कूर्म महा पुराण
23 अध्याय
आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रियाविधि, शुद्धि-विधान,
सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक
तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन
व्यास उवाच
दशाहं प्राहुराशौचं सपिण्डेषु विपश्चितः।
मृतेषु वाथ जातेषु ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः॥१॥
नित्यानि चैव कर्माणि काम्यानि च विशेषतः।
न कुर्याद् विहितं किञ्चित् स्वाध्यायं मनसापिच॥२॥
व्यासजीने कहा-हे द्विजोत्तमो! विद्वानोंने ब्राह्मणों के लिये सपिण्डोंकी मृत्यु अथवा जन्म होनेपर दस दिन का आशौच कहा है। (आशौचमें) विशेषरूपसे विहित नित्य तथा काम्य कुछ भी कर्म न करे। मनसे भी स्वाध्याय (वेदाध्ययन) न करे॥१-२॥
शुचीनक्रोधनान् भूम्यान् शालाग्नौ भावयेद् द्विजान् ।
शुष्कान्नेन फलैर्वापि वैतानं जुहुयात् तथा॥३॥
यज्ञशालाके अग्निकार्यके लिये पवित्र, क्रोधरहित, भूमिदेवरूप ब्राह्मणोंको नियुक्त करना चाहिये। शुष्क अन्न अथवा फूलोंके द्वारा वैतानाग्निमें हवन (श्रौत होम) करना चाहिये ॥३॥
न स्पृशेयुरिमानन्ये न च तेभ्यः समाहरेत्।
चतुर्थे पञ्चमे वाह्नि संस्पर्शः कथितो बुधैः॥ ४॥
सूतके तु सपिण्डानां संस्पर्शो न प्रदुष्यति।
सूतकं सूतिकां चैव वर्जयित्वा नृणां पुनः॥५॥
दूसरे लोग इन आशौचग्रस्त व्यक्तियोंको स्पर्श न करें और न कोई वस्तु ही उनसे लें। विद्वानोंने चौथे अथवा पाँचवें दिन इनके स्पर्शका विधान किया है।
(सपिण्डोंके) जननाशौचमें सपिण्डोंको स्पर्श करने में दोष नहीं होता। तथापि उत्पन्न हुए बालक और उसे जन्म देनेवाली (सद्यः) प्रसूता स्त्रीका मनुष्योंको स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ ४-५॥
अधीयानस्तथा यज्वा वेदविच्च पिता भवेत्।
संस्पृश्याः सर्व एवैते स्नानान्माता दशाहतः॥६॥
दशाहं निर्गुणे प्रोक्तमशौचं चातिनिर्गुणे।
एकद्वित्रिगुणैर्युक्तं चतुस्त्र्येकदिनैः शुचिः॥७॥
दशाहात् तु परं सम्यगधीयीत जुहोति च।
चतुर्थे तस्य संस्पर्श मनुराह प्रजापतिः॥८॥
क्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एव च।
यथेष्टाचरणस्याहुमरणान्तमशौचकम् ॥९॥
जननाशौचमें वेदका अध्ययन करनेवाला, यज्ञ करनेवाला और वेद जाननेवाला पिता-ये सभी स्नान करनेसे स्पर्श करने योग्य हो जाते हैं। माता दस दिनोंके
बाद (स्पर्श-योग्य होती है) निर्गुण' अथवा अति-निर्गुण लोगोंके लिये दस दिनोंका आशौच कहा गया है। एक, दो अथवा तीन गुणवालोंके लिये चार, तीन या एक दिनमें शुद्धि होनेका विधान है। दस दिन हो जानेपर सम्यक्-रूपसे अध्ययन एवं हवन करना चाहिये। प्रजापति मनुने चौथे दिन (एक गुणवाले अशौची)-के स्पर्शका विधान किया है। क्रियाहीन, मूर्ख, महारोगी और मनमाना आचरण करनेवाले व्यक्तियों का आशौच मरणपर्यन्त कहा गया है॥६-९॥
त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशौचकम्।
प्राक्संस्कारात् त्रिरात्रं स्यात् तस्मादूर्ध्वं दशाहकम्॥१०।
ब्राह्मणोंका आशीच तीन रात अथवा दस रात-तकका होता है। (उपनयन) संस्कार होनेके पूर्व (तथा चूडासंस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर) तीन रात का और (उपनयन) संस्कार होनेपर दस रातका अशौच होता है ॥ १०॥
ऊनद्विवार्षिके प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते।
त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदि ह्यत्यन्तनिर्गुणः ॥११॥
अदन्तजातमरणे पित्रोरेकाहमिष्यते।
जातदन्ते त्रिरात्रं स्याद् यदि स्यातां तु निर्गुणौ ॥१२॥
आदन्तजननात् सद्य आचौलादेकरात्रकम्।
त्रिरात्रमौपनयनात् सपिण्डानामुदाहृतम्॥१३॥
जातमात्रस्य बालस्य यदि स्यान्मरणं पितुः।
मातुश्च सूतकं तत् स्यात् पिता स्यात् स्पृश्य एव च ॥१४॥
सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य च।
ऊर्ध्वं दशाहादेकाहं सोदरो यदि निर्गुणः॥१५॥
दो वर्षसे कम अवस्थावाले बालकके मरनेपर केवल माता-पिताको तीन रातका अशौच होता है। अत्यन्त निर्गुण (सपिण्डकी मृत्यु) होनेपर तीन रात में शुद्धि होती है। बिना दाँतवाले शिशुके मरनेपर माता-पिता को एक दिनका अशौच कहा गया है। यदि माता-पिता निर्गुण हों तो दाँत उत्पन्न हुए शिशुको मृत्यु होने पर उन्हें तीन रातका अशौच होता है। दाँत उत्पन्न होनेके पूर्वतक बालकको मृत्यु होनेपर सद्यः चूडाकरण-संस्कार के पूर्वतक एक रात तथा उपनयनसे पूर्वतक तीन रातका आशौच सपिण्डोंके लिये कहा गया है। उत्पन्न होते ही बालकको मृत्यु होनेपर पिता और माताको अशौच होता है, किंतु पिता (स्नानके बाद) स्पर्शके योग्य होता है। सपिण्डों और सहोदर भाई की (जन्मसे) दस दिनोंके भीतर मृत्यु होनेपर (स्नानमात्रसे) सद्यः पवित्रता होती है। दस दिनके पश्चात् (मृत्यु होनेपर) एक दिनका अशौच उस सहोदरको होगा जो निर्गुण होता है॥११-१५॥
अथोर्ध्वं दन्तजननात् सपिण्डानामशौचकम्।
एकरात्रं निर्गुणानां चौलादूर्ध्वं त्रिरात्रकम्॥१६॥
अदन्तजातमरणं सम्भवेद् यदि सत्तमाः।
एकरात्रं सपिण्डानां यदि तेऽत्यन्तनिर्गुणाः ॥१७॥
व्रतादेशात् सपिण्डानामर्वाक् स्नानं विधीयते।
सर्वेषामेव गुणिनामूर्ध्वं तु विषमं पुनः॥१८॥
तदनन्तर दाँत निकलनेतक निर्गुण सपिण्डोंको एक रातका अशौच होता है। चौलकर्मके उपरान्त (सपिण्डों के मरनेपर) तीन रातका अशौच होता है। श्रेष्ठ जनो! सपिण्डी (यदि) अत्यन्त निर्गुण हों तो बिना दाँत निकले उनकी मृत्यु होनेपर एक रातका अशौच होता है। उपनयनके पूर्व सपिण्डोंकी मृत्यु होनेपर सभी गुणवानोंके लिये स्नानका विधान है, किंतु उपनयन के बाद मृत्यु होनेपर भिन्न स्थिति (अलग-अलग अशौच की व्यवस्था) होती है॥ १६-१८॥
अर्वाक् षण्मासतः स्त्रीणां यदि स्याद् गर्भसंस्रवः ।
तदा माससमैस्तासामशौचं दिवसैः स्मृतम्॥१९॥
तत ऊर्ध्वं तु पतने स्त्रीणां द्वादशरात्रिकम्।
सद्यः शौचं सपिण्डानां गर्भस्रावाच्च वा ततः॥२०॥
छः महीनेसे पूर्व यदि स्त्रियोंका गर्भस्राव हो जाता है तो जितने महीनेका गर्भ रहता है, उतने ही दिनों-तक का उनका (स्त्रियोंका) अशौच कहा गया है, उसके बाद गर्भपात होनेपर स्त्रियों के लिये बारह रात्रिका और सपिण्डोंके लिये सद्यः शौचका विधान है॥ १९-२०॥
गर्भच्युतावहोरात्रं सपिण्डेऽत्यन्तनिर्गुणे।
यथेष्टाचरणे ज्ञातौ त्रिरात्रमिति निश्चयः ॥२१॥
यदि स्यात् सूतके सूतिर्मरणे वा मृतिर्भवेत्।
शेषेणैव भवेच्छुद्धिरहःशेषे त्रिरात्रकम् ॥२२॥
मरणोत्पत्तियोगे तु मरणाच्छुद्धिरिष्यते।
अघवृद्धिमदाशौचमूर्ध्वं चेत् तेन शुध्यति॥२३॥
अथ चेत् पञ्चमीरात्रिमतीत्य परतो भवेत्।
अघवृद्धिमदाशौचं तदा पूर्वेण शुध्यति॥२४॥
गर्भस्राव तथा अत्यन्त निर्गुण सपिण्डीकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रका और मनमाने आचरणवाले जाति-बन्धुके (यहाँ गर्भस्राव होनेपर) तीन रात का अशौच निश्चित है। यदि जननाशौचके मध्य दूसरा जननाशौच हो जाय और मरणाशौचके बीचमें दूसरा मरणाशौच पड़ जाय तो प्रथम अशौचके जितने दिन शेष रहते हैं, उतने ही दिनोंमें दूसरे अशौचकी भी शुद्धि हो जाती है। किंतु प्रथम अशौच एक ही दिन का बचा हो तो तीन रातका आशौच होता है। मरणाशौच के मध्य जननाशौच होनेपर अथवा जननाशौचके बीच में मरणाशौच आ जानेपर मरणाशौचके पूरा होनेपर ही शुद्धि होती है। यदि पूर्वका अशौच वृद्धिमद् (बड़ा गुरुतर) अशौच हो तो पूर्वके अशौचकी शुद्धिसे ही दोनों अशौचोंकी शुद्धि होती है। यदि पाँचवीं रात्रि बीत जानेपर वृद्धिमद् अशौच हो तो दूसरे अशौचकी शुद्धि पूर्वके ही अशौचसे हो जाती है॥ २१-२४॥
