कूर्म महा पुराण
37 अध्याय
देवदारु-वनमें स्थित मुनियोंका वृत्तान्त एवं शिवलिङ्गका पतन, मुनियोंको ब्रह्माका
उपदेश, शिवको प्रसन्न करने हेतु ऋषियोंद्वारा तपस्या तथा स्तुति,
शिवद्वारा सांख्यका उपदेश
ऋषय ऊचुः
कथं दारुवनं प्राप्तो भगवान् गोवृषध्वजः।
मोहयामास विप्रेन्द्रान् सूत वक्तुमिहार्हसि ॥ १ ॥
ऋषियोंने कहा-सूतजी! इस समय आप यह बतलायें कि भगवान् गोवृषध्वजने दारुवनमें आकर ब्राह्मणोंको क्यों मोहित किया? ॥१॥
सूत उवाच
पुरा दारुवने रम्ये देवसिद्धनिषेविते।
सपुत्रदारा मुनयस्तपश्चेरुः सहस्रशः॥ २ ॥
प्रवृत्तं विविधं कर्म प्रकुर्वाणा यथाविधि।
यजन्ति विविधैर्यज्ञैस्तपन्ति च महर्षयः॥ ३ ॥
सूतजी बोले-प्राचीन कालमें देवताओं तथा सिद्धोंसे सेवित रमणीय दारुवनमें हजारों मुनिजन अपने पुत्रों तथा अपनी स्त्रियोंके साथ तपस्या करते थे। विविध कर्मों में प्रवृत्त होते हुए तथा यथाविधि उन्हें सम्पन्न करते हुए वे महर्षिगण विविध यज्ञोंसे यजन तथा तप करते थे॥२-३॥
तेषां प्रवृत्तिविन्यस्तचेतसामथ शूलधृक् ।
ख्यापयन् स महादोषं ययौ दारुवनं हरः॥ ४ ॥
कृत्वा विश्वगुरुं विष्णुंपार्श्वे देवो महेश्वरः।
ययौ निवृत्तिविज्ञानस्थापनार्थं च शंकरः॥ ५ ॥
आस्थाय विपुलं वेशमूनविंशतिवत्सरः।
लीलालसो महाबाहुः पीनाङ्गश्चारुलोचनः॥ ६ ॥
तदनन्तर त्रिशूल धारण करनेवाले वे हर प्रवृत्ति मार्ग में मन लगानेवाले उन ऋषियोंके महान् दोषका वर्णन करते हुए दारुवन में गये। महेश्वर देव शंकर निवृत्ति विज्ञान की स्थापना करनेके लिये विश्वके गुरु विष्णुको अपने पार्श्वमें लेकर वहाँ गये। महान् बाहुवाले, पुष्ट शरीरवाले तथा सुन्दर नेत्रवाले उन्नीस वर्षके लीलायुक्त पुरुष का वेश धारणकर श्रीशंकर वहाँ गये ॥ ४-६॥
चामीकरवपुः श्रीमान् पूर्णचन्द्रनिभाननः ।
मत्तमातङ्गगमनो दिग्वासा जगदीश्वरः॥ ७ ॥
कुशेशयमयीं मालां सर्वरत्तैरलंकृताम्।
दधानो भगवानीशः समागच्छति सस्मितः॥ ८॥
जगदीश्वर (शंकर)- -का शरीर स्वर्ण-वर्णके समान तथा श्रीसम्पन्न था। उनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान, उनकी गति मतवाले हाथीके समान और दिशाएँ ही उनके वस्त्रका स्थान ले रखी थीं। सभी रत्नोंसे अलंकृत कमलोंकी माला धारण किये हुए भगवान् ईश मुसकराते हुए आ रहे थे॥७-८॥
योऽनन्तः पुरुषो योनिर्लोकानामव्ययो हरिः।
स्त्रीवेषं विष्णुरास्थाय सोऽनुगच्छति शूलिनम्॥ ९ ॥
सम्पूर्णचन्द्रवदनं पीनोन्नतपयोधरम्।
शुचिस्मितं सुप्रसन्न रणन्नूपुरकद्वयम्॥१०॥
मुलायसनं दिव्यं श्यामलं चारुलोचनम्।
साहपचलनं विलासि सुमनोहरम् ॥११॥
जो सभी लोकोंके उत्पत्ति-स्थान, अनन्त अव्यय पुरुष हरि विष्णु हैं, वे स्त्री-वेष धारणकर शूली शंकरका अनुगमन कर रहे थे। उनका मुख पूर्णिमा के चन्द्रके तुल्य था। पयोधर पीन और उन्नत थे। पवित्र मुसकान थी और वे (विष्णु) अत्यन्त प्रसन्न थे। दोनों चरणोंसे नूपुरकी ध्वनि हो रही थी, सुन्दर पीताम्बर उन्होंने धारण कर रखा था। दिव्य श्यामल शरीर था। नेत्र अत्यन्त सुन्दर थे। हंसके समान उदार गति थी। भगवान् विष्णु विलासमय एवं अति मनोहारी रूप धारण कर रखे थे॥९-११॥
एवं स भगवानीशो देवदारुवने हरः।
चचार हरिणा भिक्षा मायया मोहयन् जगत्॥१२॥
दृष्ट्वा चरन्तं विश्वेशं तत्र तत्र पिनाकिनम्।
मायया मोहिता नार्यो देवदेवं समन्वयुः॥१३॥
विस्त्रस्तवस्त्राभरणास्त्यक्त्वा लज्जां पतिव्रताः।
सहैव तेन कामार्ता विलासिन्यश्चरन्ति हि॥१४॥
ऋषीणां पुत्रका ये स्युर्युवानो जितमानसाः।
अन्वगच्छन् हृषीकेशं सर्वे कामप्रपीडिताः॥१५॥
इस प्रकारके (स्त्री-वेषवाले) हरिके साथ वे । भगवान् ईश हर अपनी मायासे संसारको मोहित करते हुए भिक्षाके लिये दारुवनमें विचरण करने लगे। पिनाकी विश्वेश्वरको स्थान-स्थानपर भ्रमण करते देखकर (उनकी) मायासे मोहित हो (देवदारु-वनकी) स्त्रियाँ देवाधिदेवका अनुगमन करने लगीं। अस्त-व्यस्त वस्त्र तथा आभरणोंवाली ये सभी पतिव्रता स्त्रियाँ लज्जा का परित्यागकर विलासयुक्त और कामार्त होकर उन्हीं के साथ भ्रमण करने लगी। जिन्होंने अपने मनको वश में कर रखा था, ऋषियोंके वे सभी युवा पुत्र भी कामपीड़ित होकर (स्त्रीरूपधारी) हृषीकेशके पीछे-पीछे चलने लगे॥१२-१५॥
गायन्ति नृत्यन्ति विलासवाह्या
नारीगणा मायिनमेकमीशम्।
दृष्ट्वा सपत्नीकमतीवकान्त-
मिच्छन्त्यथालिङ्गनमाचरन्ति ॥१६॥
पदे निपेतुः स्मितमाचरन्ति
गायन्ति गीतानि मुनीशपुत्राः।
आलोक्य पद्मापतिमादिदेवं
भ्रूभङ्गमन्ये विचरन्ति
आसामथैषामपि वासुदेवो
मायी मुरारिर्मनसि प्रविष्टः।
करोति भोगान् मनसि प्रवृत्तिं
मायानुभूयन्त इतीव सम्यक् ॥१८॥
पत्नीके रूपमें श्रीविष्णुको साथमें लेकर चलनेवाले अतीव सुन्दर, मायामय, अद्वितीय ईश (श्रीशंकर) को देखकर (महर्षियोंकी) विलासिनी स्त्रियाँ नाचने गाने लगीं, उन्हें प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगीं और उनका आलिंगन करने लगीं। लक्ष्मीके पति आदिदेव (विष्णु)-को (स्त्री-रूपमें) देखकर मुनीश्वरों के पुत्र उनके पैरोंपर गिरने लगे, मुसकराने लगे और गीत गाने लगे। दूसरे मुनिपुत्र भ्रूविलास (कटाक्षपात) करते हुए उनके साथ विचरण करने लगे। उन (स्त्रियों) तथा उन (पुरुषों)-के मनमें प्रविष्ट होकर मायावी मुरारि वासुदेवने उनके मनमें भोगोंके प्रति प्रवृत्ति उत्पन्न की। इस प्रकार उन सभीने भलीभाँति मायाका अनुभव किया ॥१६-१८॥
विभाति विश्वामरभूतभर्ता
स माधवः स्त्रीगणमध्यविष्टः।
अशेषशक्त्यासनसंनिविष्टो
यथैकशक्त्या सह देवदेवः॥१९॥
करोति नृत्यं परमप्रभावं तदा विरूढः पुनरेव भूयः।
ययौ समारुह्य हरिः स्वभावं तदीशवृत्तामृतमादिदेवः ॥२०॥
स्त्रियोंके मध्य घिरे हुए समस्त देवों और प्राणियों के स्वामी वे माधव तथा शंकर वैसे ही सुशोभित हुए जैसे समस्त शक्तियोंके आसनपर स्थित अद्वितीय शक्तिस्वरूपा पार्वतीके साथ देवाधिदेव शंकर सुशोभित होते हैं। उस समय महादेव (मुनियोंको मोहित करने की भावनापर) आरूढ़ होकर पुनः बार-बार अत्यन्त प्रभावकारी नृत्य करने लगे और आदिदेव हरि उन ईशके चरितामृत-रूप स्वभावके रहस्यको समझकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे॥ १९-२०॥
