पूर्वार्थ - 1 अध्याय

सूतजीकी उत्पत्ति, उनके रोमहर्षण नाम पड़नेका कारण, पुराणों तथा

उपपुराणोंका नाम-परिगणन, समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विष्णुमायाका

वर्णन, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और कूर्मपुराणकी महिमा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

नमस्कृत्वाप्रमेयाय विष्णवे कूर्मरूपिणे।

पुराणं सम्प्रवक्ष्यामि यदुक्तं विश्वयोनिना॥१॥

(बदरिकाश्रममें निवास करनेवाले ऋषि) नारायण, नरोंमें उत्तम श्रीनर तथा उनकी लीला प्रकट करनेवालीभगवती सरस्वतीको नमस्कार कर जय (पुराण एवंइतिहास आदि सद्ग्रन्थों)-का पाठ करना चाहिये।कूर्मरूप धारण करनेवाले अप्रमेय भगवान् विष्णुकोनमस्कार कर मैं उस पुराण (कूर्मपुराण)-को कहूँगा, जो समस्त विश्वके मूल कारण भगवान् विष्णुके द्वाराकहा गया था ॥१॥

सत्रान्ते सूतमनघं नैमिषीया महर्षयः।

पुराणसंहितां पुण्यां पप्रच्छू रोमहर्षणम्॥२॥

त्वया सूत महाबुद्धे भगवान् ब्रह्मवित्तमः।

इतिहासपुराणार्थं व्यासः सम्यगुपासितः॥३॥

तस्य ते सर्वरोमाणि वचसा हृषितानि यत्।

द्वैपायनस्य भगवांस्ततो वै रोमहर्षणः॥४॥

नैमिषारण्यवासी महर्षियोंने (बारह वर्षतक चलनेवाले)सत्र (यज्ञ)-के पूर्ण हो जानेपर सर्वथा निष्पाप रोमहर्षणसूतजीसे पवित्र पुराण-संहिताके विषयमें प्रश्न किया-महाबुद्धिमान् सूतजी महाराज! आपने इतिहास औरपुराणोंके ज्ञानके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें परम श्रेष्ठ भगवान्वेदव्यासजीकी भलीभाँति उपासना की है। चूंकिआपके वचनसे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीके समस्तरोम हर्षित हो गये थे, इसलिये आप 'रोमहर्षण' कहलाते हैं॥२-४॥

भवन्तमेव भगवान् व्याजहार स्वयं प्रभुः।

मुनीनां संहितां वक्तुं व्यासः पौराणिकी पुरा॥ ५॥

त्वं हि स्वायम्भुवे यज्ञे सुत्याहे वितते हरिः।

सम्भूतः संहितां वक्तुं स्वांशेन पुरुषोत्तमः॥ ६ ॥

तस्माद् भवन्तं पृच्छामः पुराणं कौर्ममुत्तमम्।

वक्तुमर्हसि चास्माकं पुराणार्थविशारद ॥ ७ ॥

प्राचीन कालमें स्वयं समर्थ होते हुए भी भगवान्वेदव्यासजीने आपसे ही कहा था कि आप मुनियोंकोपुराण-संहिता सुनायें। (सूतजी महाराज!) आप अपनेअंशसे उत्पन्न साक्षात् पुरुषोत्तम नारायण हैं। स्वयम्भूब्रह्माजीके महान् यज्ञमें सोमरस प्रस्तुत करनेके दिनपुराण-संहिताका वाचन करनेके लिये ही आपका आविर्भावहुआ था। आप पुराणोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवालेहैं। इसीलिये हम आपसे श्रेष्ठ कूर्मपुराणके विषयमें पूछरहे हैं। आप हमें वह (कूर्मपुराण) बतलायें ॥५-७॥

मुनीनां वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः ।

प्रणम्य मनसा प्राह गुरुं सत्यवतीसुतम्॥ ८ ॥

मुनियोंके वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीनेदेवी सत्यवतीके पुत्र अपने गुरु (भगवान् वेदव्यास)-को मन-ही-मन प्रणाम कर (इस प्रकार) कहा-॥८॥

रोमहर्षण उवाच

नमस्कृत्वा जगद्योनि कूर्मरूपधरं हरिम्।

वक्ष्ये पौराणिकी दिव्यांकथांपापप्रणाशिनीम्॥ ९ ॥

यां श्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेत परमां गतिम्।

ननास्तिके कथांपुण्यामिमां ब्रूयात् कदाचन॥१०॥

श्रद्दधानाय शान्ताय धार्मिकाय द्विजातये।

इमां कथामनुब्रूयात् साक्षान्नारायणेरिताम्॥११॥

रोमहर्षण सूतजी बोले-समस्त विश्वके मूल कारण, कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण विष्णुकोनमस्कार करके कूर्मपुराणकी उस दिव्य कथाको कहताहूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है और जिसेसुनकर महान्-से-महान् पाप करनेवाला पापी व्यक्तिभी परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कूर्मपुराणकी इसपुण्यकथाको नास्तिक व्यक्तिको कभी भी नहीं सुनानाचाहिये। जो अत्यन्त श्रद्धालु हैं, शान्त हैं, धर्मात्मा हैं-ऐसे द्विजातियोंको साक्षात् नारायण भगवान् विष्णुके द्वाराकही गयी इस कूर्मपुराणकी कथाको विशेष रूपसेकहना चाहिये ॥९-११॥

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।

वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम्॥१२॥

सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय), वंश, वंशानुचरिततथा मन्वन्तर-ये पुराणोंके पाँच लक्षण हैं ॥ १२ ॥

ब्राह्यं पुराणं प्रथमं पानं वैष्णवमेव च।

शैवं भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम्॥१३॥

मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च।

लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च॥१४॥

कौम मात्स्यं गारुडं च वायवीयमनन्तरम्।

अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम्॥१५॥

अठारह महापुराणोंमें प्रथम पुराण ब्रह्मपुराण है | द्वितीय पद्मपुराण है। इसी प्रकार क्रमशः विष्णु, शिव, भागवत, भविष्य, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य और गरुडपुराणहैं। भगवान् वायुके द्वारा कहा गया अठारहवाँ पुराणब्रह्माण्डपुराणके नामसे कहा जाता है ॥१३-१५॥

अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु।

अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः॥१६॥

आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम्।

तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम्॥१७॥

(सूतजीने पुनः कहा-) ब्राह्मणो! अठारह पुराणोंकानाम सुनकर (अब आप लोग) मुनियोंद्वारा कहे गयेअन्य उपपुराणोंका नाम भी संक्षेपमें सुनें-॥१६॥(इन उपपुराणोंमें) पहला उपपुराण सनत्कुमारकेद्वारा कहा गया सनत्कुमार उपपुराण है। तदनन्तर दूसरानरसिंहपुराण है। स्कन्दकुमारके द्वारा कथित तीसरापुराण स्कन्दपुराण कहा गया है॥१७॥

चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम्।

दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदोक्तमतः परम्॥१८॥

कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम्।

ब्रह्माण्डं वारुणं चाथ कालिकाह्वयमेव च ॥१९॥

माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसंचयम्।

पराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम्॥२०॥

चौथे पुराणका नाम शिवधर्म है जो साक्षात् भगवान्नन्दीश्वर (शिव)-के द्वारा कहा गया है। महर्षि दुर्वासाकेद्वारा कहा गया आश्चर्यपुराण पाँचवाँ है और छठा पुराणदेवर्षि नारदके द्वारा कहा गया नारदपुराण है। इसी प्रकार (सातवाँ) कपिल, (आठवाँ) मानव और शुक्राचार्यद्वाराप्रोक्त उशना नामक (नवाँ) पुराण है। (दसवाँ)ब्रह्माण्ड, (ग्यारहवाँ) वरुण तथा (बारहवाँ पुराण)कालिकापुराणके नामसे कहा गया है। (तेरहवाँ)माहेश्वरपुराण, (चौदहवाँ) साम्बपुराण तथा सभी प्रकारकेअर्थोंसे युक्त (पंद्रहवाँ) सौरपुराण है। (सोलहवाँ)पराशरपुराण महर्षि पराशरके द्वारा कहा गया है। (सत्रहवाँ) मारीचपुराण है और (अठारहवाँ पुराण)भार्गवपुराणके नामसे कहा गया है॥ १८-२० ॥

इदं तु पञ्चदशमं पुराणं कौर्ममुत्तमम्।

चतुर्धा संस्थितं पुण्यं संहितानां प्रभेदतः ॥२१॥

ब्राह्मी भागवती सौरी वैष्णवी च प्रकीर्तिताः।

चतस्त्रः संहिताः पुण्या धर्मकामार्थमोक्षदाः॥२२॥

यह कूर्मपुराण पंद्रहवाँ महापुराण है, जो पुराणोंमेंश्रेष्ठ है। संहिताओंके भेदसे यह पवित्र पुराण चार भागों (चार संहिताओं)-में विभक्त है। ब्राह्मी, भागवती, सौरीतथा वैष्णवी नामक इस कूर्मपुराणकी चार पवित्रसंहिताएँ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इस प्रकारचतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाली कही गयी हैं ॥ २१-२२ ।।

इयं तु संहिता ब्राह्मी चतुर्वेदैस्तु सम्मिता।

भवन्ति षट्सहस्त्राणि श्लोकानामत्र संख्यया॥२३॥

यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च मुनीश्वराः।

माहात्म्यमखिलं ब्रह्म ज्ञायते परमेश्वरः॥२४॥

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।

वंशानुचरितं दिव्याः पुण्याः प्रासंगिकी:कथाः॥२५॥

ब्राह्मणाद्यैरियं धार्या धार्मिकैः शान्तमानसैः।

तामहं वर्तयिष्यामि व्यासेन कथितां पुरा॥२६॥

यह ब्राह्मी संहिता है, जो चारों वेदोंद्वारा अनुमोदितहै। इसकी श्लोक-संख्या छः हजार है। हे मुनीश्वरो!इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अशेष माहात्म्यवर्णित है और (इसके श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पठन-पाठनएवं श्रवण आदिसे) परमेश्वर ब्रह्मका ज्ञान होता है।इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरितऔर दिव्य एवं पुण्य प्रासंगिक कथाएँ भी कही गयीहैं। यह पुराणसंहिता शान्त-चित्त एवं धर्मात्मा ब्राह्मणादिकोंकेद्वारा धारण करने योग्य है। (सूतजी कहते हैं-) मैंउसी पुराणसंहिताका प्रवचन करूँगा, जिसे प्राचीनसमयमें वेदव्यासजीने कहा था ॥ २३-२६॥

पुरामृतार्थं दैतेयदानवैः सह देवताः।

मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुः क्षीरसागरम्॥ २७॥

मथ्यमाने तदा तस्मिन् कूर्मरूपी जनार्दनः ।

बभार मन्दरं देवो देवानां हितकाम्यया ।। २८॥

प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओंनेदितिके पुत्र दैत्यों और दानवोंके साथ मन्दर नामकपर्वतको मथानी बनाकर क्षीरसागरको मथा। उसक्षीरसागरके मन्थन किये जाते समय देवताओंकेकल्याणकी कामनासे जनार्दन भगवान् विष्णुने कूर्मरूपधारण करके उस मन्दराचलको ऊपर उठायेरखा ॥ २७-२८॥

देवाश्च तुष्टवुर्देवं नारदाद्या महर्षयः।

कूर्मरूपधरं दृष्ट्वा साक्षिणं विष्णुमव्ययम्॥२९॥

कूर्म (कच्छप)-रूप धारण किये हुए सर्वद्रष्टाअविनाशी भगवान् विष्णुको देखकर देवताओं तथानारदादि महर्षियोंने उन देवकी स्तुति की ॥ २९ ॥

तदन्तरेऽभवद् देवी श्री रायणवल्लभा।

जग्राह भगवान् विष्णुस्तामेव पुरुषोत्तमः ॥३०॥

तेजसा विष्णुमव्यक्तं नारदाद्या महर्षयः।

मोहिताः सह शक्रेण श्रियो वचनमब्रुवन्॥३१॥

उसी समय नारायण भगवान् विष्णुकी प्रिया देवीश्रीलक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। उन्हें पुरुषोत्तम भगवान्विष्णुने ही ग्रहण किया। लक्ष्मीके तेजसे मोहित हुएइन्द्रसहित नारद आदि महर्षियोंने अव्यक्त भगवान्विष्णुसे यह वचन कहा- ॥ ३०-३१ ।।

भगवन् देवदेवेश नारायण जगन्मय।

कैषा देवी विशालाक्षी यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥३२॥

हे भगवन् ! हे देवदेवेश! हे नारायण! हे जगन्मय!हम पूछनेवालोंको आप ठीक-ठीक बतलायें किविशाल नेत्रोंवाली यह देवी कौन है? ॥३२॥

श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं विष्णुर्दानवमर्दनः ।

प्रोवाच देवीं सम्प्रेक्ष्य नारदादीनकल्मषान्॥३३॥

उस समय उन देवताओं तथा महर्षियोंका वहवाक्य सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णुदेवी लक्ष्मीकी ओर देखकर नारद आदि परम पवित्रमहर्षियोंसे बोले- ॥ ३३ ॥

