48-कल्कि-द्वादशीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं-मुने! पूर्वकथित व्रतोंकी भाँति ही भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी होती है, उस तिथिमें कल्कि-व्रत करना चाहिये। इसमें विधिपूर्वक संकल्पकर देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार अर्चना करनी चाहिये।'ॐ कल्कये नमः','ॐ हृषीकेशाय नमः', 'ॐ म्लेच्छविध्वंसनाय नमः', 'ॐ शितिकण्ठाय नमः', 'ॐ खड्गपाणये नमः', 'ॐ चतुर्भुजाय नमः', तथा 'ॐ विश्वमूर्तये नमः' कहकर क्रमश: भगवान् कल्किके चरण, कमर, उदर, कण्ठ, भुजा, हाथ एवं सिरकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष पहलेके समान ही सामने कलश स्थापित कर उसपर भगवान् कल्किकी सुवर्णनिर्मित प्रतिमा स्थापितकर उसके ऊपर एक स्वच्छ वस्त्र लपेटकर चन्दन और पुष्पसे उस प्रतिमाको अलङ्कृत करे। पुनः प्रात:काल उसे किसी शास्त्रके ज्ञाता ब्राह्मणको दान कर दे।

मुनिवर! इस प्रकार यह व्रत करनेपर जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो-बहुत पहले काशीपुरीमें विशाल नामक एक पराक्रमी राजा थे। बादमें उनके गोत्रके व्यक्तियोंने ही उनके राज्यको छीन लिया। अब वे गन्धमादन पर्वतके पवित्र बदरीवनके क्षेत्रमें चले गये और तप करने लगे। इसी समय किसी दिन श्रीनरनारायणनामक पुराण एवं परम प्रसिद्ध ऋषि वहाँ पधारे। उन दोनों देवताओंने, जिन्हें सम्पूर्ण देवगण नमस्कार करते हैं और जिनके आगे किसीकी शक्ति काम नहीं देती, उस समय राजा विशालको देखा और मनमें विचार किया कि यह राजा बहुत पहलेसे यहाँ आया है और परब्रह्म परमात्मा विष्णुका निरन्तर ध्यान कर रहा है। अतः नर-नारायणने प्रसन्न होकर उन निष्पाप नरेशसे कहा-'राजेन्द्र! हमलोग तुम्हारी कल्याणकामनासे वर देने आये हैं। तुम हमसे कोई वर माँग लो।'

राजा विशालने कहा-आप दोनों कौन हैं, यह मैं नहीं जानता। फिर किसके सामने वर पानेकी प्रार्थना करूँ। मैं जिनकी आराधना करता हूँ, मेरी उन्हींसे वर-प्राप्तिकी हार्दिक इच्छा है। राजाके इस प्रकार कहनेपर नर-नारायणने उनसे पूछा-'राजन्! तुम किसकी आराधना करते हो? अथवा कौन-सा वर पानेकी तुम्हें इच्छा है? हमलोग जानना चाहते हैं, तुम इसे बताओ।' ऐसा पूछनेपर राजा विशाल बोले-'मैं भगवान् विष्णुको आराधना करता हूँ' और फिर वे चुपचाप बैठ गये। तब नर-नारायणने पुन: उनसे कहा-'राजन्! उन्हीं देवेश्वरकी कृपासे हम तुम्हें वर देनेके लिये आये हैं। तुम वर माँगो-तुम्हारे मनमें क्या अभिलाषा है?'

राजा विशालने कहा-अनेक प्रकारकी दक्षिणासे सम्पन्न होनेवाले यज्ञ करके मैं भगवान् यज्ञेश्वरकी उपासना करना चाहता हूँ। आप वर देकर इसी मनोरथको पूर्ण करें। उस समय राजाके पास नर और नारायणदोनों महाभाग विराजमान थे। उनमेंसे नरने कहा-ये भगवान् नारायण हैं। अखिल जगत्को मार्ग दिखाना इनका प्रधान काम है। संसारकी सृष्टि करनेमें निपुण ये प्रभु मेरे साथ तपस्या करनेके विचारसे इस बदरीवनमें आ गये हैं। मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन और परशुराम-इन सब रूपोंसे पूर्वसमयमें इनका अवतार हो चुका है। इनकी शक्ति अपरिमेय है। फिर ये ही महाराज दशरथजीके घर राजा राम हुए। उस समय इनका रूप महान् आकर्षक था। उस समय म्लेच्छ राक्षसोंको मार पृथ्वीका भार दूर कर सुखी किया था। कभी पापियोंसे भयभीत होकर नरसमुदायने इनकी स्तुति की थी। उस अवसरपर इन्होंने नरसिंहरूपसे अवतार लिया था। बलिको मोहनेके निमित्त वामन तथा क्षत्रियोंके हाथसे राज्य वापस करनेके लिये परशुराम ये बन चुके हैं। दुष्ट शत्रुओंको दमन करनेके लिये इन्होंने कृष्णका अवतार धारण किया है। अतः पण्डितजन इनकी उपासना करते हैं। यदि पुत्र-प्राप्तिकी कामना हो तो बुद्धिमान् पुरुष इनके बालकृष्ण-रूपकी उपासना करे। रूपकी इच्छा करनेवाला इनके बुद्धावतारकी तथा शत्रुका संहार चाहनेवाला कल्कि अवतारकी उपासना करे-यह संशयशून्य सिद्धान्त है।

इस प्रकारकी बातें स्पष्ट करके मुनिवर नरने राजा विशालको भगवान् हरिकी यह द्वादशी बतला दी। वे राजा इस व्रतको सम्पन्न करने में संलग्न भी हो गये। फलस्वरूप वे चक्रवर्ती राजा हुए। मुने! उन्हीं राजा विशालसे सम्बन्ध रखनेके कारण यह बदरीवन 'विशाल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वे नरेश इस जन्ममें सुखपूर्वक राज्यकर अन्तमें बदरीवनमें गये, जहाँ अनेक प्रकारके यज्ञ करके भगवान् नारायणके परम पदको प्राप्त किया।