वराह महा पुराण
55-शुभ-व्रत
कुब्जामेश्वर-ऋषीकेश-माहात्म्य
अगस्त्यजी कहते हैं-राजन्! अब मैं व्रतोंमें उत्तम शुभसंज्ञक व्रतका वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो। महाभाग! इसके प्रभावसे भगवान् विष्णुका दर्शन सुलभ हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। मार्गशीर्षमासके प्रथम दिन इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। इसमें दशमीको एक समय भोजन करनेका नियम है। उस दिन स्नान करके दोपहरमें भगवान् विष्णुकी पूजा करे। एकादशीके दिन उपवासकर ब्राह्मणोंको विधिके साथ यव देना चाहिये। उस समय दान, होम एवं अर्चनइन सभी क्रियाओंमें सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। राजेन्द्र ! अगहन, पूस, माघ एवं फाल्गुन-इन चार महीनोंमें ऐसे ही नियमोंका पालन करना समुचित है। उपवास करके पूजा सम्पन्न करे। फिर विद्वान् पुरुष चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ एवं आषाढ़-इन चार महीनोंमें उसी तरह संयमपूर्वक व्रत करे। इस चौमासेमें ब्राह्मणोंके लिये प्रीतिपूर्वक पात्रसहित सत्तू दान करना चाहिये। श्रावण, भाद्रपद और आश्विनइन तीन महीनोंमें अगहनमासमें तैयार होनेवाले धानको बाँटनेका विधान है। इन तीन मासोंकी अवधि कार्तिक आरम्भ होनेके पूर्वतक मानी जाती है। इन महीनोंमें भी पूर्व-जैसे ही उपवास करके पूजा करनेका नियम है। दशमीके दिन संयमशील एवं पवित्र रहे। एकादशीके दिन बुद्धिमान् व्यक्ति मासके नामका उच्चारण करके भक्तिके साथ भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। द्वादशीके दिन व्रतको समाप्त करे।
राजन्! एकादशीके दिन पर्वत एवं पातालके रूपसे अङ्कित पृथ्वीको सुवर्णमयी प्रतिमाके पूजन एवं दानका विशेष महत्त्व है। भगवान् श्रीहरिके सामने उस प्रतिमाको स्थापितकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे ढक दे, पासमें बीज बिखेर दे और रातमें जागरण करे। फिर प्रात:काल चौबीस ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर प्रत्येक ब्राह्मणको गाय, दो वस्त्र, सुवर्णमयी अंगूठी तथा कुण्डल आदि आभूषण दे। राजन्! यदि व्रती पुरुष राजा है तो वह प्रत्येक ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार भरण-पोषणकी व्यवस्था कर दे और दक्षिणामें सुवर्णसे बनी हुई पृथ्वीकी प्रतिमा, दो गौ और दो वस्त्र दे। अथवा अपनी सम्पत्तिके अनुसार चाँदीकी पृथ्वी बनवाये और भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए उसे ब्राह्मणोंको अर्पण कर दे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भोजन, छाता और खड़ाऊँ भी दे। तत्पश्चात् प्रार्थना करे-'भगवान् कृष्ण, दामोदर, श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' राजन! इस व्रतके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। फिर भी एक प्रसङ्ग सुनाता हूँ।
सत्ययुगमें एक ब्रह्मवादी राजा थे। उन्होंने ब्रह्माजीसे पुत्र-प्राप्तिका उपाय पूछा। तब ब्रह्माजीने उन्हें यह व्रत बता दिया और राजा इस व्रतको करनेमें संलग्न हो गये। राजन्! व्रत समाप्त हो जानेपर विश्वात्मा श्रीहरि राजाके सामने पधारे और कहा-'राजन्! तुम मुझसे वर माँगो।'
राजाने कहा-'देवेश! मुझे ऐसा पुत्र देनेकी कृपा कीजिये, जो वैदिक मन्त्रोंका पूर्ण जानकार, दूसरोंका यज्ञ करानेवाला, स्वयं यज्ञ करनेमें तत्पर, कीर्तिसम्पन्न, दीर्घायु, असंख्य सद्गुणोंसे युक्त, ब्राह्मणोंमें निष्ठा रखनेवाला तथा शुद्ध अन्त:करणसम्पन्न हो तथा जहाँ पहँच जानेपर फिर सोच करनेका अवसर सामने नहीं आता, वह मोक्ष प्रदान कर दे।' इसपर श्रीहरि 'एवमस्तु'-कहकर अन्तर्धान हो गये। अब राजाके घर समयानुसार पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम 'वत्सश्री' रखा गया। वह वेद-वेदाङ्गका पूर्ण जानकार था। भगवान् विष्णुके प्रसादस्वरूप उस प्रतापी पुत्रको पाकर राजा तपस्या करनेके विचारसे निकल पड़े। वे हिमालय पर्वतपर इन्द्रियोंको वशमें करके तथा निराहार रहकर भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए इस प्रकार स्तुति करने लगे।
राजाने कहा-क्षर एवं अक्षर-अखिल जगत् जिनका रूप है, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं, देहधारियों के लिये परम पद, इन्द्रियोंके अविषय, विश्वकी रक्षा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा जलमय आकृति बनाये हुए हैं, उन भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। देवताओं एवं दानवोंके निरन्तर प्रार्थना करनेपर सृष्टि करनेके विचारसे आपने इस जगत्की रचना की है। भगवन्! आप सदा एक कूटस्थ रूपसे आसीन रहकर इच्छामात्रसे संसारको सृष्टि करते हैं। प्रभो!
