वराह महा पुराण
25-अष्टमी तिथिकी महिमाके प्रसङ्गमें मातृकाओंकी उत्पत्तिकी कथा
मुनिवर महातपा कहते हैं-राजन्! पूर्व समयकी बात है, भूमण्डलपर एक महान् पराक्रमी राक्षस था, जिसकी अन्धक नामसे ख्याति थी। ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उसका अहंकार चरम सीमापर पहुँच गया था। सभी देवता उसके अधीन हो गये थे। उसकी सेवा असह्य होनेके कारण देवताओंने सुमेरु पर्वत छोड़ दिया और उस दानवके भयसे दुःखी होकर वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस समय वहाँ आये हुए प्रधान देवताओंसे पितामहने कहा-'सुरगणो! कहो, तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम क्या चाहते हो?'
देवताओंने कहा-जगत्पते! आप चतुर्मुख एवं जगत्-पितामह हैं। भगवन्! आपको हमारा नमस्कार है। अन्धकासुरके द्वारा हम सभी देवता महान् दुःखी हैं। आप हम सबकी रक्षा करें।
ब्रह्माजी बोले-श्रेष्ठ देवताओ! अन्धकासुरसे रक्षा करना मेरे वशकी बात नहीं है। हाँ, महाभाग शंकरजी अवश्य सर्वसमर्थ हैं। हम सभी उनकी ही शरणमें चलें; क्योंकि मैंने ही उसे वर दिया था कि तुम्हें कोई भी मार न सकेगा और तुम्हारा शरीर भी पृथ्वीका स्पर्श नहीं करेगा। फिर भी उस परम पराक्रमी असुरको शत्रुओंके संहार करनेवाले भगवान् शंकर मार सकते हैं; अत: हम सबलोग उन्हीं कैलासवासी प्रभुके पास चलें।
राजन्! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सभी देवताओंके साथ भगवान् शंकरके पास गये। उन्हें देखकर भगवान् शंकरने प्रत्युत्थानादिद्वारा स्वागतकर उनसे कहा-'आप सभी देवता किस कारणसे यहाँ पधारे हैं? आप शीघ्र आज्ञा दें, जिससे मैं आपलोगोंका कार्य तुरंत सम्पन्न कर दूं।'
इसपर देवताओंने कहा-'भगवन्! दुष्टचित्त, महाबली अन्धकासुरसे आप हमारी रक्षा करें' अभी वे ऐसा कह ही रहे थे कि विशाल सेना लिये अन्धकासुर वहीं आ धमका। उस समय वह दानव पूरे साधनोंके साथ आया था। उसकी इच्छा थी कि वह युद्ध में चतुरङ्गिणी सेनाके सहारे शंकरजीको मारकर उनकी पत्नी पार्वतीका अपहरण कर ले। उसे सहसा इस प्रकार प्रहारके लिये उद्यत देखकर रुद्र भी युद्धके लिये उद्यत हो गये। सभी देवता भी उनका साथ देनेको तैयार हुए। फिर उन प्रभुने वासुकि, तक्षक और धनञ्जयको स्मरण किया और उन्हें क्रमसे अपना कङ्कण और करधनी बनाया। इतनेमें नील नामसे प्रसिद्ध एक प्रधान दैत्य हाथीका रूप धारणकर भगवान् शंकरके पास आया। नन्दी उसकी माया जान गये और वीरभद्रको बतलाया। बस! क्या था, वीरभद्रने भी सिंहका रूप धारणकर उसे तत्काल मार डाला। उस हाथीका चर्म अञ्जनके समान काला था। वीरभद्रने उसकी चमड़ी उधेड़कर उसे भगवान् शंकरको समर्पित कर दिया। तब रुद्रने उसे वस्त्रके स्थानपर पहन लिया। तभीसे वे गजाजिनधारी हुए। इस प्रकार गजचर्म पहनकर उन्होंने श्वेत सर्पका भूषण भी धारण कर लिया। फिर हाथमें त्रिशूल लेकर अपने गणोंके साथ उन्होंने अन्धकासुरपर धावा बोल दिया। अब देवता एवं दानवोंमें भीषण संग्राम प्रारम्भ हो गया। उस अवसरपर इन्द्र आदि सभी लोकपाल, सेनापति स्कन्द एवं अन्य सभी देवता भी समराङ्गणमें उतर आये। यह स्थिति देखकर नारदजी तुरंत भगवान् नारायणके पास गये और बोले-'भगवन्! कैलासपर देवताओंका दानवोंके साथ घोर युद्ध हो रहा है।'
