कूर्म महा पुराण
2 अध्याय
विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव, रुद्र तथा लक्ष्मीका प्राकट्य, ब्रह्माद्वारानौ मानस पुत्रों तथा चार वर्णोंकी सृष्टि, वेदज्ञानकी महिमा, ब्रह्म-सृष्टिकावर्णन, वर्ण और आश्रमोंके सामान्य तथा विशेष धर्म, गृहस्थाश्रमकामाहात्म्य, चतुर्विध पुरुषार्थोंमें धर्मकी महिमा, आश्रमोंका द्वैविध्य,त्रिदेवोंका पूजन, त्रिपुण्ड्र, तिलक तथा भस्म-धारणकी महिमा
शृणुध्वमृषयः सर्वे यत्पृष्टोऽहं जगद्धितम्।
वक्ष्यमाणं मया सर्वमिन्द्रद्युम्नाय भाषितम्॥१॥
श्रीकूर्मने कहा-समस्त ऋषिगणो! संसारकेकल्याणके लिये आप लोगोंने जो कुछ मुझसे पूछा हैऔर इन्द्रद्युम्नके प्रति मैंने जो कुछ कहा है, वह सब मैंबतला रहा हूँ, आप लोग सुनें ॥१॥
भूतैर्भव्यैर्भविष्यद्भिश्चरितैरुपबृंहितम्
पुराणं पुण्यदं नृणां मोक्षधर्मानुकीर्तनम्॥२॥
इस (कूर्म) पुराणमें भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमेंहुए वृत्तान्तोंको विस्तारसे बतलाया गया है। यह पुराणमनुष्योंको पुण्य प्रदान करनेवाला और मोक्षधर्मकावर्णन करनेवाला है॥२॥
अहं नारायणो देवः पूर्वमासं न मे परम्।
उपास्य विपुलां निद्रां भोगिशय्यां समाश्रितः ।।३।।
मैं ही नारायण देवरूपसे पूर्वकालमें विद्यमान था।मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा न था॥३॥
चिन्तयामि पुनः सृष्टिं निशान्ते प्रतिबुध्य तु।
ततो मे सहसोत्पन्नः प्रसादो मुनिपुंगवाः॥ ४ ॥
मैं प्रगाढ़ योगनिद्राका आश्रय लेकर शेष-शय्या में पड़ा था। मुनिश्रेष्ठो! रात्रिके बीत जानेपर जागकर मैं पुन: सृष्टिविषयक चिन्तन करने लगा। उसी समय अकस्मात् मुझे प्रसन्नता प्राप्त हुई॥४॥
चतुर्मुखस्ततो जातो ब्रह्मा लोकपितामहः।
तदन्तरेऽभवत् क्रोधः कस्माच्चित् कारणात् तदा ॥५॥
आत्मनो मुनिशार्दूलास्तत्र देवो महेश्वरः।
रुद्रः क्रोधात्मजो जज्ञे शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।
तेजसा सूर्यसंकाशस्त्रैलोक्यं संहरनिव॥६॥
तदुपरान्त समस्त संसारके पितामह चतुर्मुख ब्रह्मा का आविर्भाव हुआ। इसी बीच किसी कारणसे अकस्मात् उस समय क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुनिश्रेष्ठो! (उस समय) क्रोधात्मज अपने तेजके द्वारा मानो त्रैलोक्यका संहार करनेके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये, तीन नेत्रोंवाले सूर्यके समान प्रकाशमान महेश्वर रुद्रदेव वहाँ उत्पन्न हुए॥५-६॥
ततः श्रीरभवद् देवी कमलायतलोचना।
सुरूपा सौम्यवदना मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥७॥
शुचिस्मिता सुप्रसन्ना मङ्गला महिमास्पदा।
दिव्यकान्तिसमायुक्ता दिव्यमाल्योपशोभिता॥८॥
नारायणी महामाया मूलप्रकृतिरव्यया।
स्वधाम्ना पूरयन्तीदं मत्पाश्र्वं समुपाविशत्॥९॥
तां दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा मामुवाच जगत्पतिः।
मोहायाशेषभूतानां नियोजय सुरूपिणीम्।
येनेयं विपुला सृष्टिवर्धते मम माधव॥१०॥
तदनन्तर कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर रूप एवं प्रसन्न मुखवाली तथा सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली देवी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। पवित्र मुस्कानवाली, अत्यन्त प्रसन्न, मङ्गलमयी, अपनी महिमामें प्रतिष्ठित, दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, दिव्य माल्य आदिसे सुशोभित, अविनाशिनी महामाया मूलप्रकृतिरूपा वे नारायणी अपने तेजसे इस (संसार)-को आपूरित करती हुई मेरे समीपमें आकर बैठ गयीं। उन्हें देखकर संसारके स्वामी भगवान् ब्रह्मा मुझसे कहने लगे-हे माधव! सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये इन सुरूपिणी (देवी)को नियुक्त करो, जिससे यह मेरी सृष्टि और भी अधिक बढ़ने लगे॥७-१०॥
तथोक्तोऽहं श्रियं देवीमब्रुवं प्रहसन्निव।
देवीदमखिलं विश्वं सदेवासुरमानुषम्।
मोहयित्वा ममादेशात् संसारे विनिपातय॥११॥
ज्ञानयोगरतान् दान्तान् ब्रह्मिष्ठान् ब्रह्मवादिनः।
अक्रोधनान् सत्यपरान् दूरतः परिवर्जय॥१२॥
ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने मुसकराते हुए देवी लक्ष्मीसे कहा-हे देवि! मेरे आदेशसे तुम देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्व को (अपनी मायासे) मोहित कर संसारमें प्रवृत्त करो। (किंतु) जो ज्ञानयोगमें निरत हैं, जितेन्द्रिय हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं, ब्रह्मवादी हैं, क्रोधशून्य हैं तथा सत्यपरायण हैं-ऐसे लोगोंको दूरसे ही छोड़ देना ॥ ११-१२॥