दृष्ट्वा नारीकुलं रुद्रं पुत्राणामपि केशवम्।
मोहयन्तं मुनिश्रेष्ठाः कोपं संदधिरे भृशम्॥२१॥
स्त्री-समूहको मुग्ध कर रहे रुद्र और पुत्रों को मोहित कर रहे (नारीरूप) विष्णुको देखकर उन श्रेष्ठ मुनियोंको अत्यन्त क्रोध हो आया॥ २१ ॥
अतीव परुषं वाक्यं प्रोचुर्देवं कपर्दिनम्।
शेपुश्च शापैर्विविधैर्मायया तस्य मोहिताः॥२२॥
तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शंकरे।
यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः॥२३॥
उन (शंकर)-की मायासे मोहित होकर मुनियों ने कपर्दीदेव (शंकर)-से अत्यन्त परुष (कठोर) वचन कहा और विविध शापोंसे उन्हें अभिशप्त किया। पर वे सभी परुष वचन एवं शाप व्यर्थ हो गये; क्योंकि उन मुनियों की तपस्याएँ (तपस्यासे उत्पन्न शक्तियाँ) भगवान् शंकरसे प्रत्याहत होकर वैसे ही प्रभावशून्य हो गयीं, जैसे आकाशमें सूर्य के प्रकाशसे प्रत्याहत ताराएँ प्रभावशून्य हो जाती हैं ॥ २२-२३ ॥
ते भग्नतपसो विप्राः समेत्य वृषभध्वजम्।
को भवानिति देवेशं पृच्छन्ति स्म विमोहिताः॥२४॥
सोऽब्रवीद् भगवानीशस्तपश्चर्तुमिहागतः।
इदानीं भार्यया देशे भवद्भिरिह सुव्रताः॥२५॥
इस प्रकार अपनी तपस्याको निष्प्रभाव देखकर मोहित हुए वे मुनि वृषभध्वज देवेशके पास जाकर उनसे पूछने लगे-'आप कौन हैं?' तब उन भगवान् ईशने कहा-सुब्रतो! इस समय आप लोगोंके इस स्थान में मैं पत्नीसहित तपस्या करनेके लिये आया हूँ॥ २४-२५ ॥
तस्य ते वाक्यमाकर्ण्य भृग्वाद्या मुनिपुंगवाः।
ऊचुर्गृहीत्वा वसनं त्यक्त्वा भार्यां तपश्चर॥२६॥
उनके उस वाक्यको सुनकर उन भृगु आदि श्रेष्ठ मुनियोंने कहा-वस्त्र धारणकर, भार्याका परित्याग कर तपस्या करो॥ २६॥
अथोवाच विहस्येश: पिनाकी नीललोहितः।
सम्प्रेक्ष्य जगतो योनिं पार्श्वस्थं च जनार्दनम्॥२७॥
कथं भवद्भिरुदितं स्वभार्यापोषणोत्सुकैः।
त्यक्तव्या मम भार्येति धर्मज्ञैः शान्तमानसैः॥२८॥
तब नीललोहित पिनाकी ईश्वरने हँसकर पार्श्वभाग में स्थित संसारके मूल कारण जनार्दनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा-धर्म को जाननेवाले तथा शान्त मनवाले और अपनी भार्या के पालन-पोषणमें तत्पर रहनेवाले आप लोगोंने मुझसे यह कैसे कहा कि अपनी भार्याका परित्याग कर दो॥ २७-२८॥
ऋषय ऊचुः
व्यभिचाररता नार्यः संत्याज्याः पतिनेरिताः।
अस्माभिरेषा सुभगा तादृशी त्यागमर्हति॥२९॥
ऋषियोंने कहा-(शास्त्रोंके अनुसार) पति का कर्तव्य है कि व्यभिचारिणी पत्नीको (भरण-आच्छादन की व्यवस्था भले ही कर दे, पर) पत्नीरूपमें उसे न स्वीकार करे। अत: आपको भी इस प्रकारकी इस सुन्दरी का त्याग करना चाहिये॥ २९॥
महादेव उवाच
न कदाचिदियं विप्रा मनसाप्यन्यमिच्छति।
नाहमेनामपि तथा विमुञ्चामि कदाचन ॥ ३०॥
महादेव बोले-विप्रो! यह कभी मनसे भी किसी दूसरेकी इच्छा नहीं करती और न मैं कभी इसका परित्याग करता हूँ॥३०॥
ऋषय ऊचुः
दृष्टा व्यभिचरन्तीह ह्यस्माभिः पुरुषाधम।
उक्तं सत्यं भवता गम्यतां क्षिप्रमेव हि ॥३१॥
ऋषियोंने कहा-पुरुषाधम! हमने इसे यहाँ व्यभिचार करते हुए देखा है। आपने असत्य कहा है। अत: शीघ्र ही यहाँसे चले जाइये ॥ ३१ ॥
एवमुक्ते महादेवः सत्यमेव मयेरितम्।
भवतां प्रतिभात्येपेत्युक्त्वासौ विचचार ह॥३२॥
सोऽगच्छद्धरिणा सार्धं मुनीन्द्रस्य महात्मनः ।
वसिष्ठस्याश्रमं पुण्यं भिक्षार्थी परमेश्वरः॥३३॥
दृष्ट्वा समागतं देवं भिक्षमाणमरुन्धती।
वसिष्ठस्य प्रिया भार्या प्रत्युद्गम्य ननाम तम्॥३४॥
ऋषियोंके ऐसा कहनेपर महादेवने कहा ही कहा है। आपको यह (मेरे पार्श्वमें विद्यमान सुन्दरी स्त्री) ऐसी प्रतीत होती है। ऐसा कहकर महादेव विचरण करने लगे। भिक्षाकी इच्छासे वे परमेश्वर विष्णु के साथ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वसिष्ठके पवित्र आश्रममें गये। भिक्षा माँगते हुए देवको देखकर वसिष्ठकी प्रिय पत्नी अरुन्धतीने समीपमें जाकर उन्हें प्रणाम किया॥३२-३४॥
प्रक्षाल्य पादौ विमलं दत्त्वा चासनमुत्तमम्।
सम्प्रेक्ष्य शिथिलं गात्रमभिघातहतं द्विजैः।
संधयामास भैषज्यैर्विषण्णा वदना सती॥३५॥
चकार महती पूजां प्रार्थयामास भार्यया।
को भवान् कुत आयातः किमाचारो भवानिति।
उवाच तां महादेवः सिद्धानां प्रवरोऽस्म्यहम्॥ ३६॥
यदेतन्मण्डलं शुद्धं भाति ब्रह्ममयं सदा।
एषैव देवता मह्यं धारयामि सदैव तत्॥ ३७॥
(परमेश्वरके) चरणोंको धोकर और शुद्ध उत्तम आसन प्रदान कर द्विजोंके आघातसे आहत उनके शिथिल शरीरको देखकर अत्यन्त खिन्न सती (अरुन्धती) ने (उनके व्रणोंपर) औषधि लगायी और भार्यासहित (परमेश्वरकी) उन्होंने (अरुन्धतीने) महती पूजा की तथा पूछा-'आप कौन हैं, कहाँसे आये हैं, आपका आचार क्या है?' महादेवने उनसे कहा-'मैं सिद्धोंमें श्रेष्ठ (सिद्ध) हूँ।' जो यह ब्रह्ममय शुद्ध मण्डल सदा प्रकाशित होता है वही मेरे देवता (आस्पद) हैं। मैं सदा ही उनको धारण करता हूँ॥ ३५-३७॥
इत्युक्त्वा प्रययौ श्रीमाननुगृह्य पतिव्रताम्।
ताडयाञ्चक्रिरे दण्डैर्लोष्टिभिर्मुष्टिभिर्द्विजाः॥ ३८॥
दृष्ट्वा चरन्तं गिरिशं नग्नं विकृतलक्षणम्।
प्रोचुरेतद् भवाँल्लिङ्गमुत्पाटयतु दुर्मते॥ ३९॥
तानब्रवीन्महायोगी करिष्यामीति शंकरः।
युष्माकं मामके लिङ्गे यदि द्वेषोऽभिजायते॥४०॥
ऐसा कहकर तथा पतिव्रता (अरुन्धती)-पर कृपा करके श्रीमान् (महादेव) चल पड़े। द्विज उन्हें डंडों, ढेलों तथा मुक्कोंसे मारने लगे। नग्न तथा विकृत
लक्षणवाले गिरिशको घूमते हुए देखकर मुनियों ने कहा-हे दुर्मते! तुम अपने इस लिङ्गको उखाड़ो। महायोगी शंकरने उनसे कहा-आप लोगोंको यदि मेरे लिङ्गके प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया हो तो मैं वैसा ही करूँगा॥३८-४०॥
