वराह महा पुराण
10-राजा दुर्जयका चरित्र तथा नैमिषारण्यकी प्रसिद्धिका प्रसङ्ग
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! उस समय मुनिवर गौरमुखके परम उत्तम आश्रमको देखकर राजा दुर्जयने सोचा-'इस परम मनोहर आश्रममें चलूँ और इसमें रहनेवाले अनुपम ऋषियोंके दर्शन करूँ।' यह विचार करके राजा दुर्जय आश्रमके भीतर चले गये। मुनिवर गौरमुख धर्मके साक्षात् स्वरूप थे। आश्रममें राजा दुर्जयके आनेपर मुनिका हृदय आनन्दसे भर उठा। उन्होंने राजाका भलीभाँति सम्मान किया। स्वागत-सत्कारके पश्चात् परस्पर कुछ वार्तालाप प्रारम्भ हुआ। मुनिवरने कहा-'महाराज! मैं यथाशक्ति अनुयायियोंसहित आपको भोजन-पान कराऊँगा। आप हाथी, घोड़े आदि वाहनोंको मुक्त कर दें और यहाँ पधारें।'
ऐसा कहकर मुनिवर गौरमुख मौन हो गये। मुनिके प्रति श्रद्धा होनेसे राजा दुर्जयके मनमें भी आतिथ्य स्वीकार करनेकी बात अँच गयी। अत: अनुचरोंके साथ वे वहीं रह गये। उनके पास पाँच अक्षौहिणी सेना थी। राजा दुर्जय सोचने लगे-'ये तपस्वी ऋषि मुझे यहाँ क्या भोजन देंगे?' इधर राजाको भोजनके लिये निमन्त्रित करनेके पश्चात् विप्रवर गौरमुख भी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे सोचने लगे-'मैं अब राजाको क्या खिलाऊँ?' महर्षि गौरमुख निरन्तर भगवद्भावमें तल्लीन रहते थे। अतएव उनके मनमें चिन्ता उत्पन्न होनेपर उन्हें देवेश्वर जगत्प्रभु भगवान् नारायणकी याद आयी। मन-ही-मन उन्होंने भगवान् नारायणका स्मरण किया और गङ्गाके तटपर जाकर उन जगदीश्वर प्रभुकी स्तुति करने लगे।
पृथ्वीने पूछा-भगवन्! विप्रवर गौरमुखने भगवान् विष्णुकी किस प्रकार स्तुति की, इसको सुननेके लिये मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है।
भगवान् वराह बोले-पृथ्वि! गौरमुखने भगवान्की इस प्रकार प्रार्थना की-जो पीताम्बर धारण करते हैं, आदिरूप हैं तथा जलके रूपमें जो अभिव्यक्त होते हैं, उन सनातन भगवान् विष्णुको मेरा बारंबार नमस्कार है। जो घटघट-वासी हैं, जलमें शयन करते हैं, पृथ्वी, तेज, वायु एवं आकाश आदि महाभूत जिनके स्वरूप हैं, उन भगवान् नारायणको मेरा बारंबार नमस्कार है। भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके आराध्य और सबके हृदयमें स्थित हैं, अन्तर्यामी परमात्माके रूपमें विराजमान हैं। आप ही ॐकार तथा वषट्कार हैं। प्रभो! आपकी सत्ता सर्वत्र विद्यमान है। आप समस्त देवताओंके आदिकारण हैं, पर आपका आदि कोई नहीं है। भगवन्! भूः, भुवः, स्वः, जन, मह, तप और सत्य-ये सभी लोक आपमें स्थित हैं। अत: चराचर जगत् आपमें ही आश्रय पाता है। आपसे ही सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय, चारों वेदों तथा सभी शास्त्रोंकी उत्पत्ति हुई है। यज्ञ भी आपमें ही प्रतिष्ठित हैं। जनार्दन ! पेड़पौधे, वनौषधियाँ, पशु-पक्षी और सर्प-इन सबकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देवेश्वर ! यह दुर्जय नामका राजा मेरे यहाँ अतिथिरूपसे