ध्यायिनो निर्ममान्शान्तान् धार्मिकान् वेदपारगान्।
जापिनस्तापसान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥१३॥
वेदवेदान्तविज्ञानसंछिन्नाशेषसंशयान् ।
महायज्ञपरान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥१४॥
ये यजन्ति जपै.मैर्देवदेवं महेश्वरम्।
स्वाध्यायेनेज्यया दूरात् तान् प्रयत्नेन वर्जय॥१५॥
ध्यान करनेवाले, ममतारहित, शान्त, धार्मिक, वेदमें पारंगत, जप-परायण और तपस्वी विप्रोंको दूरसे ही छोड़ देना। वेद एवं वेदान्तके विशेष ज्ञानसे जिनके सम्पूर्ण संशय सर्वथा दूर हो गये हैं ऐसे तथा बड़े-बड़े यज्ञोंमें परायण द्विजोंको दूरसे ही छोड़ देना। जो जप, होम, यज्ञ एवं स्वाध्यायके द्वारा देवाधिदेव महेश्वरका यजन करते हैं, उनका प्रयत्नपूर्वक दूरसे ही परित्याग कर देना ।। १३-१५॥
भक्तियोगसमायुक्तानीश्वरार्पितमानसान् ।
प्राणायामादिषु रतान् दूरात् परिहरामलान्॥१६॥
प्रणवासक्तमनसो रुद्रजप्यपरायणान्।
अथर्वशिरसोऽध्येतॄन् धर्मज्ञान् परिवर्जय॥१७॥
बहुनात्र किमुक्तेन स्वधर्मपरिपालकान्।
ईश्वराराधनरतान् मन्नियोगान्न मोहय ॥१८॥
जो भक्तियोगमें लगे हुए हैं, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्को अर्पण कर दिया है और जो प्राणायाम (धारणा, ध्यान तथा समाधि) आदिमें निरत हैं, ऐसे अमलात्माओं का दूरसे ही त्याग कर देना। जिनका मन प्रणवोपासनामें आसक्त है, जो रुद्र (मन्त्रों)-का जप करनेवाले हैं और जो अथर्वशिरस्के अध्येता हैं, उन धर्मज्ञ व्यक्तियोंको छोड़ देना। और अधिक क्या कहा जाय, जो अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, ईश्वर की आराधना में सतत रत हैं, (हे देवि!) उन्हें मेरे आदेश से कदापि मोहित न करना ॥ १६-१८॥
एवं मया महामाया प्रेरिता हरिवल्लभा।
यथादेशं चकारासौ तस्माल्लक्ष्मी समर्चयेत्॥१९॥
श्रियं ददाति विपुलां पुष्टिं मेधां यशो बलम्।
अर्चिता भगवत्पत्नी तस्माल्लक्ष्मी समर्चयेत्॥२०॥
इस प्रकार मेरे द्वारा प्रेरित हरिप्रिया महामायाने जैसी मेरी आज्ञा थी, उसी प्रकार किया, इसलिये (उन) लक्ष्मीकी आराधना करनी चाहिये। भगवत्पत्नी (देवी महालक्ष्मी) पूजा किये जानेपर विपुल ऐश्वर्य, पुष्टि, मेधा, यश एवं बल प्रदान करती हैं, इसलिये लक्ष्मी की भलीभाँति पूजा करनी चाहिये ॥१९-२०॥
ततोऽसृजत् स भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
चराचराणि भूतानि यथापूर्वं ममाज्ञया॥२१॥
मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्।
दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया॥२२॥
तदनन्तर लोकपितामह भगवान्ने मेरी आज्ञा से पूर्वकी भाँति ही समस्त चराचर भूत-प्राणियोंकी सृष्टि की। योगविद्याके प्रभावसे ब्रह्माजीने मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ को उत्पन्न किया ॥ २१-२२॥
नवैते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्माणो ब्राह्मणोत्तमाः।
ब्रह्मवादिन एवैते मरीच्याद्यास्तु साधकाः॥२३॥
ससर्ज ब्राह्मणान् वक्त्रात् क्षत्रियांश्च भुजाद् विभुः।
वैश्यानूरुद्वयाद् देवः पादाच्छूद्रान् पितामहः ॥२४॥
यज्ञनिष्यत्तये ब्रह्मा शूद्रवर्जं ससर्ज ह।
गुप्तये सर्ववेदानां तेभ्यो यज्ञो हि निर्बभौ ॥२५॥
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माके मरीचि आदि ये नौ 'ब्रह्माण'- संज्ञक पुत्र साधक हैं, ब्रह्मवादी हैं। पितामह विभु देव (ब्रह्मा)-ने मुखसे ब्राह्मणों तथा भुजा से क्षत्रियोंकी सृष्टि की। दोनों जंघाओंसे वैश्योंको तथा पैरसे शूद्रोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माने यज्ञकी निष्पत्ति एवं सभी वेदों की रक्षा के लिये शूद्रके अतिरिक्त (अन्य सभी वर्णोंकी) सृष्टि की, क्योंकि उनसे यज्ञका निर्वाह होता है॥ २३-२५॥
ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वणानि च।
ब्रह्मणः सहजं रूपं नित्यैषा शक्तिरव्यया॥२६॥
अनादिनिधना दिव्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा।
आदौ वेदमयी भूता यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ।। २७॥
अतोऽन्यानि तुशास्त्राणि पृथिव्यां यानि कानिचित्।
न तेषु रमते धीरः पाषण्डी तेन जायते॥ २८॥
ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद ब्रह्माके सहज स्वरूप हैं और यह नित्य अव्यय शक्ति हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रारम्भमें आदि और अन्तसे रहित वेदमयी दिव्य वागरूपी शक्तिको उत्पन्न किया, जिसके द्वारा सभी व्यवहार होते हैं। पृथ्वीपर इन (वेदों)-से भिन्न जो कोई भी शास्त्र हैं उनमें धीर पुरुषका मन नहीं लगता क्योंकि ऐसे वेदातिरिक्त ग्रन्थोंके अध्ययन से मनुष्य पाखंडी हो जाता है ॥ २६-२८॥