देशान्तरगतं श्रुत्वा सूतकं शावमेव तु।
तावदप्रयतो मर्यो यावच्छेषः समाप्यते॥२५॥
अतीते सूतके प्रोक्तं सपिण्डानां त्रिरात्रकम्।
तथैव मरणे स्नानमूर्ध्वं संवत्सराद् यदि॥२६॥
देशान्तरमें गये हुएका जननाशौच या मरणाशौच-सम्बन्धी समाचार सुननेके बाद उतने समयतक संयम (अशौचके नियमका पालन) करना चाहिये जबतक शेष दिन समाप्त न हो जाय। (एक वर्षके भीतर) व्यतीत हुए मरणाशौच का समाचार सुननेपर सपिण्डोंको तीन रातका अशौच होता है, उसी प्रकार एक वर्ष
बीतने के बाद समाचार मिलने पर मरणाशौच में स्नानमात्र करना चाहिये ।२५-२६ ॥
वेदान्तविच्चाधीयानो योऽग्निमान् वृत्तिकर्षितः ।
सद्यः शौचं भवेत् तस्य सर्वावस्थासु सर्वदा ॥२७॥
वेदान्तको जाननेवाला (ब्रह्मनिष्ठ), अध्ययनकर्ता (गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी), अग्निहोत्री तथा वृत्तिहीन लोगोंको सभी अवस्थाओंमें सदा सद्यः शौच होता है ॥ २७॥
स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदानात् पूर्वतः सदा।
सपिण्डानां त्रिरात्रं स्यात् संस्कारे भर्तुरेव हि ॥२८॥
अहस्त्वदत्तकन्यानामशौचं मरणे स्मृतम्।
ऊनद्विवर्षान्मरणे सद्यः शौचमुदाहृतम् ॥२९॥
अविवाहित स्त्रियों (कन्याओं)-की पाणिग्रहण से पूर्व मृत्यु होनेपर सपिण्डोंके निमित्त सदा तीन रात का अशौच होता है और विवाह-संस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर केवल पति और पतिकुलमें अशौच होता है। वाग्दानसे पूर्व कन्याओंकी मृत्यु होनेपर एक दिन का अशौच कहा गया है और दो वर्षसे कम अवस्थावाली कन्याके मरनेपर सद्यः शौच बताया गया है ।। २८-२९॥
आदन्तात् सोदरे सद्य आचौलादेकरात्रकम्।
आप्रदानात् त्रिरात्रं स्याद् दशरात्रमतः परम्॥३०॥
दाँत निकलनेसे पूर्व कन्याकी मृत्यु होनेपर सहोदर भाईको सद्यः शौच होता है और चूडाकरणके कालतक मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है। कन्यादान के पूर्व (कन्याका मरण होनेपर) तीन रातका और विवाह के बाद मरण होनेपर दस रातका (पतिकुलमें) अशौच होता है ॥ ३०॥
मातामहानां मरणे त्रिरात्रं स्यादशौचकम् ।
एकोदकानां मरणे सूतके चैतदेव हि ॥३१॥
पक्षिणी योनिसम्बन्धे बान्धवेषु तथैव च।
एकरात्रं समुद्दिष्टं गुरौ सब्रह्मचारिणि॥३२॥
प्रेते राजनि सज्योतिर्यस्य स्याद् विषये स्थितिः।
गृहे मृतासु दत्तासु कन्यकासु त्र्यहं पितुः॥ ३३॥
परपूर्वासु भार्यासु पुत्रेषु कृतकेषु च।
त्रिरात्रं स्यात् तथाचार्ये स्वभार्यास्वन्यगासुच॥ ३४॥
आचार्यपुत्रे पल्यां च अहोरात्रमुदाहृतम्।
एकाहं स्यादुपाध्याये स्वग्रामे श्रोत्रियेऽपि च ॥३५॥
मातामहकी मृत्यु होनेपर (दौहित्रको) तीन रात का अशौच होता है। समानोदकोंके' मरण या जन्ममें भी तीन रातका ही अशौच होता है। योनि-सम्बन्धवालों (भांजा, मामा, मौसी, बूआ-कुलके लोग आदि) तथा बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पक्षिणी (आगामी तथा वर्तमान दिन से युक्त रात्रि)-तक अशौच होता है। गुरु एवं सहपाठी (-के मरणमें) एक रात्रिका अशौच बतलाया गया है। जिस देशमें निवास करता हो, उस देश के राजाकी मृत्यु होनेपर सज्योतिकालतकका' अशौच होता है और पिताके घरमें विवाहित कन्याकी मृत्यु होने पर पिताको तीन रातका अशौच होता है। पूर्वमें अन्य की भार्या रहनेवाली स्त्री, उसके पुत्र तथा कृत्रिम पुत्र के मरणमें तीन रातका आशौच होता है। इसी प्रकार आचार्यके मरणमें भी तीन रातका आशौच होता है। गुरुपुत्र तथा गुरुपत्नीका एक अहोरात्रका और उपाध्याय तथा अपने ग्राममें श्रोत्रियकी मृत्यु होनेपर भी एक दिनका आशौच होता है। ३१-३५ ॥
त्रिरात्रमसपिण्डेषु स्वगृहे संस्थितेषु च।
एकाहं चास्ववर्ये स्यादेकरात्रं तदिष्यते॥३६॥
