बताया गया, विस्तारपूर्वक इसका वर्णन नहीं हो सकता। अब आप पुनः क्या सुनना चाहते हैं ? जो इन वंशोंके शुभ वर्णनको पढ़ता है अथवा सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्गलोक में आदर प्राप्त करता है॥ २१-२२॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रयां संहितायां पूर्वविभागे षड्विंशोऽध्यायः॥२६॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २६ ॥
Summary of chapter 26 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
In Dvārakā, desiring a noble son possessed of unmatched spiritual vigor, Bhagavān Śrī Kṛshṇa traveled to the holy hermitage of Sage Upamanyu in the Himalayas. Under Upamanyu's guidance, Kṛshṇa received the sacred Dīkshā, smeared His body with holy ash, and performed intense Tapas for twelve years, meditating upon Mahādeva Śiva with absolute devotion. Pleased by Kṛshṇa's unwavering asceticism, Bhagavān Parameshvara along with Goddess Parvatī manifested before Him in full cosmic glory. Kṛshṇa bowed reverently and offered magnificent hymns, whereupon Mahādeva granted Him spiritual boons, including the birth of Sāmba and eternal, flawless devotion to Śiva-Shakti.