वेदार्थवित्तमैः कार्यं यत्स्मृतं मुनिभिः पुरा।
स ज्ञेयः परमो धर्मो नान्यशास्त्रेषु संस्थितः ॥२९॥
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः।
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः॥३०॥
वेदार्थ-ज्ञानमें श्रेष्ठ मुनियोंने प्राचीन समयमें जो कार्य (करने योग्य) बतलाया है, उसीको परम धर्म समझना चाहिये, (वह धर्म वेदातिरिक्त) अन्य शास्त्रोंमें प्रतिपादित नहीं है। वैदिक सिद्धान्तोंके विपरीत बातोंका प्रतिपादन करनेवाली जो स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र) हैं और जो कोई भी कुदर्शन (नास्तिक दर्शन) हैं, पारलौकिक दृष्टि से वे सभी निष्फल हैं, इसीलिये वे तामसी कहे गये हैं ।। २९-३०॥
पूर्वकल्पे प्रजा जाताः सर्वबाधाविवर्जिताः।
शुद्धान्तःकरणाः सर्वाः स्वधर्मनिरताः सदा॥३१॥
तत: कालवशात् तासांरागद्वेषादिकोऽभवत्।
अधर्मो मुनिशार्दूलाः स्वधर्मप्रतिबन्धकः॥३२॥
पूर्व कल्पमें जो प्रजा उत्पन्न हुई थी, वह सभी बाधाओंसे रहित थी। सभी लोग निर्मल अन्त:करणवाले थे और सर्वदा अपनी-अपनी धर्म-मर्यादामें स्थिर रहते थे। हे श्रेष्ठ मुनियो! कुछ समय बाद कालकी गति के प्रभावसे उन (लोगों)-में राग, द्वेष (लोभ, मोह तथा क्रोध) आदि उत्पन्न हो गये और स्वधर्ममें बाधा डालनेवाला अधर्म भी उत्पन्न हो गया॥३१-३२॥
ततः सा सहजा सिद्धिस्तासां नातीव जायते।
रजोमात्रात्मिकास्तासां सिद्धयोऽन्यास्तदाभवन्॥३३॥
तासु क्षीणास्वशेषासु कालयोगेन ताः पुनः ।
वार्तोपायं पुनश्चक्रुर्हस्तसिद्धिं च कर्मजाम्।
ततस्तासां विभुर्ब्रह्मा कर्माजीवमकल्पयत्॥३४॥
(इस कारण) उस समय उनमें (जो पहले सात्त्विक) सहज सिद्धि थी, वह धीरे-धीरे कम होने लगी और रजोगुणमूलक जो अन्य सिद्धियाँ थीं, वे ही उन्हें प्राप्त हुईं। उन सभी (रजोगुणमूलक सिद्धियों)-के भी कालयोग से क्षीण हो जानेपर वे वार्तोपाय अर्थात् कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्यरूपी जीविकाके उपाय और कर्मसाध्य (परिश्रमसाध्य) हस्तसिद्धि अर्थात् शिल्पशास्त्र (हाथों के माध्यमसे किये जानेवाले शिल्प, मूर्ति-कला आदि) के उपाय करने लगे। तब विभु ब्रह्माजीने उन लोगोंके लिये कर्म एवं आजीविकाकी व्यवस्था की॥३३-३४॥
स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं धर्मान् प्रोवाच धर्मदृक् ।
साक्षात् प्रजापतेर्मूर्तिर्निसृष्टा ब्रह्मणा द्विजाः।
भृग्वादयस्तद्वदनाच्छ्रुत्वा
धर्मानथोचिरे॥३५॥
हे ब्राह्मणो! ब्रह्मासे उत्पन्न साक्षात् प्रजापति स्वरूप धर्मदर्शी स्वायम्भुव मनुने पूर्वकालमें धर्मोंका उपदेश किया (जो मनुस्मृतिके नामसे प्रसिद्ध हुई)। तदनन्तर उनके मुखसे उसे सुनकर भृगु आदि महर्षियोंने धर्मों का वर्णन किया ॥ ३५॥
यजनं याजनं दानं ब्राह्मणस्य प्रतिग्रहम्।
अध्यापनं चाध्ययनं षट्कर्माणि द्विजोत्तमाः॥३६॥
दानमध्ययनं यज्ञो धर्मः क्षत्रियवैश्ययोः ।
दण्डो युद्धं क्षत्रियस्य कृषिर्वैश्यस्य शस्यते॥३७॥
शुश्रूषैव द्विजातीनां शूद्राणां धर्मसाधनम्।
कारुकर्म तथाजीवः पाकयज्ञोऽपि धर्मतः॥३८॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, अध्ययन और अध्यापन-ये ब्राह्मणोंके छः कर्म हैं। दान, अध्ययन और यज्ञ-ये तीन क्षत्रिय और वैश्य के (सामान्य) धर्म हैं, दण्ड-विधान और युद्ध क्षत्रियका तथा कृषिकर्म वैश्यका प्रशस्त कर्म है। द्विजातियोंकी सेवा करना शूद्रों के लिये एकमात्र धर्मका साधन है। धर्मानुसार पाकयज्ञ तथा शिल्पविद्या उनकी आजीविका है॥३६-३८॥
ततः स्थितेषु वर्णेषु स्थापयामास चाश्रमान्।
गृहस्थं च वनस्थं च भिक्षुकं ब्रह्मचारिणम्॥ ३९॥
तदनन्तर वर्णों की व्यवस्था स्थिर हो जाने पर (उन्होंने) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास (इन चार)आश्रमों की स्थापना की ॥३९॥
अग्नयोऽतिथिशुश्रूषा यज्ञो दानं सुरार्चनम्।
गृहस्थस्य समासेन धर्मोऽयं मुनिपुंगवाः॥४०॥
होमो मूलफलाशित्वं स्वाध्यायस्तप एव च।
संविभागो यथान्यायं धर्मोऽयं वनवासिनाम्॥४१॥
भैक्षाशनं च मौनित्वं तपो ध्यानं विशेषतः।
सम्यग्ज्ञानं च वैराग्यं धर्मोऽयं भिक्षुके मतः॥४२॥
भिक्षाचर्या च शुश्रूषा गुरोः स्वाध्याय एव च।
संध्याकाग्निकार्यं च धर्मोऽयं ब्रह्मचारिणाम्॥४३॥