आप कच्छप एवं नृसिंह आदि अनेक अवतार धारण कर चुके हैं। पर आपके अवतार लेनेकी यह बात भी मायिक ही है, तथ्य नहीं।( द्रष्टव्य-'अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥' (गीता ४।६)
नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि , वरेश, शम्भु एवं विबुधारिनाशन आदि नामोंसे सम्बोधित होनेवाले भगवन्! आपको मेरा निरन्तर प्रणाम है। विष्णो! आप स्वयं आदि यज्ञपुरुष हैं। यज्ञकी सामग्री हवि आदि आपका ही रूप है। पशु, ऋत्विक् और घृत-ये सब आप ही हैं। कमलनेत्र! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये।
स्तुतिके अन्तमें परम प्रभु प्रसन्न हुए। वे एक कुबड़े ब्राह्मणका वेष धारणकर वहाँ आये। उनके वहाँ पधारते ही आमका वृक्ष भी वैसा ही कुबड़ा बन गया। उन राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसे विशाल वृक्षका यह छोटा रूप कैसे हो गया-फिर सोचा कि परम प्रभुकी संनिधिका यह परिणाम है। फिर उन्होंने ब्राह्मण-वेषधारी प्रभुको प्रणाम किया। साथ ही कहा–'भगवन्! आप परम पुरुष परमात्मा हैं। अवश्य ही मुझपर कृपा करनेके लिये आपका यहाँ पधारना हुआ है। हरे! अब आप अपने वास्तविक स्वरूपका दर्शन करानेकी कृपा कीजिये।'
जब राजाने इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे प्रार्थना की, तो वे शङ्ख, चक्र एवं गदा हाथमें लिये हुए सौम्य रूप धारणकर उनके सामने विराजमान हो गये और यह वचन कहा'राजेन्द्र ! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, वह मुझसे माँग लो।' भगवान् श्रीहरिके यों कहनेपर राजाकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। साथ ही कहा-'देवेश! आप मुझे मोक्ष देनेकी कृपा करें।' राजाकी ऐसी बात सुनकर पुनः श्रीभगवान् बोले-'राजन्! मेरे यहाँ आनेपर इस विशाल आम्रके वृक्षमें जो कुब्जत्व आ गया है, इसके परिणामस्वरूप यह स्थान कुब्जाम्रक (ऋषिकेशका नामान्तर) तीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगा। इस उत्तम तीर्थमें ब्राह्मण अथवा पशु-पक्षी आदि योनिवाले भी यदि अपने शरीरका त्याग करेंगे तो उनको ले जानेके लिये पाँच सौ दिव्य विमान उपस्थित होंगे और वहाँके उन योगियोंकी मुक्ति हो जायगी।'
महाराज! इस प्रकार कहकर भगवान् जनार्दनने शङ्खके अग्रभागसे राजाका स्पर्श किया। केवल स्पर्श होते ही उन नरेशको परम निर्वाण पद प्राप्त हो गया। अतएव तुम भी उन परम प्रभुकी शरण ग्रहण करो, जिससे शोक करनेके योग्य पद तुम्हें पुनः प्राप्त न हो सके। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर यह चरित्र पढ़ेगा, उसे भगवान् श्रीहरि धर्म एवं मोक्ष प्रदान करेंगे। राजन्! जो इस परम पवित्र शुभव्रतको करेगा, उसे इस संसारमें सम्पूर्ण सुखसम्पत्ति और भोग सुलभ होंगे एवं आयु समाप्त होनेपर वह भगवान्में लीन हो जायगा।