प्राप्त हुआ है। मैं इसका आतिथ्यसत्कार करना चाहता हूँ। भगवन्! आप देवताओंके भी आराध्य और जगत्के स्वामी हैं, मैं नितान्त निर्धन हूँ। फिर भी आपसे मेरी भक्ति और विनयपूर्ण प्रार्थना है कि आप मेरे यहाँ अन्न आदि भोज्य पदार्थोंका संचय कर दें। मैं अपने हाथसे जिस-जिस वस्तुका स्पर्श करूँ और आँखसे जिस-जिस पदार्थको देख लूँ, वह चाहे काठ अथवा तृण ही क्यों न हो, वह तत्काल चार प्रकारके सपक्व अन्नके रूपमें परिणत हो जाय। परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन् ! इसके अतिरिक्त यदि मैं किसी दूसरे पदार्थका भी मनमें चिन्तन करूँ तो वह सबका-सब मेरे लिये सद्यः प्रस्तुत हो जाय।
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! इस प्रकार जब मुनिवर गौरमुखने जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति की तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन महाभाग केशवने अपना श्रेष्ठ रूप गौरमुखको परिणत हो जाय। परमेश्वर! आपको मेरा नमस्कार है। भगवन् ! इसके अतिरिक्त यदि मैं किसी दूसरे पदार्थका भी मनमें चिन्तन करूँ तो वह सबका-सब मेरे लिये सद्यः प्रस्तुत हो जाय।*
(* नमोऽस्तु विष्णवे नित्यं नमस्ते पीतवाससे । नमस्ते चाद्यरूपाय नमस्ते जलरूपिणे॥ नमस्ते सर्वसंस्थाय नमस्ते जलशायिने । नमस्ते क्षितिरूपाय नमस्ते तैजसात्मने ॥ नमस्ते वायुरूपाय नमस्ते व्योमरूपिणे । त्वं देवः सर्वभूतानां प्रभुस्त्वमसि हच्छयः॥ त्वमोंकारो वषट्कारः सर्वत्रैव च संस्थितः । त्वमादिः सर्वदेवानां तव चादिर्न विद्यते । त्वं भूस्त्वं च भुव: स्वस्त्वं जनस्त्वं च मह:स्मृतः । त्वं तपस्त्वं च सत्यं च त्वयि देव चराचरम्॥ त्वत्तो भूतमिदं सर्वं विश्वं त्वत्तो ऋगादयः । त्वत्तः शास्त्राणि जातानि त्वत्तो यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ।। त्वचो वृक्षा वीरुधव त्वत्तः सर्वा वनौषधिः। पशवः पक्षिणः सस्त्वित्त एव जनार्दन ।। ममापि देवदेवेश राजा दुर्जयसंज्ञितः। आगतोऽभ्यागतस्तस्य चातिथ्यं कर्तुमुत्सहे॥ तस्य मे निर्धनस्याद्य देवदेव जगत्पते । भक्तिनम्रस्य देवेश कुरुष्वान्नादिसंचयम्॥ ययं स्पशामि हस्तेन यं च पश्यामि चक्षुषा। काष्ठं वा तृणकन्दं वा तत्तदन्नं चतुर्विधम्॥ तथा त्वन्यतमं वापि यद्ध्यातं मनसा मया। तत्सर्वं सिद्ध्यतां मह्यं नमस्ते परमेश्वर ॥)
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! इस प्रकार जब मुनिवर गौरमुखने जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति की तो वे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन महाभाग केशवने अपना श्रेष्ठ रूप गौरमुखको प्रत्यक्ष दिखलाया और कहा-'विप्रवर! जो चाहो, वर माँग लो।' यह सुनकर मुनिने ज्यों ही अपने नेत्र खोले, त्यों ही उनको भगवान् श्रीहरिके परम आश्चर्यमय रूपका दर्शन हुआ। उन्होंने देखा भगवान् जनार्दन अपने हाथोंमें गदा और शङ्ख लिये हुए हैं और उनका श्रीविग्रह पीताम्बरसे