त्रिरात्रं श्वश्रूमरणे श्वशुरे वै तदेव हि।
सद्यः शौचं समुद्दिष्टं सगोत्रे संस्थिते सति॥३७॥
शुध्येद् विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः।
वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति॥३८॥
क्षत्रविट्शूद्रदायादा ये स्युर्विप्रस्य बान्धवाः।
तेषामशौचे विप्रस्य दशाहाच्छुद्धिरिष्यते॥३९॥
अपने घरमें रहनेवाले असपिण्डीकी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है और अपने घरमें (स्वेच्छा से रहनेवाले) अन्य किसी व्यक्तिको मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। सास एवं ससुरके मरनेपर तीन रातका और अपने घरमें स्थित रहनेवाले सगोत्र के मरणमें सद्यः शौच कहा गया है। ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनमें, क्षत्रियकी बारह दिनमें, वैश्यकी पंद्रह दिन में और शूद्रकी एक माहमें शुद्धि होती है। ब्राह्मणद्वारा क्षत्राणी, वैश्या और शूद्रासे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनोंमें होती है॥३६-३९॥
राजन्यवैश्यावप्येवं हीनवर्णासु योनिषु।
स्वमेव शौचं कुर्यातां विशुद्ध्यर्थमसंशयम्॥४०॥
क्षत्रिय और वैश्यको भी हीनवर्णकी स्त्रियों से उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पूर्ण शुद्धिके लिये अपने वर्णके अनुसार विहित शौच-विधिका पालन करना चाहिये ॥४०॥
सर्वे तूत्तरवर्णानामशौचं कुर्युरादृताः।
तवर्णविधिदृष्टेन स्वं तु शौचं स्वयोनिषु॥४१॥
षड्रात्रं वा त्रिरात्रं स्यादेकरात्रं क्रमेण हि।
वैश्यक्षत्रियविप्राणां शूद्रेष्वाशौचमेव तु॥४२॥
अर्धमासोऽथ षड्रानं त्रिरात्रं द्विजपुंगवाः।
शूद्रक्षत्रियविप्राणां वैश्येष्वाशौचमिष्यते॥४३॥
षड्रात्रं वै दशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः।
अशौचं क्षत्रिये प्रोक्तं क्रमेण द्विजपुंगवाः॥४४॥
शूद्रविक्षत्रियाणां तु ब्राह्मणे संस्थिते सति।
दशरात्रेण शुद्धिः स्यादित्याह कमलोद्भवः॥४५॥
सभी वर्णके व्यक्तियोंको उत्तर वर्णके लिये विहित अशौचका आदरपूर्वक पालन करना चाहिये। किंतु अपने वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न बन्धुकी मृत्यु होनेपर अपने ही वर्णके अनुसार अशौचका पालन करना चाहिये। शूद्र सपिण्डकी मृत्यु या जन्म होनेपर वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणोंको क्रमानुसार छः रात, तीन रात और एक रातका आशौच होता है। द्विजश्रेष्ठो! वैश्य सपिण्डके जन्म या मृत्युपर शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मणोंको क्रमश: आधे मास, छः रात तथा तीन रातका आशौच होता है। द्विजश्रेष्ठो! क्षत्रिय सपिण्डके जन्म या मरणमें क्रमश: ब्राह्मणको छः दिन और वैश्य तथा शूद्रको दस दिनोंका अशौच होता है। ब्रह्माजीने कहा है कि ब्राह्मण (सपिण्ड)-का (जन्म-मरण होनेपर) शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रियकी शुद्धि दस रातमें होती है ॥ ४१-४५ ॥
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हत्य बन्धुवत्।
अशित्वा च सहोषित्वा दशरात्रेण शुध्यति॥४६॥
यद्यन्नमत्ति तेषां तु त्रिरात्रेण ततः शुचिः।
अनदन्नन्नमलैव न च तस्मिन् गृहे वसेत्॥४७॥
सोदकेष्वेतदेव स्यान्मातुराप्तेषु बन्धुषु।
दशाहेन शवस्पर्श सपिण्डश्चैव शुध्यति॥४८॥
यदि निर्हरति प्रेतं प्रलोभाक्रान्तमानसः।
दशाहेन द्विजः शुध्येद् द्वादशाहेन भूमिपः॥४९॥
अर्धमासेन वैश्यस्तु शूद्रो मासेन शुध्यति।
षड्रात्रेणाथवा सर्वे त्रिरात्रेणाथवा पुनः॥५०॥