इत्युक्त्वोत्पाटयामास भगवान् भगनेत्रहा।
नापश्यंस्तत्क्षणेनेशं केशवं लिङ्गमेव च।। ४१ ।।
तदोत्पाता बभूवुर्हि लोकानां भयशंसिनः ।
न राजते सहस्रांशुश्चचाल पृथिवी पुनः।
निष्प्रभाश्च ग्रहाः सर्वे चुक्षुभे च महोदधिः॥४२॥
ऐसा कहकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान्ने (अपने) लिङ्गको उखाड़ दिया। पर तत्काल ही सब कुछ अदृश्य हो गया और (मुनियोंने) न शंकर को देखा न केशवको और न लिङ्गको ही देखा और तभी पूरे लोकमें भय उत्पन्न करनेवाले उपद्रव होने लगे। सहस्रकिरण (सूर्य)-का तेज समाप्त हो गया, पृथ्वी काँपने लगी। सभी ग्रह प्रभावहीन हो गये और समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न हो गया ।। ४१-४२॥
अपश्यच्चानसूयात्रेः स्वप्नं भार्या पतिव्रता।
कथयामास विप्राणां भयादाकुलितेक्षणा॥४३॥
तेजसा भासयन् कृत्स्नं नारायणसहायवान्।
भिक्षमाणः शिवो नूनं दृष्टोऽस्माकं गृहेष्विति॥४४॥
तस्या वचनमाकर्ण्य शङ्कमाना महर्षयः।
सर्वे जग्मुर्महायोगं ब्रह्माणं विश्वसम्भवम्॥४५॥
इधर अत्रिकी पत्नी पतिव्रता अनसूयाने स्वप्न देखा। उनके नेत्र भयसे व्याकुल हो गये। उन्होंने ब्राह्मणोंसे (स्वप्नकी बात बताते हुए) कहा-निश्चय ही हम लोगोंके घरमें अपने तेजसे सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित कर रहे शिव (भगवान् शंकर) नारायण के साथ भिक्षा माँगते हुए दिखलायी पड़े थे। उनके वचन सुनकर सशंकित सभी महर्षि जगत्को उत्पन्न करनेवाले महायोगी ब्रह्माजीके पास गये॥ ४३-४५॥
उपास्यमानममलैर्योगिभिर्ब्रह्मवित्तमैः
चतुर्वेदैर्मूर्तिमद्भिः सावित्र्या सहितं प्रभुम्॥ ४६॥
वहाँ उन्होंने ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ विशुद्ध योगिजनों द्वारा तथा मूर्तिमान् चारों वेदोंद्वारा उपासित होते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-को सावित्रीके साथ देखा ॥ ४६॥
आसीनमासने रम्ये नानाश्चर्यसमन्विते।
प्रभासहस्रकलिले ज्ञानेश्वर्यादिसंयुते॥४७॥
विभ्राजमानं वपुषा सस्मितं शुभ्रलोचनम्।
चतुर्मुखं महाबाहुं छन्दोमयमजं परम्॥४८॥
विलोक्य वेदपुरुषं प्रसन्नवदनं शुभम्।
शिरोभिर्धरणीं गत्वा तोषयामासुरीश्वरम्॥४९॥
तान् प्रसन्नमना देवश्चतुर्मूर्तिश्चतुर्मुखः।
व्याजहार मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्॥५०॥
तस्य ते वृत्तमखिलं ब्रह्मणः परमात्मनः ।
ज्ञापयाञ्चक्रिरे सर्वे कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥५१॥
ऋषय ऊचुः
कश्चिद् दारुवनं पुण्यं पुरुषोऽतीवशोभनः ।
भार्यया चारुसर्वाङ्या प्रविष्टो नग्न एव हि ॥५२॥
मोहयामास वपुषा नारीणां कुलमीश्वरः।
कन्यकानां प्रिया चास्य दूषयामास पुत्रकान्॥५३॥
अस्माभिर्विविधाः शापाः प्रदत्ताश्च पराहताः।
ताडितोऽस्माभिरत्यर्थं लिङ्गं तु विनिपातितम्॥५४॥
अन्तर्हितश्च भगवान् सभार्यो लिङ्गमेव च।
उत्पाताश्चाभवन् घोराः सर्वभूतभयंकराः॥५५॥
क एष पुरुषो देव भीताः स्म पुरुषोत्तम।
भवन्तमेव शरणं प्रपन्ना वयमच्युत॥५६॥
त्वं हि वेत्सि जगत्यस्मिन् यत्किञ्चिदपि चेष्टितम्।
अनुग्रहेण विश्वेश तदस्माननुपालय॥५७॥
विज्ञापितो मुनिगणैर्विश्वात्मा कमलोद्भवः।
ध्यात्वा देवं त्रिशूलाकं कृताञ्जलिरभाषत॥५८॥
ब्रह्मोवाच
हा कष्टं भवतामद्य जातं सर्वार्थनाशनम्।
धिग्बलं धिक् तपश्चर्या मिथ्यैव भवतामिह॥५९॥
सम्प्राप्य पुण्यसंस्कारान्निधीनां परमं निधिम्।
उपेक्षितं वृथाचारैर्भवद्भिरिह मोहितैः॥६०॥
कांक्षन्ते योगिनो नित्यं यतन्तो यतयो निधिम्।
यमेव तं समासाद्य हा भवद्भिपेक्षितम्॥६१॥
यजन्ति यज्ञैर्विविधैर्यत्प्राप्त्यै वेदवादिनः।
महानिधिं समासाद्य हा भवद्भिपेक्षितम् ॥ २॥
यं समासाद्य देवानामैश्वर्यमखिलं जगत्।
तमासाद्याक्षयनिधिं हा भवद्भिपेक्षितम्॥६३॥
योगी लोग तथा यत्न करनेवाले यति लोग जिस निधिको प्राप्त करनेकी नित्य अभिलाषा करते हैं, उसीको प्राप्तकर आप लोगोंने उपेक्षा कर दी, यह बहुत ही कष्टकी बात है। वैदिक लोग जिसकी प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, बड़ा कष्ट है कि उन महानिधिको प्राप्तकर भी आप सभीने उनकी उपेक्षा कर दी। हाय! जिसे प्राप्तकर देवताओंके ऐश्वर्य- रूप में समस्त लोक-लोकान्तर दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उन अक्षयनिधिको प्राप्तकर आपने उनकी उपेक्षा कर दी॥६१-६३॥
यत्समापत्तिजनितं विश्वेशत्वमिदं मम।
तदेवोपेक्षितं दृष्ट्वा निधानं भाग्यवर्जितैः॥६४॥
यस्मिन् समाहितं दिव्यमैश्वर्यं यत् तदव्ययम्।
तमासाद्य निधिं ब्राह्मं हा भवद्भिर्वृथा कृतम्॥६५॥
एष देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः।
न तस्य परमं किञ्चित् पदं समधिगम्यते॥६६॥
जिनकी प्राप्ति होनेसे मुझे यह विश्वेश्वरत्व प्राप्त हुआ है, उन (समस्त ऐश्वर्यके) निधानका दर्शनकर भाग्यरहित आप लोगोंने (उनकी) उपेक्षा कर दी। जिनमें वह अविनाशी दिव्य ऐश्वर्य समाहित है, उन ब्रह्मरूप निधिको प्राप्तकर भी आप लोगोंने अपना सुअवसर खो दिया, यह बड़े कष्टकी बात है। इन्हीं देवको महादेव और महेश्वर समझना चाहिये। इनका परम पद (सर्वोत्कृष्ट ऐश्वर्य) किंचित् भी प्राप्त नहीं किया जा सकता अर्थात् जाना नहीं जा सकता ॥ ६४-६६ ॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां चापि शाश्वतः ।
सहस्रयुगपर्यन्तं प्रलये सर्वदेहिनाम्।
संहरत्येष भगवान् कालो भूत्वा महेश्वरः॥६७॥
एष चैव प्रजाः सर्वाः सृजत्येकः स्वतेजसा।
एष चक्री च वज्री च श्रीवत्सकृतलक्षणः॥८॥
योगी कृतयुगे देवस्त्रेतायां यज्ञ उच्यते।
द्वापरे भगवान् कालो धर्मकेतुः कलौ युगे॥६९॥
रुद्रस्य मूर्तयस्तिस्रो याभिर्विश्वमिदं ततम्।
तमो ह्यग्नी रजो ब्रह्मा सत्त्वं विष्णुरिति प्रभुः॥७०॥