यह सुनना था कि भगवान् जनार्दन भी हाथमें चक्र लेकर गरुडपर बैठे और युद्ध-स्थलमें पहुँचकर दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। उनके वहाँ आ जानेपर देवताओंका उत्साह कुछ बढ़ा अवश्य, किंतु उस समरमें उनका मन एक प्रकारसे म्लान हो चुका था, अत: वे सभी भाग चले। जब देवताओंकी शक्ति समाप्त हो गयी तो स्वयं भगवान् रुद्र अन्धकासुरके सामने गये। उसके साथ उनका रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया। उस समय उन प्रभुने उस दानवपर त्रिशूलसे भीषण प्रहार किया। फिर तो घायल हो जानेपर अन्धकासुरके शरीरसे जो रक्त जमीनपर गिरा, उससे उसी क्षण दूसरे असंख्य अन्धकासुर उत्पन्न हो गये। युद्धभूमिमें ऐसा अत्यन्त आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखकर परम प्रभु भगवान् रुद्रने प्रधान अन्धकासुरको त्रिशूलके अग्रभागसे बींध दिया और उसे लिये हुए नाचने लगे। शेष मायामय अन्धकासुरोंको भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे काट डाला। शूलप्रोत प्रधान अन्धकासुरके शरीरसे रक्तकी धाराएँ अब भी निरन्तर प्रवाहित हो रही थीं; अतः रुद्रके मनमें भीषण क्रोधाग्नि भड़क उठी, जिससे उनके मुखसे अग्निकी ज्वाला बाहर निकलने लगी। उस ज्वालाने एक देवीका रूप धारण कर लिया, जिसे लोग योगेश्वरी कहने लगे।
इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी अपने रूपके सदृश (ज्वालाद्वारा) अन्य शक्तिका निर्माण किया। ऐसे ही ब्रह्मा, कार्तिकेय, इन्द्र, यम, वराह, महादेव, विष्णु और नारायण-इनके प्रभावसे आठ मातृकाएँ प्रकट हो गयीं। जब श्रीहरिने पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वराहका रूप धारण किया था, उस समय जिन्हें अपनाया वे वाराही हैं। इस प्रकार ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, यमी, योगेश्वरी, माहेश्वरी और माहेन्द्री-ये आठ मातृकाएँ हैं। क्षेत्रज्ञ श्रीहरिने जिनका जिस कारणसे निर्माण हुआ था, उसपर विचार करके उनका वही नाम रख दिया। ऐसे ही काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मात्सर्य, पैशुन्य और असूया-इनकी आठ शक्तियाँ मातृका नामसे प्रसिद्ध हुईं। काम 'योगेश्वरी', क्रोध 'माहेश्वरी', लोभ 'वैष्णवी', मद 'ब्रह्माणी', मोह 'कौमारी', मात्सर्य 'इन्द्राणी', पैशुन्य 'यमदण्डधरा' और असूया 'वाराही' नामसे कही गयी हैं-ऐसा जानना चाहिये। ये कामादिगण भी भगवान् नारायणके शरीर कहे जाते हैं। उन प्रभुने जैसी मूर्ति धारण की, उनका वैसा नाम तुम्हें बता दिया। तदनन्तर इन मातृ-देवियोंके प्रयाससे अन्धकासुरकी रक्तधाराका प्रवाह सूख गया। उसकी आसुरी माया समाप्त हो गयी। फिर अन्धकासुर भी सिद्ध हो गया। राजन्! मैंने तुमसे यह आत्मविद्यामृततत्त्वका वर्णन किया है। मातृकाओंकी उत्पत्तिका यह कल्याणकारी प्रसङ्ग जो सदा सुनता है, ये माताएँ उसकी प्रतिदिन सभी प्रकार रक्षा करती हैं। राजेन्द्र ! जो मुखसे इन मातृकाओंके जन्मचरित्रका पाठ करता है, वह इस लोकमें सर्वथा धन्यवादका पात्र माना जाता है। अन्तमें उसको भगवान् शिवके लोककी प्राप्ति सुलभ हो जाती है। महाभाग ब्रह्माने उन मातृकाओंके लिये उत्तम अष्टमी तिथि प्रदान की है। मनुष्यको चाहिये कि इस तिथिमें बिल्वके आहारपर रहकर भक्तिपूर्वक सदा इनकी पूजा करे। इससे परम संतुष्ट होकर ये मातृकाएँ उसको कल्याण एवं आरोग्य प्रदान करती हैं।