कूर्म महा पुराण
28 अध्याय
संन्यासधर्मका प्रतिपादन, संन्यासियोंके भेद तथा संन्यासीके कर्तव्योंका वर्णन
व्यास उवाच
एवं वनाश्रमे स्थित्वा तृतीयं भागमायुषः।
चतुर्थमायुषो भागं संन्यासेन नयेत् क्रमात्॥१॥
अग्नीनात्मनि संस्थाप्य द्विजः प्रव्रजितो भवेत्।
योगाभ्यासरतः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः॥२॥
यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु।
तदा संन्यासमिच्छेच्च पतितः स्याद् विपर्यये॥३॥
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा पुनः।
दान्तः पक्वकषायोऽसौ ब्रह्माश्रममुपाश्रयेत्॥४॥
व्यासजीने कहा-इस प्रकार वानप्रस्थ-आश्रममें आयुके तीसरे भागको व्यतीतकर क्रमशः आयुके चौथे भागको संन्यास-आश्रमद्वारा व्यतीत करना चाहिये। अग्नियोंको आत्मामें प्रतिष्ठित कर द्विजको संन्यास ग्रहण करना चाहिये। उसे योगाभ्यासमें निरत, शान्त तथा ब्रह्मविद्यापरायण रहना चाहिये। जब सभी वस्तुओं के प्रति मनमें वितृष्णा उत्पन्न हो जाय, तब संन्यास ग्रहण करनेकी इच्छा करनी चाहिये। इसके विपरीत करने से (अर्थात् स्वल्प भी तृष्णाके रहते संन्यास ग्रहण करनेपर) मनुष्य पतित हो जाता है। प्राजापत्य अथवा आग्नेय
याग करके इन्द्रियनिग्रही एवं पूर्ण वैराग्यवान् द्विजको ब्रह्माश्रम (संन्यासाश्रम)-का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥१-४॥
ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनः परे।
कर्मसंन्यासिनस्त्वन्ये त्रिविधाः परिकीर्तिताः॥५॥
कुछ ज्ञानसंन्यासी होते हैं, कुछ वेदसंन्यासी होते हैं और कुछ कर्मसंन्यासी होते हैं। इस प्रकार तीन प्रकारके संन्यासी कहे गये हैं॥५॥
यः सर्वसङ्गनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वश्चैव निर्भयः।
प्रोच्यते ज्ञानसंन्यासी स्वात्मन्येव व्यवस्थितः॥ ६ ॥
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं निराशी निष्परिग्रहः।
प्रोच्यते वेदसंन्यासी मुमुक्षुर्विजितेन्द्रियः ॥ ७ ॥
यस्त्वग्नीनात्मसात्कृत्वा ब्रह्मार्पणपरो द्विजः ।
ज्ञेयः स कर्मसंन्यासी महायज्ञपरायणः॥ ८ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां ज्ञानी त्वभ्यधिको मतः।
न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्ग वा विपश्चितः॥ ९ ॥
द्वन्द्वों से जो सभी आसक्तियोंसे मुक्त है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित है और निर्भय है, अपनी आत्मामें ही प्रतिष्ठित रहनेवाला है, वह ज्ञानसंन्यासी कहलाता है। जो नित्य वेदका ही अभ्यास (स्वाध्याय) करता रहता है, आशारहित है, संग्रहशून्य है, जितेन्द्रिय है तथा मोक्ष की इच्छा रखनेवाला है, वह वेदसंन्यासी कहा जाता है। जो अग्नियोंको आत्मसात्कर ब्रह्मार्पणतत्पर रहता है, उस महायज्ञपरायण (सतत ब्रह्मचिन्तन-परायण) द्विजको कर्मसंन्यासी जानना चाहिये। इन तीनोंमें ज्ञानी (ज्ञान-संन्यासी)-को अधिक श्रेष्ठ माना गया है। उस (ज्ञानी)-का न कोई कर्तव्य (शेष) रह जाता है और न कोई चिह्न ही होता है ॥६-९॥
निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वः पर्णभोजनः ।
जीर्णकौपीनवासा: स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः १०॥
संन्यासीको ममताशून्य, भयरहित, शान्त, परे, पत्तोंका ही आहार करनेवाला, जीर्ण कौपीन को वस्त्र-रूपमें धारण करनेवाला अथवा नग्न और ध्यान-परायण होना चाहिये ॥ १०॥
ब्रह्मचारी मिताहारो ग्रामादन्नं समाहरेत्।