हे मुनिश्रेष्ठो! अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि)-की उपासना, अतिथि-सेवा, यज्ञ, दान एवं देवताओं की पूजा-यह संक्षेप में गृहस्थ का धर्म है। हवन, कन्द-मूल-फलका सेवन, स्वाध्याय तथा तप, न्यायपूर्वक (सम्पत्तिका) विभाजन-यह वानप्रस्थोंका धर्म है। भिक्षावृत्तिसे प्राप्त पदार्थों का सेवन, मौनव्रत, तप, सम्यक्-ध्यान, सम्यक्-ज्ञान तथा वैराग्य-यह संन्यासियोंका धर्म है। भिक्षा माँगना, गुरुकी सेवा करना, स्वाध्याय, संध्याकर्म
तथा अग्निकार्य-यह ब्रह्मचारियों का धर्म है॥ ४०-४३॥
ब्रह्मचारिवनस्थानां भिक्षुकाणां द्विजोत्तमाः।
साधारणं ब्रह्मचर्यं प्रोवाच कमलोद्भवः॥४४॥
ऋतुकालाभिगामित्वं स्वदारेषु न चान्यतः।
पर्ववर्जं गृहस्थस्य ब्रह्मचर्यमुदाहृतम्॥४५॥
आगर्भसम्भवादाद्यात् कार्यं तेनाप्रमादतः।
अकुर्वाणस्तु विप्रेन्द्रा भ्रूणहा तु प्रजायते॥४६॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! कमलसे प्रादुर्भूत ब्रह्माजीने ब्रह्मचर्य को ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासीका साधारण धर्म कहा है अर्थात् ब्रह्मचर्य तीनों आश्रमियोंका सामान्य धर्म है। ऋतुकाल (स्त्री के रजस्वलाकी चार रात्रियोंको छोड़कर)- में, विशेष पर्वो को छोड़कर अपनी पत्नी में गमन करना गृहस्थ के लिये 'ब्रह्मचर्य' ही कहा गया है, अन्य रात्रियों में नहीं। प्रथम गर्भ धारण करने तक उसे बिना किसी प्रमादके इस नियम का पालन करना चाहिये। हे विप्रेन्द्रो! ऐसा न करनेवाला (गृहस्थ) भ्रूणघाती होता है ॥ ४४-४६ ॥
वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या श्राद्धं चातिथिपूजनम्।
गृहस्थस्य परो धर्मो देवताभ्यर्चनं तथा॥४७॥
वैवाह्यमग्निमिन्धीत सायं प्रातर्यथाविधि।
देशान्तरगतो वाथ मृतपत्नीक एव वा॥४८॥
यथाशक्ति प्रतिदिन वेद का स्वाध्याय, श्राद्ध, अतिथि सेवा तथा देवताओं की पूजा-यह गृहस्थ का श्रेष्ठ धर्म है। किसी दूसरे देश में जाने पर अथवा पत्नी के मर जाने पर भी गृहस्थ को चाहिये कि वह प्रात:काल और सायंकाल विधिपूर्वक विवाहाग्नि (गार्हपत्याग्नि)-को प्रज्वलित करता रहे ॥ ४७-४८॥
त्रयाणामाश्रमाणां तु गृहस्थो योनिरुच्यते।
अन्ये तमुपजीवन्ति तस्माच्छ्रेयान् गृहाश्रमी॥४९॥
ऐकाश्रम्यं गृहस्थस्य त्रयाणां श्रुतिदर्शनात्।
तस्माद् गार्हस्थ्यमेवैकं विज्ञेयं धर्मसाधनम्॥५०॥
गृहस्थ-आश्रमको तीनों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा संन्यास)-का बीज कहा जाता है, क्योंकि तीनों आश्रमोंके लोग गृहस्थाश्रमीपर ही निर्भर रहते हैं, इसलिये गृहस्थाश्रमी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। वेदों का अभिमत है कि केवल गृहस्थाश्रममें ही अन्य तीनों आश्रमों का (समावेश) होता है, इसलिये एकमात्र गार्हस्थ्यको ही धर्मका साधन जानना चाहिये ॥४९-५०॥
परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ।
सर्वलोकविरुद्धं च धर्ममप्याचरेन तु॥५१॥
धर्मसे रहित जो अर्थ एवं काम नामक (पुरुषार्थ)हैं, उनका परित्याग करना चाहिये। साथ ही सभी प्रकारसे जो लोकविरुद्ध हो उस धर्मका भी आचरण नहीं करना चाहिये॥५१॥
धर्मात् संजायते ह्यर्थो धर्मात् कामोऽभिजायते।
धर्म एवापवर्गाय तस्माद् धर्मं समाश्रयेत्॥५२॥
धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, धर्म से ही काम की भी सिद्धि होती है और धर्म (-के आचरण)-से ही मोक्ष प्राप्त होता है, इसलिये धर्म का ही आश्रय लेना चाहिये ॥५२॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गस्त्रिगुणो मतः।
सत्त्वं रजस्तमश्चेति तस्माद्धर्मं समाश्रयेत्॥५३॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥५४॥
यस्मिन् धर्मसमायुक्तावर्थकामौ व्यवस्थितौ।
इह लोके सुखी भूत्वा प्रेत्यानन्त्याय कल्पते॥५५॥
धर्म, अर्थ और कामरूपी त्रिवर्ग (क्रमशः) सत्त्व, रज और तमरूपी त्रिगुण से युक्त है, इसलिये धर्म का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। सात्त्विक गुणों का आश्रय लेनेवाले ऊर्ध्व लोक को प्राप्त करते हैं, राजसी व्यक्ति मध्य लोकमें रहते हैं तथा तमोगुण के कार्य में स्थित तामसी व्यक्ति अधोगति को प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्ति में धर्म से समन्वित अर्थ और काम प्रतिष्ठित रहते हैं, वह इस लोक में सुखों का उपभोग कर मृत्यु के उपरान्त मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ होता है॥५३-५५॥
धर्मात् संजायते मोक्षो ह्यर्थात् कामोऽभिजायते ।
एवं साधनसाध्यत्वं चातुर्विध्ये प्रदर्शितम्॥५६॥
य एवं वेद धर्मार्थकाममोक्षस्य मानवः।
माहात्म्यं चानुतिष्ठेत स चानन्त्याय कल्पते॥५७॥
तस्मादर्थं च कामंच त्यक्त्वा धर्म समाश्रयेत्।