असपिण्ड द्विजकी मृत्यु होनेपर बन्धुवत् उसके प्रेतकर्ममें सम्मिलित होकर भोजन एवं निवास करनेवाला ब्राह्मण दस रातमें शुद्ध होता है। मृत व्यक्तिके यहाँ भोजन करनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। अन्न न खानेवालेकी उसी दिन शुद्धि हो जाती है, परंतु उसके घरमें निवास नहीं करना चाहिये। समानोदक तथा माताके श्रेष्ठ बान्धवोंके मरणमें शव वहन करनेवाला सपिण्ड व्यक्ति दस दिनोंमें शुद्ध होता है। यदि कोई व्यक्ति लोभके वशीभूत हो शवको ढोता है तो वह यदि ब्राह्मण है तो दस दिनोंमें, क्षत्रिय है तो बारह दिनोंमें, वैश्य है तो आधे मासमें और शूद्र है तो एक मासमें शुद्ध होता है अथवा सभी वर्णके व्यक्ति छः रात या तीन रातमें शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४६-५० ॥
अनाथं चैव निर्हत्य ब्राह्मणं धनवर्जितम्।
स्नात्वा सम्प्राश्य तु घृतंशुध्यन्ति ब्राह्मणादयः॥५१॥
धनहीन अनाथ ब्राह्मणके शवका वहन आदि कर्म करनेवाले ब्राह्मणादि स्नान करके घृतका प्राशन करने से शुद्ध हो जाते हैं॥५१॥
अवरश्चेद् वरं वर्णमवरं वा वरो यदि।
अशौचे संस्पृशेत् स्नेहात् तदाशौचेन शुध्यति॥५२॥
प्रेतीभूतं द्विजं विप्रो योऽनुगच्छेत कामतः ।
स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥५३॥
एकाहात् क्षत्रिये शुद्धिर्वैश्ये स्याच्च द्वयहेन तु।
शूद्रे दिनत्रयं प्रोक्तं प्राणायामशतं पुनः ॥ ५४॥
स्नेहवश यदि हीनवर्णके व्यक्ति उच्च वर्णके शवका और उच्च वर्णके व्यक्ति हीनवर्णके शवका स्पर्श करते हैं तो वे उस मृतवर्णके निर्धारित अशौच (नियमपालन)- से शुद्ध होते हैं। यदि ब्राह्मण अपनी इच्छासे मरे हुए द्विजका अनुगमन करता है (शव-यात्रामें जाता है) तो वह वस्त्रसहित स्नानकर, अग्निका स्पर्श करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाता है। (द्विजके शवका अनुगमन करनेपर) क्षत्रियकी शुद्धि एक दिनमें, वैश्यकी दो दिनमें, शूद्रकी तीन दिनोंमें कही गयी है। (अशौचके दिन बीतनेके बाद) सौ बार प्राणायाम (भी शुद्धिके लिये) करना चाहिये ।। ५२-५४॥
अनस्थिसंचिते शूद्रे रौति चेद् ब्राह्मणः स्वकैः ।
त्रिरात्रं स्यात् तथाशौचमेकाहं त्वन्यथा स्मृतम्॥५५॥
अस्थिसंचयनादर्वागेकाहं क्षत्रवैश्ययोः।
अन्यथा चैव सज्योतिर्ब्राह्मणे स्नानमेव तु॥५६॥
अनस्थिसंचिते विप्रे ब्राह्मणो रौति चेत् तदा।
स्नानेनैव भवेच्छुद्धिः सचैलेन न संशयः॥५७॥
शूद्रके अस्थिसंचय होनेसे पहले यदि ब्राह्मण उसके स्वजनोंके साथ विलाप करता है तो उसे तीन रातका अशौच होता है, इसके विपरीत (अस्थि-संचयनतक प्रेतकर्म हो जानेके अनन्तर यदि शूद्रका मरण जानकर ब्राह्मण उसके बान्धवोंके साथ विलाप करता है, उनका स्पर्श करता है तो उसे) एक दिनका अशौच होता है। अस्थिसंचयके पूर्व (शूद्रके घर विलाप करनेवाले) क्षत्रिय एवं वैश्यको एक दिनका और अन्य अवस्थामें सज्योति(काल)-तकका आशौच होता है। ब्राह्मण की स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। ब्राह्मणके अस्थिसंचयके पूर्व यदि (असपिण्ड, असगोत्र, सम्बन्धरहित) ब्राह्मण रोता है तो वस्त्रोंसहित स्नानमात्रसे उसकी शुद्धि हो जाती है, इसमें संदेह नहीं ॥५५-५७॥
यस्तैः सहाशनं कुर्याच्छयनादीनि चैव हि।
बान्धवो वापरो वापि स दशाहेन शुध्यति॥५८॥
यस्तेषामन्नमश्नाति सकृदेवापि कामतः ।
तदाशौचे निवृत्तेऽसौ स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥५९॥
यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षोपहतो नरः।
तावन्त्यहान्यशौचं स्यात् प्रायश्चित्तं ततश्चरेत्॥६०॥
आशौचीजनोंके साथ जो भोजन तथा शयन आदि करता है, वह चाहे बान्धव हो या कोई दूसरा, दस दिनमें शुद्ध होता है। जो इच्छापूर्वक उनका एक बार भी अन्न ग्रहण करता है तो वह अशौच पूरा होने पर स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। दुर्भिक्षसे पीड़ित व्यक्ति जितने दिनतक उस (अशौची)-का अन्न ग्रहण करता है, उतने दिनोंतकका उसे अशौच होता है, तदनन्तर उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥५८-६०॥
