21-गणेशजी की उत्पत्तिका प्रसङ्ग और चतुर्थी तिथिका

राजा प्रजापालने पूछा-महामुने! गणपतिका जन्म कैसे हुआ, उन्होंने सगुणरूप कैसे धारण किया? यह संशय मेरे हृदयके लिये कष्टप्रद बन गया है। अतः आप इसे दूर करनेकी कृपा कीजिये।

महातपा बोले-पूर्व समयकी बात हैसम्पूर्ण देवता और तपको ही धन माननेवाले ऋषिगण कार्य आरम्भ करते थे और उसमें उन्हें निश्चय ही सिद्धि प्राप्त हो जाती थी। फिर ऐसी स्थिति आ गयी कि अच्छे मार्गपर चलनेवाले लोग विघ्नका सामना करते हुए किसी प्रकार कार्यमें सफलता पाने लगे, पर निकृष्ट कार्यशील व्यक्तिकी कार्य-सिद्धि में कोई विघ्न नहीं आता। तब पितरोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके मनमें यह चिन्ता उत्पन्न हुई कि विघ्न तो असत् कार्यों में होना चाहिये। अतः इस विषयपर वे परस्पर विचार करने लगे। इस प्रकार मन्त्रणा करते-करते उन देवताओंके मनमें भगवान् शंकरके पास चलकर इस गुत्थीको सुलझानेकी इच्छा हुई। अतएव कैलास पहुँचकर उन्होंने परम गुरु शंकरको प्रणामकर विनयपूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की।

देवता बोले-देवाधिदेव! महादेव! शूलपाणि! त्रिलोचन! भगवन्! हम देवताओंसे भिन्न असुरोंके कार्यमें ही विघ्न उपस्थित करना आपके लिये उचित है, हमारे कार्यों में नहीं। देवताओंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे निर्निमेष दृष्टिसे भगवती उमाको देखने लगे। देवता भी वहीं थे। पार्वतीकी ओर देखते हुए वे मन-ही-मन सोचने लगे-'अरे, इस आकाशका कोई स्वरूप क्यों नहीं दीखता? पृथ्वी, जल, तेज और वायुकी मूर्ति तो चक्षुगोचर होती है; किंतु आकाशकी मूर्ति क्यों नहीं दीखती?' ऐसा सोचकर ज्ञानशक्तिके भण्डार परम पुरुष भगवान् रुद्र हँस पड़े। आकाशकी मूर्ति न देखकर शम्भुने जो हँस दिया, इसका अभिप्राय था-'बहुत पहले ब्रह्माजीके मुखसे वे सुन चुके थे कि शरीरधारी व्यक्तियोंकी ही मूर्ति होती है। आकाशके शरीरधारी न होनेके कारण इसकी मूर्ति असम्भव है। फिर तो उन परब्रह्म रुद्रके द्वारा पृथ्वी, जलतेजऔर वायुइन चारोंके सहयोगसे यह एक अद्भुत कार्य सम्भव हो गया। अभी हँसी बंद भी नहीं हुई थी, इतनेमें एक परम तेजस्वी कुमार प्रकट हो गया। उसका मुख तेजसे चमक रहा था। उस तेजसे दिशाएँ चमकने लगीं। भगवान् शिवके सभी गुण उसमें संनिहित थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो साक्षात् दूसरे रुद्र ही हों। वह कुमार एक महान् आत्मा था। वह प्रकट होकर अपनी सस्मित दृष्टि, अद्भुत कान्ति, दीप्त मूर्ति तथा रूपके कारण देवताओंके मनको मोहित कर रहा था। उसका रूप बड़ा ही आकर्षक था। भगवती उमा उसे निर्निमेष दृष्टिसे देखने लगीं। यह अद्भुत कार्य देखकर तथा 'स्त्रीका स्वभाव चञ्चल होता है, सम्भवत: उमाकी आँखें भी इस अनुपम सुन्दर बालकपर मुग्ध हो गयी हैं' यह मानकर भगवान् रुद्रके मनमें क्रोधका आविर्भाव हो गया। अत: उन परम प्रभुने गणेशजीको शाप दे दिया-'कुमार! तुम्हारा मुख हाथीके मुखजैसा और पेट लम्बा होगा। सर्प ही तुम्हारे यज्ञोपवीतका काम देंगे-यह नितान्त सत्य है।' इस प्रकार गणेशजीको शाप देनेपर भी भगवान शंकरका रोष शान्त नहीं हुआ। उनका शरीर क्रोधसे काँप रहा था। वे उठकर खड़े हो गये। त्रिशूलधारी रुद्रका शरीर जैसे-जैसे हिलता, वैसे-वैसे उनके श्रीविग्रहके रोमकूपोंसे तेजोमय जल निकलकर बाहर गिरने लगा। उससे दूसरे अनेक विनायक उत्पन्न हो गये। उन सभीके मुख हाथीक मुख-जैसे थे तथा उनके शरीरक आभा काले खैर-वृक्ष या अञ्जनके समान थी। वे हाथों में अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे। अब देवता व्यग्र मनसे सोचने लगे-'अरे, यह क्या हो गया? एक ही बालक ऐसा अतुलित महान् कार्य कर रहा है। हम देवताओंकी अभिलाषा अनायास ही पूरी हो गयी। पर इसके चारों ओर ये वैसे ही गण कहाँसे आ पहुँचे?'उस समय उन विनायकोंके कारण देवताओंकी चिन्ता अत्यधिक बढ़ गयी। पृथ्वीमें क्षोभ उत्पन्न हो गया। तब चार मुखोंसे शोभा पानेवाले ब्रह्माजी अनुपम विमानपर विराजमान होकर आकाशमें आये और यों कहा-'देवताओ! तुम लोग धन्य हो। यों तुम सभी तीन नेत्रवाले अद्भुत रूपधारी भगवान् रुद्रके कृपापात्र हो। साथ ही तुमने असुरोंके कार्यमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले गणेशजीको प्रणाम करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है।' उनसे इस प्रकार कहनेके पश्चात् ब्रह्माजीने भगवान् रुद्रसे कहा-'विभो! आपके मुखसे प्रकट हुआ जो यह बालक है, इसे ही आप इन विनायकोंका स्वामी बना दें। ये शेष दूसरे विनायक इनके अनुगामी-अनुचर बनकर रहें। प्रभो! साथ ही मेरी प्रार्थना है कि आपके वरप्रभावसे आकाशको भी शरीरधारी बनकर पृथ्वी आदि चारों महाभूतोंमें रहनेका सुअवसर मिल जाय। इससे एक ही आकाश अनेक प्रकारसे व्यवस्थित हो सकता है।' प्रकार भगवान् रुद्र और ब्रह्माजी बातें कर ही रहे थे कि विनायक वहाँसे चले गये। फिर पितामहने शम्भुसे कहा-'देव! आपके हाथमें अनेक समुचित अस्त्र हैं। आप ये अस्त्र तथा वर अब इस बालकको प्रदान करें, यह मेरी प्रार्थना है।' ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहाँसे चले गये। तब भगवान् शंकरने अपने सुपुत्र गणेशजीसे कहा-'पुत्र! विनायक, विघ्नहर, गजास्य और भवपुत्र-इन नामोंसे तुम प्रसिद्ध होगे। क्रूरदृष्टिवाले ये विनायक बड़े उग्र स्वभावके हैं। पर ये सब तुम्हारी सेवा करेंगे। प्रकृष्ट यज्ञ, दान आदि शुभ कर्मके प्रभावसे शक्तिशाली बनकर ये कार्यों में सिद्धि प्रदान करेंगे। देवताओं, यज्ञों तथा अन्य कार्यों में भी सबसे श्रेष्ठ स्थान तुम्हें प्राप्त होगा। सर्वप्रथम पूजा पानेका अधिकार तुम्हारा है। यदि ऐसा न हुआ तो तुम्हारे द्वारा उस कार्यकी सफलता बाधित होगी।' महाराज! जब ये बातें समाप्त हो गयीं तो भगवान् शंकरने देवताओंके साथ जलपूर्ण सुवर्णकलशोंके विभिन्न तीर्थों के जलसे उन गणेशजीका अभिषेक किया। राजन्! इस प्रकार जलभगवान् से अभिषिक्त होकर विनायकोंके स्वामी भगवान् गणेशकी अद्भुत शोभा होने लगी। उन्हें अभिषिक्त देखकर सभी देवता भगवान् शंकरके सामने ही उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।