धर्मात् संजायते सर्वमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः॥५८॥
धर्म से (धर्माचरण से) मोक्ष की प्राप्ति होती है और अर्थ से काम की सिद्धि होती है। इस प्रकार चार प्रकार के पुरुषार्थों में साधन और साध्य का वर्णन दिखाया गया। जो मानव धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के इस प्रकार बताये गये माहात्म्य को जानता है और तदनुसार आचरण करता है, वह मोक्ष (प्राप्त) करने में समर्थ होता है। इसलिये (धर्मविरुद्ध) अर्थ एवं काम (-रूपी पुरुषार्थ)-का सर्वथा परित्याग कर धर्म का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये। धर्म से ही सब कुछ सिद्ध हो जाता है-ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है॥५६-५८॥
धर्मेण धार्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
अनादिनिधना शक्तिः सैषा ब्राह्मी द्विजोत्तमाः॥५९॥
कर्मणा प्राप्यते धर्मो ज्ञानेन च न संशयः ।
तस्माज्ज्ञानेन सहितं कर्मयोगं समाचरेत्॥६०॥
धर्म के द्वारा ही स्थावर-जंगमात्मक सारा विश्व धारण किया जाता है। हे द्विजोत्तमो! यह (धर्मशक्ति) ब्रह्माजी की वह ब्राह्मी शक्ति है जो आदि और अन्त से रहित है। कर्म एवं ज्ञान-दोनों के द्वारा ही धर्म की प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिये ज्ञानके साथ ही कर्मयोग का भी आचरण ग्रहण करना चाहिये॥५९-६०॥
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम्।
ज्ञानपूर्वं निवृत्तं स्यात् प्रवृत्तं यदतोऽन्यथा॥६१॥
निवृत्तं सेवमानस्तु याति तत् परमं पदम्। ।
तस्मान्निवृत्तं संसेव्यमन्यथा संसरेत् पुनः॥६२॥
प्रवृत्त एवं निवृत्त-इस प्रकार से वैदिक कर्म दो प्रकार का होता है। निवृत्त कर्म ज्ञानपूर्वक एवं प्रवृत्त कर्म इससे भिन्न प्रकार का होता है। निवृत्त कर्म का सेवन करनेवाला उस परमपद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है। अतः निवृत्तकर्म (निवृत्तिमार्ग)-का ही सेवन करना चाहिये, इससे अन्यथा करने पर पुन: संसारमें आना पड़ता है।६१-६२॥
क्षमा दमो दया दानमलोभस्त्याग एव च।
आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा॥६३॥
सत्यं संतोष आस्तिक्यं श्रद्धा चेन्द्रियनिग्रहः।
देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः॥६४॥
अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमकल्कता।
सामासिकमिमं धर्मं चातुर्वर्येऽब्रवीन्मनुः ॥६५॥
क्षमा, दम (इन्द्रियनिग्रह), दया, दान, अलोभ, त्याग, आर्जव (मन-वाणी आदि की सरलता), अनसूया, तीर्थानुसरण अर्थात् गुरु एवं शास्त्र का अनुगमन या तीर्थसेवन, सत्य, संतोष, आस्तिकता (वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा), श्रद्धा, जितेन्द्रियत्व, देवताओंका अर्चन, विशेष रूपसे ब्राह्मणोंकी पूजा, अहिंसा, मधुर भाषण, अपिशुनता तथा पाप से राहित्य-स्वायम्भुव मनुने चारों वर्गों के लिये ये सामान्य धर्म कहे हैं। ६३-६५ ॥
प्राजापत्यं ब्राह्मणानां स्मृतं स्थानं क्रियावताम्।
स्थानमैन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वपलायिनाम्॥६६॥
वैश्यानां मारुतं स्थानं स्वधर्ममनुवर्तताम्।
गान्धर्वं शूद्रजातीनां परिचारेण वर्तताम्॥६७॥
अपने ब्राह्मण-धर्म का यथावत् पालन करनेवाले क्रिया-निष्ठ ब्राह्मणों के लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक)तथा संग्राम में पलायन न करनेवाले क्षत्रियों के लिये केन्द्र-स्थान (इन्द्रलोक) सुनिश्चित है। इसी प्रकार स्वधर्म का पालन करनेवाले वैश्यों के लिये मारुत-स्थान (वायुलोक) और परिचर्यारूप स्वधर्मका पालन करनेवाले शूद्र जातिवालों के लिये गन्धर्वलोक सुनिश्चित है॥६६-६७॥
अष्टाशीतिसहस्राणामृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स्मृतं तेषां तु यत्स्थानं तदेव गुरुवासिनाम्॥६८॥
सप्तर्षीणां तु यत्स्थानं स्मृतं तद् वैवनौकसाम्।
प्राजापत्यं गृहस्थानां स्थानमुक्तं स्वयम्भुवा॥६९॥
ऊर्ध्वरेता अट्ठासी हजार (शौनक आदि) ऋषियों का जो स्थान है, वही स्थान गुरु के अन्तेवासी ब्रह्मचारियों को प्राप्त होता है। सप्तर्षियों का जो स्थान है, वही स्थान वनमें रहनेवाले वानप्रस्थियों को प्राप्त होता है और स्वयम्भू ब्रह्मा ने गृहस्थों के लिये प्राजापत्य स्थान (प्राजापत्य लोक) की प्राप्ति बतलायी है॥६८-६९॥
यतीनां यतचित्तानां न्यासिनामूर्ध्वरेतसाम्।
हैरण्यगर्भ तत् स्थानं यस्मानावर्तते पुनः॥७०॥
योगिनाममृतं स्थानं व्योमाख्यं परमाक्षरम्।
आनन्दमैश्वरं धाम सा काष्ठा सा परा गतिः॥७१॥