सुशोभित है। वे गरुडपर बैठे हुए हैं और तेजस्वी तो इतने हैं कि बारह सूर्योंका प्रकाश भी उनके सामने कुछ भी नहीं है। अधिक क्या, यदि आकाशमें एक हजार सूर्य एक साथ उदित हो जायँ तो कदाचित् उनका वह प्रकाश उन विश्वरूप परमात्माके प्रकाशके सदृश हो जाय! अनेक रूपोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत् उन श्रीहरिके श्रीविग्रहमें एकाकार रूपमें स्थित था। देवि! भगवान् श्रीहरिके ऐसे अद्भुत रूपको झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहने लगे-'भगवन्! अब मुझे आपसे किसी प्रकारके वरकी इच्छा शेष नहीं रह गयी है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि इस समय राजा दुर्जयको जिस-किसी भी भाँति मेरे आश्रमपर अपने सैनिकों एवं वाहनोंके साथ भोजन प्राप्त हो जाय। कल तो वह अपने घर चला ही जायगा।'
इस प्रकार मुनिवर गौरमुखके प्रार्थना करनेपर देवेश्वर श्रीहरि द्रवित हो गये और चिन्तन करनेमात्रसे सिद्धि प्रदान करनेवाला एक महान् कान्तिमान् ‘चिन्तामणि'रत्न उन्हें देकर वे अन्तर्धान हो गये। इधर गौरमुख भी अपने अनेक ऋषिमहर्षियोंसे सेवित पवित्र आश्रममें पधारे। वहाँ पहुँचकर मुनिने उस 'चिन्तामणि के सम्मुख विशाल प्रासाद एवं हिमालयके शिखर तथा महान् मेघके समान ऊँचे एवं चन्द्र-किरणोंके सदृश चमकसे युक्त सैकड़ों तलोंके महलका चिन्तन किया। फिर तो एककी कौन कहे, हजारों एवं करोड़ोंकी संख्यामें वैसे विशाल भवन तैयार हो गये। कारण, गौरमुखको भगवान् श्रीहरिसे वर मिल चुका था। महलोंके आस-पास चहारदीवारियाँ बन गयीं। उनके बगलमें सटे ही उपवन उन महलोंकी शोभा बढ़ाने लगे। उन उद्यानोंमें कोकिलें तथा अनेक प्रकारके पक्षी भी आ बसे। चम्पा, अशोक, जायफल और नागकेसर आदि अनेक प्रकारके बहुत-से वृक्ष उन उद्यानोंमें सब ओर दृष्टिगत होने लगे। हाथियों के लिये हथसार तथा घोड़ोंके लिये घुड़सारका निर्माण हो गया। इन सबका संचय हो जानेपर गौरमुखने सब प्रकारके भोज्य पदार्थोंका चिन्तन किया। फिर उस मणिने भक्ष्य, भोज्य, लेह्य एवं चोष्य प्रभृति अनेक प्रकारके अन्न तथा परोसनेके लिये बहुत-से स्वर्ण-पात्र भी प्रस्तुत कर दिये। ऐसी सूचना मुनिवर गौरमुखको मिल गयी। तब उन्होंने परम तेजस्व राजा दुर्जयसे कहा-'महाराज! अब आप अपने सैनिकोंके साथ महलोंमें पधारें।' मुनिकी आज्ञा पाकर राजा दुर्जयने उस परम विशाल गृहमें प्रवेश किया, जो पर्वतके समान ऊँचा जान पड़ता था। राजाके भीतर चले जानेपर अन्य सेवकगण भी यथाशीघ्र अपने-अपने गृहोंमें प्रविष्ट हो गये।