इयं सा परमा शक्तिर्मन्मयी ब्रह्मरूपिणी।

माया मम प्रियानन्ता ययेदं मोहितं जगत्॥३४॥

अनयैव जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।

मोहयामि द्विजश्रेष्ठा ग्रसामि विसृजामि च॥३५॥

उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।

विज्ञायान्वीक्ष्य चात्मानं तरन्ति विपुलामिमाम्॥३६॥

अस्यास्त्वंशानधिष्ठाय शक्तिमन्तोऽभवन् द्विजाः।

ब्रह्मशानादयो देवाः सर्वशक्तिरियं मम॥३७॥

यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी वह प्रियाहै जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। हेश्रेष्ठ द्विजो! इसीके द्वारा मैं देवताओं, असुरों एवं मनुष्योंसेयुक्त सम्पूर्ण विश्वको मोहित करता हूँ, संहार करता हूँऔर पुनः सृष्टि करता हूँ। (ज्ञानीजन जगत्की) उत्पत्तिएवं प्रलयको तथा प्राणियोंके जन्म एवं मोक्षको ठीक-ठीक समझकर और आत्मतत्त्वका दर्शनकर इस महा-मायाके बन्धनसे पार उतरते हैं। द्विजो! मेरी सब प्रकारकीशक्ति यही है, इसीके अंशोंका आश्रय ग्रहणकर ब्रह्मातथा शिव आदि देवता शक्तिमान् हुए हैं ॥ ३४-३७॥

सैषा सर्वजगत्सूतिः प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका।

प्रागेव मत्तः संजाता श्रीकल्पे पद्मवासिनी॥३८॥

चतुर्भुजा शङ्खचक्रपद्महस्ता शुभान्विता।

कोटिसूर्यप्रतीकाशा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥३९॥

नालं देवा न पितरो मानवा वसवोऽपि च।

मायामेतां समुत्तर्तुं ये चान्ये भुवि देहिनः॥४०॥

यही वह सत्त्व-रज तथा तम–तीनों गुणोंसे युक्तत्रिगुणात्मिका प्रकृति है और यही सारे संसारको उत्पन्नकरनेवाली है। प्राचीन कालमें श्रीकल्पमें यह पद्मवासिनीकेरूपमें मुझसे ही आविर्भूत हुई थी। ये चार भुजावालीहैं, ये हाथोंमें शंख, चक्र तथा कमल धारण कियेरहती हैं, सभी मङ्गलमय गुणोंसे युक्त हैं, करोड़ों सूर्योंकेसमान इनकी आभा है, ये सभी प्राणियोंको मोहितकरनेवाली हैं। देवता, पितर, मनुष्य, वसुगण तथापृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी अन्य देहधारी प्राणी हैं,वे सभी अर्थात् कोई भी ऐसा नहीं है जो इस मायाकोपार करने में समर्थ हो। ३८-४०॥

इत्युक्ता वासुदेवेन मुनयो विष्णुमब्रुवन्।

ब्रूहि त्वं पुण्डरीकाक्ष यदि कालत्रयेऽपि च।

को वा तरति तां मायां दुर्जयां देवनिर्मिताम्॥४१॥

भगवान् वासुदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपरमुनियोंने भगवान् विष्णुसे कहा-हे पुण्डरीकाक्ष! उसदेवनिर्मित दुर्जय मायाको पार करनेवाला तीनों कालोंमेंयदि कोई हुआ हो तो उसे आप बतलायें ॥४१॥

अथोवाच हृषीकेशो मुनीन् मुनिगणार्चितः ।

अस्ति द्विजातिप्रवर इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः॥४२॥

पूर्वजन्मनि राजासावधृष्यः शंकरादिभिः।

दृष्ट्वा मां कूर्मसंस्थानं श्रुत्वा पौराणिकी स्वयम्।

संहितां मन्मुखाद दिव्यां पुरस्कृत्य मुनीश्वरान्॥४३॥

ब्रह्माणंच महादेवं देवांश्चान्यान् स्वशक्तिभिः।

मच्छक्तौ संस्थितान् बुद्ध्वा मामेव शरणं गतः॥४४॥

तदनन्तर मुनियोंद्वारा पूजित भगवान् हृषीकेशनेउन मुनियोंसे कहा-इन्द्रद्युम्न नामका द्विजातियोंमें श्रेष्ठ एकब्राह्मण था, ऐसा सुना गया है। पूर्वजन्ममें वह शंकर आदिदेवताओंसे भी अजेय राजा था। मैंने कूर्म-अवतार धारणकिया है' यह जानकर तथा स्वयं मेरे मुखसे दिव्य पुराण-संहिताको सुनकर वह (राजा इन्द्रद्युम्न) मुनीश्वरोंसहितब्रह्मा, शिव एवं अपनी-अपनी शक्तियोंके साथ अन्यसभी देवताओंको मेरी ही शक्तिमें प्रतिष्ठित समझकरमुझे देखनेके लिये मेरी शरणमें आया ॥ ४२-४४॥

सम्भाषितो मया चाथ विप्रयोनिं गमिष्यसि।

इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो जातिं स्मरसि पौर्विकीम्॥४५॥

सर्वेषामेव भूतानां देवानामप्यगोचरम्।

वक्तव्यं यद् गुह्यतमं दास्ये ज्ञानं तवानघ ।

लब्ध्वा तन्मामकं ज्ञानं मामेवान्ते प्रवेक्ष्यसि॥४६॥

अंशान्तरेण भूम्यां त्वं तत्र तिष्ठ सुनिर्वृतः।

वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते कार्यार्थं मां प्रवेक्ष्यसि॥४७॥

इसके बाद मैंने कहा-(इन्द्रद्युम्न!) तुम ब्राह्मणकीयोनिमें उत्पन्न होओगे, तुम्हारा 'इन्द्रद्युम्न' यह नामप्रसिद्ध होगा और तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करोगे।हे अनघ! मैं तुम्हें सभी प्राणियों तथा देवताओंके लियेभी अज्ञात एवं जो अत्यन्त गूढरूपसे कहने योग्य है, उस ज्ञानको प्रदान करूँगा। उस मेरे ज्ञानको प्राप्तकर तुमअन्त समयमें मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे और अपनेही अंशसे दूसरे रूपमें तुम पृथ्वीपर शान्तिपूर्वक रहो।वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर तुम (अभीष्ट)कार्यके लिये मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे॥ ४५-४७॥

मां प्रणम्य पुरीं गत्वा पालयामास मेदिनीम्।

कालधर्मं गतः कालाच्छ्वेतद्वीपे मया सह॥४८॥

भुक्त्वा तान् वैष्णवान् भोगान् योगिनामप्यगोचरान्।

मदाज्ञया मुनिश्रेष्ठा जज्ञे विप्रकुले पुनः॥४९॥

(भगवान्ने पुनः कहा-) मुनिश्रेष्ठो! मुझे प्रणामकरवह राजा अपनी नगरीमें गया और पृथ्वीका पालन-पोषण करने लगा। यथासमय मृत्यु होनेपर वह मेरेस्थान-श्वेतद्वीपको प्राप्त हुआ और वहाँ मेरे साथयोगियोंके लिये भी अलभ्य दिव्य वैष्णव भोगोंकोभोगकर पुन: मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्नहुआ॥ ४८-४९॥

