वराह महा पुराण
7-रैभ्य-सनत्कुमार-संवाद, गयामें पिण्डदानकी महिमा एवं रैभ्य मुनिका ऊर्ध्वलोकमें गमन
पथ्वीने पछा-भगवन्! मुनिवर रैभ्यने राजा । दी। परम मेधावी रैभ्यके इस प्रकार दुष्कर वसुके सिद्धि प्राप्त होनेकी बातको सुनकर क्या तपका आचरण करते समय एक महायोगी किया? इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा विमानपर आरूढ़ होकर उनके पास पधारे। है। आप उसे शान्त करनेकी कृपा करें।
भगवान् वराहने कहा-पृथ्वि! तपोधन | वह परम उज्ज्वल विमान सूर्यके समान उद्भासित रैभ्यमुनिने जब राजा वसुके सिद्धि प्राप्त होनेकी हो रहा था। त्रसरेणुके समान सूक्ष्म उस विमानपर बात सुनी, तो वे पवित्र पितृतीर्थ गया जा पहुँचे। विराजमान वह तेजोमय पुरुष भी आकारमें वहाँ जाकर उन्होंने भक्तिपूर्वक पितरोंके लिये परमाणुके तुल्य प्रतीत होता था। पिण्डदान किया। इस प्रकार पितरोंको तृप्त उस तेजोमय पुरुषने कहा-'सुव्रत! तुम करके उन्होंने अत्यन्त कठिन तपस्या आरम्भ कर दी। परम मेधावी रैभ्यके इस प्रकार दुष्कर तपका आचरण करते समय एक महायोगी विमानपर आरूढ़ होकर उनके पास पधारे। उनका शरीर तेजसे देदीप्यमान था। उन महायोगीका वह परम उज्ज्वल विमान सूर्यके समान उद्भासित हो रहा था। त्रसरेणुके समान सूक्ष्म उस विमानपर विराजमान वह तेजोमय पुरुष भी आकारमें परमाणुके तुल्य प्रतीत होता था।
तेजोमय पुरुषने कहा-'सुव्रत! तुम किस प्रयोजनसे इतनी कठिन तपस्या कर रहे हो?' इतना कहकर वह दिव्य पुरुष बढ़ने लगा और उसने अपने शरीरसे पृथ्वी एवं आकाशके मध्यभागको व्याप्त कर लिया। सूर्यके समान देदीप्यमान उसके विमानने भी सम्पूर्ण भूगोल और खगोलको एवं साथ-ही-साथ विष्णुलोकको भी व्याप्त कर लिया। तब रैभ्यने अत्यन्त आश्चर्ययुक्त होकर उस योगीसे पूछा-'योगीश्वर! आप कौन हैं ? मुझे बतानेकी कृपा करें।'
उस तेजोमय पुरुषने कहा-रैभ्य! मैं ब्रह्माजीका मानस पुत्र सनत्कुमार हूँ। रुद्र मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं। मेरा जनलोकमें निवास है। तपोधन! तुम्हारे पास प्रेमके वशीभूत होकर मैं आया हूँ। वत्स! तुमने ब्रह्माजीकी सृष्टिका विस्तार किया है। तुम धन्य हो!
मुनिवर रैभ्यने पूछा-योगिराज! आपको मेरा नमस्कार है। यह सारा विश्व आपका ही रूप है। आप प्रसन्न हों और मुझपर दया करें। योगीश्वर! कहिये, मैं आपके लिये क्या करूँ? अभी आपने मुझे जो धन्य कहा है, इसका क्या रहस्य है?