अध्यात्ममतिरासीत निरपेक्षो निरामिषः ॥११॥
आत्मनैव सहायेन सुखार्थं विचरेदिह।
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्॥१२॥
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा।
नाध्येतव्यं न वक्तव्यं श्रोतव्यं न कदाचन।
एवं ज्ञात्वा परो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१३॥
(संन्यासी) ब्रह्मचर्यका पालन करे, सीमित मात्रा में आहार ग्रहण करे, ग्रामसे अन्न माँगकर लाये। अध्यात्म (ज्ञान)-में बुद्धि रखे, निरपेक्ष रहे तथा निरामिष रहे। अपनी ही सहायतासे अर्थात् स्वावलम्बी होकर आत्मतुष्टि के लिये इस संसारमें विचरण करे, न तो मृत्युका ही
अभिनन्दन करे और न जीवनका अभिनन्दन करे। जिस प्रकार सेवक (अपने स्वामीके) आज्ञाकी प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। न कभी अध्ययन करे, न प्रवचन करे और न कुछ श्रवण ही करे। इस प्रकारका ज्ञान रखकर (आत्मनिष्ठ होकर) वह श्रेष्ठ योगी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥११-१३॥
एकवासाथवा विद्वान् कौपीनाच्छादनस्तथा।
मुण्डी शिखी वाथ भवेत् त्रिदण्डी निष्परिग्रहः ।
काषायवासाः सततं ध्यानयोगपरायणः॥१४॥
ग्रामान्ते वृक्षमूले वा वसेद् देवालयेऽपि वा।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेत् क्वचित्॥ १५॥
विद्वान् संन्यासी (कौपीनके साथ) एक वस्त्र (उत्तरीय) धारण करे अथवा कौपीनमात्रसे शरीर का आच्छादन करे। मुण्डित सिर अथवा जटाधारी रहे। त्रिदण्डी रहे, संचयवृत्तिसे शून्य रहे। काषाय वस्त्र ही धारण करे और निरन्तर ध्यानयोगमें परायण रहे। उसे (संन्यासीको) ग्रामकी सीमापर, वृक्षके मूलमें अथवा किसी देवमन्दिरमें रहना चाहिये। शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें समान रहना चाहिये। नित्य भिक्षावृत्ति से निर्वाह करे। कभी भी उसे किसी एक ही व्यक्ति का अन्न खानेवाला नहीं होना चाहिये॥१४-१५॥
यस्तु मोहेन वालस्यादेकान्नादी भवेद् यतिः ।
न तस्य निष्कृतिः काचिद्धर्मशास्त्रेषु कथ्यते॥१६॥
रागद्वेषविमुक्तात्मा समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मौनी स्यात् सर्वनिस्पृहः॥१७॥
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद् वाणी मनःपूतं समाचरेत्॥१८॥
जो संन्यासी मोह या आलस्यवश किसी एक ही व्यक्तिका अन्न भक्षण करता है, उसकी मुक्तिका कोई उपाय धर्मशास्त्रोंमें नहीं बतलाया गया है। (संन्यासीको) राग-द्वेषसे मुक्त, मिट्टी, पत्थर और सोनेमें समान भाव रखनेवाला, प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त, मौनी और सब प्रकारसे आसक्तिशून्य होना चाहिये, अच्छी तरह देखकर पैर रखना चाहिये, वस्त्रसे छानकर जल पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वाणी बोलनी चाहिये और मनसे शुद्ध आचरण करना चाहिये॥१६-१८॥
नैकत्र निवसेद् देशे वर्षाभ्योऽन्यत्र भिक्षुकः।
स्नानशौचरतो नित्यं कमण्डलुकरः शुचिः॥१९॥
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं वनवासरतो भवेत्।
मोक्षशास्त्रेषु निरतो ब्रह्मसूत्री जितेन्द्रियः ॥२०॥
दम्भाहंकारनिर्मुक्तो निन्दापैशुन्यवर्जितः ।
आत्मज्ञानगुणोपेतो यतिर्मोक्षमवाप्नुयात्॥ २१॥
अभ्यसेत् सततं वेदं प्रणवाख्यं सनातनम्।
स्नात्वाचम्य विधानेन शुचिर्देवालयादिषु ॥२२॥