ज्ञात्वा मां वासुदेवाख्यं यत्र द्वे निहितेऽक्षरे।

विद्याविद्ये गूढरूपे यत्तद् ब्रह्म परं विदुः॥५०॥

सोऽर्चयामास भूतानामाश्रयं परमेश्वरम्।

व्रतोपवासनियमै)मैाह्मणतर्पणैः ॥५१॥

जिसमें अविनश्वर गूढ़ स्वरूपवाली विद्या एवंअविद्या-ये दोनों प्रतिष्ठित हैं तथा जिसे ज्ञानीजनपरब्रह्मके नामसे जानते हैं, उस वासुदेव नामवालेमुझे जानकर इन्द्रद्युम्नने व्रत, उपवास, नियम, होमतथा ब्राह्मणोंकी संतुष्टि आदि उपायोंद्वारा सभीप्राणियोंके एकमात्र आश्रय परमेश्वरकी आराधनाकी॥५०-५१॥

तदाशीस्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

आराधयन् महादेवं योगिनां हृदि संस्थितम्॥५२॥

तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् परमा कला।

स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं विष्णुसमुद्भवम्॥५३॥

दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा विष्णोर्भगवतः प्रियाम्।

संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः कृताञ्जलिरभाषत॥५४॥

वह उन्हींकी मङ्गलकामना करते हुए उन्हींकोनमस्कार करता था, उनमें ही उसकी अनन्य निष्ठाथी तथा वह उन्हींके आश्रित होकर योगियोंके हृदयप्रदेशमेंविराजमान रहनेवाले महादेवकी आराधना करने लगा।उसके इसी प्रकार आराधना करते हुए एक दिन वैष्णवीशक्तिने भगवान् विष्णुसे प्रादुर्भूत दिव्य स्वरूप उसेदिखलाया। भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी विष्णुप्रियाकादर्शनकर उसने सिर झुकाकर विनीतभावसे उन्हें प्रणामकिया और विविध स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुतिकरहाथ जोड़कर कहा-॥५२-५४॥

इन्द्रद्युम्न उवाच

का त्वं देवि विशालाक्षि विष्णुचिह्नाङ्कितेशुभे।

याथातथ्येन वै भावं तवेदानीं ब्रवीहि मे॥५५॥

इन्द्रद्युम्नने कहा-वैष्णव चिह्नोंवाली, मङ्गलमयीतथा विशाल नेत्रोंवाली हे देवि! आप कौन हैं? आपकाजो यथार्थ स्वरूप हो उसे इस समय मुझे बतलायें ॥५५॥

तस्य तद् वाक्यमाकर्ण्य सुप्रसन्ना सुमङ्गला।

हसन्ती संस्मरन् विष्णुं प्रियं ब्राह्मणमब्रवीत्॥५६॥

इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर अत्यन्त सुप्रसन्ना सुमङ्गलावह देवी विष्णुका स्मरणकर उस प्रिय ब्राह्मणसे हँसतीहुई बोली- ॥५६॥

न मां पश्यन्ति मुनयो देवाः शक्रपुरोगमाः।

नारायणात्मिका चैका मायाहं तन्मया परा॥५७॥

न मे नारायणाद् भेदो विद्यते हि विचारतः।

तन्मयाहं परं ब्रह्म स विष्णुः परमेश्वरः ।।५८॥

येऽर्चयन्तीह भूतानामाश्रयं परमेश्वरम्।

ज्ञानेन कर्मयोगेन न तेषां प्रभवाम्यहम्॥५९॥

तस्मादनादिनिधनं कर्मयोगपरायणः।

ज्ञानेनाराधयानन्तं ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥६०॥

मैं उन विष्णुकी प्रकृतिस्वरूपा परा माया हूँ। मुझअद्वितीय नारायणस्वरूपा नारायणीको मुनि तथा इन्द्रआदि देवता भी नहीं देख पाते हैं। सूक्ष्म विचार करनेपरमुझमें और नारायणमें कोई भेद नहीं दीखता। मैं उनकी प्रकृति रूपा हूँ, वे विष्णु पर ब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं। समस्तभूत (प्राणियों)-के आश्रयभूत उन परमेश्वर की जोज्ञानयोग अथवा कर्मयोग द्वारा यहाँ आराधना करते हैं ऐसे भक्तों पर मेरा कोई वश नहीं चलता। अतः तुम कर्मयोग का आश्रय लेते हुए ज्ञान के द्वारा उन आदि और अन्त से रहित अनन्त भगवान् विष्णु की आराधना करो। इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥५७-६०॥

इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नो महामतिः।

प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत्॥६१॥

कथं स भगवानीशः शाश्वतो निष्कलोऽच्युतः।

ज्ञातुं हि शक्यते देवि ब्रूहि मे परमेश्वरि॥६२॥

ऐसा कहे जाने पर अत्यन्त बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ उस इन्द्रद्युम्न ने देवी को विनयपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा-हे परमेश्वरी देवि! शाश्वत, अखण्ड तथा अच्युत सबके स्वामी उन भगवान्को किस प्रकार जाना जा सकता है, यह मुझे बतलायें ॥६१-६२॥

एवमुक्ताथ विप्रेण देवी कमलवासिनी।

साक्षान्नारायणो ज्ञानं दास्यतीत्याह तं मुनिम्॥६३॥

उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां संस्पृश्य प्रणतं मुनिम्।

स्मृत्वा परात्परं विष्णुं तत्रैवान्तरधीयत॥६४॥

ब्राह्मण (इन्द्रद्युम्न)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपरकमलमें निवास करनेवाली देवीने उस मुनिसे कहा-'साक्षात्नारायण ही तुम्हें (वह) ज्ञान प्रदान करेंगे। तदनन्तर प्रणामकर रहे उस मुनि (इन्द्रद्युम्न)-को अपने दोनों हाथोंसे भली-भाँति स्पर्श कर ( वे देवी) परात्पर विष्णुका स्मरणकरती हुई वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥६३-६४ ॥

सोऽपि नारायणं द्रष्टुं परमेण समाधिना।

आराधयद्धृषीकेशं प्रणतार्तिप्रभञ्जनम्॥६५॥

ततो बहुतिथे काले गते नारायणः स्वयम्।

प्रादुरासीन्महायोगी पीतवासा जगन्मयः॥६६॥

दृष्ट्वा देवं समायान्तं विष्णुमात्मानमव्ययम्।

जानुभ्यामवनिं गत्वा तुष्टाव गरुडध्वजम्॥६७॥

इन्द्रद्युम्न भी शरणागतके दुःखोंको सर्वथा दूर करदेनेवाले हृषीकेश भगवान् नारायणका दर्शन करनेकेलिये दीर्घकालीन समाधिमें निरत होकर आराधना करनेलगा। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर पीताम्बरधारी, जगन्मूर्ति महायोगी भगवान् नारायण उसके सामने स्वयंप्रकट हो गये। अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुकोआया हुआ देखकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर स्थित होकरवह गरुडध्वजदेवकी स्तुति करने लगा ॥ ६५-६७॥