सनत्कुमारजीने कहा-रैभ्य! तुमने गयातीर्थमें जाकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए विधिपूर्वक पिण्डदानके द्वारा पितरोंको तृप्त किया है, श्राद्धकर्मके अङ्गभूत व्रत, जप एवं हवनकी भी विधि तुम्हारे द्वारा सम्पन्न हुई है। अतएव तुम ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ तथा धन्यवादके पात्र हो। इस विषयमें एक आख्यान है, वह मुझसे सुनो। विशाल नामसे विख्यात एक राजा हो चुके हैं। उनके नगरका नाम भी विशाल ही था। वे राजा नि:संतान थे, इससे शत्रुओंको पराजित करनेवाले उन परम धैर्यशाली राजा विशालके मनमें पुत्र-प्राप्तिकी इच्छा हुई। अत: उन्होंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे पुत्र-प्राप्तिका उपाय पूछा। उन उदारचेता ब्राह्मणोंने कहा-'राजन्! तुम पुत्र-प्राप्तिके निमित्त गयामें जाकर पुष्कल अन्नदान करके पितरोंको तृप्त करो। ऐसा करनेसे तुम्हें अवश्य ही पुत्र प्राप्त होगा। वह महान् दानी एवं सम्पूर्ण भूमण्डलपर शासन करनेवाला होगा।'ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर विशाल-नरेशके अङ्ग-प्रत्यङ्ग हर्षसे खिल उठे। तदनन्तर सूर्य जब मघा नक्षत्रपर आये, उस समय प्रयत्नपूर्वक गयातीर्थमें जाकर उन नरेशने विधि-विधानके साथ भक्तिपूर्वक पितरोंके लिये पिण्डदान किया। सहसा उन्होंने आकाशमें श्वेत, पीत एवं कृष्ण वर्णके तीन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। उनको देखकर राजाने पूछा-'आपलोग कौन हैं ?'
श्वेत पुरुषने कहा-राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है, साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्व ल) हैं। (मेरे साथ) ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठर कर्म किये हैं। ये ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। इनका नाम अधीश्वर है। ये कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक वयोवृद्ध ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं; अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता जो दीर्घ कालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया थातुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे-तीनों ही बलात् मुक्त हो गये। शत्रुदमन! पिण्डदानके समय 'मैं अपने पिता, पितामह और प्रपितामहको तृप्त करनेके लिये यह जल देता हूँ'-ऐसा कहकर जो तुमने जल दिया है, उसीके प्रभावसे हमलोग यहाँ एक साथ एकत्र होकर तुम्हारे समक्ष वार्तालाप कर सके हैं। अब मैं इस गया-तीर्थके प्रभावसे पितृलोकमें जा रहा हूँ। इस तीर्थमें पिण्डदान करनेके माहात्म्यसे ही ये तुम्हारे पितामह और प्रपितामह, जो पापी होनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त हो चुके थे एवं जिनके अङ्गप्रत्यङ्ग विकृत हो चुके थे, वे भी अब उत्तम लोकोंको प्राप्त हो रहे हैं। यह इस गयातीर्थका ही प्रताप है कि यहाँ पिण्डदान करनेके प्रभावसे पुत्र अपने ब्रह्मघाती पिताका भी पुनः उद्धार कर सकता है। वत्स! इसी कारण मैं इन दोनोंतुम्हारे पितामह और प्रपितामहको लेकर तुम्हें देखनेके लिये आ गया हूँ।
