कूर्म महा पुराण
9 अध्याय
महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन
ऋषय ऊचुः
निष्कलो निर्मलो नित्यो निष्क्रियः परमेश्वरः।
तन्नो वद महादेव विश्वरूपः कथं भवान्॥१॥
ऋषियोंने पूछा-महादेव! आप परमेश्वर निष्कल, निर्मल, नित्य तथा निष्क्रिय होनेपर भी विश्वरूप कैसे हैं, इसे हम लोगोंको बतलायें ॥१॥
ईश्वर उवाच
नाहं विश्वो न विश्वं च मामृते विद्यते द्विजाः ।
मायानिमित्तमत्रास्ति सा चात्मानमपाश्रिता॥२॥
अनादिनिधना शक्तिर्मायाव्यक्तसमाश्रया।
तन्निमित्तः प्रपञ्चोऽयमव्यक्तादभवत् खलु॥३॥
अव्यक्तं कारणं प्राहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।
अहमेव परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥४॥
तस्मान्मे विश्वरूपत्वं निश्चितं ब्रह्मवादिभिः।
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्॥५॥
अहं तत् परमं ब्रह्म परमात्मा सनातनः।
अकारणं द्विजाः प्रोक्तो न दोषो ह्यात्मनस्तथा॥६॥
ईश्वर बोले-द्विजो! मैं विश्व नहीं हूँ और मुझसे अतिरिक्त विश्व भी नहीं है। यह सब मायाके निमित्त से है और वह माया भी आत्माको आश्रित कर रहती है। आदि और अन्तसे रहित शक्तिरूप माया अव्यक्त (परमात्मा)-के आश्रित है, उसी (माया)-के कारण अव्यक्तसे यह प्रपञ्चरूप संसार उत्पन्न हुआ है। (मुझ) अव्यक्तको कारण कहा जाता है। मैं ही आनन्दस्वरूप, प्रकाशरूप, अक्षर परम ब्रह्म हूँ। मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी कारण ब्रह्मवादियोंने मेरा विश्वरूपत्व निश्चित किया है। एक रूप तथा भिन्न रूप के विषयमें इस उदाहरणका* वर्णन किया गया है। द्विजो! मैं कारणरहित, सनातन, परम ब्रह्म परमात्मा हूँ, अतः मुझमें कोई दोष नहीं है। तात्पर्य यह है कि जगत्में विषमता, क्रूरता आदि दोषोंका असाधारण कारण मनुष्यकृत कर्म है, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो सामान्य कारण है, अतः वह दोषरहित है॥२-६॥
अनन्ता शक्तयोऽव्यक्ते मायाद्याः संस्थिता ध्रुवाः ।
तस्मिन् दिवि स्थितं नित्यमव्यक्तं भाति केवलम्॥ ७ ॥
याभिस्तल्लक्ष्यते भिन्नमभिन्नं तु स्वभावतः।
एकया मम सायुज्यमनादिनिधनं ध्रुवम्॥ ८ ॥
पुंसोऽभूदन्यया भूतिरन्यया तत्तिरोहितम्।
अनादिमध्यं तिष्ठन्तं युज्यतेऽविद्यया किल॥ ९ ॥
तदेतत् परमं व्यक्तं प्रभामण्डलमण्डितम्।
तदक्षरं परं ज्योतिस्तद् विष्णोः परमं पदम्॥१०॥
तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।
तदेव च जगत् कृत्स्नं तद् विज्ञाय विमुच्यते॥११॥
अव्यक्तमें ही माया आदि अनन्त ध्रुव शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं और वह अव्यक्त अकेले ही विशुद्ध शब्दतन्मात्रारूप आकाशतत्त्वमें स्थित रहते हुए सदा प्रकाशित रहता है। स्वभावतः वह अभिन्न (अव्यक्त) तत्त्व जिनके द्वारा अनेक रूपोंमें प्रतिभासित होता है, उनकी मूल एक (परम) शक्तिसे आदि और अन्तरहित मेरा ध्रुव सायुज्य प्राप्त होता है। पुरुषकी दूसरी शक्ति से भूति (ऐश्वर्य)-की उत्पत्ति तथा अन्य शक्तिसे उसका (भूतिका) लोप होता है। आदि एवं मध्यरहित सर्वत्र विद्यमान (पुरुष) ही अविद्यासे (स्वेच्छया) युक्त होता है। प्रभामण्डलसे मण्डित वह परम व्यक्त, अक्षर, परम ज्योतिरूप है और वह विष्णुका परमपद है। उसमें ही यह सारा जगत् ओतप्रोत है। वही सम्पूर्ण जगत् है। उसे जान लेनेसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है।। ७-११ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् बिभेति न कुतश्चन॥१२॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तद् विज्ञाय परिमुच्येत विद्वान्
नित्यानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥१३॥