इन्द्रद्युम्न उवाचयज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।

कृष्ण विष्णो हृषीकेश तुभ्यं विश्वात्मने नमः॥६८॥

नमोऽस्तु ते पुराणाय हरये विश्वमूर्तये।

सर्गस्थितिविनाशानां हेतवेऽनन्तशक्तये॥६९॥

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं निष्कलायामलात्मने।

पुरुषाय नमस्तुभ्यं विश्वरूपाय ते नमः॥७०॥

नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये।

आदिमध्यान्तहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः॥७१॥

नमस्ते निर्विकाराय निष्प्रपञ्चाय ते नमः।

भेदाभेदविहीनाय नमोऽस्त्वानन्दरूपिणे॥७२॥

नमस्ताराय शान्ताय नमोऽप्रतिहतात्मने।

अनन्तमूर्तये तुभ्यममूर्ताय नमो नमः॥७३॥

नमस्ते परमार्थाय मायातीताय ते नमः।

नमस्ते परमेशाय ब्रह्मणे परमात्मने॥७४॥

नमोऽस्तु ते सुसूक्ष्माय महादेवाय ते नमः ।

नमः शिवाय शुद्धाय नमस्ते परमेष्ठिने॥७५॥

इन्द्रद्युम्नने कहा-हे यज्ञोंके स्वामी! अच्युत! गोविन्द!माधव! अनन्त ! केशव! कृष्ण! विष्णु! तथा हृषीकेश!आप विश्वात्माको नमस्कार है। पुराण-पुरुष! विश्वमूर्ति हेहरि! आप सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके मूल कारण हैं, आप अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आपनिर्गुण-स्वरूप हैं, निष्कल एवं विमलात्मा हैं, आपकोनमस्कार है। हे विश्वरूप पुरुष! आपको नमस्कार है।विश्वकी योनि, वासुदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है।आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित ज्ञानद्वारा जानने योग्यहैं, आपको नमस्कार है। निर्विकार तथा प्रपञ्चरहितआपको नमस्कार है। भेद-अभेदसे रहित आनन्द-स्वरूपआपको नमस्कार है। (संसारसागरसे) पार उतारनेवाले, शान्तस्वरूप आपको नमस्कार है। शुद्धात्मा आपको नमस्कारहै। आप अनन्तमूर्तिवाले हैं, अमूर्त हैं, आपको बार-बारनमस्कार है। आप परमार्थरूप हैं, आपको नमस्कार है।आप मायासे अतीत हैं, आपको नमस्कार है। ईशोंके भीईश! आपको नमस्कार है। परमात्मा परब्रह्मरूप आपकोनमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्मरूप आपको नमस्कार है।देवोंके भी देव महादेव! आपको नमस्कार है। विशुद्धस्वरूपशिव! आपको नमस्कार है। परमेष्ठीस्वरूप आपको नमस्कारहै॥६८-७५॥

त्वयैव सृष्टमखिलं त्वमेव परमा गतिः।

त्वं पिता सर्वभूतानां त्वं माता पुरुषोत्तम॥७६ ॥

त्वमक्षरं परं धाम चिन्मानं व्योम निष्कलम्।

सर्वस्याधारमव्यक्तमनन्तं तमसः परम्॥७७॥

प्रपश्यन्ति परात्मानं ज्ञानदीपेन केवलम्।

प्रपद्ये भवतो रूपं तद्विष्णोः परमं पदम्॥७८॥

आपने ही सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है। आप ही परमगति हैं। हे पुरुषोत्तम! आप ही सभी भूत-प्राणियोंके पिता हैंऔर आप ही सबकी माता हैं। आप अविनाशी हैं, परम धामहैं, चित्स्वरूप हैं, व्योम हैं, निष्कल हैं, सबके आधार हैं,अव्यक्त हैं, अनन्त हैं और तमसे सर्वथा रहित नित्य प्रकाशस्वरूपहैं। (ज्ञानीजन) केवल ज्ञानरूपी दीपककेद्वारा जिस परमात्माकादर्शन करते हैं, मैं आपके उस रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ,वह विष्णुका परमपद है॥७६-७८॥

एवं स्तुवन्तं भगवान् भूतात्मा भूतभावनः।

उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां पस्पर्श प्रहसन्निव॥७९॥

इस प्रकार स्तुति करते हुए इन्द्रद्युम्रका सभीप्राणियोंके आत्मरूप भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने ।दोनों हाथोंसे किञ्चित् मुसकराते हुए स्पर्श किया ॥७९॥

स्पृष्टमात्रो भगवता विष्णुना मुनिपुंगवः।

यथावत् परमं तत्त्वं ज्ञातवांस्तत्प्रसादतः ॥८०॥

ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य जनार्दनम्।

प्रोवाचोनिद्रपद्माक्षं पीतवाससमच्युतम्।। ८१॥

भगवान् विष्णुके द्वारा स्पर्श करते ही मुनिश्रेष्ठ (इन्द्रद्युम्न)-को उन भगवान्की कृपासे परम तत्त्वका ।यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो गया। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्नमनसे इन्द्रद्युम्नने प्रफुल्लित कमलके समान नेत्रवाले, पीताम्बरधारी अच्युत भगवान् जनार्दनको प्रणाम करकहा-॥८०-८१ ॥

त्वत्प्रसादादसंदिग्धमुत्पन्न पुरुषोत्तम।

ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं परमानन्दसिद्धिदम्।। ८२ ॥

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय वेधसे।

किं करिष्यामि योगेश तन्मे वद जगन्मय॥८३॥

हे पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे मुझे परमानन्दकीप्राप्ति करानेवाला एकमात्र ब्रह्मसम्बन्धी संदेहरहित ज्ञानप्राप्त हो गया है। हे भगवन्! हे वासुदेव! हे वेधा!आपको नमस्कार है। हे योगेश! हे जगन्मय! मैं क्याकरूँ, उसे आप मुझे बतलायें ॥८२-८३॥

श्रुत्वा नारायणो वाक्यमिन्द्रद्युम्नस्य माधवः।

उवाच सस्मितं वाक्यमशेषजगतो हितम्॥८४॥

इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर माधव भगवान् नारायणनेसमस्त संसारके कल्याणकी कामनासे मुसकराते हुए यहवचन कहा-॥८४॥