(सनत्कुमारजी कहते हैं-) महाभाग रैभ्य! यही कारण है कि मैंने तुमको धन्य कहा है। गयातीर्थमें एक बार जाना और पिण्डदान करना ही दुर्लभ है। फिर तुम तो प्रतिदिन यहाँ इस उत्तम कार्यका सम्पादन करते हो। मुनिवर ! तुमने गदाधररूपमें विराजमान साक्षात् भगवान् नारायणका दर्शन कर लिया है। तुम्हारे इस पुण्यके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय? द्विजवर! इस गयाक्षेत्रमें भगवान् गदाधर सदा साक्षात् विराजते हैं। इसी कारण सम्पूर्ण तीर्थों में यह विशेष प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है।
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! ऐसा कहकर महायोगी सनत्कुमारजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब मुनिवर रैभ्यने भगवान् गदाधरकी स्तुति करनी प्रारम्भ कर दी।
विप्रवर रैभ्य बोले-देवता जिनका स्तवन करते रहते हैं, जो क्षमाके धाम हैं, जो क्षुधाग्रस्त आर्तजनोंके दुःखोंको दूर करनेवाले हैं, जो विशाल नामक दैत्यकी सेनाओंका मर्दन करनेवाले हैं तथा जो स्मरण करनेसे समस्त अशभोंका विनाश कर देते हैं, उन मङ्गलमय भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो पूर्वजोंके भी पूर्वज, पुराणपुरुष, स्वर्गलोकमें पूजित एवं मनुष्योंके एकमात्र परम आश्रय हैं, जिन्होंने वामन अवतार ग्रहण करके दैत्यराज बलिके चंगुलसे पृथ्वीका उद्धार किया है, उन महाबलशाली शुद्धस्वरूप भगवान् गदाधरको मैं एकान्तमें नमस्कार करता हूँ। जो परम शुद्ध स्वभाववाले एवं अनन्त वैभवसम्पन्न हैं, लक्ष्मीने जिनका स्वयं वरण किया है, जो अत्यन्त निर्मल एवं विशिष्ट विचारशील हैं तथा पवित्र अन्त:करणवाले भूपाल जिनका स्तवन करते हैं, ऐसे भगवान् गदाधरको जो प्रणाम करता है, वह जगत्में सुखसे रहनेका अधिकारी होता है। देवता और दानव जिनके चरणकमलोंकी अर्चना करते हैं, जो हार, केयूर, बाजूबंद एवं किरीट धारण किये हुए हैं तथा समुद्र में शयन करते हैं, उन चक्रधारी भगवान् गदाधरकी जो वन्दना करता है, वही जगत्में सुखपूर्वक रहनेका अधिकारी है। जो भगवान् अच्युत सत्ययुगमें श्वेत, त्रेतामें अरुण, द्वापरमें पीत-वर्णसे अनुरञ्जित श्याम तथा कलियुगमें भौरेके समान कृष्णवर्णयुक्त विग्रह धारण करते हैं, उन भगवान् गदाधरको जो प्रणाम करता है, वह जगत्में सुखपूर्वक निवास करता है। जिनसे सृष्टिके बीजरूप चतुर्मुख ब्रह्माका प्राकट्य हुआ है तथा जो नारायण विष्णुरूप धारण करके जगत्का पालन और रुद्ररूपसे संहार करते हैं एवं इस प्रकार जो ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश–इन तीन मूर्तियोंमें विलसित होते हैं, उन भगवान् गदाधरकी जय हो। सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणोंका संयोग ही विश्वकी सृष्टि में कारण बतलाया जाता है; किंतु इस प्रकार जो एक होकर भी इन तीन गुणोंके रूपमें अभिव्यक्त होते हैं, वे भगवान् गदाधर धर्म एवं मोक्षकी कामनासे अधीर हुए मुझको धैर्य प्रदान करनेकी कृपा करें। जिस दयामय प्रभुने दुःखरूपी जल-जन्तुओं एवं मृत्युरूप ग्राहके भयंकर आक्रमणोंसे संसार-सागरमें थपेड़े खाकर डूबते हुए मुझ दीन-हीन प्राणीका विशाल जलपोत बनकर उद्धार कर दिया, उन भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वयं महाकाशमें घटाकाशकी व्याप्तिकी भाँति अपने द्वारा अपनेमें ही तीन मूर्तियोंमें अभिव्यक्त होते हैं तथा अपनी मायाशक्तिका आश्रय लेकर इस ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं एवं उसीमें कमलासन ब्रह्माके रूपमें प्रकटित होकर तेजस् आदि तत्त्वोंका प्रादुर्भाव करते हैं, उन जगदाधार भगवान् गदाधरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मत्स्यकच्छप आदि अवतार ग्रहण करके देवताओंकी रक्षा करते हैं, जिनकी जगत्में 'वृषाकपि' के नामसे प्रसिद्धि है, वे यज्ञवराहरूपी भगवान् गदाधर मुझे सद्गति प्रदान करें।* (*
