वराह महा पुराण
5-रैभ्य मुनि और राजा वसुका देवगुरु बृहस्पतिसे संवाद तथा राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन एवं उनके श्रीविग्रहमें लीन होना
राजा अश्वशिरा बोले-'मुनिवरो! मेरे मनमें एक संदेह है, उसे दूर करनेमें आप दोनों पूर्ण समर्थ हैं। उसके फलस्वरूप मुझे मुक्ति सुलभ हो सकती है।' उनके इस प्रकार कहनेपर योगीश्वर, परम धर्मात्मा कपिलमुनिने यज्ञ करनेवालोंमें श्रेष्ठ उस राजासे कहा।
कपिलजीने कहा-राजन् ! तुम परम धार्मिक हो। तुम्हारे मनमें क्या संदेह है? बताओ, उसे सुनकर मैं दूर कर दूंगा।
राजा अश्वशिरा बोले-मुने! मोक्ष पानेका अधिकारी कर्मशील पुरुष है या ज्ञानी?-मेरे मनमें यह संदेह उत्पन्न हो गया है। यदि मुझपर आपकी दया हो तो इसे दूर करनेकी कृपा करें।
कपिलजीने कहा-महाराज! प्राचीन कालकी बात है, यही प्रश्न ब्रह्माजीके पुत्र रैभ्य तथा राजा वसुने बृहस्पतिसे पूछा था। पूर्वकालमें चाक्षुष मन्वन्तरमें एक अत्यन्त प्रसिद्ध राजा थे, जिनका नाम था वसु। वे बड़े विद्वान् और विख्यात दानी थे। ब्रह्माजीके वंशमें उनका जन्म हुआ था। राजन्! वे महाराज वसु ब्रह्माजीका दर्शन करनेके विचारसे ब्रह्मलोकको चल पड़े। मार्गमें ही चित्ररथ नामक विद्याधरसे उनकी भेंट हो गयी। राजाने प्रेमपूर्वक चित्ररथसे पूछा-'प्रभो! ब्रह्माजीका दर्शन किस समय हो सकता है?' चित्ररथने कहा-'ब्रह्माजीके भवनमें इस समय देवताओंकी सभा हो रही है।' ऐसा सुनकर वे नरेश ब्रह्मभवनके द्वारपर ठहर गये। इतने में महान् तपस्वी रैभ्य भी वहीं आ गये। उनको देखकर राजा वसुके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। तदनन्तर रैभ्य मुनिकी पूजा करके राजाने उनसे पूछा-'मुने! आप कहाँ चल पड़े?'
रैभ्य मुनि बोले-'महाराज! मैं देवगुरु बृहस्पतिके पाससे आ रहा हूँ। किसी कार्यके विषयमें पूछनेके लिये मैं उनके पास चला गया था।' रैभ्य मुनि इस प्रकार बोल ही रहे थे कि इतनेमें ब्रह्माजीकी वह विशाल सभा विसर्जित हो गयी। सभी देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। अतः अब बृहस्पतिजी भी वहीं आ गये। राजा वसुने उनका स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् तीनों ही एक साथ बृहस्पतिके भवनपर गये। राजेन्द्र! वहाँ रैभ्य, बृहस्पति एवं राजा वसुतीनों बैठ गये। सबके बैठ जानेपर देवताओंके गुरु बृहस्पतिने रैभ्य मुनिसे कहा-'महाभाग! तुम्हें तो स्वयं वेद एवं वेदाङ्गोंका पूर्ण ज्ञान है। कहो, तुम्हारा मैं कौन-सा कार्य करूँ?'