देवता बोले-गजानन! आप गणोंके स्वामी हैं। आपका एक नाम विनायक है। आप प्रचण्ड पराक्रमी हैं। आपको हमारा निरन्तर नमस्कार है। भगवन् ! विघ्न दूर करना आपका स्वभाव है। आप सर्पकी मेखला पहनते हैं। भगवान् शंकरके मुखसे आपका प्रादुर्भाव हुआ है। लम्बे पेटसे आपकी आकृति उद्भासित होती है। हम सम्पूर्ण देवता आपको प्रणाम करते हैं। आप हमारे सभी विघ्न सदाके लिये शान्त कर दें।*

(* नमस्ते गजवक्त्राय नमस्ते गणनायक । विनायक नमस्तेऽस्तु नमस्ते चण्डविक्रम॥ नमोऽस्तु ते विघ्नहर्त्रे नमस्ते सर्पमेखल। नमस्ते रुद्रवक्त्रोत्थ प्रलम्बजठराश्रित ॥ सर्वदेवनमस्कारादविघ्नं कुरु सर्वदा।)

राजन्! जब इस प्रकार भगवान् रुद्रने महान् पुरुष श्रीगणेशजीका अभिषेक कर दिया और देवताओंद्वारा उनकी स्तुति सम्पन्न हो गयी, तब वे भगवती पार्वतीके पुत्रके रूपमें शोभा पाने लगे। गणाध्यक्ष गणेशजीकी (जन्म एवं अभिषेक आदि) सारी क्रियाएँ चतुर्थी तिथिके दिन ही सम्पन्न हुई थीं। अतएव तभीसे यह तिथि समस्त तिथियोंमें परम श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त हुई। राजन् ! जो भाग्यशाली मानव इस तिथिको तिलोंका आहारकर भक्तिपूर्वक गणपतिकी आराधना करता है, उसपर वे अत्यन्त शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैंइसमें कोई संशय नहीं है। महाराज! जो व्यक्ति इस स्तोत्रका पठन अथवा श्रवण करता है, उसके पास विघ्न कभी नहीं फटकते और न उसके पास लेशमात्र पाप ही शेष रह जाता है।