हजारों युग-पर्यन्त रहनेवाले प्रलयकालमें ये ही सनातन भगवान् महेश्वर कालरूप होकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरों और समस्त देहधारियोंका संहार (अपने में लय) करते हैं। ये ही अद्वितीय अपने तेजसे समस्त प्रजाओंकी सृष्टि करते हैं। चक्र, वज्र तथा श्रीवत्सके चिह्नको धारण करनेवाले ये ही हैं (क्योंकि इनमें तथा श्रीविष्णुमें सर्वथा अभेद है), ये ही देव कृतयुगमें योगी, त्रेतामें यज्ञरूप, द्वापरमें भगवान् काल तथा कलियुगमें धर्मकेतु कहलाते हैं। रुद्रकी तीन मूर्तियाँ हैं, इन्होंने ही इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तमोगुणके अधिष्ठाता को अग्नि, रजोगुणके अधिष्ठाताको ब्रह्मा तथा सत्त्वगुण के अधिष्ठाताको प्रभु विष्णु कहा गया है॥६७-७० ॥
मूर्तिरन्या स्मृता चास्य दिग्वासा वै शिवा ध्रुवा।
यत्र तिष्ठति तद् ब्रह्म योगेन तु समन्वितम्॥७१॥
या चास्य पार्श्वगा भार्या भवद्भिरभिवीक्षिता।
सा हि नारायणो देवः परमात्मा सनातनः॥७२॥
तस्मात् सर्वमिदं जातं तत्रैव च लयं व्रजेत्।
स एव मोहयेत् कृत्स्नं स एव परमा गतिः॥७३॥
इनकी एक दूसरी मूर्ति है जो दिगम्बरा, शाश्वत तथा शिवात्मिका कहलाती है। उसीमें योगसे युक्त परम ब्रह्म प्रतिष्ठित रहते हैं। जिनको इनके पार्श्वभागमें स्थित भार्याके रूपमें आपने देखा है, वे ही सनातन परमात्मा नारायण देव हैं। उनसे ही यह सब उत्पन्न है और उनमें ही यह सब लीन भी हो जाता है। वे ही सबको मोहित करते हैं और वे ही परम गति हैं।७१-७३॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
एकशृङ्गो महानात्मा पुराणोऽष्टाक्षरो हरिः॥७४॥
चतुर्वेदश्चतुर्मूर्तिस्त्रिमूर्तिस्त्रिगुणः
एकमूर्तिरमेयात्मा नारायण इति श्रुतिः ॥७५॥
महान् आत्मा पुराण (शाश्वत) पुरुष हरि एक शृंगधारी (अनन्त ब्रह्माण्डको एक शृंग-रूपमें धारण करनेवाले) अष्टाक्षर (अष्टमूर्तिरूप तथा अविनाशी तत्त्व) हजारों सिरवाले, हजारों आँखवाले एवं हजारों चरणवाले हैं। श्रुतिका कथन है कि नारायण चतुर्वेद, चतुर्मूर्ति, त्रिमूर्ति एवं त्रिगुण होते हुए भी एकमूर्ति तथा अमेयात्मा हैं।७४-७५ ॥
ऋतस्य गर्भो भगवानापो मायातनुः प्रभुः।
स्तूयते विविधैर्मन्त्रैर्ब्राह्मणैर्धर्ममोक्षिभिः॥७६ ॥
संहृत्य सकलं विश्वं कल्पान्ते पुरुषोत्तमः।
शेते योगामृतं पीत्वा यत् तद् विष्णोः परं पदम्॥ ७७॥
न जायते न म्रियते वर्धते न च विश्वसृक् ।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता गीयते वैदिकैरजः॥७८॥
माया (-से विविध) शरीर धारण करनेवाले तथा (समस्त जगत्के जीवन-जलको ही अपने आयतन के रूपमें स्वीकार करनेवाले) जलस्वरूप प्रभु भगवान् कर्मफलके एकमात्र अधिष्ठाता हैं। धर्म तथा मोक्ष की इच्छा करनेवाले ब्राह्मण लोग विविध मन्त्रोंके द्वारा (उनकी) स्तुति करते हैं। कल्पान्तमें समस्त विश्व का संहार करनेके अनन्तर योगामृतका पानकर पुरुषोत्तम (भगवान् शंकर) जिस सर्वाधिष्ठान, स्वप्रकाशमें शयन (परम विश्रान्तिका अनुभव) करते हैं, वही विष्णु नामका परम पद है। विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये न जन्म लेते हैं, न मरते हैं और न वृद्धिको प्राप्त होते हैं। वैदिक लोग इन्हीं अजन्मा (भगवान्)-को अव्यक्त मूलप्रकृति कहते हैं ॥७६-७८ ॥
ततो निशायां वृत्तायां सिसृक्षुरखिलं जगत् ।
अजस्य नाभौ तद् बीजं क्षिपत्येष महेश्वरः।। ७९॥
तं मां वित्त महात्मानं ब्रह्माणं विश्वतोमुखम्।
महान्तं पुरुषं विश्वमपां गर्भमनुत्तमम्॥८०॥
न तं विदथ जनकं मोहितास्तस्य मायया।
देवदेवं महादेवं भूतानामीश्वरं हरम्॥८१॥
ये महेश्वर (प्रलयरूपी) रात्रिके बीत जाने पर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टिकी इच्छासे अजकी नाभिमें इस (सृष्टि)-के बीजको स्थापित करते हैं। उन (अज) के रूपमें मुझे ही आप लोग जानें। मैं ही समस्त लोकों का मूल होनेके कारण महात्मा, ब्रह्मा, सर्वतोमुख, महान् पुरुष, विश्वात्मा अप् (समस्त स्थूल जल) का अधिष्ठाता सर्वोत्तम देव हूँ। अनन्त ब्रह्माण्ड के बीजको मेरेमें स्थापित करनेवाले उन परमपिता देवाधिपति महादेव हरको आप लोग उनकी मायासे मोहित होने के कारण नहीं जान सके ।। ७९-८१॥
एष देवो महादेवो ह्यनादिर्भगवान् हरः।
विष्णुना सह संयुक्तः करोति विकरोति च॥८२॥
न तस्य विद्यते कार्यं न तस्माद् विद्यते परम्।
स वेदान् प्रददौ पूर्वं योगमायातनुर्मम॥८३॥
वे ही अनादि देव भगवान् महादेव हर विष्णु के साथ युक्त होकर सृष्टि और संहार करते रहते हैं। उनका कोई कार्य (कर्तव्य) नहीं है और उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। योगमायामय शरीर धारण करनेवाले उन्होंने पूर्वकाल में मुझे वेद प्रदान किया।। ८२-८३ ॥
स मायी मायया सर्वं करोति विकरोति च।
तमेव मुक्तये ज्ञात्वा व्रजेत शरणं भवम् ।। ८४।
इतीरिता भगवता मरीचिप्रमुखा विभुम्।
प्रणम्य देवं ब्रह्माणं पृच्छन्ति स्म सुदुःखिताः॥८५।
वे मायी (अपनी) मायाद्वारा सभी की सृष्टि और - संहार करते हैं। उन्हें ही मुक्तिका मूल समझकर उन भवकी ही शरण में जाना चाहिये। भगवान् (ब्रह्मा) के ऐसा कहनेपर मरीचि आदि प्रमुख ऋषियोंने विभु ब्रह्मदेवको प्रणामकर अत्यन्त दुःखित होकर उनसे पूछा-॥८४-८५॥
मुनय ऊचुः
कथं पश्येम तं देवं पुनरेव पिनाकिनम्।
ब्रूहि विश्वामरेशान त्राता त्वं शरणैषिणाम्॥८६॥
मुनिजन बोले-समस्त देवोंके स्वामी! उन पिनाकधारी देवका दर्शन हम पुनः किस प्रकार कर पायेंगे, आप हमें बतायें। आप शरण चाहनेवालों की रक्षा करनेवाले हैं॥८६॥
पितामह उवाच
यद् दृष्टं भवता तस्य लिङ्गं भुवि निपातितम्।
तल्लिङ्गानुकृतीशस्य कृत्वा लिङ्गमनुत्तमम्॥८७॥
पूजयध्वं सपत्नीका: सादरं पुत्रसंयुताः।
वैदिकैरेव नियमैर्विविधैर्ब्रह्मचारिणः॥८८॥
संस्थाप्य शांकरैर्मन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः ।
तपः परं समास्थाय गृणन्तः शतरुद्रियम्॥८९॥
समाहिताः पूजयध्वं सपुत्राः सह बन्धुभिः ।
सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा शूलपाणिं प्रपद्यथ॥९०॥
ततो द्रक्ष्यथ देवेशं दुर्दर्शमकृतात्मभिः ।
यं दृष्ट्वा सर्वमज्ञानमधर्मश्च प्रणश्यति॥९१॥
पितामहने कहा-पृथ्वीपर गिराये गये उनके (महेश्वरके) जिस लिङ्गको आप लोगोंने देखा था, उसी लिङ्गके समान श्रेष्ठ लिङ्ग बनाकर सपत्नीक तथा पुत्रोंसहित आदरपूर्वक विविध वैदिक मन्त्रों से | ब्रह्मचर्यपूर्वक आप लोग उसकी पूजा करें। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदमें कहे गये शंकरके मन्त्रों से (लिङ्गकी) स्थापना कर परम तपका अवलम्बन कर, शतरुद्रियका जप करते हुए समाहित होकर बन्धुओं तथा पुत्रोंसहित आप सभी लोग हाथ जोड़कर शूलपाणि की शरणमें जायँ। तदनन्तर आप लोग अकृतात्माओं के लिये दुर्दर्श उन देवेश्वरका दर्शन करेंगे, जिनको देख लेनेपर सम्पूर्ण अज्ञान और अधर्म दूर हो जाता है। ८७-९१॥
ततः प्रणम्य वरदं ब्रह्माणममितौजसम्।
जग्मुः संहृष्टमनसो देवदारुवनं पुनः॥९२॥
आराधयितुमारब्धा ब्रह्मणा कथितः यथा।
अजानन्तः परं देवं वीतरागा विमत्सराः॥९३॥
स्थण्डिलेषु विचित्रेषु पर्वतानां गुहासु च।
नदीनां च विविक्तेषु पुलिनेषु शुभेषु च ॥९४॥
तब अमित ओजस्वी वरदाता ब्रह्माको प्रणामकर प्रसन्नमनवाले वे सभी महर्षि पुनः देवदारु-वन की ओर चले गये और परम देवको न जानते हुए भी उन महर्षियोंने राग एवं मात्सर्यसे रहित होकर ब्रह्माजीने जैसा बताया था, तदनुसार अनेकविध यज्ञीय वेदियों, पर्वतोंकी गुफाओं तथा जनशून्य नदियों के सुन्दर किनारोंपर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ कर दी। ९२-९४॥
शैवालभोजनाः केचित् केचिदन्तर्जलेशयाः।
केचिदभ्रावकाशास्तु पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठिताः॥ ९५ ॥
कुछ लोग शैवालका भोजन करते हुए, कुछ जलके अंदर शयनकी मुद्रामें स्थित रहते हुए तथा कुछ लोग खुले आकाशके नीचे पैरके अँगूठे के अग्रभागपर स्थित रहकर श्रीशंकरकी आराधनामें दत्तचित्त हो गये ॥ ९५॥
दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये ह्यश्मकुट्टास्तथा परे।
शाकपर्णाशिनः केचित् सम्प्रक्षाला मरीचिपाः॥ ९६ ॥
वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे।
कालं नयन्ति तपसा पूजयन्तो महेश्वरम्॥ ९७ ॥
कुछ दूसरे दन्तोलूखली अर्थात् दाँतोंके ही द्वारा अनाजको तुष (भूसी) आदिसे रहितकर बिना पकाये खा लेते थे, कुछ दूसरे पत्थरपर ही अन्नको कूटकर खा लेते थे*। कुछ शाक तथा पत्तोंका ही भोजन करते थे, कुछ लोग एक समय भोजन करके अङ्गोंकी चिन्ता (शारीरिक सौष्ठव आदिकी चिन्ता) नहीं रखते थे, कुछ लोग स्नानपरायण एवं कुछ लोग सूर्य-किरणोंका ही पान करते थे। कुछ लोग वृक्षके नीचे रहते थे, दूसरे शिलारूपी शय्यापर ही सोते थे। इस प्रकार तपस्या (विविधाके) द्वारा महेश्वरकी पूजा करते हुए वे (मुनिजन) समय व्यतीत कर रहे थे॥९६-९७॥
ततस्तेषां प्रसादार्थं प्रपन्नार्तिहरो हरः।
चकार भगवान् बुद्धिं प्रबोधाय वृषध्वजः॥ ९८ ॥
देवः कृतयुगे ह्यस्मिन् शृङ्गे हिमवतः शुभे।
देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः॥ ९९ ॥
भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः ।
उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः॥१००॥
(मुनियोंको इस प्रकार पश्चात्तापपूर्वक तपस्या में निरत देखकर) उनकी व्याकुलता दूर करनेके लिये शरणागतों के दुःखहर्ता भगवान् वृषध्वज हरने उन्हें प्रबोधित (मोहमुक्त) करनेका विचार किया। इसलिये प्रसन्न परमेश्वर वे देव (शंकर) सत्ययुगमें हिमालय के इस शुभ शिखरपर स्थित देवदारु-वनमें पुनः आये। उनके सारे अङ्ग भस्मसे उपलिप्त होनेके कारण श्वेत वर्णके थे, नग्न थे, विकृत लक्षणवाले थे, हाथमें उल्मुक (जलती लकड़ी) लेकर उसे घुमा रहे थे और उनके नेत्र लाल तथा पिंगलवर्णके थे॥९८-१००॥
क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः।
क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारी क्वचिद्रौति मुहुर्मुहुः॥१०१॥
आश्रमेऽभ्यागतो भिक्षां याचते च पुनः पुनः।
मायां कृत्वात्मनो रूपं देवस्तद् वनमागतः ॥१०२॥
कृत्वा गिरिसुतां गौरीं पार्वे देवः पिनाकधृक् ।
सा च पूर्ववद् देवेशी देवदारुवनं गता॥१०३॥
कभी वे भयंकर रूपसे हँसते, कभी आश्चर्ययुक्त हो गान करने लगते, कभी शृंगारपूर्वक नृत्य करने लगते और कभी बार-बार रोने लगते। (इस स्थिति में
भगवान्) महादेव आश्रममें आकर बार-बार भिक्षा माँगने लगे। इस प्रकार अपना मायामय रूप बनाकर वे देव (शंकर) उस (देवदारु) वनमें विचरने लगे और उन पिनाकधारी देवने पर्वतपुत्री गौरीको अपने पार्श्वभागमें कर लिया था। वे देवेशी पूर्वके समान ही देवदारु-वनमें महादेवके साथ आयीं ॥ १०१-१०३॥
दृष्ट्वा समागतं देवं देव्या सह कपर्दिनम्।
प्रणेमुः शिरसा भूमौ तोषयामासुरीश्वरम्॥१०४॥
वैदिकैर्विविधैर्मन्त्रैः सूक्तैर्माहेश्वरैः शुभैः।
अथर्वशिरसा चान्ये रुद्राद्यैर्ब्रह्मभिर्भवम्॥१०५ ।।
देवीके साथ कपर्दी (शंकर) देवको आया देखकर उन्होंने (मुनियोंने) भूमिमें सिर रखकर ईश्वरको प्रणाम किया और स्तुति की। वे विविध वैदिक मन्त्रों, शुभ माहेश्वर सूक्तों, अथर्वशिरस् तथा अन्य रुद्रसम्बन्धी वेदमन्त्रोंसे शंकरकी स्तुति करने लगे-॥ १०४-१०५ ॥
नमो देवादिदेवाय महादेवाय ते नमः।
त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं त्रिशूलवरधारिणे ॥१०६ ।।
नमो दिग्वाससे तुभ्यं विकृताय पिनाकिने।
सर्वप्रणतदेहाय स्वयमप्रणतात्मने । १०७॥
अन्तकान्तकृते तुभ्यं सर्वसंहरणाय च।
नमोऽस्तु नृत्यशीलाय नमो भैरवरूपिणे॥१०८ ॥
नरनारीशरीराय योगिनां गुरवे नमः।
नमो दान्ताय शान्ताय तापसाय हराय च ॥१०९॥
विभीषणाय रुद्राय नमस्ते कृत्तिवाससे।
नमस्ते लेलिहानाय शितिकण्ठाय ते नमः ॥११०॥
अघोरघोररूपाय वामदेवाय वै नमः।
नमः कनकमालाय देव्याः प्रियकराय च ॥१११॥