समाहित-चित्त यतात्मा ऊर्ध्वरेता संन्यासियों को हिरण्यगर्भ नामक वह स्थान प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः लौटना नहीं पड़ता। योगियोंको अविनाशी वह व्योमसंज्ञक श्रेष्ठ अमरस्थान प्राप्त होता है जो आनन्दस्वरूप और ऐश्वर धाम है, वही पराकाष्ठा (अन्तिम) और परम गति है ॥७०-७१॥
ऋषय ऊचुः
भगवन् देवतारिघ्न हिरण्याक्षनिषूदन।
चत्वारोह्याश्रमाः प्रोक्ता योगिनामेक उच्यते॥७२॥
ऋषियों ने कहा-देवताओं के शत्रुओं का विनाश करनेवाले, हिरण्याक्ष का वध करनेवाले हे भगवन्! (आपने) चार आश्रम बताये (किंतु) योगियोंके लिये एक ही आश्रम बतलाया ॥ ७२॥
श्रीकूर्म उवाच
सर्वकर्माणि संन्यस्य समाधिमचलं श्रितः।
यआस्ते निश्चलो योगी स संन्यासी न पञ्चमः॥७३॥
सर्वेषामाश्रमाणां तु द्वैविध्यं श्रुतिदर्शितम्।
ब्रह्मचार्युपकुर्वाणो नैष्ठिको ब्रह्मतत्परः॥७४॥
श्री कूम ने कहा-सभी कर्मों का परित्याग कर एकमात्र अचल समाधि में निरन्तर स्थिर रहनेवाला जो निश्चल योगी है, वही संन्यासी होता है, अत: (चार ही आश्रम होते हैं) पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं होता। वेदमें बतलाया गया है कि सभी आश्रम दो प्रकारके होते हैं। ब्रह्मचारीके दो भेद हैं-उपकुर्वाण और नैष्ठिक ब्रह्मतत्पर ॥ ७३-७४ ॥
योऽधीत्य विधिवद्वेदान् गृहस्थाश्रममाव्रजेत्।
उपकुर्वाणको ज्ञेयो नैष्ठिको मरणान्तिकः॥७५॥
जो ब्रह्मचारी विधिवत् वेदों का अध्ययन कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है, उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी समझना चाहिये और जो यावज्जीवन गुरु के पास रहकर ब्रह्मविद्या का अभ्यास करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाता है। ७५ ॥
उदासीन: साधकश्च गृहस्थो द्विविधो भवेत्।
कुटुम्बभरणे यत्तः साधकोऽसौ गृही भवेत्॥७६॥
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य त्यक्त्वा भार्याधनादिकम्।
एकाकी यस्तु विचरेदुदासीनः स मौक्षिकः॥७७॥
(इसी प्रकार) गृहस्थाश्रमी भी दो प्रकारका होता है-(१) उदासीन और (२) साधक। जो कुटुम्ब के भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह गृहस्थ साधक कहलाता है और जो देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण-इन तीन ऋणोंसे उऋण होकर स्त्री, धन आदि का परित्याग कर देता है तथा एकाकी विचरण करता है, वह मोक्ष-प्राप्तिकी इच्छावाला गृहस्थ उदासीन कहलाता है॥ ७६-७७॥
तपस्तप्यति योऽरण्ये यजेद् देवान् जुहोति च।
स्वाध्याये चैव निरतो वनस्थस्तापसो मतः॥७८॥
तपसा कर्षितोऽत्यर्थं यस्तु ध्यानपरो भवेत्।
सांन्यासिकः स विज्ञेयो वानप्रस्थाश्रमे स्थितः॥७९॥
जो वन में अनुष्ठान करता है, देवताओं की पूजा करता है, हवन करता है और स्वाध्यायमें निरत रहता है, वह वनमें रहनेवाला 'तापस' नामक वानप्रस्थ कहलाता है और जो अत्यन्त तपसे अपने शरीरको कृश कर लेता है तथा निरन्तर ध्यानपरायण रहता है, वह वानप्रस्थ-आश्रम में रहनेवाला सांन्यासिक वानप्रस्थी कहलाता है॥७८-७९॥
योगाभ्यासरतो नित्यमारुरुक्षुर्जितेन्द्रियः।
ज्ञानाय वर्तते भिक्षुः प्रोच्यते पारमेष्ठिकः॥८०॥
यस्त्वात्मरतिरेव स्यान्नित्यतृप्तो महामुनिः ।
सम्यग् दर्शनसम्पन्नः स योगी भिक्षुरुच्यते॥८१॥
नित्य योगाभ्यास में रत रहनेवाला, मोक्षमार्ग में आरूढ़ होने की इच्छावाला, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रयत्नशील संन्यासीको 'पारमेष्ठिक' संन्यासी कहा जाता है और जो केवल आत्मामें ही रमण करनेवाला है, नित्य-तृप्त महामुनि है, सम्यक्-दर्शन-सम्पन्न है वह संन्यासी 'योगी' कहलाता है॥८०-८१॥
ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनोऽपरे।
कर्मसंन्यासिनः केचित् त्रिविधा: पारमेष्ठिकाः॥८२॥
योगी च त्रिविधो ज्ञेयो भौतिकः सांख्य एव च।
तृतीयोऽत्याश्रमी प्रोक्तो योगमुत्तममास्थितः॥८३॥
प्रथमा भावना पूर्वे सांख्ये त्वक्षरभावना।
तृतीये चान्तिमा प्रोक्ता भावना पारमेश्वरी॥८४॥
पारमेष्ठिक (संन्यासी)-के तीन भेद होते हैं-(१) कोई ज्ञान संन्यासी होते हैं, (२) कोई वेदसंन्यासी होते हैं और (३) कोई कर्मसंन्यासी होते हैं। (इसी प्रकार) योगी भी तीन प्रकार का समझना चाहिये-पहला भौतिक, दूसरा सांख्य और तीसरे प्रकार का योगी अत्याश्रमी कहा गया है, जो श्रेष्ठ योग में ही नित्य स्थित रहता है। पहले भौतिक योगी में प्रथम भावना, (दूसरे) सांख्ययोगीमें अक्षर-भावना और तीसरे अत्याश्रमी नामक योगी में जो अन्तिम भावना रहती है, वह पारमेश्वरी भावना कहलाती है॥ ८२-८४॥