मनके साथ वाणी जिसे न पाकर लौट आती है, उस आनन्दस्वरूप ब्रह्माको जाननेवाला कहीं भयभीत नहीं होता। मैं इस तमोगुणसे परे आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशयुक्त महान् पुरुषको जानता हूँ, इसे जानकर विद्वान् मुक्त हो जाता है और नित्य आनन्दस्वरूप तथा ब्रह्ममय हो जाता है॥१२-१३॥
यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्
यज्योतिषां ज्योतिरेकं दिविस्थम्।
तदेवात्मानं मन्यमानोऽथ विद्वा-
नात्मानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥१४॥
तदव्ययं कलिलं गूढदेहं
ब्रह्मानन्दममृतं विश्वधाम।
वदन्त्येवं ब्राह्मणा ब्रह्मनिष्ठा
यत्र गत्वा न निवर्तेत भूयः॥१५॥
जिससे परे और भिन्न कुछ भी नहीं है और जो धुलोकमें स्थित सभी ज्योतियोंका एकमात्र प्रकाशक है, उसीको आत्मा माननेवाला विद्वान् नित्य आनन्द- स्वरूप ब्रह्ममय हो जाता है। ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण उसे अविनाशी, कलिल, गूढदेह, ब्रह्मानन्द, अमृत तथा विश्वधाम कहते हैं। वहाँ पहुँचनेपर फिर लौटना नहीं पड़ता॥१४-१५॥
हिरण्मये परमाकाशतत्त्वे
यदर्चिषि प्रविभातीव तेजः।
तद्विज्ञाने परिपश्यन्ति धीरा
विभ्राजमानं विमलं व्योम धाम॥१६॥
ततः परं परिपश्यन्ति धीरा
आत्मन्यात्मानमनुभूयानुभूय ।
स्वयम्प्रभः परमेष्ठी महीयान्
ब्रह्मानन्दी भगवानीश एषः॥१७॥
हिरण्मय प्रकाशयुक्त परम आकाशतत्त्वमें जो तेज के समान प्रतिभासित होता है, धीर जन (आत्मस्थ) विज्ञानमें उस प्रकाशमान निर्मल व्योम (ब्रह्म) एवं धाम (परम प्राप्तव्य)-का दर्शन करते हैं। तदनन्तर अपने आत्मामें आत्माका बार-बार अनुभव करके धीर पुरुष परम तत्त्वका दर्शन करते हैं और उन्हें यह ज्ञान होता है-यही (आत्मतत्त्व) स्वयं प्रकाशमान, परमेष्ठी, महान् ब्रह्मानन्दस्वरूप भगवान् ईशके रूप में है॥१६-१७॥
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
तमेवैकं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥१८॥
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।
सर्वव्यापी च भगवान् न तस्मादन्यदिष्यते॥१९॥
सभी प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वव्यापी एक देव ही सभी प्राणियोंमें छिपे हुए हैं। जो धीर पुरुष उन एक अद्वितीयका दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। वे भगवान् सभी ओर मुख, सिर तथा ग्रीवावाले, सभी प्राणियोंके (हृदयरूपी) गुहामें स्थित और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। उनसे भिन्न कुछ नहीं है।॥ १८-१९॥
इत्येतदैश्वरं ज्ञानमुक्तं वो मुनिपुंगवाः ।
गोपनीयं विशेषेण योगिनामपि दुर्लभम्॥२०॥
मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार यह आपको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान बतलाया। यह विशेषरूपसे गोपनीय है और योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २० ॥
Summary of chapter 58 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Mahādeva manifests His terrifying yet awe-inspiring Vishvarūpa, possessing a thousand heads, a thousand arms, three eyes, and a radiant splendor equaling a million suns, and performs His cosmic Tāṇḍava dance in the firmament. As the cosmos quakes and divine light fills all fourteen realms, the Mahārshis witness Bhagavān Nārāyaṇa merging seamlessly into the left side of Mahādeva's divine body, demonstrating their eternal non-duality. Overwhelmed with profound devotion and spiritual ecstasy, Sanatkumāra, Bhṛgu, Vāmadeva, and other great sages bow down, chanting majestic Vedic hymns to Shambhu as the Soul of the universe, the source of Māyā, and the supreme Refuge of all Yogins.