श्रीभगवानुवाच

वर्णाश्रमाचारवतां पुंसां देवो महेश्वरः ।

ज्ञानेन भक्तियोगेन पूजनीयो न चान्यथा।। ८५॥

विज्ञाय तत्परं तत्त्वं विभूतिं कार्यकारणम्।

प्रवृत्तिं चापि मे ज्ञात्वा मोक्षार्थीश्वरमर्चयेत्॥८६॥

सर्वसंगान् परित्यज्य ज्ञात्वा मायामयं जगत्।

अद्वैतं भावयात्मानं द्रक्ष्यसे परमेश्वरम्।। ८७॥

श्रीभगवान् बोले-वर्ण एवं आश्रमधर्मका पालनकरनेवाले व्यक्तियोंको चाहिये कि वे ज्ञान एवं भक्तियोगकेद्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करें, अन्य साधनसे नहीं।मोक्षार्थीको चाहिये कि उस परम तत्त्व, विभूति एवंकार्यकारणरूपको ठीक-ठीक जानकर साथ ही मेरीप्रवृत्तिको समझकर ईश्वरकी उपासना करे। सभी प्रकारकीआसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर, इस संसारको माया-रूप जानकर अपनेमें अद्वैतकी भावना करे* । (ऐसा करनेसेइन्द्रद्युम्न! तुम) परमेश्वरका दर्शन करोगे॥ ८५-८७॥

त्रिविधा भावना ब्रह्मन् प्रोच्यमाना निबोध मे।

एका मद्विषया तत्र द्वितीया व्यक्तसंश्रया।

अन्या च भावना ब्राह्मी विज्ञेया सा गुणातिगा॥८८॥

ब्रह्मन् इन्द्रद्युम्न ! तीन प्रकारकी भावनाएँ कही गयीहैं, उन्हें मैं बताता हूँ, तुम सुनो-उन तीनोंमेंसे पहलीभावना है मद्विषया अर्थात् मेरे सगुण स्वरूपकी भावना ।दूसरी है व्यक्तसंश्रया अर्थात् भगवान्का जो विराट्स्वरूप है, उसका आश्रय ग्रहण कर उपासनाकी भावनाऔर तीसरी जो भावना है उसे ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मज्ञानविषयकभावना जानना चाहिये, यह तीसरी भावना गुणातीतहै (गुणातीतरूपमें ब्रह्मकी उपासना ही ब्राह्मी भावनाहै।) विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि इन तीनोंमेंसे किसीभी भावनाका आश्रय ग्रहण कर उपासना करे॥८८॥

आसामन्यतमां चाथ भावनां भावयेद् बुधः ।

अशक्तः संश्रयेदाद्यामित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥८९॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

समाराधय विश्वेशं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ।। ९०॥

जो असमर्थ व्यक्ति है उसे चाहिये कि वह प्रथमभावना अर्थात् वैष्णवी भावनाका अवलम्बन ग्रहणकरे-ऐसा वेदका मत है। इसलिये (इन्द्रद्युम्न! तुम)समस्त प्रयत्नोंके द्वारा सम्पूर्ण संसारके स्वामी भगवान्विष्णुकी आराधना करो, उनमें ही निष्ठा रखो औरउन्हींका आश्रय ग्रहण कर उन्हींके शरणागत हो जाओ, इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥८९-९० ॥

इन्द्रद्युम्न उवाच

किं तत् परतरं तत्त्वं का विभूतिर्जनार्दन।

किं कार्यकारणं कस्त्वं प्रवृत्तिश्चापिका तव॥९१॥

इन्द्रद्युम्न बोले-हे जनार्दन! वह परात्पर तत्त्व क्याहै, विभूति क्या है? कार्य क्या है और कारण क्या है? आप कौन हैं ? और आपकी प्रवृत्ति क्या है ? ॥ ९१ ॥

श्रीभगवानुवाच

परात्परतरं तत्त्वं परं ब्रह्मैकमव्ययम्।

नित्यानन्दं स्वयंज्योतिरक्षरं तमसः परम्॥ ९२॥

ऐश्वर्यं तस्य यन्नित्यं विभूतिरिति गीयते।

कार्यं जगदथाव्यक्तं कारणं शुद्धमक्षरम्॥ ९३॥

अहं हि सर्वभूतानामन्तर्यामीश्वरः परः।

सर्गस्थित्यन्तकर्तृत्वं प्रवृत्तिर्मम गीयते॥९४॥

एतद् विज्ञाय भावेन यथावदखिलं द्विज।

ततस्त्वं कर्मयोगेन शाश्वतं सम्यगर्चय॥९५॥

श्रीभगवान् बोले-वह परसे परतर तत्त्व एकमात्रअखण्ड परम ब्रह्म ही है। वह नित्य आनन्दस्वरूप है, स्वयं प्रकाशमान है, अविनाशी है और तम (अन्धकार)-से सर्वथा परे है। उस परमात्माका जो नित्य रहनेवालाऐश्वर्य है, वही विभूति नामसे कहा जाता है। यह संसारही (परमात्माका) कार्यरूप है और अविनाशी विशुद्धअव्यक्त तत्त्व ही (इस संसारका) कारणरूप है। मैं हीसमस्त प्राणियोंमें रहनेवाला अन्तर्यामी ईश्वर हूँ। सृष्टि, पालन और संहार ही मेरी प्रवृत्ति कही जाती है। हेद्विज! इन सभी बातोंको यथार्थरूपसे जानकर तुमकर्मयोगके द्वारा श्रद्धाभावसे (उस) सनातन (ईश्वर)-की भलीभाँति अर्चना करो॥ ९२-९५॥

इन्द्रद्युम्न उवाच

के ते वर्णाश्रमाचारा यैः समाराध्यते परः।

ज्ञानं च कीदृशं दिव्यं भावनात्रयसंस्थितम्॥९६॥

कथं सृष्टमिदं पूर्वं कथं संह्रियते पुनः ।

कियत्यः सृष्टयो लोके वंशा मन्वन्तराणि च।

कानि तेषां प्रमाणानि पावनानि व्रतानि च।। ९७॥

तीर्थान्यर्कादिसंस्थानं पृथिव्यायामविस्तरे।

कति द्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च नदीनदाः।

ब्रूहि मे पुण्डरीकाक्ष यथावदधुनाखिलम्॥९८ ।।

इन्द्रद्युम्नने कहा-(भगवन्!) वर्णों तथा आश्रमोंकेवे कौनसे पालनीय नियम हैं, जिनसे (उस) परतत्त्वकीआराधना की जाती है और वह दिव्य ज्ञान कैसा है जोतीन भावनाओंसे युक्त है ? (परमात्माने) पूर्वकालमें इस (संसार)-की सृष्टि कैसे की और फिर कैसे इसकासंहार होता है, लोकमें कितनी सृष्टियाँ हैं, कितने वंशहैं, कितने मन्वन्तर हैं। उनके कितने प्रमाण हैं औरपवित्र व्रत तथा तीर्थ कौन-से हैं। सूर्य आदि ग्रहोंकीस्थिति कैसी है, पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है, कितने द्वीप, समुद्र, पर्वत हैं और कितने नद हैं औरकितनी नदियाँ हैं, हे पुण्डरीकाक्ष! इस समय यह सबमुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥९६-९८॥