तदनन्तर जब सब-के-सब महलमें चले गये, तब फिर मुनिवर गौरमुखने उस दिव्य चिन्तामणिको हाथमें लेकर राजा दुर्जयसे कहा-'राजन्! यदि अब आप स्नान-भोजन करना चाहते हों तो मैं दास-दासियोंको आपकी सेवामें भेज दूं।' इस प्रकार कहकर द्विजवर गौरमुखने राजाके देखतेदेखते ही भगवान् विष्णुसे प्राप्त 'चिन्तामणि'को एकान्त स्थानमें स्थापित किया। शुद्ध एवं प्रभापूर्ण उस चिन्तामणिके वहाँ रखते-न-रखते हजारों दिव्य रूपवाली स्त्रियाँ प्रकट हो गयीं। उन स्त्रियोंके सभी अङ्ग बड़े सुन्दर, सुकुमार तथा अनुलेपनोंसे अलङ्कृत थे। उनके कपोल, केश और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे सोनेके पात्रोंको लेकर चल पड़ी। इसी प्रकार कार्य करने में कुशल अनेकों पुरुष भी एक साथ ही राजा दुर्जयकी सेवाके लिये अग्रसर हए। अब तरही आदि अनेक प्रकारके बाजे बजने लगे। जिस समय राजा दुर्जय स्नान करने लगे तो कुछ स्त्रियाँ इन्द्रके स्नानकालके समान ही उनके सामने भी नाचने और गाने लगीं। इस प्रकार दिव्य उपचारोंके साथ महाभाग दुर्जयका स्नानकार्य सम्पन्न हुआ।
अब राजा दुर्जय बड़े आश्चर्यमें पड़ गया। वह सोचने लगा-'अहो! यह मुनिकी तपस्याका प्रभाव है अथवा इस चिन्तामणिका?' फिर उसने स्नान किया, उत्तम वस्त्र पहने और भाँतिभाँतिके अन्नोंसे बने भोजनको ग्रहण किया। उस समय मुनिवर गौरमुखने जिस प्रकार राजा दुर्जयकी सेवा एवं सत्कार किया, वैसे ही वे राजाके सेवकोंकी सेवामें भी संलग्न रहे। राजा अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ भोजनपर बैठा ही था कि इतने में भगवान् भास्कर अस्ताचलको पधारे। आकाश लाल हो गया। अब शरद् ऋतुके स्वच्छ चन्द्रमासे मण्डित रात्रि आयी। ऐसा जान पड़ता था, मानो सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न रोहिणीनाथ उस रात्रिसे अनुराग कर रहे हों। उनके साथ ही हरित किरणोंसे युक्त शुक्र और बृहस्पति भी उदित हो गये। पर चन्द्रमाके साथ उनकी शोभा अधिक नहीं हो रही थी। क्योंकि प्राणियोंकी ऐसी धारणा है कि दूसरेके पक्षमें गया हुआ कोई भी व्यक्ति अपने भिन्न स्वभावके कारण शोभा नहीं पाता। चन्द्रमाकी चमकती हुई किरणें सबको प्रसन्न करने में पूर्ण समर्थ हैं; किंतु उनसे भी सभी प्रेम नहीं करते।
स्वयं भी भोजन-वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कृत हो चुके थे। अब उनके सोनेके लिये बहुत-से रत्नजटित पलंग भी भिन्न-भिन्न कक्षोंमें उपस्थित हो गये। उनपर सुन्दर गद्दे और चादरें भी बिछी थीं। अपने हाव-भावसे प्रसन्न करनेवाली मनोहारिणी दिव्य स्त्रियाँ भी वहाँ सपर्याके लिये तत्पर थीं। राजा दुर्जय उस महलमें गया। साथ ही अपने भृत्योंको भी जानेकी आज्ञा दी। जब सभी महलोंमें चले गये, तब वह प्रतापी राजा भी स्त्रियोंसे घिरा सुखपूर्वक शयन करनेवाले इन्द्रकी तरह सो गया।
इस प्रकार महात्मा गौरमुखके स्वागत-सत्कारसे प्रभावित, परम प्रसन्न राजा तथा उनके सभी सेवक सो गये। रात बीत जानेपर राजा दुर्जयने जगकर जब नेत्र खोले तो वे सुन्दर स्त्रियाँ, सभी बहुमूल्य महल तथा उत्तम-उत्तम पलंग सब-केसब लुप्त हो गये थे। यह स्थिति देखकर दुर्जयको बड़ा आश्चर्य हुआ। मनमें चिन्ताके बादल उमड़ आये और दुःखकी लहरें उठने लगीं। यह मणि कैसे प्राप्त हो, इस प्रकारकी चिन्ताकी लहरियाँ उसके मनमें बार-बार उठने लगीं। अन्तमें उसने निश्चय किया कि इस गौरमुख ब्राह्मणकी