संन्यासीको वर्षा-ऋतुके अतिरिक्त (अन्य ऋतुओंमें) किसी एक ही स्थानपर नहीं रहना चाहिये। नित्य स्नान एवं शौचमें तत्पर, हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाला तथा पवित्र होना चाहिये। नित्य ब्रह्मचर्यव्रत धारण करना चाहिये, वनवासी ही रहना चाहिये तथा मोक्षविषयक शास्त्राध्ययनमें निरत रहते हुए ब्रह्मसूत्री (यज्ञोपवीत से युक्त दण्डधारी) और जितेन्द्रिय रहना चाहिये। दम्भ-अहंकार से मुक्त रहे, निन्दा तथा पिशुनता (चुगलखोरी) का सर्वथा परित्याग करे। आत्मज्ञानसम्बन्धी गुणों से सम्पन्न रहे-ऐसा संन्यासी मोक्ष प्राप्त करता है। विधिपूर्वक स्नानोपरान्त आचमन करके पवित्रतापूर्वक देवालयों में प्रणव नामक सनातन वेद (मन्त्र)-का निरन्तर अभ्यास (जप) करे। १९-२२॥
यज्ञोपवीती शान्तात्मा कुशपाणिः समाहितः।
धौतकाषायवसनो भस्मच्छन्नतनूरुहः॥२३॥
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत्॥२४॥
पुत्रेषु वाथ निवसन् ब्रह्मचारी यतिर्मुनिः।
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं स याति परमां गतिम्॥ २५॥
यज्ञोपवीती, शान्तात्मा, हाथमें कुश धारण करने वाला, एकाग्रचित्त, धुला हुआ काषाय वस्त्र धारण करनेवाला और भस्मसे धूसरित देहवाला रहना चाहिये । संन्यासीको वेदान्त-प्रतिपादित अधियज्ञ, (समस्त यज्ञोंके अधिष्ठान) आधिदैविक तथा आध्यात्मिक ब्रह्म (मन्त्र-प्रणव)-का सतत जप करना चाहिये। अथवा मननशील तथा ब्रह्मचारी यतिको पुत्रोंके बीच रहते हुए नित्य वेदका ही अभ्यास करना चाहिये, इससे उसे परम गति प्राप्त होती है॥ २३-२५ ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं तपः परम्।
क्षमा दया च संतोषो व्रतान्यस्य विशेषतः॥२६॥
वेदान्तज्ञाननिष्ठो वा पञ्च यज्ञान् समाहितः।
कुर्यादहरहः स्नात्वा भिक्षान्नेनैव तेन हि॥२७॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ तप, क्षमा, दया और संतोष-ये ब्रह्मचारी यति के विशेष व्रत हैं। अथवा वेदान्त-ज्ञानमें निष्ठाके साथ समाहित होकर स्नानादि कर भिक्षामें प्राप्त अन्नसे नित्य पञ्चमहायज्ञोंका सम्पादन करना चाहिये (इसे विरक्त
कर्मयोगीका धर्म समझना चाहिये)॥२६-२७॥
होममन्त्राञ्जपेन्नित्यं काले काले समाहितः।
स्वाध्यायं चान्वहं कुर्यात् सावित्री संध्ययोर्जपेत् ॥ २८॥
ध्यायीत सततं देवमेकान्ते परमेश्वरम्।
एकान्नं वर्जयेन्नित्यं काम क्रोधं परिग्रहम्॥२९॥
एकवासा द्विवासा वा शिखी यज्ञोपवीतवान्।
कमण्डलुकरो विद्वान् त्रिदण्डी याति तत्परम्॥३०॥
नियत समयपर समाहित होकर नित्य होम-मन्त्रों का जप करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे और संध्याओंमें गायत्रीका जप करे। एकान्तमें निरन्तर परमेश्वरदेवका ध्यान करे। नित्य एक ही व्यक्ति के अन्नका और काम, क्रोध तथा परिग्रहका त्याग करे। एक वस्त्र अथवा दो वस्त्र धारण करे। शिखा एवं यज्ञोपवीत धारण करे। हाथमें कमण्डलु धारण करे, ऐसा त्रिदण्डी विद्वान् भी (अनासक्त-द्वन्द्वातीत कर्मयोगी होनेके कारण) परम पदको प्राप्त करता है॥२८-३०॥
Summary of chapter 77 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa details the specific methods for purifying various physical materials that become subtly polluted. He prescribes water, ash, earth, fire, and sunshine for cleansing metals, wooden vessels, stone implements, textiles, grains, and living spaces. Vyāsa highlights that physical cleanliness combined with Vedic Mantras restores full ceremonial purity to all household articles.