कूर्म महा पुराण
44 अध्याय
ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियों का वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादा पर्वतों का वर्णन
सूत उवाच
चतुर्दशसहस्त्राणि योजनानां महापुरी।
मेरोरुपरि विख्याता देवदेवस्य वेधसः॥ १ ॥
तत्रास्ते भगवान् ब्रह्मा विश्वात्मा विश्वभावनः।
उपास्यमानो योगीन्द्रैर्मुनीन्द्रोपेन्द्रशंकरैः॥ २ ॥
तत्र देवेश्वरेशानं विश्वात्मानं प्रजापतिम्।
सनत्कुमारो भगवानुपास्ते नित्यमेव हि ॥ ३ ॥
स सिद्धैर्ऋषिगन्धर्वैः पूज्यमानः सुरैरपि।
समास्ते योगयुक्तात्मा पीत्वा तत्परमामृतम्॥ ४ ॥
सूतजी बोले-देवाधिदेव ब्रह्माकी मेरु पर्वत के ऊपर चौदह हजार योजन विस्तारवाली महापुरी विख्यात है। वहाँ विश्वभावन विश्वात्मा भगवान् ब्रह्मा रहते हैं। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) और शंकर उनकी उपासना करते रहते हैं। वहाँ भगवान् सनत्कुमार नित्य ही ईशान देवेश्वर विश्वात्मा प्रजापतिकी उपासना करते हैं। वे (सनत्कुमार) योगात्मा सिद्ध, ऋषि, गन्धर्व तथा देवताओंसे पूजित होते हुए परम अमृतका पान करते हैं और वहाँ निवास करते हैं ॥१-४॥
तत्र देवादिदेवस्य शम्भोरमिततेजसः।
दीप्तमायतनं शुभं पुरस्ताद् ब्रह्मणः स्थितम्॥ ५ ॥
दिव्यकान्तिसमायुक्तं चतुर सुशोभनम्।
महर्षिगणसंकीर्णं ब्रह्मविद्भिर्निषेवितम्॥ ६ ॥
देव्या सह महादेवः शशाङ्कार्काग्निलोचनः ।
रमते तत्र विश्वेशः प्रमथैः प्रमथेश्वरः॥ ७ ॥
वहाँ देवोंके आदिदेव अमित तेजस्वी शंकरका शुभ्र एवं दीप्तियुक्त मन्दिर है, जो ब्रह्माके (आयतनके) सामने स्थित है। (यह मन्दिर) दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, चार द्वारोंसे युक्त, अत्यन्त सुन्दर, महर्षियोंसे पूर्ण और ब्रह्मज्ञानियों द्वारा सेवित है। चन्द्रमा, सूर्य एवं अग्निस्वरूप (तीन) नेत्रों वाले
प्रमथेश्वर विश्वेश महादेव देवी (पार्वती) एवं प्रमथगणों के साथ वहाँ रमण करते हैं॥५-७॥
तत्र वेदविदः शान्ता मुनयो ब्रह्मचारिणः ।
पूजयन्ति महादेवं तापसाः सत्यवादिनः॥ ८ ॥
तेषां साक्षान्महादेवो मुनीनां ब्रह्मवादिनाम्।
गृह्णाति पूजां शिरसा पार्वत्या परमेश्वरः॥ ९ ॥
तत्रैव पर्वतवरे शक्रस्य परमा पुरी।
नाम्नाऽमरावती पूर्वे सर्वशोभासमन्विता॥१०॥
वहाँ वेदज्ञ शान्तचित्त मुनि, ब्रह्मचारी, तपस्वी और सत्यवादी लोग महादेवकी पूजा करते हैं। इन ब्रह्मवादी मुनियों की पूजाको पार्वतीके साथ साक्षात् परमेश्वर महादेव सिरसे आदरपूर्वक स्वीकार करते हैं। वहीं श्रेष्ठ पर्वत (मेरु)-पर पूर्वकी ओर इन्द्रकी सभी शोभाओं से समन्वित अमरावती नामकी श्रेष्ठ पुरी है॥८-१०॥
तमिन्द्रमप्सरःसङ्घा गन्धर्वा गीततत्पराः।
उपासते सहस्त्राक्षं देवास सहस्त्रशः॥११॥
ये धार्मिका वेदविदो यागहोमपरायणाः।