श्रीकूर्म उवाच

एवमुक्तोऽथ तेनाहं भक्तानुग्रहकाम्यया।

यथावदखिलं सर्वमवोचं मुनिपुंगवाः ।। ९९॥

श्रीकूर्मने कहा-हे श्रेष्ठ मुनियो! उस इन्द्रद्युम्नके

द्वारा मुझसे इस प्रकार कहे जानेपर भक्तोंपर अनुकम्पाकरनेकी कामनासे मैंने वे सभी बातें विस्तारसे ठीक-ठीक उसे बतला दी॥ ९९॥

व्याख्यायाशेषमेवेदं यत्पृष्टोऽहं द्विजेन तु।

अनुगृह्य च तं विप्रं तत्रैवान्तर्हितोऽभवम्॥१००॥

इस प्रकार उस ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नने जो-जो भी मुझसेपूछा था, वह सब विस्तारसे बतलाकर और उसपर कृपाकरके मैं वहीं अन्तर्धान हो गया । १०० ॥

सोऽपि तेन विधानेन मदुक्तेन द्विजोत्तमः।

आराधयामास परं भावपूतः समाहितः॥१०१॥

त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।

संन्यस्य सर्वकर्माणि परं वैराग्यमाश्रितः॥१०२॥

आत्मन्यात्मानमन्वीक्ष्य स्वात्मन्येवाखिलं जगत्।

सम्प्राप्य भावनामन्त्यां ब्राह्मीमक्षरपूर्विकाम्॥१०३॥

अवाप परमं योगं येनैकं परिपश्यति।

यं विनिद्रा जितश्वासाः कांक्षन्ते मोक्षकांक्षिणः॥ १०४॥

उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी मेरे द्वारा बताये गये विधानसेअत्यन्त पवित्र भावनासे समाहित-चित्त होकर परमतत्त्वकी उपासना की। उसने अपने स्त्री-पुत्र आदिकामोह छोड़ दिया, सुख-दु:ख आदि द्वन्द्वोंसे रहित होगया, किसी भी वस्तुका संग्रह करना सर्वथा त्याग करअपरिग्रही हो गया और सभी कर्मोंका परित्याग करउसने परम वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। अपनीआत्मामें ही परमात्माका दर्शन करके और अपनीआत्मामें ही सम्पूर्ण विश्वका अनुभव कर अक्षर-तत्त्व-सम्बन्धी अन्तिम ब्राह्मी भावनाको प्राप्त किया, जिसकेकारण उसे उस दुर्लभ परम योगकी प्राप्ति हुई। इसयोगसे ही उस अद्वितीय तत्त्वका साक्षात्कार होता हैजिसकी अभिलाषा निद्रात्यागी, श्वासजयी, मोक्षार्थीपुरुष भी करते हैं॥१०१-१०४॥

ततःकदाचिद्योगीन्द्रो ब्रह्माणं द्रष्टुमव्ययम्।

जगामादित्यनिर्देशान्मानसोत्तरपर्वतम् ।

आकाशेनैव विप्रेन्द्रो योगैश्वर्यप्रभावतः॥१०५॥

विमानं सूर्यसंकाशं प्रादुर्भूतमनुत्तमम्।

अन्वगच्छन् देवगणा गन्धर्वाप्सरसांगणाः।

दृष्ट्वान्ये पथि योगीन्द्रं सिद्धा ब्रह्मर्षयो ययुः ॥१०६॥

इसके बाद किसी दिन वह ब्राह्मण श्रेष्ठ योगीन्द्रइन्द्रद्युम्न भगवान् सूर्यके निर्देशसे अव्यय ब्रह्मका दर्शनकरनेके लिये अपनी योग-सिद्धिके प्रभावसे प्रादुर्भूतसूर्यके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमानमें चढ़कर आकाशमार्गसेमानसरोवरके उत्तरमें स्थित पर्वतपर गया। उस योगिराजइन्द्रद्युम्नको आकाशमार्गमें जाते हुए देखकर देवों, गन्धर्षों तथा अप्सराओंका समूह भी उसके पीछे-पीछेगया और अन्य सिद्ध तथा ब्रह्मर्षियोंने भी उसकाअनुसरण किया॥१०५-१०६॥

ततः स गत्वा तु गिरिं विवेश सुरवन्दितम्।

स्थानं तद्योगिभिर्जुष्टं यत्रास्ते परमः पुमान्॥१०७॥

सम्प्राप्य परमं स्थानं सूर्यायुतसमप्रभम्।

विवेश चान्तर्भवनं देवानां च दुरासदम्॥१०८॥

तदनन्तर वहाँ जाकर इन्द्रद्युम्नने देवताओंद्वारा वन्दिततथा योगियोंद्वारा सेवित पर्वतके उस स्थानपर प्रवेशकिया, जहाँ परम पुरुष परमात्मा प्रतिष्ठित रहते हैं। दसहजार सूर्योंके प्रकाशके समान प्रकाशित उस श्रेष्ठ स्थानपरपहुँचकर (इन्द्रद्युम्नने) देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य (उस स्थानके) अन्तर्गृहमें प्रवेश किया॥१०७-१०८॥

विचिन्तयामास परं शरण्यं सर्वदेहिनाम्।

अनादिनिधनं देवं देवदेवं पितामहम्॥१०९॥

ततः प्रादुरभूत् तस्मिन् प्रकाशः परमात्मनः।

तन्मध्ये पुरुषं पूर्वमपश्यत् परमं पदम्॥११०॥

(वहाँ पहुँचकर उसने) सभी प्राणियोंके परमशरणदाता, आदि-अन्तसे रहित, देवाधिदेव पितामहब्रह्मदेवका ध्यान किया। इसके बाद उसके ध्यान करतेही वहाँ परमात्माका प्रकाश प्रादुर्भूत हुआ।॥१०९-११०॥

महान्तं तेजसो राशिमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम्।

चतुर्मुखमुदाराङ्गमर्चिभिरुपशोभितम् ॥१११॥

उस प्रकाशपुञ्जके मध्यमें महान् तेजकी राशिके रूपमेंब्रह्मविद्वेषियोंके लिये अगम्य, परमपदस्वरूप पूर्व पुरुषकादर्शन किया, जो चार मुखवाले थे, जिनके सभी अङ्गशुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे और प्रकाशकी किरणोंसेसुशोभित थे॥१११॥

