3- देवर्षि नारदद्वारा अपने पूर्वजन्मवर्णनके प्रसङ्गमें ब्रह्मपारस्तोत्रका कथन

प्रियव्रत बोले-भगवन्! आपके द्वारा पूर्वजन्मोंमें जो-जो कार्य सम्पन्न हुए हों, उन सबको मुझे बतानेकी कृपा करें, क्योंकि देवर्षे! उन्हें सुननेकी मुझे बड़ी उत्कण्ठा है।

नारदजीने कहा-राजेन्द्र! कुमारी सावित्रीकी बात सुनकर उस वेद-सरोवरमें मैंने ज्यों ही स्नान किया, उसी क्षण मुझे अपने हजारों जन्मोंकी बातें स्मरण हो आयीं। अब तुम मेरे पूर्वजन्मकी बात सुनो। अवन्ती नामकी एक पुरी है। मैं पूर्वजन्ममें उसमें निवास करनेवाला एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था।

उस जन्ममें मेरा नाम सारस्वत था और सभी वेद-वेदाङ्ग मुझे सम्यक् अभ्यस्त थे। राजन्! यह दूसरे सत्ययुगकी बात है। उस समय मेरे पास बहुत-से सेवक थे, धन-धान्यकी अटूट राशि थी, भगवान्ने उत्तम बुद्धि भी दी थी। एक बार मैं एकान्तमें बैठकर विचार करने लगा कि संसार द्वन्द्वस्वरूप है। इसमें सुख-दु:ख, हानि-लाभ आदिका चक्र सदा चलता रहता है। मुझे ऐसे संसारसे क्या लेना-देना है? अत: मुझे अब अपनी सारी सांसारिक धन-सम्पदा पुत्रोंको सौंपकर तपस्या करनेके लिये तुरंत सरस्वती नदीके तटपर चल देना चाहिये। यह विचार करनेके पश्चात्, क्या यह तत्काल करना उचित होगा, इस जिज्ञासाको लेकर मैंने भगवान्से प्रार्थना की। फिर भगवान्के आज्ञानुसार मैंने श्राद्धद्वारा पितरोंको, यज्ञद्वारा देवताओंको तथा दानद्वारा अन्य लोगोंको भी संतुष्ट किया। राजन्! तत्पश्चात् सभी ओरसे निश्चिन्त होकर मैं सारस्वत नामक सरोवरपर, जो इस समय पुष्करतीर्थके  नामसे विख्यात है, चला गया। वहाँ जाकर परम मङ्गलमय पुराणपुरुष भगवान् विष्णुके नारायणमन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का  जप एवं ब्रह्मपार नामक उत्तम स्तोत्रका पाठ करता हुआ मैं भक्तिपूर्वक आराधना करने लगा। तब परम प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् श्रीहरि मेरे सम्मुख प्रत्यक्ष रूपसे प्रकट हो गये।

प्रियव्रत बोले- महाभाग देवर्षे ! ब्रह्मपारस्तोत्र कैसा है? इसे मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर सदा प्रसन्न रहते हैं, अतएव कृपापूर्वक मुझे इसका उपदेश करें।