तेषां तत् परमं स्थानं देवानामपि दुर्लभम्॥१२॥
अप्सराओंका समूह, गान-परायण गन्धर्व तथा हजारों देवता हजार नेत्रोंवाले इन्द्रकी वहाँ उपासना करते हैं। जो धार्मिक हैं, वेदज्ञ हैं, यज्ञ एवं होमपरायण हैं, उनका वह परम स्थान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है॥११-१२ ॥
तस्य दक्षिणदिग्भागे वह्नेरमिततेजसः।
तेजोवती नाम पुरी दिव्याश्चर्यसमन्विता॥१३॥
तत्रास्ते भगवान् वह्निर्धाजमानः स्वतेजसा।
जपिनां होमिनां स्थानं दानवानां दुरासदम्॥१४॥
उसके दक्षिण दिशामें अमित तेजस्वी अग्नि की दिव्य आश्चर्योंसे युक्त तेजोवती नामकी पुरी स्थित है। भगवान् वह्नि अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ रहते हैं। जप करनेवालों तथा होम करनेवालोंका वह स्थान दानवोंके लिये दुष्प्राप्य है।॥ १३-१४॥
दक्षिणे पर्वतवरे यमस्यापि महापुरी।
नाम्ना संयमनी दिव्या सिद्धगन्धर्वसेविता॥१५॥
तत्र वैवस्वतं देवं देवाद्याः पर्युपासते।
स्थानं तत्सत्यसंधानां लोके पुण्यकृतां नृणाम्॥१६॥
तस्यास्तु पश्चिमे भागे निर्ऋतेस्तु महात्मनः ।
रक्षोवती नाम पुरी राक्षसैः सर्वतो वृता॥१७॥
तत्र तं निर्ऋतिं देवं राक्षसाः पर्युपासते।
गच्छन्ति तां धर्मरता ये वै तामसवृत्तयः॥१८॥
पश्चिमे पर्वतवरे वरुणस्य महापुरी।
नाम्ना शुद्धवती पुण्या सर्वकामद्धिसंयुता॥१९॥
श्रेष्ठ (मेरु) पर्वतपर दक्षिण भाग में यमराज की भी सिद्धों तथा गन्धर्वांसे सेवित संयमनी नामक दिव्य महापुरी है। वहाँ देवादिगण विवस्वान्' (सूर्य) देवकी उपासना करते रहते हैं। वह स्थान संसारमें पुण्य करनेवाले सत्यव्रती मनुष्योंका है। उसके पश्चिम भागमें महात्मा निर्ऋतिकी रक्षोवती नामक पुरी है, जो चारों ओरसे राक्षसोंसे घिरी है। वहाँ राक्षस निर्ऋतिदेव की उपासना करते हैं तथा जो तमोगुणी जीविकावाले होते हुए भी धार्मिक होते हैं, वे उसी पुरीमें जाते हैं। पश्चिम में इस श्रेष्ठ पर्वत पर सभी प्रकार की कामनाओं की समृद्धि से समन्वित वरुण की शुद्धवती नाम की पुण्य महापुरी है॥१५-१९॥
तत्राप्सरोगणैः सिद्धैः सेव्यमानोऽमराधिपः।
आस्तेसवरुणो राजा तत्र गच्छन्ति येऽम्बुदाः।
तीर्थयात्रापरा नित्यं ये च लोकेऽघमर्षिणः॥२०॥
यहाँ अप्सराओं तथा सिद्धोंसे सेवित अमराधिप राजा वरुण रहते हैं। यहाँ वे ही मनुष्य जाते हैं, जो संसारमें नित्य जलदान करते हैं, तीर्थयात्रा-परायण रहते हैं और जो अघमर्षण किया करते हैं॥२०॥
तस्या उत्तरदिग्भागे वायोरपि महापुरी।
नामा गन्धवती पुण्या तत्रास्तेऽसौ प्रभञ्जनः॥२१॥
अप्सरोगणगन्धर्वैः सेव्यमानोऽमरप्रभुः।
प्राणायामपरा मा स्थानं तद् यान्ति शाश्वतम्॥२२॥
उस (शुद्धवती पुरी)-के उत्तरभागमें वायु देवता की भी गन्धवती नामवाली पवित्र महापुरी स्थित है। वहाँ प्रभञ्जन (वायुदेवता) निवास करते हैं। देवों के स्वामी इन वायुदेवताकी अप्सराओंके समूह और गन्धर्व सेवा करते रहते हैं। जो प्राणायाम-परायण मनुष्य हैं, वे इस शाश्वत स्थान में जाते हैं ॥ २१-२२॥