दाहाद्यशौचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रिणाम्।
सपिण्डानां तु मरणे मरणादितरेषु च॥१॥
सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।
समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने॥६२॥
अग्निहोत्री द्विजोंका दाह-कालसे अशौच आरम्भ होता है, अतः (तभीसे इनके मरणके निमित्त) नियम का पालन करना चाहिये। सपिण्डोंके मरने तथा जन्ममें भी अशौचका पालन करना चाहिये। पुरुषको सपिण्डता सातवीं पीढ़ीमें समाप्त हो जाती है। अपने वंशके मूल पुरुषका नाम ज्ञात न होनेपर समानोदकता नष्ट हो जाती है ॥६१-६२॥
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः ।
लेपभाजस्त्रयश्चात्मा सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥६३॥
अप्रत्तानां तथा स्त्रीणां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्।
ऊढानां भर्तृसापिण्ड्यं प्राह देवः पितामहः॥ ६४॥
ये चैकजाता बहवो भिन्नयोनय एव च।
भिन्नवर्णास्तु सापिण्ड्यं भवेत् तेषां त्रिपूरुषम्॥६५॥
पिता, पितामह तथा प्रपितामह-इन तीनोंसे आगे के पितर लेपभागी होते हैं। सात पुरुषोंतक सपिण्डता होती है। अविवाहित कन्याओंकी सपिण्डता उसके पिता के सात पुरुषों (पीढ़ीतक)-में होती है और विवाहित स्त्रियों की सपिण्डता उसके पतिके साथ (सात पीढ़ी तक) होती है-ऐसा भगवान् ब्रह्माने कहा है। एक पुरुषद्वारा भिन्न वर्णकी* स्त्रियोंसे उत्पन्न पुत्रोंकी सपिण्डता तीन पीढ़ीतक होती है॥६३-६५ ॥
कारवः शिल्पिनो वैद्या दासीदासास्तथैव च।
दातारो नियमी चैव ब्रह्मविद्ब्रह्मचारिणी॥६६॥
सत्रिणो व्रतिनस्तावत् सद्यःशौचा उदाहृताः।
राजा चैवाभिषिक्तश्च प्राणसत्रिण एव च॥६७॥
यज्ञे विवाहकाले च देवयागे तथैव च।
सद्य:शौचं समाख्यातं दुर्भिक्षे चाप्युपद्रवे॥ ६८॥
डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवैर्द्विजैः।
सद्यःशौचं समाख्यातं सर्पादिमरणे तथा॥१९॥
अग्नौ मरुप्रपतने वीराध्वन्यप्यनाशके।
ब्राह्मणार्थे च संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते॥७०।।
बढ़ई, शिल्पी, वैद्य, दासी, दास, दाता, व्रतपरायण, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी, यज्ञकर्ता, व्रती-ये सभी (किसीका मरण होनेपर) स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार अभिषिक्त राजा एवं प्राणकी रक्षा करनेवाले अन्नदाता को भी सद्यः शौच होता है। यज्ञ, विवाहारम्भ, देवपूजनका आरम्भ हो जानेपर तथा दुर्भिक्ष और उपद्रवकी स्थिति में सद्यः शौच होता है। क्षत्रियों तथा ब्राह्मणोंके साथ मामूली लड़ाई अथवा झड़प आदिमें मरनेवालों तथा विद्युत् और सादिके कारण मरनेवालोंका सद्यः शौच कहा गया है। अग्निमें गिरकर अथवा मरुस्थल में मरनेपर, दुर्गम मार्गमें गमन और अकाल-मृत्युपर, ब्राह्मणके लिये मरनेपर तथा संन्यासी होनेके उपरान्त मृत्यु होनेपर सद्यः शौचका विधान है॥६६-७० ॥
नैष्ठिकानां वनस्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम्।
नाशौचं कीर्त्यते सद्भिः पतिते च तथा मृते॥७१॥
पतितानां न दाहः स्यानान्त्येष्टि स्थिसंचयः।
न चाश्रुपातपिण्डौ वा कार्यं श्राद्धादिकं क्वचित्॥७२॥
विद्वानोंने नैष्ठिक अर्थात् जीवनभर ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करनेवाले ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ-धर्मावलम्बी, यति तथा ब्रह्मचारीको मृत्यु होनेपर और पतित व्यक्ति की मृत्यु होनेपर अशौच नहीं बताया है। पतित व्यक्तियों का न दाह होता है, न अन्त्येष्टि-संस्कार होता है और न अस्थिसंचय ही होता है। उनके लिये अश्रुपात, पिण्डदान तथा श्राद्धादि कार्य भी कभी नहीं करने चाहिये॥७१-७२ ॥