गदाधरं विबुधजनैरभिष्टुतं धृतक्षमं क्षुधितजनातिनाशनम् । शिवंविशालासुरसैन्यमर्दनं नमाम्यहं हृतसकलाशुभं स्मृतौ॥
पुराणपूर्वं पुरुषं पुरुष्टुतं पुरातनं विमलमलं नृणां गतिम् । त्रिविक्रमं हृतधरणि बलोर्जितं गदाधरं रहसि नमामि केशवम्॥ विशुद्धभावं विभवैरुपावृतं श्रिया वृतं विगतमलं विचक्षणम् । क्षितीश्वरैरपगतकिल्विषैः स्तुतं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत्॥ सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजं केयूरहाराङ्गदमौलिधारिणम् । अब्धौ शयानं च रथाङ्गपाणिनं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत्॥ सितं कृते तयुगेऽरुणं विभुं तथा तृतीये नीलसुवर्णमच्युतम् । कलौ युगेऽलिप्रतिमं महेश्वरं गदाधरं प्रणमति यः सुखं वसेत् ॥ बीजोद्भवो य: सृजते चतुर्मुखं तथैव नारायणरूपतो जगत् । प्रपालयेद् रुद्रवपुस्तथान्तकृद्गदाधरो जयतु पडर्द्धमूर्तिमान्॥ सत्त्वं रजश्चैव तमो गुणास्त्रयस्त्वेतेषु विश्वस्य समुद्भवः किल । स चैक एव त्रिविधो गदाधरो दधातु धैर्यं मम धर्ममोक्षयोः॥ संसारतोयार्णवदुःखतन्तुभिर्वियोगनक्रक्रमणैः सुभीषणैः । मज्जन्तमुच्चैः सुतरां महाप्लवो गदाधरो मामुदधौ तु योऽतरत्॥ स्वयं त्रिमूर्ति: खमिवात्मनात्मनि स्वशक्तितश्चाण्डमिदं ससर्ज ह । तस्मिञ्जलोत्थासनमाप तैजसं ससर्ज यस्तं प्रणतोऽस्मि भूधरम्॥ मत्स्यादिनामानि जगत्सु चाश्नुते सुरादिसंरक्षणतो वृषाकपिः। मखस्वरूपेण स संततो विभुर्गदाधरो मे विदधातु सद्गतिम्॥)
भगवान् वराह कहते हैं-पृथ्वि! मुनिवर रैभ्य महान् बुद्धिमान् थे। जब उन्होंने इस प्रकार भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति की तो भगवान् गदाधर सहसा उनके सामने प्रकट हो गये। उनका श्रीविग्रह पीताम्बरसे शोभायमान था। वे गरुडपर स्थित थे तथा उनकी भुजाएँ शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्यसे अलंकृत थीं। वे भगवान् पुरुषोत्तम आकाशमें ही स्थित रहकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले-'द्विजवर रैभ्य! तुम्हारी भक्ति, स्तुति एवं तीर्थ-स्नानसे मैं संतुष्ट हो गया हूँ। अब तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह मुझसे कहो।'
रैभ्यने कहा-देवेश्वर! अब मुझे उस लोकमें निवास प्रदान कीजिये, जहाँ सनक-सनन्दन आदि मुनिजन रहते हैं। भगवन्! आपकी कृपासे मैं उसी लोकमें जाना चाहता हूँ।
श्रीभगवान् बोले-'विप्रश्रेष्ठ! बहुत ठीक, ऐसा ही होगा।' ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये। फिर तो प्रभुके कृपाप्रसादसे उसी क्षण रैभ्यको दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया और वे परम सिद्ध सनकादि महर्षि जहाँ निवास करते हैं, उस लोकको चले गये। भगवान् श्रीहरिका यह गदाधर-स्तोत्र रैभ्य मुनिके मुखसे उच्चरित हुआ है। जो मनुष्य गयातीर्थमें जाकर इसका पाठ करेगा, उसे पिण्डदानसे बढ़कर फलकी प्राप्ति होगी।