गङ्गासलिलधाराय शम्भवे परमेष्ठिने।
नमो योगाधिपतये ब्रह्माधिपतये नमः॥११२॥
देवोंके आदिदेवको नमस्कार है। महादेव! आपको नमस्कार है। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है। दिगम्बर, (स्वेच्छासे) विकृत (रूप धारण करनेवाले) तथा पिनाकी आपको नमस्कार है। समस्त प्रणतजनोंके आश्रय तथा स्वयं निराश्रय (निरधिष्ठान देव)-को नमस्कार है। अन्त करनेवाले (यम)-का भी अन्त करनेवाले और सबका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। नृत्यपरायण और भैरवरूप आपको नमस्कार है। नर-नारी शरीरवाले (अर्धनारीश्वर) एवं योगियोंके गुरु आपको नमस्कार है। दान्त, शान्त, तापस (विरक्त) तथा हरको नमस्कार है। अत्यन्त भीषण, चर्माम्बरधारी रुद्रको नमस्कार है। लेलिहानको नमस्कार है, शितिकण्ठको नमस्कार है। अघोर तथा घोर रूपवाले वामदेवको नमस्कार है। धतूरेकी माला धारण करनेवाले और देवीके प्रियकर्ता को नमस्कार है। गङ्गाजलकी धाराको धारण करनेवाले परमेष्ठी शम्भुको नमस्कार है। योगाधिपतिको नमस्कार है तथा ब्रह्माधिपतिको नमस्कार है॥१०६-११२ ।।
प्राणाय च नमस्तुभ्यं नमो भस्माङ्गरागिणे।
नमस्ते घनवाहाय दंष्ट्रिणे वह्निरेतसे ॥११३ ॥
ब्रह्मणश्च शिरोहत्रे नमस्ते कालरूपिणे।
आगतिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च।
विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते॥११४॥
नमः प्रमथनाथाय दात्रे च शुभसम्पदाम्।
कपालपाणये तुभ्यं नमो मीढुष्टमाय ते।
नमः कनकलिङ्गाय वारिलिङ्गाय ते नमः॥११५ ॥
नमो वह्नयर्कलिङ्गाय ज्ञानलिङ्गाय ते नमः।
नमो भुजंगहाराय कर्णिकारप्रियाय च।
किरीटिने कुण्डलिने कालकालाय ते नमः॥११६॥
भस्मका अङ्गराग लगानेवाले प्राणरूप आपको बार-बार नमस्कार है। घनवाह' ! दंष्ट्री तथा वह्निरेता को नमस्कार है। ब्रह्माके सिरका हरण करनेवाले काल रूप को नमस्कार है। हम आपके न आगमनको जानते हैं और न गमन को ही जानते हैं। विश्वेश्वर! महादेव! आप जिस रूप में हैं, उसी रूपमें आपको नमस्कार है। प्रमथनाथ तथा शुभ सम्पदा देनेवाले को नमस्कार है। हाथ में कपाल धारण करनेवाले आपको तथा आप मीढुष्टम-शिवलिङ्ग-विग्रह को नमस्कार है। कनकलिङ्ग और वारिलिङ्ग आपको नमस्कार है। अग्नि तथा सूर्यस्वरूप लिङ्गवाले को नमस्कार है, ज्ञानलिङ्ग! आपको नमस्कार है। सौकी
मालावाले और कर्णिकारप्रिय आपको नमस्कार है। किरीटी, कुण्डल धारण करनेवाले तथा कालके भी काल आपको नमस्कार है॥ ११३-११६ ॥
वामदेव महेशान देवदेव त्रिलोचन।
क्षम्यतां यत्कृतं मोहात् त्वमेव शरणं हि नः॥११७॥
चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च।
ब्रह्मादीनां च सर्वेषां दुर्विज्ञेयोऽसि शंकर॥११८॥
अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानाद् यत्किंचित् कुरुते नरः ।
तत्सर्वं भगवानेव कुरुते योगमायया॥११९॥
एवं स्तुत्वा महादेवं प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
ऊचुः प्रणम्य गिरिशं पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥१२०॥
वामदेव! त्रिलोचन! महेशान! देवाधिदेव! मोहवश हमने जो किया, उसे आप क्षमा करें। हम सभी आपकी शरणमें हैं। आपके चरित्र विचित्र, गहन तथा गुह्य हैं। शंकर! आप ब्रह्मा आदि सभीके लिये दुर्विज्ञेय हैं। मनुष्य ज्ञान अथवा अज्ञानसे जो कुछ भी करता है, वह सब आप भगवान् ही अपनी योगमायासे करते हैं। इस प्रकार महादेवकी स्तुतिकर प्रसन्न-मनसे (मुनियोंने) उनको प्रणाम किया और कहा-हम लोग आपको पूर्वरूपमें देखना चाहते हैं ॥ ११७-१२० ॥
तेषां संस्तवमाकर्ण्य सोमः सोमविभूषणः।
स्वमेव परमं रूपं दर्शयामास शंकरः॥१२१॥
तं ते दृष्ट्वाथ गिरिशं देव्या सह पिनाकिनम्।
यथा पूर्वं स्थिता विप्राः प्रणेमुर्हष्टमानसाः॥१२२॥
ततस्ते मुनयः सर्वे संस्तूय च महेश्वरम्।
भृग्वङ्गिरोवसिष्ठास्तु विश्वामित्रस्तथैव च॥१२३॥
गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
मरीचिः कश्यपश्चापि संवर्तश्च महातपाः।
प्रणम्य देवदेवेशमिदं वचनमब्रुवन्॥१२४॥
उनकी (मुनियोंकी इस) स्तुतिको सुनकर चन्द्रभूषण सोम शंकरने अपने परम रूपका दर्शन (उन्हें) कराया। उन पिनाकी गिरिशको देवी (पार्वती)-के साथ पहले-जैसे (मङ्गलमय) रूपमें स्थित देखकर प्रसन्न-मनवाले ब्राह्मणोंने उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ तथा विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप तथा महातपस्वी संवर्त आदि सभी ऋषियोंने महेश्वरकी स्तुतिकर उन देवदेवेशको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा-॥१२१-१२४ ॥
कथं त्वां देवदेवेश कर्मयोगेन वा प्रभो।
ज्ञानेन वाथ योगेन पूजयामः सदैव हि ॥१२५॥
केन वा देवमार्गेण सम्पूज्यो भगवानिह ।
किं सेव्यमसेव्यं वा सर्वमेतद् ब्रवीहि नः॥१२६॥
देवदेवेश! प्रभो! हम सब किस प्रकारसे आपकी सदा पूजा करें, कर्मयोग या ज्ञानयोगसे? किस देवमार्ग (प्रशस्त मार्ग)-के द्वारा भगवान्की पूजा करनी चाहिये, हम लोगोंके लिये क्या सेवनीय है, क्या असेवनीय है, यह सब आप हमें बतलायें ॥ १२५-१२६ ॥
देवदेव उवाच
एतद् वः सम्प्रवक्ष्यामि गूढं गहनमुत्तमम्।
ब्रह्मणे कथितं पूर्वमादावेव महर्षयः॥१२७॥
देवदेवने कहा-महर्षियो! मैं आप लोगोंको यह उत्तम और गम्भीर रहस्य बतलाता हूँ। पूर्वकाल में (मैंने) इसे ब्रह्माजीको बतलाया था॥ १२७॥
सांख्ययोगो द्विधा ज्ञेयः पुरुषाणां हि साधनम् ।
योगेन सहितं सांख्यं पुरुषाणां विमुक्तिदम्॥१२८॥
न केवलेन योगेन दृश्यते पुरुषः परः।
ज्ञानं तु केवलं सम्यगपवर्गफलप्रदम्॥१२९॥
भवन्तः केवलं योगं समाश्रित्य विमुक्तये।
विहाय सांख्यं विमलमकुर्वन्त परिश्रमम्॥१३०॥
एतस्मात् कारणात् विप्रा नृणां केवलधर्मिणाम्।
आगतोऽहमिमं देशं ज्ञापयन् मोहसम्भवम्॥१३१॥