तस्मादेतद् विजानीध्वमाश्रमाणां चतुष्टयम्।
सर्वेषु वेदशास्त्रेषु पञ्चमो नोपपद्यते॥८५॥
इसीलिये (हे ऋषियो!) सभी वेदशास्त्रोंमें चार ही आश्रम निश्चित किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये। पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं है।। ८५ ॥
एवं वर्णाश्रमान् सृष्ट्वा देवदेवो निरञ्जनः ।
दक्षादीन् प्राह विश्वात्मा सृजध्वं विविधाः प्रजाः॥८६॥
ब्रह्मणो वचनात् पुत्रा दक्षाद्या मुनिसत्तमाः।
असृजन्त प्रजाः सर्वा देवमानुषपूर्विकाः॥८७॥
इस प्रकार (चार) वर्ण तथा (चार) आश्रमोंकी सृष्टि करके देवाधिदेव निरञ्जन विश्वात्मा (ब्रह्माजी)-ने दक्ष आदि (प्रजापतियों)-से कहा-'अनेक प्रकारकी सृष्टि करो'। हे मुनिश्रेष्ठो! ब्रह्माजीके कहनेपर उनके दक्ष आदि (मानस) पुत्रोंने देवताओं एवं मनुष्योंके साथ ही अन्य भी सभी प्रजाओं (प्राणियों)-की सृष्टि की ॥ ८६-८७ ॥
इत्येष भगवान् ब्रह्मा स्रष्ट्रत्वे स व्यवस्थितः।
अहं वै पालयामीदं संहरिष्यति शूलभृत्॥८८॥
इस प्रकार ये भगवान् ब्रह्मा सृष्टिके कार्य में नियत हैं। मैं इस (सृष्टि)-का पालन-पोषण करता हूँ और शूलधारी भगवान् शंकर इसका संहार करेंगे॥८८ ॥
तित्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।
रजःसत्त्वतमोयोगात् परस्य परमात्मनः॥८९॥
अन्योन्यमनुरक्तास्ते ह्यन्योन्यमुपजीविनः ।
अन्योन्यं प्रणताश्चैव लीलया परमेश्वराः॥९०॥
परात्पर परमात्माकी रज, सत्त्व एवं तमोगुण के योगसे (क्रमशः) ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर नामक तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। ये तीनों विग्रह परस्पर एक-दूसरे में अनुरक्त तथा एक-दूसरे के उपजीवी (आश्रित) हैं। ये तीनों परमेश्वर हैं और लीलावश एक-दूसरे को प्रणाम करते रहते हैं। ८९-९०॥
ब्राह्मी माहेश्वरी चैव तथैवाक्षरभावना।
तिस्त्रस्तु भावना रुद्रे वर्तन्ते सततं द्विजाः॥९१॥
प्रवर्तते मय्यजस्त्रमाद्या चाक्षरभावना।
द्वितीया ब्रह्मणः प्रोक्ता देवस्याक्षरभावना॥९२॥
हे ब्राह्मणो! रुद्रमें ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा अक्षर (वैष्णवी) नामक तीन प्रकारकी भावनाएँ सर्वदा विद्यमान रहती हैं। मुझमें प्रथम अक्षरभावना निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। भगवान् ब्रह्माजीकी द्वितीय अक्षरभावना कही गयी है॥९१-९२॥
अहं चैव महादेवो न भिन्नौ परमार्थतः।
विभज्य स्वेच्छयात्मानं सोऽन्तर्यामीश्वरः स्थितः ॥९३॥
त्रैलोक्यमखिलं स्रष्टुं सदेवासुरमानुषम्।
पुरुषः परतोऽव्यक्ताद् ब्रह्मत्वं समुपागमत्॥९४॥
पारमार्थिक दृष्टिसे मुझमें और महादेवमें कोई भिन्नता नहीं है। वही अन्तर्यामी ईश्वर अपनी इच्छा से अपनेको विभाजित कर (मेरे तथा महादेवके रूपमें) स्थित है। देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंके साथ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यकी सृष्टि करनेके लिये (इसी परम) पुरुषने अपने परात्पर अव्यक्त स्वरूपद्वारा ब्रह्मत्व को स्वीकार किया अर्थात् वे ही अव्यक्त परमात्मा सृष्टि करनेके लिये ब्रह्माके रूपमें व्यक्त हुए।९३-९४॥
तस्माद् ब्रह्मा महादेवो विष्णुर्विश्वेश्वरः परः।
एकस्यैव स्मृतास्तिस्त्रस्तनूः कार्यवशात् प्रभोः ।।९५॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वन्द्याः पूज्याः प्रयत्नतः।
यदीच्छेदचिरात् स्थानं यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम्॥९६॥
वर्णाश्रमप्रयुक्तेन धर्मेण प्रीतिसंयुतः।
पूजयेद् भावयुक्तेन यावज्जीवं प्रतिज्ञया॥९७॥
अतः ब्रह्मा, महादेव एवं परात्पर विश्वेश्वर भगवान् विष्णु (ये तीनों ही) पृथक्-पृथक् कार्यकी दृष्टि से एक ही प्रभुकी तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषतः (ये तीनों ही) वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं। मोक्ष नामसे कहे जानेवाले उस अविनाशी स्थानको यदि शीघ्र ही प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वर्णाश्रम-धर्मके नियमोंका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पालन करते हुए प्रतिज्ञापूर्वक बड़े श्रद्धाभावसे जीवनपर्यन्त इन (त्रिदेवों)-का पूजन करना चाहिये ॥९५-९७॥
चतुर्णामाश्रमाणां तु प्रोक्तोऽयं विधिवद्विजाः।
आश्रमो वैष्णवो ब्राह्मो हराश्रम इति त्रयः॥ ९८ ॥
तल्लिङ्गधारी सततं तद्भक्तजनवत्सलः।
ध्यायेदथार्चयेदेतान् ब्रह्मविद्यापरायणः॥ ९९ ॥