सोऽपि योगिनमन्वीक्ष्य प्रणमन्तमुपस्थितम्।

प्रत्युद्गम्य स्वयं देवो विश्वात्मा परिषस्वजे॥११२॥

परिष्वक्तस्य देवेन द्विजेन्द्रस्याथ देहतः।

निर्गत्य महती ज्योत्स्ना विवेशादित्यमण्डलम्।

ऋग्यजुःसामसंज्ञं तत् पवित्रममलं पदम्॥११३।।

हिरण्यगर्भो भगवान् यत्रास्ते हव्यकव्यभुक्।

द्वारं तद् योगिनामाद्यं वेदान्तेषु प्रतिष्ठितम्।

ब्रह्मतेजोमयं श्रीमन्निष्ठा चैव मनीषिणाम्॥११४॥

समीपमें आये प्रणाम करते हुए योगी इन्द्रद्युम्नकोदेखकर वह विश्वात्मा ब्रह्मदेव स्वयं भी उसकेसमीपमें गये और उसको अपने हृदयसे लगाया।ब्रह्मदेवके द्वारा आलिङ्गन करते ही उस ब्राह्मणश्रेष्ठइन्द्रद्युम्नके शरीरसे एक महान् प्रकाश निकला, जोआदित्य-मण्डलमें प्रविष्ट हो गया। वह पवित्र निर्मलपद (आदित्य-मण्डल) ऋक्-यजुः एवं साम नामवालाहै। जिस स्थानमें हव्य (देवताओंको प्राप्त होनेवालाहवनीय द्रव्य) तथा कव्य (पितरोंको प्राप्त करायाजानेवाला श्राद्धीय पदार्थ)-का उपभोग करनेवालेभगवान् हिरण्यगर्भ निवास करते हैं। वह (स्थान)वेदान्तमें प्रतिपादित योगी जनोंका आद्य प्रवेश-द्वारहै, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न है, श्रीयुक्त है और वहमनीषियोंकी निष्ठा भी है। ११२-११४ ॥

दृष्टमात्रो भगवता ब्रह्मणार्चिर्मयो मुनिः।

अपश्यदैश्वरं तेजः शान्तं सर्वत्रगं शिवम्॥११५॥

स्वात्मानमक्षरं व्योम तद् विष्णोः परमं पदम्।

आनन्दमचलं ब्रह्म स्थानं तत्पारमेश्वरम्॥११६॥

सर्वभूतात्मभूतः स परमैश्वर्यमास्थितः।

प्राप्तवानात्मनो धाम यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम्॥११७॥

भगवान् ब्रह्माके देखते ही देखते वह मुनि इन्द्रद्युम्नतेजसे सम्पन्न हो गया और उसने सर्वत्र व्याप्त, परमकल्याणकारी, अत्यन्त शान्त स्वात्मस्वरूप, अक्षर, व्योम उस परमेश्वर-सम्बन्धी तेजको देखा। वह विष्णुकापरम पद है। केवल आनन्दरूप, अचल वह ब्रह्मकास्थान परमेश्वररूप है। सभी प्राणियोंको अपनी ही आत्मासमझनेवाला वह योगी इन्द्रद्युम्न परम ऐश्वर्यमें प्रतिष्ठितहो गया और उसने 'मोक्ष' पदसे कहे जानेवाले उसअव्यय परमात्मधामको प्राप्त कर लिया ॥ ११५-११७॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वर्णाश्रमविधौ स्थितः।

समाश्रित्यान्तिमं भावं मायां लक्ष्मी तरेद् बुधः॥११८॥

इसलिये सभी प्रयत्नोंसे वर्ण एवं आश्रमके नियमोंकापालन करते हुए अन्तिम भावका आश्रय ग्रहण करविद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह लक्ष्मीरूप मायासेपार उतरे ॥ ११८॥

सूत उवाच

व्याहृता हरिणा त्वेवं नारदाद्या महर्षयः।

शक्रेण सहिताः सर्वे पप्रच्छुर्गरुडध्वजम्॥११९॥

सूतजी बोले-हरिके द्वारा इस प्रकार कहनेपरइन्द्रसहित नारद आदि सभी महर्षियोंने गरुडध्वजभगवान् विष्णुसे पूछा- ॥ ११९ ।।

ऋषय ऊचुः

देवदेव हृषीकेश नाथ नारायणामल।

तद् वदाशेषमस्माकं यदुक्तं भवता पुरा॥१२०॥

इन्द्रद्युम्नाय विप्राय ज्ञानं धर्मादिगोचरम्।

शुश्रूषुश्चाप्ययं शक्रः सखा तव जगन्मय॥१२१॥

ऋषियोंने कहा-हे देवाधिदेव! हे हृषीकेश! हेनाथ! हे अमलरूप नारायण! जो आपने पूर्वकालमेंब्राह्मण इन्द्रद्युम्नसे धर्मादि-सम्बन्धी ज्ञान कहा था, वहसब आप हमें बतलायें। हे जगन्मूर्ति! ये आपके सखाइन्द्र भी सुननेके लिये इच्छुक हैं॥१२०-१२१ ।।

ततः स भगवान् विष्णुः कूर्मरूपी जनार्दनः।

रसातलगतो देवो नारदाद्यैर्महर्षिभिः॥१२२॥

पृष्टः प्रोवाच सकलं पुराणं कौर्ममुत्तमम्।

संनिधौ देवराजस्य तद् वक्ष्ये भवतामहम्॥१२३॥

इसके बाद (सूतजीने कहा-) रसातलमें स्थितकूर्मरूपी जनार्दन भगवान् विष्णुदेवने नारदादि महर्षियोंकेद्वारा (इस प्रकार) पूछे जानेपर जिस श्रेष्ठ सम्पूर्णकूर्मपुराणको देवराज इन्द्रके समीप सुनाया था, मैं उसेआप लोगोंको सुनाता हूँ॥१२२-१२३ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं मोक्षप्रदं नृणाम्।

पुराणश्रवणं विप्राः कथनं च विशेषतः॥१२४॥

श्रुत्वा चाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते।

उपाख्यानमथैकं वा ब्रह्मलोके महीयते॥१२५॥

इदं पुराणं परमं कौर्मं कूर्मस्वरूपिणा।

उक्तं देवाधिदेवेन श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः ॥१२६।।

हे ब्राह्मणो! (इस कूर्म) पुराणका सुनना मनुष्योंकेलिये यशकी प्राप्ति करानेवाला, दीर्घ आयु प्रदानकरानेवाला, पुण्य प्रदान करानेवाला, कृतकृत्य करानेवालातथा मोक्ष प्रदान करानेवाला है। इस पुराणके वाचनकरनेकी तो और भी विशेष महिमा है। इसके मात्र एकअध्यायके सुननेसे ही सभी प्रकारके पापोंसे (व्यक्ति)मुक्त हो जाता है। अधिक क्या कहा जाय, केवल एकउपाख्यानके श्रवणमात्रसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होतीहै। इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको कूर्मरूपधारी देवाधिदेव स्वयंभगवान् विष्णुने कहा है, द्विजातियोंको इसपर अवश्यश्रद्धा रखनी चाहिये ॥ १२४-१२६ ।।