यह मणि मैं हठपूर्वक छीन लूँ। फिर वहाँसे चलनेके लिये सबको आज्ञा दे दी। जब मुनिके आश्रमसे निकलकर वह थोड़ी दूर गया और उसके वाहन तथा सैनिक सभी बाहर चले आये, तब दर्जयने विरोचन नामके अपने मन्त्रीको मुनिके पास भेजकर कहलवाया कि गौरमुखके पास जो मणि है, उसे वे मुझे दे दें। मन्त्रीने मुनिसे कहा-'रत्नोंके रखनेका उचित पात्र राजा ही होता है, इसलिये यह मणि आप राजा दुर्जयको दे दें।' मन्त्रीके ऐसा कहनेपर गौरमुखने क्रोधमें आकर उससे कहा-'मन्त्री! तुम उस दुराचारी राजा दुर्जयसे स्वयं मेरी बात कह दो। साथ ही मेरा यह भी संदेश कहना"अरे दुष्ट! तू अभी यहाँसे भाग जा, क्योंकि यह स्थान दुर्जय-जैसे दुष्टोंके रहने योग्य नहीं है।'
इस प्रकार द्विजवर गौरमुखके कहनेपर दुर्जयका मन्त्री विरोचन, जो दूतका काम कर रहा था, राजाके पास गया और ब्राह्मणकी कही हुई सारी बातें उसे अक्षरशः सुना दीं। गौरमुखके वचन सुनते ही दुर्जयकी क्रोधाग्नि भभक उठी। उसने उसी क्षण नील नामक मन्त्रीसे कहा-'तुम अभी जाओ और चाहे जैसे भी हो उस ब्राह्मणसे मणि छीनकर शीघ्र यहाँ आ जाओ।'
इसपर नील बहुत-से सैनिकोंको साथ लेकर गौरमुखके आश्रमकी ओर चल पड़ा। फिर वह रथसे नीचे उतरकर जमीनपर आया। तदनन्तर अग्निशालामें पहुँचकर उसने मणिको रखे हुए देखा। परम दारुण क्रूर-बुद्धि नीलके पृथ्वीपर उतरते ही उस मणिसे भी अस्त्र-शस्त्र लिये हुए अपरिमित शक्तिशाली असंख्य शूर-वीर निकल पड़े, जो रथ, ध्वजा और घोड़ोंसे सुसज्जित थे तथा ढाल, तलवार, धनुष और तरकस लिये हुए थे। (भगवान् वराह कहते हैं-) परम भाग्यवति पृथ्वि! उनमें पंद्रह तो प्रमुख वीर सेनापति थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं-सुप्रभ, दीप्ततेजा, सुरश्मि, शुभदर्शन, सुकान्ति, सुन्दर, सुन्द,
प्रद्युम्न, सुमन, शुभ, सुशील, सुखद, शम्भु, सुदान्त और सोम। इन वीर पुरुषोंने विरोचनको बहुत-सी सेनाके साथ डटा देखा। तब ये सभी शूर-वीर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीसे युद्ध करने लगे। उनके धनुष सुवर्णके समान देदीप्यमान थे। उनके पङ्खधारी बाण शुद्ध सोनेसे बने हुए थे। अब वे परम प्रसिद्ध तथा अत्यन्त भयंकर तलवारों एवं त्रिशूलोंसे प्रहार करने लगे। उस युद्धमें विरोचनके रथ, हाथी, घोड़े
पैदल लड़नेवाले सैनिकोंके आगे मणिसे प्रकट हुए वीरोंके रथ, हाथी, घोड़े एवं पदाति सैनिक डट गये और उनमें भयंकर द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया। छल-बल आदि अनेक प्रकारके युद्धोंके बावजूद विरोचनके सैनिक भयसे कम्पित हो उठे और वे भाग चले। घोर रक्तप्रवाहसे मार्ग बड़े भयंकर हो गये। दुर्जयके मन्त्री विरोचनकी तो जीवनलीला ही समाप्त हो गयी। उसके बहुतसे अनुयायी भी सैनिकोंसहित यमराजके लोकको प्रस्थान कर गये।