व्यापादयेत् तथात्मानं स्वयं योऽग्निविषादिभिः ।
विहितं तस्य नाशौचं नाग्नि प्युदकादिकम्॥७३॥
अथ कश्चित् प्रमादेन म्रियतेऽग्निविषादिभिः।
तस्याशौचं विधातव्यं कार्यं चैवोदकादिकम्॥७४॥
जाते कुमारे तदहः कामं कुर्यात् प्रतिग्रहम्।
हिरण्यधान्यगोवासस्तिलानगुडसर्पिषाम् ॥७५॥
जो व्यक्ति अग्नि तथा विष आदिके द्वारा स्वयं अपनी आत्महत्या करता है, उसके निमित्त अशौच, दाह तथा उदकदान आदिका विधान नहीं है। यदि कोई प्रमादवश अग्नि अथवा विष आदिद्वारा मर जाता है, उसके (सम्बन्धियोंके) लिये अशौचका विधान है और उदकदान आदि भी करना चाहिये। पुत्रका जन्म
होनेपर उस दिन स्वर्ण, धान्य, गौ, वस्त्र, तिल, अन्न, गुड़ तथा घृत-इन वस्तुओंका इच्छापूर्वक (कार्पण्यरहित होकर) दान करना चाहिये ।।७३-७५॥
फलानि पुष्पं शाकं च लवणं काष्ठमेव च।
तोयं दधि घृतं तैलमौषधं क्षीरमेव च।
आशौचिनां गृहाद् ग्राह्यं शुष्कानं चैव नित्यशः॥७६॥
आहिताग्निर्यथान्यायं दग्धव्यस्त्रिभिरग्निभिः।
अनाहिताग्निर्गृह्येण लौकिकेनेतरो जनः॥७७॥
देहाभावात् पलाशैस्तु कृत्वा प्रतिकृतिं पुनः ।
दाहः कार्यो यथान्यायं सपिण्डै: श्रद्धयान्वितैः॥७८॥
आशौची व्यक्तियोंके घरोंसे फल, पुष्प, शाक, लवण, काष्ठ, मट्ठा, दही, घी, तेल, औषधि तथा क्षीर और शुष्कान्नको नित्य ग्रहण किया जा सकता है। आहिताग्नि श्रोत्रियका दाह-संस्कार तीनों अग्नियों से यथाविधि करना चाहिये और अनाहिताग्निका दाह गृह्याग्निसे तथा दूसरे सामान्य लोगोंका दाह लौकिक अग्निसे करना चाहिये। (मृत व्यक्तिके) देहका अभाव (शव न मिलनेपर) होनेपर पलाशके पत्तोंसे उसके ही समान आकृति बनाकर सपिण्डीजनोंको चाहिये कि वे श्रद्धायुक्त होकर विधिपूर्वक दाह-संस्कार करें॥७६-७८॥
सकृत्प्रसिञ्चन्त्युदकं नामगोत्रेण वाग्यताः।
दशाहं बान्धवैः सार्धं सर्वे चैवाईवाससः॥७९॥
पिण्डं प्रतिदिनं दद्युः सायं प्रातर्यथाविधि।
प्रेताय च गृहद्वारि चतुर्थे भोजयेद् द्विजान्॥८०॥
सभी बान्धवोंको संयमपूर्वक दस दिनों तक (मृत व्यक्ति के) नाम तथा गोत्रका उच्चारण करते हुए स्नान के गीले वस्त्र पहने हुए ही एक बार जलदान करना चाहिये। प्रेतके निमित्त यथाविधि प्रात:से सायंकाल (अर्थात् दिनमें किसी भी समय) प्रतिदिन पिण्डदान करना चाहिये और चौथे दिनसे घरके द्वारपर (अभ्यागत) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥७९-८०॥
द्वितीयेऽहनि कर्तव्यं क्षुरकर्म सबान्धवैः।
चतुर्थे बान्धवैः सर्वैरस्थनां संचयनं भवेत्।
पूर्वं तु भोजयेद् विप्रानयुग्मान् श्रद्धया शुचीन्॥८१॥
पञ्चमे नवमे चैव तथैवैकादशेऽहनि।
अयुग्मान् भोजये विप्रान् नवश्राद्धंतु तद्विदुः॥८२॥
एकादशेऽह्नि कुर्वीत प्रेतमुद्दिश्य भावतः।
द्वादशे वाथ कर्तव्यमनिन्द्ये त्वथवाहनि।
एकं पवित्रमेकोऽर्घः पिण्डपात्रं तथैव च॥८३॥
दूसरे दिन बान्धवोंके साथ क्षौरकर्म करना चाहिये। चौथे दिन बन्धुओंसहित अस्थिसंचयन करना चाहिये। अस्थिसंचयनसे पूर्व श्रद्धापूर्वक पवित्र अयुग्म (विषम संख्यावाले) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पाँचवें, नवें तथा ग्यारहवें दिन अयुग्म (विषम संख्यामें) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इसे नवश्राद्ध जानना चाहिये। प्रेतके निमित्त ग्यारहवें, बारहवें अथवा किसी अनिन्दित दिनमें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धमें एक पवित्र, एक अर्घ और एक ही पिण्डपात्र होता है॥ ८१-८३॥
एवं मृताह्नि कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम्।
सपिण्डीकरणं प्रोक्तं पूर्णे संवत्सरे पुनः॥८४॥
कुर्याच्चत्वारि पात्राणि प्रेतादीनां द्विजोत्तमाः।