रैभ्य मुनि बोले-बृहस्पतिजी! कर्मशील और ज्ञानसम्पन्न-इन दोनोंमें कौन मोक्ष पानेका अधिकारी है? इस विषयमें मुझे संदेह उत्पन्न हो गया है। प्रभो! आप इसका निराकरण करनेकी कृपा करें।
बृहस्पतिजीने कहा-मुने! पुरुष शुभ या अशुभ जो कुछ भी कर्म करे, वह सब-का-सब भगवान् नारायणको समर्पण कर देनेसे कर्मफलोंसे लिप्त नहीं हो सकता। द्विजवर! इस विषयमें एक ब्राह्मण और व्याधका संवाद सुना जाता है। अत्रिके वंशमें उत्पन्न एक ब्राह्मण थे। उनकी वेदाभ्यासमें बड़ी रुचि थी। वे प्रातः, मध्याह्न तथा सायं-त्रिकाल स्नान करते हुए तपस्या करते थे। संयमन नामसे उनकी प्रसिद्धि थी। एक दिनकी बात है-वे ब्राह्मण धर्मारण्यक्षेत्रमें परम पुण्यमयी गङ्गानदीके तटपर स्नान करनेके उद्देश्यसे गये।
वहाँ मुनिने निष्ठुरक नामके व्याधको देखकर उसे मना करते हुए कहा-'भद्र ! तुम निन्द्य कर्म मत करो।' तब मुनिपर दृष्टि डालकर वह व्याध मुस्कुराते हुए बोला-'द्विजवर! सभी जीवधारियोंमें आत्मारूपसे स्थित होकर स्वयं भगवान् ही इन जीवोंके वेशमें क्रीडा कर रहे हैं। जैसे माया जाननेवाला व्यक्ति मन्त्रोंका प्रयोग करके माया फैला देता है, ठीक वैसे ही यह प्रभुकी माया है, इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिये। विप्रवर! मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे कभी भी अपने मनमें अहंभावको न टिकने दें। यह सारा संसार अपनी जीवनयात्राके प्रयत्नमें संलग्न रहता है। हाँ, इस कार्यके विषयमें 'अहम्' अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ'-इस भावका होना उचित नहीं है। जब विप्रवर संयमनने निष्ठरक व्याधकी बात सुनी तो वे अत्यन्त आश्चर्ययुक्त होकर उसके प्रति यह वचन बोले-'भद्र! तुम ऐसी युक्तिसंगत बात कैसे कह रहे हो?'
ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मके मर्मज्ञ उस व्याधने पुनः अपनी बात प्रारम्भ की। उसने सर्वप्रथम लोहेका एक जाल बनाया। उसे फैलाकर उसके नीचे सूखी लकड़ियाँ डाल दीं। तदनन्तर ब्राह्मणके हाथमें अग्नि देकर उसने कहा'आर्य! इस लकड़ीके ढेरमें आग लगा दीजिये।'
तत्पश्चात् ब्राह्मणने मुखसे फूंककर अग्नि प्रज्वलित कर दी और शान्त होकर बैठ गये। जब आग धधकने लगी, तो वह लोहेका जाल भी गरम हो उठा। साथ ही उसमें जो गायकी आँखके समान छिद्र थे, उनमेंसे निकलती हुई ज्वाला इस प्रकार शोभा पाने लगी, मानो हंसके बच्चे श्रेणीबद्ध होकर निकल रहे हों। उस जलती हुई अग्निसे हजारों ज्वालाएँ अलग-अलग फूट पड़ी। आगके एक जगह रहनेपर भी उस लौहमय जालके छिद्रोंसे ऐसा दृश्य प्रतीत होने लगा। तब व्याधने उन ब्राह्मणसे कहा-'मुनिवर! आप इनमेंसे कोई भी एक ज्वाला उठा लें, जिससे मैं शेष ज्वालाओंको बुझाकर शान्त कर दूं।'
