वराह महा पुराण
40-नृसिंह-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं-मुनिवर! पहले कहे हुए व्रतकी भाँति फाल्गुनमासके शुक्ल पक्षमें नृसिंहद्वादशीव्रत होता है। विद्वान् पुरुष उस दिन उपवास करके विधिके साथ भगवान् श्रीहरिकी आराधना करे।'ॐ नरसिंहाय नमः' कहकर भगवान् नृसिंहके चरणोंकी, 'ॐ गोविन्दाय नमः'से ऊरुओंकी, 'ॐ विश्वभुजे नम:'से कटिप्रदेशकी, 'ॐ अनिरुद्धाय नमः'से वक्षःस्थलकी, ॐ शितिकण्ठाय नमः'से कण्ठकी, 'ॐ पिङ्गकेशाय नमः' कहकर शिरोदेशकी, 'ॐ असुरध्वंसनाय नमः 'से चक्रकी तथा 'ॐ तोयात्मने नमः' कहकर शङ्खको चन्दन, फूल एवं फल आदिके द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् भगवान्के सामने दो सफेद वस्त्रोंसे सम्पन्न एक कलश रखनेका विधान है। उस कलशपर एक ताँबेका पात्र अथवा अपने वित्तके अनुसार काष्ठ या बाँसका पात्र रखकर उसके ऊपर भगवान् नृसिंहकी स्वर्णमयी मूर्ति पधरानी चाहिये। घड़ेमें रत्न डालकर द्वादशीके दिन पूजा करनेके उपरान्त भगवान्की वह प्रतिमा वेदके विशेषज्ञ ब्राह्मणको अर्पण कर दे। महामुने! इस प्रकारका व्रत करनेपर एक राजाको जो फल मिला था, उसे मैं कहता हूँ, सुनो-किम्पुरुष वर्षमें भारत नामसे विख्यात एक धार्मिक राजा रहते थे। उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम वत्स था। किसी युद्धमें शत्रुओंसे हारकर वह केवल अपनी स्त्रीके साथ पैदल ही वसिष्ठजीके आश्रमपर गया और वहीं रहने लगा। इस प्रकार वहाँ उनके आश्रमपर रहते कुछ दिन बीत गये। एक दिन मुनिने उससे पूछा'राजन् ! तुम किस प्रयोजनसे इस महान् आश्रममें निवास कर रहे हो?'
राजा वत्सने कहा-भगवन् ! शत्रुओंने मुझे परास्तकर मेरा राज्य तथा खजाना छीन लिया है। अतः असहाय होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप अपने उपदेश-प्रदानद्वारा मेरे चित्तको शान्त करनेकी कृपा कीजिये।
दुर्वासाजी कहते हैं-मुने! राजा वत्सके इस प्रकार कहनेपर वसिष्ठजीने उसे विधिपूर्वक इस द्वादशीको ही करनेका उपदेश दिया तथा उस राजाने भी सब कुछ वैसा ही किया। व्रत पूर्ण होनेपर भगवान् नृसिंह उस राजापर प्रसन्न हुए और उन परम प्रभुने उस राजाको एक ऐसा चक्र दिया, जो समराङ्गणमें शत्रुओंका संहार कर सके। उस अस्त्रके प्रभावसे महाराज वत्सने शत्रुओंको परास्तकर अपना राज्य फिर जीत लिया। राज्यपर आसीन होकर उस नरेशने एक हजार अश्वमेध यज्ञ किये और अन्तमें वह धर्मात्मा राजा भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त हुआ। मुने! पापोंका नाश करनेवाली यह नृसिंह-द्वादशी धन्य है। तुम्हारे पूछनेपर मैंने इसका वर्णन कर दिया। अब तुम इसे सुनकर अपनी इच्छाके अनुसार जैसा चाहे करो।