प्रेताघु पितृपात्रेषु पात्रमासेचयेत् ततः॥८५॥
इसी प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक महीनेमें मृत्यु को तिथिको श्राद्ध करना चाहिये। संवत्सर (वर्ष)-के पूर्ण हो जानेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध करनेका विधान किया गया है। हे द्विजोत्तमो! प्रेतादि अर्थात् प्रेत, पितामह, प्रपितामह तथा वृद्ध प्रपितामहके उद्देश्यसे चार अर्घ- पात्र बनाना चाहिये और पितृपात्रोंमें प्रेतपात्रका अर्घ डालना चाहिये। ८४-८५॥
ये समाना इति द्वाभ्यां पिण्डानप्येवमेव हि।
सपिण्डीकरणं श्राद्धं देवपूर्वं विधीयते॥८६॥
पितॄनावाहयेत् तत्र पुनः प्रेतं च निर्दिशेत्।
ये सपिण्डीकृताः प्रेता न तेषां स्यात् पृथक्रियाः।
यस्तु कुर्यात् पृथक् पिण्डं पितृहा सोऽभिजायते॥८७॥
'ये समाना:०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारणकर पितामहादि के पिण्डों में प्रेतपिण्डको मिलाना चाहिये। देवश्राद्ध करने के अनन्तर सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। पहले पितरों का आवाहनकर पुनः प्रेतका आवाहन करना चाहिये। जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण कर लिया जाता है, उनकी श्राद्धक्रिया पृथक् नहीं होती। जो (सपिण्डीकृत प्रेत का) पृथक् पिण्डदान करता है, वह पितृघाती
कहलाता है॥ ८६-८७॥
मृते पितरि वै पुत्रः पिण्डमब्दं समाचरेत्।
दद्याच्चानं सोदकुम्भं प्रत्यहं प्रेतधर्मतः॥८८॥
पार्वणेन विधानेन सांवत्सरिकमिष्यते।
प्रतिसंवत्सरं कार्यं विधिरेष सनातनः ।।८९॥
मातापित्रोः सुतैः कार्यं पिण्डदानादिकं च यत् ।
पत्नी कुर्यात् सुताभावे पत्न्यभावे सहोदरः॥९० ॥
अनेनैव विधानेन जीवन् वा श्राद्धमाचरेत्।
कृत्वा दानादिकं सर्वं श्रद्धायुक्तः समाहितः ॥९१॥
पिताके मर जानेपर पुत्रको वर्षपर्यन्त पिण्डदान करना चाहिये। प्रतिदिन प्रेतधर्मानुसार उदककुम्भ एवं अन्न का दान करना चाहिये। प्रत्येक वर्ष पार्वण-विधानके अनुसार सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। यही सनातन विधि है । पुत्रोंको माता-पिताका पिण्डदान आदि जो कार्य है, वह सब करना चाहिये। पुत्र के अभाव होनेपर पत्नी करे और पत्नीके अभाव होनेपर सहोदर भाई करे। अथवा (पुत्रादि श्राद्ध न कर सकें या इनके अभावमें) सभी दान आदि कर्म करनेके बाद समाहित होकर मनुष्यको श्रद्धापूर्वक यथाविधान जीते हुए ही श्राद्ध कर लेना चाहिये (इससे श्राद्धकी अनिवार्यता स्पष्ट है)॥८८-९१॥
एष वः कथितः सम्यग् गृहस्थानां क्रियाविधिः ।
स्त्रीणां तु भर्तृशुश्रूषा धर्मो नान्य इहेष्यते॥९२॥
स्वधर्मपरमो नित्यमीश्वरार्पितमानसः।
प्राप्नोति तत् परं स्थानं यदुक्तं वेदवादिभिः॥९३॥
इस प्रकार मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंकी क्रिया-विधि सम्यक्रूपसे बतलायी। स्त्रियोंका तो पतिकी सेवा करना ही एकमात्र धर्म है, उनका अन्य कोई धर्म नहीं कहा गया है। नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला और भगवान्में समर्पित मनवाला वेदज्ञोंद्वारा बताये गये उस परम पदको प्राप्त करता है ॥९२-९३ ॥
Summary of chapter 72 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa expounds the sacred etiquette of taking meal offerings, treating food as a holy sacrifice (Prāṇāgnihotra) offered to the five inner Prāṇas. He details the evening Sandhyāvandana, performance of evening Agnihotra, and night routines, including auspicious rules regarding sleep direction and celibacy. Vyāsa concludes that a householder who strictly adheres to these daily routines cleanses all past sins and attains heavenly realms.