हे ब्राह्मणो! विधिपूर्वक इस प्रकार चारों आश्रमों का वर्णन किया गया। (इनमें) वैष्णव, ब्राह्म तथा हर (शैव) नामक तीन आश्रम (सम्प्रदाय) होते हैं। उन (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म आश्रमों)-का लिङ्ग (चिह्न)धारण कर उस (देवता)-के भक्तजनोंके प्रति प्रेम रखते हुए ब्रह्मविद्यापरायण व्यक्तिको चाहिये कि वह इन देवों का निरन्तर ध्यान करे, पूजन करे॥९८-९९॥
सर्वेषामेव भक्तानां शम्भोलिङ्गमनुत्तमम्।
सितेन भस्मना कार्य ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम्॥१००॥
यस्तु नारायणं देवं प्रपन्नः परमं पदम्।
धारयेत् सर्वदा शूलं ललाटे गन्धवारिभिः॥१०१॥
प्रपन्ना ये जगबीजं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
तेषां ललाटे तिलकं धारणीयं तु सर्वदा॥१०२॥
शिवके सभी भक्तोंके लिये (चिह्न-रूपमें) शिवलिङ्ग धारण करना श्रेष्ठ है। शैवोंको चाहिये कि वे श्वेत भस्म से ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करें। जो परम पद (-स्वरूप) भगवान् नारायणके शरणागत (भक्त) हो उसे ललाटपर (कस्तूरी आदिके) सुगन्धित जलसे त्रिशूल (-की आकृति)-का तिलक सर्वदा धारण करना चाहिये। जो संसारके बीज परमेष्ठी ब्रह्मा के भक्त हैं, उन्हें ललाट पर सर्वदा तिलक धारण करना चाहिये ॥१००-१०२॥
योऽसावनादिर्भूतादिः कालात्मासौ धृतो भवेत्।
उपर्यधो भावयोगात् त्रिपुण्ड्रस्य तु धारणात्॥१०३।।
यत्तत् प्रधानं त्रिगुणं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।
धृतं त्रिशूलधरणाद् भवत्येव न संशयः॥१०४।।
ब्रह्मतेजोमयं शुक्लं यदेतन्मण्डलं रवेः।
भवत्येव धृतं स्थानमैश्वरं तिलके कृते॥१०५॥
ऊपर-नीचे भावपूर्वक त्रिपुण्ड्रके धारण करनेसे अनादि (होते हुए भी) जो प्राणियोंका आदि है, कालात्मा है उसका धारण करना हो जाता है। त्रिशूल (चिह्न)-के धारण करनेसे जो वह त्रिगुणात्मक प्रधान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूप है निश्चयरूपसे उसका धारण हो जाता है। तिलक लगानेसे जो आदित्यमण्डल का प्रकाशमान ब्रह्मतेजोमय ऐश्वरयुक्त स्थान है उसका धारण हो जाता है॥१०३-१०५॥
तस्मात् कार्यं त्रिशूलाङ्कं तथा च तिलकं शुभम्।
त्रियायुषं च भक्तानां त्रयाणां विधिपूर्वकम्॥१०६॥
इसलिये (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म) तीनों प्रकार के भक्तोंको विधिपूर्वक मङ्गलमय तथा दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले त्रिशूलके चिह्न तथा तिलकको धारण करना चाहिये ॥१०६॥
यजेत जुहुयादग्नौ जपेद् दद्याज्जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो जितक्रोधो वर्णाश्रमविधानवित्॥१०७॥
एवं परिचरेद् देवान् यावज्जीवं समाहितः।
तेषां संस्थानमचलं सोऽचिरादधिगच्छति॥१०८॥
वर्ण तथा आश्रमके विधि-विधानको जाननेवाले शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधजयीको यज्ञ, अग्नि में हवन, जप तथा दान करना चाहिये। इस प्रकार यावज्जीवन समाहित-मन होकर देवोंकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसे शीघ्र ही अचल स्थान की प्राप्ति होती है॥१०७-१०८॥
Summary of chapter 2 of the Kūrma Mahā Purana is as follows:
Bhagavān Kūrma recounts how prior to creation, Purushottama Nārāyaṇa rested upon Śesha in the primeval ocean and brought forth Brahmā Hiranyagarbha and Rudra. At the command of Nārāyaṇa, Goddess Lakshmī was instructed to bind worldly beings through Her enchanting Māyā while sparing truthful ascetics, silent meditators, performers of Yajñas, and sincere worshippers of Mahādeva. Brahmā then generated the nine Mānasa-putras—Bhṛgu, Angiras, Pulastya, Pulaha, Kratu, Daksha, Atri, Vashishṭha, and Marīchi—alongside the four Varṇas from his face, arms, thighs, and feet for the performance of cosmic rites. The eternal Veda was revealed to establish cosmic righteousness through the six prescribed duties of Brāhmaṇas, defense by Kshatriyas, commerce by Vaishyas, and service by Śūdras. The four Āshramas—Brahmacharya, Gṛhastha, Vānaprastha, and Saṁnyāsa—were instituted with Gṛhasthāshrama serving as the essential bedrock of all spiritual order. Bhagavān emphasizes that Dharma generates Artha, Kāma, and Moksha, revealing that Brahmā, Vishṇu, and Śiva are functional forms of the singular Supreme Entity who must be reverently worshipped through prescribed duties, holy Tilaka, and sacred Marks.