मन्त्री विरोचनके मर जानेपर अब स्वयं राजा दुर्जय चतुरङ्गिणी सेना लेकर युद्धक्षेत्रमें आया और मणिसे प्रकट हुए शूर-वीरोंके साथ उसका युद्ध प्रारम्भ हो गया। इस युद्धमें राजा दुर्जयकी सैन्यशक्तिका भयंकर विनाश हुआ। इधर हेतु और प्रहेतृको खबर मिली कि मेरा जामाता दुर्जय संग्राममें लड़ रहा है तो वे दोनों असुर भी एक विशाल सेनाके साथ वहाँ आ गये। उस युद्धभूमिमें जो पंद्रह प्रमुख मायावी दैत्य आये थे, उनके नाम सुनो-प्रघस, विघस, संघ, अशनिप्रभ, विद्युत्प्रभ, सुघोष, भयंकर, उन्मत्ताक्ष, अग्नितेज, बाहु, शक्र, प्रतर्दन, विरोध और भीमकर्मा विप्रचित्ति। इनके पास भी उत्तम अस्त्र-शस्त्रोंका संग्रह था। प्रत्येक वीरके साथ एक-एक अक्षौहिणी सेना थी। ये सभी दुष्ट दुर्जयकी ओरसे युद्धभूमिमें डटकर मणिसे प्रकट हुए वीरोंके साथ लड़नेके लिये उद्यत हो गये। सुप्रभने तीन बाणोंसे विघसको बींध डाला और सुरश्मिने दस बाणोंसे प्रघसको। उस मोर्चेपर सुदर्शनके पाँच बाणोंसे अशनिप्रभके अङ्ग छिद गये। इसी प्रकार सुकान्तिने विद्युत्प्रभको तथा सुन्दरने सुघोषको धराशायी कर डाला। सुन्दने अपने शीघ्रगामी पाँच बाणोंसे उन्मत्ताक्षपर प्रहार किया। साथ ही चमचमाते हुए बाणोंसे शत्रुके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। इस प्रकार सुमनका अग्निदत्तसे, सुवेदका अग्नितेजसे, सुनलका बाहु एवं शक्रसे तथा सुवेदका प्रतर्दनसे युद्ध छिड़ गया।
यों अपने अस्त्र-शस्त्रोंकी कुशलता दिखाते हुए सैनिक आपसमें युद्ध करने लगे, पर अन्तमें मणिसे प्रकट हुए योद्धाओंके हाथ सभी दैत्य मार डाले गये। अब मुनिवर गौरमुख भी हाथमें कुशा आदि लिये वनसे आश्रममें पहुँचे। दुर्जय अब भी बहुतसे सैनिकोंके साथ खड़ा था। यह देखकर गौरमुख आश्रमके दरवाजेपर रुक गये और मनही-मन विचार करने लगे-'अहो, इस मणिके कारण ही यह सब कुछ हआ और हो रहा है। अरे! यह भयंकर संग्राम इस मणिके लिये ही आरम्भ हुआ है।'
इस प्रकार सोचते-सोचते मुनिवर गौरमुखने देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही पीताम्बर धारण किये हुए भगवान् नारायण गरुडपर विराजमान हो मुनिके सामने प्रकट हो गये और बोले-'कहो!
मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ?' तब मुनिवर गौरमुखने हाथ जोड़कर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिसे कहा—'प्रभो! आप इस पापी दुर्जयको इसकी सेनाके सहित मार डालें।' मुनिके ऐसा कहते ही अग्निके समान प्रज्वलित भगवान्के सुदर्शनचक्रने सेनासहित दुर्जयको भस्म कर डाला। यह सब कार्य एक निमेषके भीतरपलक मारते सम्पन्न हो गया। फिर भगवान्ने गौरमुखसे कहा—'मुने! इस वनमें दानवोंका परिवार एक निमेषमें ही नष्ट हो गया है। अतः इस स्थानकी 'नैमिषारण्य-क्षेत्र के नामसे प्रसिद्धि होगी। इस तीर्थमें ब्राह्मणोंका समुचित निवास होगा। इस वनके भीतर मैं यज्ञपुरुषके रूपमें निवास करूँगा। ये पंद्रह दिव्य पुरुष, जो मणिसे प्रकट हुए हैं, सत्ययुगमें याज्य नामसे विख्यात राजा होंगे।'
इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और मुनिवर गौरमुख भी अपने आश्रममें आनन्दपूर्वक निवास करने लगे।