पुरुषोंके लिये साधनस्वरूप दो प्रकारका सांख्ययोग समझना चाहिये। योगसहित (कर्मयोगसहित अर्थात् अनासक्त-भाव से कर्मनिष्ठाके साथ) सांख्य (ज्ञाननिष्ठा) पुरुषों को मुक्ति प्रदान करनेवाला है। केवल योगके द्वारा परम पुरुषका दर्शन नहीं होता। (शुद्ध) ज्ञान (ज्ञाननिष्ठा) भलीभाँति केवल मोक्षफलको देनेवाला है। आप लोग मुक्ति प्राप्त करनेके लिये विमल सांख्यका परित्याग करके केवल योगका ही अवलम्बनकर परिश्रम कर रहे थे। ब्राह्मणो! इसी कारणसे केवल धर्म करनेवाले (कर्ममात्रनिष्ठ- कर्मव्यसनी) मनुष्योंको मोह उत्पन्न होता है, यह बतानेके लिये मैं इस स्थानपर आया हूँ॥ १२८-१३१॥
तस्माद्भवद्भिर्विमलं ज्ञानं कैवल्यसाधनम्।
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन श्रोतव्यं दृश्यमेव च ॥ १३२॥
अत: आप लोगोंको मोक्षके साधनरूप विशुद्ध ज्ञानको प्रयत्नपूर्वक जानना, सुनना तथा उसका साक्षात्कार करना चाहिये ॥१३२॥
एकः सर्वत्रगो ह्यात्मा केवलश्चितिमात्रकः।
आनन्दो निर्मलो नित्यं स्यादेतत् सांख्यदर्शनम्॥१३३॥
एतदेव परं ज्ञानमेष मोक्षोऽत्र गीयते।
एतत् कैवल्यममलं ब्रह्मभावश्च वर्णितः॥१३४॥
आश्रित्य चैतत् परमं तनिष्ठास्तत्परायणाः।
पश्यन्ति मां महात्मानो यतयो विश्वमीश्वरम्॥१३५॥
आत्मा सर्वत्र व्याप्त, विशुद्ध, चिन्मात्र, आनन्द, निर्मल, नित्य तथा एक है। यही सांख्य (ज्ञाननिष्ठाका) दर्शन है। यही परम ज्ञान है, इसीको यहाँ मोक्ष कहा गया है। यही निर्मल मोक्ष है और यही शुद्ध ब्रह्मभाव बताया गया है। इस परम (ज्ञान)-का आश्रय ग्रहणकर उसमें ही निष्ठा रखते हुए और उसीके परायण रहते हुए महात्मा तथा यतिजन मुझ विश्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं ॥ १३३-१३५॥
एतत् तत् परमं ज्ञानं केवलं सन्निरञ्जनम्।
अहं हि वेद्यो भगवान् मम मूर्तिरियं शिवा॥१३६॥
बहूनि साधनानीह सिद्धये कथितानि तु।
तेषामभ्यधिकं ज्ञानं मामकं द्विजपुंगवाः॥१३७॥
यही वह सत्, निरञ्जन तथा अद्वितीय परम ज्ञान है। मुझे ही भगवान् जानना चाहिये और यह शिवा मेरी ही मूर्ति है। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! सिद्धिके लिये यहाँ (शास्त्रोंमें) बहुतसे साधन बताये गये हैं, किंतु उनमें मेरे विषयका ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है ॥ १३६-१३७॥
ज्ञानयोगरताः शान्ता मामेव शरणं गताः।
ये हि मां भस्मनिरता ध्यायन्ति सततं हृदि॥१३८॥
मद्भक्तिपरमा नित्यं यतयः क्षीणकल्मषाः।
नाशयाम्यचिरात् तेषां घोरं संसारसागरम्॥१३९॥
भस्म धारण करनेवाले, (संसारकी निःसारता को हृदयसे समझनेवाले) ज्ञानयोगपरायण, शान्त और मेरे ही शरणमें आये हुए जो लोग हृदयमें निरन्तर मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरी परम भक्ति में तत्पर हैं, कल्मषोंसे रहित एवं पूर्ण संयत हैं, उन लोगों के घोर संसाररूपी सागरको मैं शीघ्र ही नष्ट कर देता हूँ॥ १३८-१३९॥
प्रशान्तः संयतमना भस्मोद्धूलितविग्रहः।
ब्रह्मचर्यरतो नग्नो व्रतं पाशुपतं चरेत्॥१४०॥
निर्मितं हि मया पूर्वं व्रतं पाशुपतं परम्।
गुह्याद् गुह्यतमं सूक्ष्मं वेदसारं विमुक्तये॥१४१॥
भस्मसे धूसरित शरीरवाला होकर संयतमन तथा शान्त होकर, ब्रह्मचर्यव्रत-परायण होते हुए वस्त्रादि परिधानकी आसक्तिसे रहित होकर पाशुपत-व्रत का पालन करना चाहिये। मुक्तिप्राप्तिके लिये मैंने पूर्वकाल में गुह्यसे भी गुह्यतम, वेदके साररूप, सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ पाशुपत-व्रतका उपदेश किया था। १४०-१४१॥
यद् वा कौपीनवसनः स्याद् वैकवसनो मुनिः।
वेदाभ्यासरतो विद्वान् ध्यायेत् पशुपतिं शिवम्॥१४२॥
एष पाशुपतो योगः सेवनीयो मुमुक्षुभिः ।
भस्मच्छन्नैर्हि सततं निष्कामैरिति विश्रुतिः॥१४३॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः॥१४४॥
अथवा कौपीन वस्त्र या एक वस्त्र धारणकर विद्वान् मुनि को वेदाभ्यासमें रत रहते हुए पशुपति शिवका (सतत) ध्यान करना चाहिये। मोक्षकी अभिलाषावाले
मुमुक्षुजनोंको सतत भस्मसे उपलिप्त रहकर निष्कामभाव से इस पाशुपतयोगका सेवन करना चाहिये। ऐसा श्रुति का कथन है। राग, भय तथा क्रोधसे सर्वथा रहित, मुझे ही सर्वस्व समझनेवाले और मेरा ही आश्रय ग्रहण करनेवाले बहुतसे (भक्तजन) इस योगके द्वारा पवित्र होकर मेरे भावको प्राप्त हुए हैं ॥ १४२-१४४॥
अन्यानि चैव शास्त्राणि लोकेऽस्मिन् मोहनानि तु ।
वेदवादविरुद्धानि मयैव कथितानि तु॥१४५॥
वामं पाशुपतं सोमं लाकुलं चैव भैरवम्।
असेव्यमेतत् कथितं वेदबाह्यं तथेतरम्॥१४६॥
इस संसारमें मोहित करनेवाले तथा वेदमतका विरोध करनेवाले अन्य भी शास्त्र हैं, वे मेरे द्वारा ही कहे गये हैं। वाम (मार्ग), पाशुपत, सोम, लाकुल तथा भैरव (मार्ग) तथा अन्य-ये असेव्य और वेदबाह्य कहे गये हैं ॥ १४५-१४६ ॥
वेदमूर्तिरहं विप्रा नान्यशास्त्रार्थवेदिभिः।
ज्ञायते मत्स्वरूपं तु मुक्त्वा वेदं सनातनम्॥ १४७॥
स्थापयध्वमिदं मार्गं पूजयध्वं महेश्वरम्।
अचिरादैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति न संशयः॥१४८॥
मयि भक्तिश्च विपुला भवतामस्तु सत्तमाः।
ध्यातमात्रो हि सांनिध्यं दास्यामि मुनिसत्तमाः॥१४९॥
ब्राह्मणो ! मैं वेदमूर्ति हूँ। सनातन वेदका परित्यागकर दूसरे शास्त्रको जाननेवाले लोग मेरे स्वरूपको नहीं जान सकते। (अतः आप लोग) इस मार्गकी स्थापना करें, महेश्वरकी पूजा करें (इससे) शीघ्र ही आप लोगोंको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं है। श्रेष्ठ जनो! आप सभीकी मुझमें महान् भक्ति हो। श्रेष्ठ मुनियो! ध्यान करनेमात्रसे मैं आपको अपना सांनिध्य प्रदान करूँगा ॥१४७-१४९॥
इत्युक्त्वा भगवान् सोमस्तत्रैवान्तरधीयत।
तेऽपि दारुवने तस्मिन् पूजयन्ति स्म शंकरम्।
ब्रह्मचर्यरताः शान्ता ज्ञानयोगपरायणाः॥१५०॥
समेत्य ते महात्मानो मुनयो ब्रह्मवादिनः।
वितेनिरे बहून् वादानध्यात्मज्ञानसंश्रयान्।। १५१॥