इस प्रकार कहकर उस व्याधने जलती हुई आगपर जलसे भरा एक घड़ा तुरंत फेंका। फिर तो वह आग एकाएक शान्त हो गयी। सारा दृश्य पूर्ववत् हो गया। अब व्याधने तपस्वी संयमनसे कहा-'भगवन् ! आपने जो जलती आग ले रखी है, वह उसी अग्निपुञ्जसे प्राप्त हुई है। उसे मुझे दे दें, जिसके सहारे मैं अपनी जीवनयात्रा सम्पन्न कर सकूँ।' व्याधके इस प्रकार कहनेपर जब ब्राह्मणने लोहेके जालकी ओर दृष्टि डाली तो वहाँ अग्नि थी ही नहीं। वह तो पुञ्जीभूत अग्निके समाप्त होते ही शान्त हो गयी थी। तब कठोर व्रतका पालन करनेवाले संयमनकी आँखें मुंद गयीं और वे मौन होकर बैठ गये। ऐसी स्थितिमें व्याधने उनसे कहा-'विप्रवर! अभी थोड़ी देर पहले आग धधक रही थी, ज्वालाओंका ओर-छोर नहीं था; किंतु मूलके शान्त होते ही सब-की-सब ज्वालाएँ शान्त हो गयीं। ठीक यही बात इस संसारकी भी है।'
'परमात्मा ही प्रकृतिका संयोग प्राप्त करके समस्त भूत-प्राणियोंके आश्रयरूपमें विराजमान होते हैं। यह जगत् तो प्रकृतिमें विक्षोभ-विकार उत्पन्न होनेसे प्रादुर्भूत होता है, अतएव संसारकी यही स्थिति है।'
'यदि जीवात्मा शरीर धारण करनेपर अपने स्वाभाविक धर्मका अनुष्ठान करता हुआ हृदयमें सदा परमात्मासे संयुक्त रहता है तो वह किसी प्रकारका कर्म करता हुआ भी विषादको प्राप्त नहीं होता।'
बृहस्पतिजीने कहा-राजेन्द्र! निष्ठुरक व्याध और संयमन ब्राह्मणकी उपर्युक्त बातें समाप्त होते ही उस व्याधके ऊपर आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। साथ ही द्विज श्रेष्ठ संयमनने देखा कि कामचारी अनेक दिव्य विमान वहाँ पहुँच गये हैं। वे सभी विमान बड़े विशाल एवं भाँतिभाँतिके रत्नोंसे सुसज्जित थे, जो निष्ठुरकको लेने आये थे। तत्पश्चात् विप्रवर संयमनने उन सभी विमानोंमें निष्ठुरक व्याधको मनोऽनुकूल उत्तम रूप धारण करके बैठे हुए देखा। क्योंकि निष्ठुरक व्याध अद्वैत ब्रह्मका उपासक था, उसे योगकी सिद्धि सुलभ थी, अतएव उसने अपने अनेक शरीर बना लिये। यह दृश्य देखकर संयमनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और वे अपने स्थानको चले गये। अत: द्विजवर रैभ्य एवं राजा वसु! अपने वर्णाश्रम-धर्मके अनुसार कर्म करनेवाला कोई भी व्यक्ति निश्चय ही ज्ञान प्राप्त करके मुक्तिका अधिकारी हो सकता है।
राजन्! यह प्रसङ्ग सुनकर रैभ्य और वसुके मनमें जो संदेह था, वह समाप्त हो गया। अत: वे दोनों बृहस्पतिजीके लोकसे अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। अतएव राजेन्द्र! तुम भी परमप्रभु भगवान् नारायणकी उपासना करते हुए अभेदबुद्धिसे उन परमप्रभु परमेश्वरकी अपने शरीरमें स्थितिका अनुभव करते रहो।।
(भगवान् वराह कहते हैं-) पृथ्वि! मुनिवर कपिलजीकी यह बात सुनकर राजा अश्वशिराने अपने यशस्वी ज्येष्ठ पुत्रको, जिसका नाम स्थूलशिरा था, बुलाया और उसे अपने राज्यपर अभिषिक्त कर वे स्वयं वनमें चले गये। नैमिषारण्य पहुँचकर, वहाँ यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणका स्तवन करते हुए उन्होंने उनकी उपासना आरम्भ कर दी।