नारदजीने कहा-जो परात्पर, अमृतस्वरूप, सनातन, अपार शक्तिशाली एवं जगत्के परम आश्रय हैं, उन पुराणपुरुष भगवान् महाविष्णुको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ। जो पुरातन, अतुलनीय, श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ एवं प्रचण्ड तेजस्वी हैं, जो गहन-गम्भीर बुद्धि-विचार करनेवालोंमें प्रधान तथा जगत्के शासक हैं, उन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो परसे भी पर हैं, जिनसे परे दूसरा कोई है ही नहीं, जो दूसरोंको आश्रय एवं महान् पुरुष हैं, जिनका धाम विशुद्ध एवं विशाल है, ऐसे पुराणपुरुष भगवान् नारायणकी परम शुद्धभावसे मैं स्तुति करता हूँ। सृष्टिके पूर्वदेनेवाले  जब केवल शून्यमात्र था, उस समय पुरुषरूप से जिन्होंने प्रकृतिकी रचना की, वे भक्तजनोंमें प्रसिद्ध, शुद्धस्वरूप पुराणपुरुष भगवान् नारायण मेरे लिये शरण हों। जो परात्पर, अपारस्वरूप, पुरातन, नीतिज्ञोंमें श्रेष्ठ, क्षमाशील, शान्तिके आगार तथा जगत्के शासक हैं, उन कल्याणस्वरूप भगवान् नारायणकी मैं सदा स्तुति करता हूँ। जिनके हजारों मस्तक हैं, असंख्य चरण और भुजाएँ हैं, चन्द्रमा और सूर्य जिनके नेत्र हैं, क्षीरसागरमें जो शयन करते हैं, उन अविनाशी सत्यस्वरूप परम प्रभु भगवान् नारायणकी मैं स्तुति करता हूँ। जो वेदत्रयीके अवलम्बनद्वारा जाने जाते हैं, जो परब्रह्मरूप एक मूर्तिसे द्वादश आदित्यरूप बारह मूर्तियोंमें अभिव्यक्त होते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूप तीन परमोज्ज्वल मूर्तियोंमें स्थित हैं, जो अग्निरूपमें दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय-इन तीन भेदोंमें विभक्त होते हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण-इन तीन तत्त्वोंके अवलम्बनद्वारा लक्षित होते हैं, जो भूत, वर्तमान और भविष्यरूपसे त्रिकालात्मक हैं तकरता हूँ। जो अपने श्रीविग्रहको सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें पीतवर्णसे अनुरञ्जित और कलियुगमें कृष्णवर्णमें प्रकाशित करते हैं,

उन पुराणपुरुष श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने अपने मुखसे ब्राह्मणोंका, भुजाओंसे क्षत्रियोंका, दोनों जङ्घाओंसे वैश्योंका एवं चरणोंके अग्रभागसे शूद्रोंका सृजन किया है, उन विश्वरूप पुराणपुरुष भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। जो परेसे भी परे, सर्वशास्त्रपारंगत, अप्रमेय और योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं, साधुओंके परित्राणरूप कार्यके निमित्त जिन्होंने श्रीकृष्ण-अवतार धारण किया है तथा जिनके हाथ ढाल, तलवार, गदा और अमृतमय कमलसे सुशोभित हैं, उन अप्रमेयस्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ। राजन्! इस प्रकार स्तुति करनेपर देवाधिदेव भगवान् नारायण प्रसन्न होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें मुझसे बोले-'वर माँगो।' तब मैंने उन प्रभुके शरीरमें लय होनेकी इच्छा व्यक्त की। मेरी बात सुनकर उन सनातन देवेश्वरने मुझसे कहा-'ब्रह्मन्! अभी तुम शरीर धारण करो, क्योंकि इसकी आवश्यकता है। तुमने अभी जो तपस्या प्रारम्भ करनेके पूर्व पितरोंको नार (जल) दान किया है, अतः अबसे तुम्हारा नाम नारद होगा।'*(* नारं पानीयमित्युक्तं पितॄणां तद्ददौ भवान्। तदाप्रभृति ते नाम नारदेति भविष्यति ।)

ऐसा कहकर भगवान् नारायण तुरंत ही मेरी आँखोंसे ओझल हो गये। समय आनेपर मैंने वह शरीर छोड़ दिया। तपस्याके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् मुझे ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई। राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजीके प्रथम दिवसका आरम्भ होनेपर मेरी भी उनके दस मानस पुत्रोंमें उत्पत्ति हुई। सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टिका वह प्रथम दिन है-इसमें कोई संशय नहीं। इसी प्रकार भगवद्धर्मानुसार सारे जगत्की सृष्टि होती है।

राजन्! यह मेरे प्राकृत जन्मका प्रसङ्ग है, जिसके विषयमें तुमने प्रश्न किया था। राजेन्द्र! भगवान् नारायणका ध्यान करनेसे ही मुझे लोकगुरुका पद प्राप्त हुआ, अतएव तुम भी उन श्रीहरिके परायण हो जाओ।