इतना कहकर भगवान् सोम (शंकर) वहींपर अन्तर्धान हो गये। वे शान्त महर्षि भी ब्रह्मचर्यपरायण होकर, ज्ञानयोग-परायण रहते हुए उस दारुवन में शंकरकी पूजा करने लगे। उन ब्रह्मवादी महात्मा मुनिगणों ने (स्वयं मोहरहित हो जानेके कारण) एकत्रित होकर अध्यात्मज्ञान-सम्बन्धी बहुतसे सिद्धान्तोंका विस्तार किया ॥ १५०-१५१ ॥
किमस्य जगतो मूलमात्मा चास्माकमेव हि।
कोऽपि स्यात् सर्वभावानां हेतुरीश्वर एव च॥ १५२ ।।
इत्येवं मन्यमानानां ध्यानमार्गावलम्बिनाम्।
आविरासीन्महादेवी देवी गिरिवरात्मजा॥१५३॥
इस जगत्का मूल (कारण) क्या है? (उत्तर-) हमारी आत्मा ही इस जगत्का मूल है। सभी भाव पदार्थोंका हेतु कौन है? (उत्तर-) ईश्वर ही सभी भावों का जनक है। इस प्रकारकी दृढ़ धारणाके साथ ध्यानमार्ग का अवलम्बन करनेवाले उन महर्षियों के समक्ष श्रेष्ठ पर्वत (हिमालय)-की पुत्री महादेवी पार्वती प्रकट हुईं ॥ १५२-१५३॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशा ज्वालामालासमावृता।
स्वभाभिर्विमलाभिस्तु पूरयन्ती नभस्तलम्॥१५४॥
तामन्वपश्यन् गिरिजाममेयां ज्वालासहस्रान्तरसंनिविष्टाम्
प्रणेमुरेकामखिलेशपत्नी जानन्ति ते तत् परमस्य बीजम्॥१५५ ॥
करोड़ों सूर्यके समान, ज्वालामालाओं (तेजो-राशि) से समावृत वे अपनी विमल प्रभा से आकाशमण्डलको आपूरित कर रही थीं। हजारों ज्वालाओं (तेजोमण्डल)-के मध्यमें प्रतिष्ठित, अतुलनीय, अद्वितीय, सम्पूर्ण जगत्के ईश (शंकर)-की पत्नी, उन गिरिजा का दर्शनकर मुनियोंने उन्हें प्रणाम किया। क्योंकि वे जानते हैं कि ये ही परमेश्वरी परमेश्वर महेश्वरकी मूलशक्ति (बीज) हैं ॥ १५४-१५५ ॥
अस्माकमेषा परमेशपत्नी
गतिस्तथात्मा गगनाभिधाना।
पश्यन्त्यथात्मानमिदं च कृत्स्नं
तस्यामथैते मुनयश्च विप्राः ।। १५६॥
निरीक्षितास्ते परमेशपल्या
तदन्तरे देवमशेषहेतुम्।
पश्यन्ति शम्भुं कविमीशितारं
रुद्रं बृहन्तं पुरुषं पुराणम्॥१५७॥
आलोक्य देवीमथ देवमीशं
प्रणेमुरानन्दमवापुरग्रयम्
ज्ञानं तदैशं भगवत्प्रसादा-
दाविर्बभौ
जन्मविनाशहेतु॥१५८॥
अनन्तर उन लोगोंने ऐसी भावना की-ये ही परमेश-पत्नी हम सबकी गति हैं, आत्मा हैं, इन्हें गगन (आकाश) नामसे कहा जाता है, (क्योंकि ये महादेवी वस्तुगत्या निराकार तथा परम व्यापक हैं, अतएव परम अवकाशस्वरूप सर्वाधिष्ठान होनेसे कथंचित् आकाश के द्वारा तुलनीय हैं और परब्रह्मका व्योम (आकाश) नाम है ही तथा इन महादेवी एवं परब्रह्ममें सर्वथा अभेद है।) समस्त मुनि एवं समस्त विप्र इन्हींमें अपने को तथा समस्त प्रपञ्चको देखते हैं। (मुनियोंके इस पवित्र भाव से संतुष्ट होकर) परमेश्वरकी पत्नी (पार्वती) ने उन्हें (विशेषरूपसे) देखा। इसी बीच (मुनियोंने) सभीके मूल कारण, नियामक, पुराण पुरुष, बृहत् एवं रुद्रात्मक कवि, देव शम्भु (महादेव)-का दर्शन किया। तदनन्तर देवी (पार्वती) तथा देव (शंकर)-को देखकर उन्होंने (मुनियोंने) प्रणाम किया, उत्तम आनन्द प्राप्त किया और उनमें भगवान् (परमेश)-की कृपासे जन्म के विनाश के हेतुरूप अर्थात् पुनर्जन्म न करानेवाले ईश्वर सम्बन्धी ज्ञानका आविर्भाव हुआ॥ १५६-१५८॥
इयं हि सा जगतो योनिरेका
सर्वात्मिका सर्वनियामिका च।
माहेश्वरीशक्तिरनादिसिद्धा
व्योमाभिधाना दिवि राजतीव॥१५९॥
अस्यां महत्परमेष्ठी परस्ता-
न्महेश्वरः शिव एकोऽथ रुद्रः।
चकार विश्वं परशक्तिनिष्ठां
मायामथारुह्य स
देवदेवः॥१६०॥
(इस ज्ञानके आविर्भावके साथ ही मुनियोंने यह अनुभव किया) ये ही देवी जगत्की एकमात्र मूल कारण, सर्वात्मिका, सबका नियन्त्रण करनेवाली तथा अनादिसिद्ध व्योम नामवाली माहेश्वरी शक्ति हैं, जो धुलोक में शोभित होती हुई प्रतीत हो रही हैं। देवाधिदेव महान् परमेष्ठी, परसे भी पर, अद्वितीय रुद्र महेश्वर शिवने इसी परम शक्ति (महादेवी)-में अंशरूपसे विद्यमान माया का आश्रय ग्रहणकर विश्वकी सृष्टि की॥ १५९-१६० ।।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढो
मायी रुद्रः सकलो निष्कलश्च।
स एव देवी न च तद्विभिन्न-
मेतज्ज्ञात्वा ह्यमृतत्वं व्रजन्ति॥१६१॥
अन्तर्हितोऽभूद् भगवानथेशो
देव्या भर्गः सह देवादिदेवः।
आराधयन्ति स्म तमेव देवं
वनौकसस्ते पुनरेव रुद्रम्॥१६२॥
ये देव ही सभी प्राणियोंमें गूढरूपसे प्रतिष्ठित हैं अर्थात् सर्वत्र सूक्ष्मरूपसे व्याप्त हैं। वे मायी (माया के नियन्ता) रुद्र सकल (साकार) तथा निष्कल (निराकार) हैं। वे ही देवी (रूप) हैं, उनसे भिन्न (जगत्में और कुछ भी) नहीं है, ऐसा जानकर अमृतत्वकी प्राप्ति होती है। इधर भर्ग (वरेण्य तेजोरूप), देवाधिदेव, भगवान् परमेश मुनियोंके मोहको दूरकर तथा उन्हें परमज्ञानसे सम्पन्न कर महादेवीके साथ अन्तर्हित हो गये और एकमात्र अरण्यको ही अपना घर माननेवाले वे परम ज्ञानी मुनि लोग उन परम देव रुद्र की आराधनामें दत्तचित्त हो गये। १६१-१६२॥
एतद् वः कथितं सर्वं देवदेवविचेष्टितम्।
देवदारुवने पूर्वं पुराणे यन्मया श्रुतम्॥१६३॥
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं मुच्यते सर्वपातकैः।
श्रावयेद्वा द्विजान् शान्तान् स याति परमां गतिम्॥१६४॥
इस तरह प्राचीन कालमें देवदारु-वनमें घटित देवाधिदेवका जो वृत्तान्त मैंने पुराणमें सुना था, वह आप लोगोंको बता दिया। जो नित्य इसका पाठ करेगा अथवा श्रवण करेगा, वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जायगा अथवा जो शान्त द्विजोंको इसे सुनायेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा ॥ १६३-१६४ ॥
Summary of chapter 86 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Maharshi Vyāsa outlines expiatory measures for miscellaneous, secret, or unintended daily transgressions. He highlights the purifying power of intense Prāṇāyāma, continuous chanting of the Rudradhyāya and Purushasūkta, taking holy dips in sacred rivers, and offering sincere heartfelt prayers to Bhagavān Vishṇu and Mahādeva.