पृथ्वी बोली-परम शक्तिशाली प्रभो! राजा अश्वशिराने यज्ञपुरुष भगवान् नारायणकी किस प्रकार स्तुति की और वह स्तोत्र कैसा है? यह भी मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं-राजा अश्वशिराद्वारा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणकी स्तुति इस प्रकार हुई जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, इन्द्र, रुद्र तथा वायु आदि अनेक रूपोंमें विराजमान हैं, उन यज्ञमूर्ति भगवान् श्रीहरिको मेरा नमस्कार है। जिनके अत्यन्त भयंकर दाढ़ हैं, सूर्य एवं चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं, संवत्सर और दोनों अयन जिनके उदर हैं, कुशसमूह ही जिनकी रोमावली है, उन प्रचण्ड शक्तिशाली यज्ञस्वरूप सनातन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ।
स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका सम्पूर्ण आकाश तथा सभी दिशाएँ जिनसे परिपूर्ण हैं, उन परम आराध्य, सर्वशक्तिसम्पन्न एवं सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके कारण सनातन श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ।
जिनपर कभी देवताओं और दानवोंका प्रभुत्व स्थापित नहीं होता, जो प्रत्येक युगमें विजयी होनेके लिये प्रकट होते हैं, जिनका कभी जन्म नहीं होता, जो स्वयं जगत्की रचना करते हैं, उन यज्ञरूपधारी परम प्रभु भगवान् नारायणको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। जो कभी हजार सिरवाले, कभी महान् पर्वतके समान शरीर धारण करनेवाले तथा कभी त्रसरेणुके समान सूक्ष्म शरीरवाले बन जाते हैं, उन यज्ञपुरुष भगवान् नारायणको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जिनकी चार भुजाएँ हैं, जिनके द्वारा अखिल जगत्की सृष्टि हुई है, अर्जुनकी रक्षाके निमित्त जिन्होंने हाथमें रथका चक्र उठा लिया था तथा जो प्रलयके समय कालाग्निका रूप धारण कर लेते हैं, उन यज्ञस्वरूप भगवान् नारायणको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।
संसारके जन्म-मरणरूप चक्रसे मुक्ति पानेके लिये जिन सर्वव्यापक पुराणपुरुष परमात्माकी मानव पूजा किया करते हैं तथा जिन अप्रमेय परम प्रभुका दर्शन योगियोंको केवल ध्यानद्वारा प्राप्त होता है, उन यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ।
भगवन्! जिस समय मुझे अपने शरीर में आपके वास्तविक स्वरूपकी झाँकी प्राप्त हुई, उसी क्षण मैंने मन-ही-मन अपनेको आपके अर्पण कर दिया। मेरी बुद्धिमें यह बात भलीभाँति प्रतीत होने लगी कि जगत्में आपके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। तभीसे मेरी भावना परम पवित्र बन गयी है।
इस प्रकार राजा अश्वशिरा यज्ञमूर्ति भगवान् नारायणकी स्तुति कर रहे थे। इतने में यज्ञवेदीसे निकलकर उनके सामने अग्निशिखाके तुल्य एक महान् तेज उपस्थित हो गया। अब इस शरीरका त्याग करनेकी इच्छासे राजा अश्वशिरा उसीमें समा गये और यज्ञपुरुष भगवान् नारायणके उस तेजोमय श्रीआपके वास्तविक स्वरूपकी झाँकी प्राप्त हुई, उसी क्षण मैंने मन-ही-मन अपनेको आपके अर्पण कर दिया। मेरी बुद्धिमें यह बात भलीभाँति प्रतीत होने लगी कि जगत्में आपके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। तभीसे मेरी भावना परम विग्रहमें लीन हो गये।