तस्याः पूर्वेण दिग्भागे सोमस्य परमा पुरी।
नामा कान्तिमती शुभ्रा तत्र सोमो विराजते॥२३॥
तत्र ये भोगनिरता स्वधर्म पर्युपासते।
तेषां तद् रचितं स्थानं नानाभोगसमन्वितम्॥२४॥
तस्याश्च पूर्वदिग्भागे शंकरस्य महापुरी।
नामा यशोवती पुण्या सर्वेषां सुदुरासदा॥२५॥
तत्रेशानस्य भवनं रुद्रविष्णुतनोः शुभम्।
गणेश्वरस्य विपुलं तत्रास्ते स गणैर्वृतः॥२६॥
तत्र भोगाभिलिप्सूनां भक्तानां परमेष्ठिनः।
निवासः कल्पितः पूर्वं देवदेवेन शूलिना॥२७॥
विष्णुपादाद् विनिष्क्रान्ता प्लावयित्वेन्दुमण्डलम्।
समन्ताद् ब्रह्मणः पुर्यां गङ्गा पतति वै दिवः॥२८॥
उसके पूर्व दिशामें सोम (चन्द्रमा)-की कान्तिमती नामवाली शुभ श्रेष्ठ पुरी है, वहाँ चन्द्रमा विराजमान रहते हैं, जो भोगपरायण रहते हुए अपने धर्म का पालन करते हैं उन्हींके लिये वहाँपर अनेक प्रकार के भोगोंसे युक्त स्थान बना है। उसके पूर्वकी ओर (भगवान् शंकरकी यशोवती नामक पवित्र महापुरी है, जो सभीके लिये दुर्लभ है, वहाँ रुद्र एवं विष्णुमय शरीरवाले गणाधिपति ईशान (शंकर)-का विशाल भवन है गणों से आवृत (शंकरदेव) उसमें रहते हैं। पूर्वकाल में देवों के देव शूल धारण करनेवाले शंकर ने वहाँ पर परमेष्ठी के भोगाभिलाषी भक्तोंका निवास स्थान बनाया था। विष्णु के चरण से निकली हुई गङ्गा चन्द्रमण्डल को आप्लावित कर स्वर्ग से ब्रह्मपुरी के चारों ओर गिरती हैं ॥ २३-२८॥
सा तत्र पतिता दिक्षु चतुर्धा ह्यभवद् द्विजाः।
सीता चालकनन्दा च सुचक्षुर्भद्रनामिका॥२९॥
पूर्वेण सीता शैलात् तु शैलं यात्यन्तरिक्षतः।
ततश्च पूर्ववर्षेण भद्राश्वेनैति चार्णवम्॥३०॥
द्विजो! वे वहाँ गिरकर सीता, अलकनन्दा, सुचक्षु एवं भद्रा नामसे चार भागोंमें (दिशाओंमें) विभक्त हो गयी हैं। अन्तरिक्ष से निकलकर सीता नामक गङ्गा एक शैल से दूसरे शैल पर जाती हुई पूर्व दिशामें भद्राश्ववर्ष में प्रवाहित होती हुई समुद्रमें जाती हैं ॥२९-३०॥
तथैवालकनन्दा च दक्षिणादेत्य भारतम्।
प्रयाति सागरं भित्त्वा सप्तभेदा द्विजोत्तमाः॥३१॥
सुचक्षुः पश्चिमगिरीनतीत्य सकलांस्तथा।
पश्चिमं केतुमालाख्यं वर्षं गत्वैति चार्णवम्॥३२॥
भद्रा तथोत्तरगिरीनुत्तरांश्च तथा कुरून्।
अतीत्य चोत्तराम्भोधिं समभ्येति महर्षयः॥३३॥
आनीलनिषधायामौ माल्यवान् गन्धमादनः।
तयोर्मध्यगतो मेरुः कर्णिकाकारसंस्थितः॥३४॥
भारताः केतुमालाश्च भद्राश्वाः कुरवस्तथा।
पत्राणि लोकपद्मस्य मर्यादाशैलबाह्यतः॥३५॥
हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार अलकनन्दा नामक गङ्गा दक्षिण दिशासे भारतवर्षमें आनेके बाद सात भागों में विभक्त होकर सागरमें जाती हैं। ऐसे ही सुचक्षु नामक गङ्गा पश्चिम दिशा के सभी पर्वतोंका अतिक्रमण करके पश्चिम दिशाके केतुमाल नामक वर्षमें प्रवाहित होकर समुद्रमें जाती हैं। महर्षियो! भद्रा नामक गङ्गा उत्तर दिशा के पर्वतों और उत्तरकुरुवर्षका अतिक्रमण कर उत्तर समुद्रमें मिलती हैं। माल्यवान् तथा गन्धमादन पर्वत नील तथा निषध पर्वतोंके समान विस्तारवाले हैं। उन दोनोंके मध्यमें कर्णिकाके आकारके समान मेरु (पर्वत) स्थित है। इन मर्यादापर्वतोंके बाहरकी ओर संसाररूपी कमलके पत्रोंके रूपमें भारतवर्ष, केतुमाल, भद्राश्व और कुरुवर्ष स्थित हैं ॥ ३१-३५॥
जठरो देवकूटश्च मर्यादापर्वतावुभौ।
दक्षिणोत्तरमायामावानीलनिषधायतौ ॥३६॥
गन्धमादनकैलासौ पूर्वपश्चायतावुभौ।
अशीतियोजनायामावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥३७॥
निषधः पारियात्रश्च मर्यादापर्वताविमौ।
मेरोः पश्चिमदिग्भागे यथापूर्वी तथा स्थितौ ॥ ३८॥
त्रिशृङ्गो जारुधिस्तद्वदुत्तरे वर्षपर्वतौ।
पूर्वपश्चायतावेतौ अर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥३९॥
जठर एवं देवकूट नामक दो मर्यादापर्वत नील और निषध पर्वतोंतक दक्षिणोत्तर-दिशामें फैले हुए हैं। गन्धमादन और कैलास नामक दोनों पर्वत पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं, (ये) अस्सी योजन विस्तारवाले हैं और समुद्र के अंदरतक स्थित हैं। निषध और पारियात्र नामक दो मर्यादा पर्वत मेरुकी पश्चिम दिशामें पूर्वके पर्वतोंके समान स्थित हैं। इसी प्रकार उत्तरमें त्रिशृङ्ग और जारुधि नामक दो वर्षपर्वत हैं। ये पूर्व-पश्चिममें फैले हुए हैं तथा समुद्रके भीतरतक स्थित हैं ॥ ३६-३९॥
मर्यादापर्वताः प्रोक्ता अष्टाविह मया द्विजाः।
जठराद्याः स्थिता मेरोश्चतुर्दिक्षु महर्षयः॥४०॥
हे द्विजो! मैंने यहाँ इन आठ मर्यादा पर्वतों को बतलाया। हे महर्षियो! मेरुके चारों दिशाओंमें जठर आदि (वर्षपर्वत) स्थित हैं॥४०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्रणं संहितायां पूर्वविभागे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥४४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौवालीसवां अध्याय समाप्त हुआ॥४४॥
Summary of chapter 42 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Sūta outlines the structure of the fourteen cosmic realms. Below Earth lie the seven subterranean netherworlds: Atala, Vitala, Sutala, Rasātala, Talātala, Mahātala, and Pātāla, ruled by noble Asuras and Nāgas, underpinned by the infinite Śesha. Above Earth rise the seven heavenly realms: Bhūrloka, Bhuvarloka, Svarloka, Maharloka, Janaloka, Tapoloka, and Satyaloka, inhabited by humans, Gandharvas, Devas, Siddhas, Ṛshis, and Brahmā Himself.